चित्रगुप्त (१)
हमारे भीतर कुछ है, हमारे भीतर कोई है जो साक्षी है। वह संलिप्त नहीं है, पर वह देख रहा है। वह बोलता नहीं है, वह दखल भी नहीं देता, वह हमारी अनुभूतियों और गतिविधियों के संकुल का अंग भी नहीं है। पर उसके प्रेक्षण की एक मौजूदगी है। वह हमारे होने का एक सबसे अंतरंग पहलू है। हमारे चित्त का चित्त। हृदय नहीं है वह, चेतना है। जाग्रति है।
और जबकि लोग चेतना-प्रवाह की, stream of consciousness की बात करते हैं, वह हमारी भावनाओं की तरह बह नहीं रहा। वह विचारों की धारा की तरह दूरियां नहीं नाप रहा और न विचारधारा की तरह दूरियां बना रहा। वह हमारे अनुभवों और संवेदनाओं की सरिताओं-सा दौड़ भी नहीं रहा। वह सिंहासनस्थ है और बिना हमारे जीवन-नाट्य में कोई भूमिका निभाए, बिना हमारे किसी राग-द्वेष से कोई रिश्ता कायम किए हमें देख भर रहा है।
और उसका देखना दर्शक होना नहीं है, दृष्टा होना है। हमारे तमाम परिवर्तनों के बीच वही एक स्थिर है- कौन है वह अज्ञात ज्ञाता? कौन है वह अनदेखा दृष्टा? हम सबको धोखा दे सकते हैं, देते रहते हैं पर उसे धोखा देना असंभव है। आप कितनी गोपनीयता बरतेंगे, उससे बच नहीं सकेंगे। आप स्वयं को छल सकते हो, छलते ही रहते हो पर आपके भीतर के सभी फुसफुसाते तहखानों तक उसकी पहुंच है। उस मामले में आप विकल्पहीन हो।
उसके यहां आपके सारे किए धरे के चित्र हैं। आप के विचार और मन्तव्य, आपकी प्रक्रियाएं और क्रियाएं वहां चित्रों में बदलती जाती है। आपका सारा अमूर्त उसके समक्ष मूर्त है।
अपने भीतर के इस गेस्टापो से आपको भय नहीं लगता क्योंकि इसकी इतनी अनाक्रामक उपस्थिति है। और यह गुप्तचर है कि गवाह है कि न्यायाधीश है, आपको यह भी नहीं पता?
उस अपरिचय के कारण आपको लगता है कि वह कहीं दूर है। जीवनान्त के बाद परलोक की किसी दूरी में। पर वह जो दूरी है, वह एक अन्तराल की, एक गैप की सूचक है। जब वह अन्तराल है तभी वह एक dispassionate तरह के निर्णय दे सकता है। वह आप को यम की किसी दुनिया में सुदूर काम करता बताया गया है, पर वह आपकी सबसे घनिष्ठ सचाई है।
उसका चित्र गुप्त है, पर वह आपकी वीडियो लगातार बना रहा है।
चित्रगुप्त (२)
अंतराल अवलोकन को संभव बनाता है। यदि हम दर्पण से चिपक ही जायें तो हमारा अक्स हमें दिखेगा ही नहीं। चित्रगुप्त जो देखते हैं उससे अलग खड़े होते हैं। खड़े नहीं बैठे। वे अवलोकनात्मक भगवान हैं। किन्तु गैर प्रतिक्रियात्मक। नॉन-रिएक्टिव। निर्वैयक्तिक प्रेक्षक।
उनको (सिंहासन पर ) बैठा हुआ दिखाया जाता है।उसे वही समझ सकता है जो zazen को पहचानता है। यह एक जापानी अवधारणा है। zazen का अर्थ है just sitting, सिर्फ बैठना। शब्दों, विचारों, छवियों और भावनाओं को गुजरते देखना बिना उनमें संसक्त हुए। जीवन की आपाधापी में, भागादौड़ में लगे हुए हम इस बैठने का मूल्य कैसे पहचानेंगे?
इसका अर्थ किसी तरह की उदासीनता नहीं है। वे कोई वैरागी नहीं हैं। सो तो उनकी दो दो पत्नियाँ हैं।वे ध्यानस्थ भी नहीं हैं, उनकी दृष्टि किसी एक त्राटक बिन्दु पर एकस्थ नहीं है। अनुभवों की खुली जागरूक विशालता उनकी पहचान है।
उन्हें कोल्ड समझने की भ्रांति में नहीं पड़ें। यदि वे हमारे दुख सुख में स्वयं लिप्त हो जाएँ तो हमारी मदद नहीं कर सकेंगे। उन्हें एक अलग आयाम में होना है ताकि वे यथार्थ को उसकी समग्रता में देख सकें और हमारी संकीर्णता उन्हें, उनके निर्णयों को दूषित न कर सकें।
और हम उन्हें देखे बिना ही लगातार उनके आर-पार देखते रहते हैं, जैसे बिना आईने के अपना चेहरा देखने की कोशिश कर रहे हों। हम जल में तैरती मछली हैं जो जलराशि के प्रति, उस सिन्धु के प्रति अनभिज्ञ है जिससे उसका अस्तित्व है।
इस परिवर्तनशील संसार में चित्रगुप्त स्थिर बिंदु हैं। वे ऐसा पर्दा हैं जिस पर फिल्म कहें कि चलचित्र चलते हैं, लेकिन जो स्वयं उस पर दिखाई देने वाली चीज़ों से कभी नहीं बदलता।
कायस्थों को नौकरशाही में चिन्हित किया जाता रहा। पर चित्रगुप्त किसी नौकरशाह की तरह निर्णय लेने नहीं बैठते हैं। वे केवल वही पढ़ते हैं जो कर्मों के स्वाभाविक परिणाम की तरह लिखा है। वास्तविकता की पुस्तक से ही पढ़े जाते परिणाम।
इन चित्रगुप्त को अपने भीतर की स्वयं प्रकाशमान प्रकटीकरणशील और स्वयं के प्रति पारदर्शी चेतना की तरह देखिए और यों कि यह जितना आत्मन् है उतना ब्रह्मन्।
चित्रगुप्त की आराधना तब ही है जब हमें इस चेतना की चेतना हो। एक meta-consciousness हो। जिन्होंने यह सिद्ध कर लिया उन्होंने बिना एनेस्थीसिया के अपने पर ऑपरेशन होते हुए देखा। उन्होंने वह साक्षी भाव सिद्ध कर लिया जो चित्रगुप्त होने की पारिभाषिकता के अधिक समीप है।
इस चित्रगुप्त की सिद्धि ही वास्तविक स्वतंत्रता है।
चित्रगुप्त (३)
हमारा जीवन एक थियरी नहीं है, एक पोर्ट्रेट है। सिद्धांत नहीं, एक चित्र है। यह चित्र कुछ टुकड़े टुकड़े सवालों और उनके उतने ही खंडित उत्तरों से बना है। वे इस चित्र का ही अंग हैं। अस्तित्व सार से पहले आता है, यह बात सार्त्र जैसे दार्शनिक बहुत पहले से करते रहे हैं। हम लगातार उस जीवन में से कुछ सिद्धांत निकालने की कोशिश करते रहते हैं और उनके अंतर्विरोधों से उलझते रहते हैं। सिद्धांत व्यापक सामान्यीकरण है। कि महात्मा गाँधी अहिंसा और बुद्ध करुणा हैं- पर हम भूल जाते हैं कि उनके जीवन की अपनी पर्टिकुलेरिटी है। चित्रगुप्त नहीं भूलते।
उन्हें यह अहसास है कि आप एक चित्रकार के चित्र की तरह रचे गये हो। और आपका पोर्ट्रेट कोई कारखाने का असेंबली लाइन उत्पादन नहीं है। उसमें रचयिता की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं।
निश्चय ही आप एक निरीक्षित और परीक्षित जीवन जी रहे हो, पर वह निरीक्षण-परीक्षण चित्रगुप्त का है। चित्र में, वे जानते हैं कि, उभरा हुआ आकार ही सब कुछ नहीं होता। उसमें पृष्ठभूमि का भी खेल है। उसमें प्रकाश और छाया के समावेशन भी हैं और फ्रेम की भी अपनी भूमिका है। आनुवंशिकी सिर्फ एक फ्रेम देती है पर उसके बाद उस चित्र में अपने संकल्प से भी रंग आते हैं और कई अन्य इंप्रेशंस भी स्थान पाते हैं।
चित्रगुप्त की गेज़ है पर वे हमारा कोई संदर्भ-च्युत विश्लेषण नहीं करने जा रहे। अस्तित्ववादी दार्शनिक मार्टिन हीडेग्गर इसे ही शायद being-in-the world कहते होंगे। यहाँ बिइंग की अन्त: क्रीड़ा संसार से होती रहती है। यह संसृति, यह प्रकृति, यह जीवन हमें रचता है। हम पर वक़्त की मार पड़ती है। हम उसे स्ट्राइक समझते हैं पर हो सकता है कि वह स्ट्रोक हों, चित्रकार के ब्रश के।
जीवन की कुछ कच्ची तात्कालिकताएँ हैं जिन्हें लेकर हम अपने ही आदर्श पुरुषों की आलोचनाएँ किया करते हैं क्योंकि वे हमारे सिद्धांत के अनुकूल नहीं पड़ते। बल्कि होता यह है कि हम ऐसे पुरुषों की जो मूर्ति अपने मन में धारण करते हैं, वह भी हमारे सिद्धान्त के अनुरूप हो, यह कोशिश रहती है। एक बड़ी हद तक वह होती भी है, पर कोई भी चित्र कई टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं से बनता है, उसमें अस्तित्व की बहुत-सी झुर्रियाँ होती हैं। संघर्ष, असफलताएँ और ख़ामियाँ।
और चित्रगुप्त उस पूरे चित्र को गुप्त ही रखते हैं। उसके आधार पर इसका सार्वजनिक मखौल नहीं उड़ाने लगते। हम लोग चीजों को सरलीकृत करना चाहते हैं और हमारे हिसाब से चीजों का जितना समास हो सके, उतना अच्छा। इतना सामासिक कि एक सूत्र में बदल जाए।
लेकिन हमारे ‘चित्र विचित्र गुपित्र मुनि’ का कहना है कि जीवन सूत्र नहीं है, चित्र है।समास नहीं है, व्यास है।
विद ऑल इट्स डिटेल्स।
चित्रगुप्त(४)
चित्रगुप्त जब शाश्वत साक्षी हैं तब उनकी सबसे बड़ी विशेषता एक स्वतंत्रता देना है। यहीं वह ‘बिग ब्रदर इज़ वाचिंग यू’ वाले आर्वेलियन डिक्टेटर से भिन्न हो जाते हैं।
यानी यदि वे साक्षी हैं तो वे हमारी तरह प्रतिक्रियात्मक तादात्म्य में फँसे नहीं हैं। दुख के प्रति हमारी प्रतिक्रियाएँ अक्सर अपनी असुविधा को मैनेज करने के बारे में होती हैं। चित्रगुप्त दुख को उससे अभिभूत हुए बिना स्पष्ट रूप से देखने वाले हैं जिससे अधिक कुशल और स्थायी और करुणामय क्रिया संभव होती है। शल्य चिकित्सक को स्थिर हाथों की आवश्यकता होती है; चित्रगुप्त वही स्थिरता हैं। सच्ची करुणा अनासक्त अवलोकन के उसी चित्रगुप्तत्व से उत्पन्न होती है।
और इसलिए चित्रगुप्त अंतिम प्रलय के दिनों में, जब विश्व न तो किसी धमाके और न किसी सिसकी से खत्म हुआ हो, बल्कि वह किसी ईश्वरीय मजिस्ट्रेट के अपनी टेबल पर एक हथौड़ा बजाने के साथ हमेशा के लिए शान्त हो गया हो, न्याय करने वाले नहीं हैं। कि क़यामत के किसी दिन जब किसी भयावह बॉलीवुड मूवी की तरह सभी मुर्दे जीवित उठ खड़े हों। कि आकाश फटे और उसके साथ उस न्यायाधीश के सामने एक ब्रह्मांडीय पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन शुरू हो जिसमें हरेक को न्याय के लिए क़तार में खड़ा होना है। चित्रगुप्त का काम नहीं है खरबों की उस अराजक भीड़ को सँभालना कि जिसमें आदमी भी होंगे और डायनासॉर भी। कि जिसमें एक गुहामानव एक जेन ज़ी से बहस कर रहा हो।
चित्रगुप्त उस न्याय में हैं जो कर्म के साथ ही जन्म ले लेता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे क्राइम एंड पनिशमेंट के नायक के द्वारा की गई हत्या के साथ दंड जन्मता हो।जैसे रस्कोलनिकोव के द्वारा हत्या के साथ ही उसका दंड उसकी आत्मा में शुरू हो जाता है, वैसे ही चित्रगुप्त हर गलत कर्म के साथ हमारे भीतर जाग उठते हैं, हमारी अंतरात्मा में एक पीड़ा, एक सवाल, एक हिसाब के रूप में।
चित्रगुप्त हमारी अंतरात्मा हैं—वह चेतना जो हर विचार, हर कर्म, हर इरादे को देखती है और उसे तुरंत तौलती है। यह वह आंतरिक साक्षी है जो किसी बाहरी न्याय की प्रतीक्षा नहीं करता। जैसे ही कोई गलत कर्म होता है—चाहे वह एक छोटा सा झूठ हो, एक चोरी, या रस्कोलनिकोव की तरह एक हत्या—चित्रगुप्त का लेखा-जोखा शुरू हो जाता है। यह लेखा-जोखा कोई कागज़ी किताब में नहीं लिखा जाता, बल्कि आत्मा की गहराइयों में लिखा जाता है जहाँ अपराधबोध, पछतावा, और आत्म-निंदा की लहरें उठने लगती हैं। आत्मा में एक भूकंप आता है। उसका आंतरिक चित्रगुप्त—उसकी अंतरात्मा—उसे तुरंत दोषी ठहराती है। वह बुखार, बेचैनी, और दुःस्वप्नों में डूब जाता है। यह कोई बाहरी जज नहीं है; यह उसकी अपनी चेतना है, जो हर पल उसे उसके कर्म का दर्पण दिखा रही है। जब हम कोई गलत काम करते हैं, हमारी अंतरात्मा हमें तुरंत उसका दर्पण दिखाती है। यह दर्पण कभी-कभी इतना स्पष्ट होता है कि हम उससे बच नहीं सकते। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति अपने परिवार को धोखा देता है, वह बाहर से मुस्कुरा सकता है, लेकिन भीतर से वह टूट रहा होता है। यह चित्रगुप्त का काम है—वह हमें हमारी सच्चाई से रू-ब-रू कराते हैं।
मनुष्य अपने कर्मों के साथ उनके दंड को जन्म देता है। यह दंड हमेशा बाहरी नहीं होता—जैसे जेल, सामाजिक बहिष्कार, या सजा। अधिकतर, यह दंड आंतरिक होता है। एक छोटा सा उदाहरण लें: मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने मित्र से झूठ बोलता है। वह सोचता है कि उसका झूठ छोटा है, कि कोई नुकसान नहीं हुआ। लेकिन जैसे ही वह झूठ बोलता है, उसके भीतर एक बेचैनी शुरू होती है। वह अपने मित्र की आँखों में देखने से कतराता है। वह रात को सोते समय उस पल को याद करता है और असहज हो जाता है। यह चित्रगुप्त का काम है—वह तुरंत आत्मा में एक निशान छोड़ देते हैं, एक ऐसा निशान जो मिटाया नहीं जा सकता, जब तक कि पश्चाताप या सुधार के द्वारा उसका प्रायश्चित न हो जाए।
या शायद वह भी एक अधूरा उदाहरण है क्योंकि मानवता के कई अपराधी ऐसे हैं जिनके भीतर का चित्रगुप्त मर गया है। जब किसी की अंतरात्मा इतनी कुंद हो जाती है कि वह गलत कर्म करने पर भी अपराधबोध महसूस नहीं करती? यह एक भयावह स्थिति है, क्योंकि यह वह अवस्था है जहाँ मनुष्य अपनी मानवता से कट जाता है। भारतीय दर्शन में इसे “अविद्या” (अज्ञान) या “माया” की गहरी परतों में डूबना कहा जाता है। ऐसे लोग अपने कर्मों के परिणामों को अनदेखा कर देते हैं। उदाहरण के लिए, एक भ्रष्ट राजनेता जो बार-बार झूठ बोलता है, या एक व्यापारी जो दूसरों का शोषण करता है, अपनी अंतरात्मा को इतना दबा देता है कि उसे कोई अपराधबोध नहीं होता। लेकिन क्या इसका मतलब है कि चित्रगुप्त वास्तव में मर चुके हैं? शायद नहीं। भारतीय दर्शन कहता है कि चित्रगुप्त कभी पूरी तरह मरते नहीं; वे आत्मा की गहराइयों में छिप जाते हैं, और देर-सबेर, चाहे इस जन्म में या अगले में, उनका हिसाब सामने आता है। कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता। भले ही व्यक्ति अपनी अंतरात्मा को दबा दे, कर्म का फल किसी न किसी रूप में प्रकट होता है—चाहे वह मानसिक अशांति के रूप में हो, सामाजिक परिणामों के रूप में, या अगले जन्म में। चित्रगुप्त की लेखनी कभी रुकती नहीं; वह हमेशा लिख रही है, भले ही हम उसे देख न पाएँ।
चित्रगुप्त इस आत्मा का प्रतीक हैं—वह हिस्सा जो हमें हमारे कर्मों का फल तुरंत दिखाता है। यह विचार पश्चिमी दर्शन में भी प्रतिध्वनित होता है, जैसे प्लेटो के विचार में, जहाँ आत्मा की शुद्धता ही सच्चा न्याय है।
आज का मनुष्य तर्क और विज्ञान के नाम पर अपनी अंतरात्मा को दबाने की कोशिश करता है। हम अपने कर्मों को तर्कसंगत ठहराते हैं—“यह तो व्यापार है,” “यह तो राजनीति है,” “यह तो मेरे लिए जरूरी था।” लेकिन चित्रगुप्त को तर्क से धोखा नहीं दिया जा सकता। वे हमारी आत्मा में गहरे बसे हैं, और उनकी लेखनी हर कर्म को दर्ज करती है।जब हम सामूहिक रूप से गलत करते हैं—जैसे पर्यावरण का विनाश, सामाजिक अन्याय, या युद्ध—हमारे आंतरिक चित्रगुप्त हमें चेतावनी देते हैं। वे हमारे सामूहिक अवचेतन में भी हैं। तब हम जलवायु परिवर्तन के परिणामों को देखते हैं और बेचैनी महसूस करते हैं। हम असमानता को देखते हैं और हमारी अंतरात्मा हमें कचोटती है। यह चित्रगुप्त का काम है—हमें हमारे कर्मों का दर्पण दिखाना, ताकि हम सुधार कर सकें।
सबसे बड़ी चुनौती तब आती है जब हम इस दर्पण से मुँह मोड़ लेते हैं। न्याय कोई बाहरी घटना नहीं है, जो सृष्टि के अंत में होगी। यह एक निरंतर प्रक्रिया है, जो हर पल हमारे भीतर चल रही है।
जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हैं, जब हम अपने कर्मों का मूल्यांकन करते हैं और उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं, हम चित्रगुप्त के साथ एक संवाद में प्रवेश करते हैं। यह संवाद हमें मुक्ति की ओर ले जाता है—न केवल इस जन्म में, बल्कि उस अनंत यात्रा में जो हमारी आत्मा की है।
चित्रगुप्त (५)
जीवन की सबसे निरंतर बनी रहने वाली चुनौतियों में से एक है आत्म-प्रवंचना। हम अपने हानिकारक कार्यों को उचित ठहराने, अपनी भागीदारी को कम करने, अपनी स्वार्थपरता को आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करने में अद्भुत रूप से निपुण हैं। हम अपने आप को ऐसी कहानियाँ सुनाते हैं जिनमें हम नायक या पीड़ित होते हैं, कभी अपराधी नहीं।
चित्रगुप्त अंतिम स्तर पर सफल आत्म-प्रवंचना की असंभवता का प्रतिनिधित्व करते हैं। आप जीवन भर खुद को धोखा दे सकते हैं, लेकिन आपकी तर्कसंगतियों से सत्य का लेखा-जोखा अप्रभावित रहता है। जब आप अंततः उससे सामना करते हैं — चाहे मृत्यु के क्षण में या पूरी ईमानदारी के क्षणों में — सत्य उजागर हो जाता है।
किसी भी बाह्य न्यायाधीश के न्याय से पूर्व, एक अदृश्य आन्तरिक सभागार में आत्म-न्याय का आरम्भ होता है।
वह न्यायालय न तो किसी स्थान विशेष में स्थित है, न ही किसी सीमा में बन्धित; अपितु वह सर्वत्र व्याप्य है—मनःप्रदेश के उस सूक्ष्म क्षेत्र में जहाँ चेतना का स्वर गूंजित होता है, जहाँ आत्म-विवेचन सम्पन्न होता है, और जहाँ अन्तःस्थ न्यायाधीश हमारे कर्मों का निर्णय करता है।
यह न्यायाधीश करुणावान् भी है तथा कठोर भी—करुणा इसलिये कि वह हमारी परिस्थितियों तथा संघर्षों से परिचित है, और कठोर इसलिये कि उसे छल, लोभ या पलायन से वश में नहीं किया जा सकता। वह जीवन के प्रत्येक क्षण में सहचर बन कर विद्यमान रहता है, साक्षी रूपेण सर्वं पश्यति, किंचित् अपि न विस्मरति।
चित्रगुप्त का दैवी आख्यान—जो कर्मफलों का लेखाकार माने जाते हैं और मृत्यु के पश्चात् जीव के समस्त कर्मों का लेखा उद्घाटित करते हैं—इस अंतःस्थ न्यायाधीश का मूर्त प्रतिरूप है। यद्यपि कथा में चित्रगुप्त को निष्पक्ष दिव्य गणक रूपेण वर्णित किया गया है, तथापि मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से वे हमारे आत्म-प्रकाश एवं अन्तःविवेचन-शक्ति के प्रतीक हैं। चित्रगुप्त के माध्यम से हम अन्तःकरण की संरचना, आत्म-न्याय की मानस-प्रवृत्ति और उस अन्तःपरिवर्तन का अभ्यास कर सकते हैं जो तब घटित होता है जब जीव अपने ही इस सर्वदृष्टा न्यायाधीश से साक्षात्कार करता है।
चित्रगुप्त अन्तरात्मा हैं, सिर्फ उसका स्थापत्य नहीं हैं। वे सिर्फ नैतिक स्वर का उद्गम नहीं हैं। बाल्यावस्था से ही मनुष्य शील, मर्यादा तथा नैतिकता के मापदण्ड आत्मसात् करने लगता है। माता-पिता, समाज, संस्कृति, रिलीजन तथा अनुभूति—ये सभी मिलकर अन्तःकरण में एक नैतिक स्वर की रचना करते हैं, जो कर्मपरायणता का मापन करता है। पर चित्रगुप्त सोशल कोड का इंटर्नलाइजेशन नहीं हैं। वे धर्म हैं, रिलीजन नहीं है।
फ्रायड ने जिसे “सुपरईगो” कहा है, अर्थात् वह मानसरचना जो सामाजिक-संस्कारों और सांस्कृतिक मध्यस्थता का अन्तरन्यस्त रूप है।किन्तु यह अन्तःस्थ न्यायाधीश केवल अर्जित संस्कारों का प्रतिबिम्ब नहीं, अपितु वह चैतन्य-शक्ति है जो आत्म-उत्तरदायित्व का बोध उत्पन्न करती है और कर्म को धर्ममूल्य से तौलती है।
यह स्वर अनेक रूपों में प्रकट होता है। कभी यह दारुण और दण्डात्मक प्रतीत होता है—“तुम अधम हो, तुम सदैव असफल होते हो, दुःख तुम्हारा भाग्य है।” कभी यह विवेकशील और शान्त भाव से कहता है—“यह तुम्हारा श्रेष्ठ क्षण नहीं था, किन्तु सुधार का अवसर विद्यमान है।” और कभी यह करुणामय किंतु सत्यप्रिय होकर उच्चरित होता है—“तुमसे त्रुटि हुई, परन्तु तुम प्रायश्चित्त में प्रवृत्त हो।” स्वर चाहे जैसा हो, उद्देश्य एक ही है—स्वयं का निरीक्षण।
चित्रगुप्त इसी स्वर का परम एवं सर्वज्ञ स्वरूप हैं। वे न केवल कर्म का ज्ञान रखते हैं, अपितु उसके मूल हेतु, भावनाओं तथा आत्म-गोपन प्रवृत्तियों का भी बोध रखते हैं। उनके पत्रों में अंकित लेख वास्तव में हमारे आत्मज्ञान का प्रत्यक्ष आकार हैं—अखण्ड, अव्यभिचारी और मुक्तिदायक।
अन्तःस्थ न्यायाधीश के बारे में कह लें कि —द्वे आयामौ स्तः—साक्षित्वं च निर्णयनम् च। प्रथमं स साक्षी रूपेण अवलोकनं करोति, श्रवणं करोति, मनोविकारान् अनुभवनं करोति। साक्षित्व निरन्तर प्रवहमान है, यद्यपि बहुधा अवचेतन गति में है। मनुष्य सम्भवतः प्रत्येक क्षण को स्मरण न कर सके, तथापि अन्तःकरण का एक अंश सब कुछ का संग्रह करता जाता है —प्रत्येक शब्द, प्रत्येक भाव, प्रत्येक छवि अमिट रूपेण अंकित रहती है, मानो कालस्वरूप लेखे में प्रतिष्ठित हो।
ईसाई धर्म में स्वीकारोक्ति, यहूदी धर्म में तेशूवह (पश्चाताप), बौद्ध धर्म में प्रातिमोक्ष (आत्म-चिंतन)की साधनाएँ भी वस्तुत: आपको अपना स्वयं का चित्रगुप्त बनने को कहती हैं — अपने लेखे को ईमानदारी से पढ़ना, बिना बचाव के, बिना औचित्य के। उपचार इस बात में नहीं है कि लिखा हुआ मिटा दिया जाए, बल्कि इस बात में है कि उसे पूरी तरह स्वीकार किया जाए, स्वयं को स्पष्ट रूप से देखा जाए, और अपने कर्मों का भार स्वीकार किया जाए।
मनोवैज्ञानिक रूप से, यह शर्म (सत्य से छिपना) से अपराधबोध (सत्य को स्वीकारना), फिर जिम्मेदारी (उसे अपनाना), और अंततः प्रायश्चित (उसे सुधारना) तक की यात्रा है।
हर चरण में चित्रगुप्त वही रहते हैं — साक्षी जो सच्चाई देखते हैं — लेकिन हमारा उनसे संबंध बदलता रहता है। प्रारंभ में वे भयावह न्यायाधीश प्रतीत होते हैं, जिनसे हम बचना चाहते हैं; पर अंततः वे वह ईमानदार दर्पण बन जाते हैं जिसके माध्यम से हम स्वयं को सही रूप में देख सकते हैं। और सच्ची करुणा क्या है? जीवन में सबसे मुक्तिदायक संबंध वे होते हैं जहाँ हम पूरी तरह जाने जाते हैं और फिर भी स्वीकार किए जाते हैं। अपने पॉलिश्ड और प्रसाधनपूर्ण रूप में नहीं। जैसे हैं वैसे।
चित्रगुप्त की कथा एक ब्रह्मांडीय रूप प्रस्तुत करती है — आप संपूर्ण रूप से ज्ञात हैं, उस के द्वारा। तब प्रश्न यह बनता है कि क्या आप स्वयं को वैसे ही स्वीकार कर सकते हैं, जैसे आप हैं, यह जानते हुए कि आप जाने जा चुके हैं।
और चित्रगुप्त की अवधारणा सामान्यतः व्यक्तिगत रूप में समझी जाती है कि प्रत्येक व्यक्ति का लेखा पृथक रूप से पढ़ा जाता है — पर यह चित्रगुप्त सैद्धांतिकी सामूहिक उत्तरदायित्व तक भी विस्तारित है। राष्ट्र, संस्कृतियाँ, आंदोलन, और समुदाय भी अपने सामूहिक कर्मों द्वारा अपने कर्म-लेख संचित करते हैं
चित्रगुप्त (६)
चित्रगुप्त के बहीखाते एक अन्य रहस्यमयी परंपरा से मेल खाते हैं—आकाशिक रिकॉर्ड्स की अवधारणा से जो यह मानती है कि ब्रह्मांड में अब तक घटी हर घटना का संपूर्ण लेखा-जोखा सुरक्षित है। संस्कृत में “आकाश” का अर्थ होता है “ether” या “space”—वह मूल तत्व जिसमें सभी घटनाएँ घटित होती हैं। आकाशिक रिकॉर्ड्स का विचार बताता है कि स्वयं अंतरिक्ष ही रिकॉर्डिंग माध्यम है—कि शून्य वास्तव में एक पूर्ण अभिलेखागार है।
इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो चित्रगुप्त रिकॉर्ड बनाते नहीं हैं, बल्कि उन्हें पढ़ते हैं। वे एक ऐसे पाठ के व्याख्याकार हैं जो स्वयं अस्तित्व द्वारा निरंतर लिखा जा रहा है। उनका कार्य है जो अप्रकट है उसे प्रकट करना, उस छिपे हुए लेखा-जोखे को उजागर करना जो हमेशा से मौजूद रहा है। जब आत्माएँ मृत्यु के बाद उनके समक्ष आती हैं, तो वे न्याय नहीं सुनाते; वे केवल उन्हें वह दिखाते हैं जो उन्होंने स्वयं लिखा है—उनके कर्मों का आईना।
यह दोष या जिम्मेदारी की अवधारणा को दिलचस्प रूप से बदल देता है। जैसे आप दर्पण को अपने प्रतिबिंब के लिए दोष नहीं दे सकते, वैसे ही आप चित्रगुप्त को अपने भाग्य के लिए दोष नहीं दे सकते। अभिलेख स्वयं रिकॉर्डकर्ता से पहले से मौजूद है। वे बस उसे पढ़ने योग्य बनाते हैं।
यह विचार, जिसे क्लॉड शैनन जैसे विचारकों ने प्रस्तुत किया और बाद में क्वांटम सूचना सिद्धांत में विस्तार से समझाया गया, यह सुझाव देता है कि सूचना कभी नष्ट नहीं होती। जब कोई किताब जलती है या कोई कंप्यूटर क्रैश हो जाता है, तब भी जानकारी गायब नहीं होती—वह केवल उलझ जाती है, बिखर जाती है, और एंट्रॉपी में परिवर्तित हो जाती है। भौतिक विज्ञानी जब यह बहस करते हैं कि ब्लैक होल में सूचना खो जाती है या नहीं, तो वे मूल रूप से यह पूछ रहे होते हैं कि क्या ब्रह्मांड की स्मृति पूर्ण है।
यदि चेतना का भौतिक ब्रह्मांड से संपर्क होता है—और अवश्य होता है, क्योंकि चेतन निर्णय भौतिक क्रियाओं को जन्म देते हैं—तो संभवतः कर्म-स्मृति का भी कोई भौतिक आधार होता है। प्रत्येक क्रिया स्पेस-टाइम में हलकी लेकिन वास्तविक तरंगें उत्पन्न करती है, जो क्वांटम क्षेत्र में जानकारी के रूप में अंकित हो जाती हैं—ऐसे रूप में जिन्हें हम अभी पूरी तरह नहीं समझते, लेकिन जिन्हें मिटाया नहीं जा सकता। चित्रगुप्त इस अस्तित्व की आंतरिक, सूचना-संरक्षण करने वाली गुणवत्ता का प्रतीक बन जाते हैं।
चित्रगुप्त समय की स्मृति है, यह सिद्धांत कि अतीत बना रहता है। यह किसी भूतिया प्रतिध्वनि के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान की शर्त के रूप में—उस नींव के रूप में जिस पर ‘अब’ खड़ा है। आपका वर्तमान क्षण पूर्ण रूप से संचित अतीत से निर्मित है—उन सभी कर्मों और विकल्पों से जिन्होंने आपको यहाँ तक पहुँचाया। यह “अभिलेख” वास्तविकता से अलग नहीं है—यह वास्तविकता की अपनी निरंतरता है।
हमें यह पहचानने के लिए रहस्यमय दावों की आवश्यकता नहीं कि कर्म—स्मृति के रूप में—जीवन में कैसे कार्य करता है। आघात संबंधी शोध बताता है कि अनुभव—विशेष रूप से तीव्र या बार-बार होने वाले अनुभव—शाब्दिक रूप से न्यूरल पथों को पुनः आकार देते हैं। शरीर स्वयं अभिलेख रखता है, जैसा कि बेसल वान डर कोलक की प्रभावशाली पुस्तक का शीर्षक बताता है। स्मृति शरीर में लिखी जाती है—तंत्रिका तंत्र की स्वचालित प्रतिक्रियाओं में, उन हार्मोनल प्रतिक्रियाओं में जो सचेत विचार के पहले सक्रिय हो जाती हैं।
जो व्यक्ति हिंसा के वातावरण में बढ़ता है, वह केवल हिंसा को याद नहीं करता; वह उसे अपने शरीर की प्रत्याशित प्रतिक्रियाओं में, आराम न कर पाने में, और अतिसतर्कता में ढोता है। आघात “अतीत” में नहीं है—वह वर्तमान क्षण के शरीर-क्रियात्मक और मनोवैज्ञानिक ढाँचे में कूटित है। यही संस्कार का सबसे ठोस रूप है: वह स्मृति जो चल रहे अनुभव को आकार देती है, वह इतिहास जो प्रवृत्ति के रूप में चलता रहता है।
इसी प्रकार, सुरक्षा, प्रेम और सामंजस्य के आवर्ती अनुभव अपने संस्कार बनाते हैं—सुरक्षित लगाव के पैटर्न, विश्वास की क्षमता, कठिनाइयों के सामने लचीलापन। ये “अच्छे कर्म” का प्रतिफल नहीं हैं; ये मनुष्य के भीतर अनुभवों द्वारा लिखे गए स्वाभाविक परिणाम हैं।इस पहचान में एक गहराई है कि हम वह सब कुछ ढोते हैं जो हमने कभी किया है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चित्रगुप्त की लेखा-पुस्तक वह योग है, जिसके द्वारा हमारा अतीत हमारी वर्तमान जीवन-प्रतिक्रिया की क्षमता को आकार देता है।
चित्रगुप्त (७)
क्या ऐसा नहीं लगता कि हम अब ज्यादा से ज्यादा एक प्रकार के चित्रगुप्त-जगत में जी रहे हैं। हर डिजिटल क्रिया—हर खोज, ख़रीद, संदेश, और स्थान—संगृहीत होती है। निगम और सरकारें किसी दिव्य लेखाकार जितनी सावधानी से बही रखते हैं, हमारे व्यवहार के पैटर्न का पता लगाते हैं, भविष्यवाणी करते हैं, और हमें अपनी स्मृतियों के माध्यम से जवाबदेह (या असुरक्षित) बनाते हैं।
चित्रगुप्त का यह प्राचीन कथ्य आधुनिक युग की निजता, निगरानी, और डिजिटल पदचिह्नों की स्थायित्व संबंधी चिंताओं से सीधा संवाद करता है। एक बार कुछ ऑनलाइन चला गया, तो वह लगभग स्थायी हो गया। इंटरनेट कभी नहीं भूलता। हर मूर्खतापूर्ण वक्तव्य, हर जवानी की गलती, हर भूल—सब किसी सर्वर पर, किसी अभिलेखागार में संग्रहीत रहती है, तैयार रहती है दोबारा सामने लाए जाने और हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने के लिए।
यह तकनीकी विकास उसी सत्य को मूर्त रूप देता है जिसका संकेत चित्रगुप्त सदियों से देते आये हैं कि हम एक ऐसे ब्रह्मांड में रह रहे हैं जहाँ सब कुछ स्थायी रूप से दर्ज रहता है। फर्क बस इतना है कि पहले ब्रह्मांडीय लेखे ईश्वर के पास होते थे, जो सर्वज्ञ और न्यायप्रिय माने जाते थे; अब वे रिकॉर्ड कंपनियों और सरकारों के पास हैं, जो लाभ और नियंत्रण की खोज में रहते हैं।
चित्रगुप्त कभी हमारे कर्मों को विज्ञापनदाताओं को नहीं बेचते थे और न हमारे अतीत को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे।
ब्लॉकचेन तकनीक इस सिद्धांत का एक ठोस रूपांतर प्रस्तुत करती है। ब्लॉकचेन एक अपरिवर्तनीय, वितरित बही है — एक बार कोई लेन-देन दर्ज हो जाए, तो उसे बदला या मिटाया नहीं जा सकता। यह रिकॉर्ड किसी केंद्रीय प्राधिकारी के बजाय पूरे नेटवर्क द्वारा संरक्षित रहता है, ठीक वैसे ही जैसे कर्मफलों का लेखा किसी बाहरी देवता द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं वास्तविकता के स्वभाव द्वारा रखा जाता है।
क्रिप्टोकरेंसी के समर्थक इस प्रणाली को “ट्रस्टलेस” कहते हैं — इसमें किसी केंद्रीय संस्था पर भरोसा करने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि रिकॉर्ड गणितीय रूप से सुनिश्चित, वितरित और स्थायी होता है। यह तकनीकी रूप में चित्रगुप्त-सिद्धांत का प्रकटीकरण है: अदोष स्मृति के माध्यम से जवाबदेही, पूर्ण रिकॉर्ड-रखने से न्याय, और अपरिवर्तनीय सूचना से परिणाम।
परंतु ब्लॉकचेन स्थायी स्मृति के संभावित अत्याचार को भी उजागर करता है। यदि हर लेन-देन सदा के लिए अंकित हो जाए, तो भूलने, पुनः प्रारंभ करने, या युवावस्था की भूलों को मिटाने का कोई अवसर नहीं बचेगा। वही स्थायित्व जो धोखाधड़ी से बचाता है, मोक्ष की संभावना को भी मिटाता है; जो जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है, वही अपरिहार्यता भी स्थापित करता है।
आज की तकनीक हमारे भौतिक अस्तित्व को ऑंटोलॉजिकल रूप से पुनर्परिभाषित करती है। डिजिटल अस्तित्व के नए रूप सामने आ रहे हैं जहां इकाइयां distributed लेजर पर अपरिवर्तनीय प्रविष्टियों के रूप में मौजूद होती हैं, जो Reality की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती हैं। यह तकनीक एक समानांतर ऑंटोलॉजी बनाती है, जो भौतिक और आभासी क्षेत्रों को गड्ड मड्ड करती है, क्योंकि डेटा ब्लॉक सेल्फ सस्टेनिंग प्रणालियां बनाते हैं जो ओनरशिप और आइडेंटिटी को बदल के रख देंगी।
दार्शनिक रूप से, यह सवाल उठाता है कि क्या मानवीय अस्तित्व को क्रिप्टोग्राफिक टोकनों तक सीमित किया जा सकता है? क्या वह एक विखंडित सेल्फ को जन्म नहीं देगा जहां व्यक्तिगत इतिहास हमेशा के लिए तय होंगे, जहाँ तरलता और विकास की गुंजाइश भी कम हो जाएगी?
रिकॉर्ड का स्थायित्व जीवन के एक नियतिवादी दृष्टिकोण की ओर ले जा सकता है जहां अतीत की कार्रवाइयां अपरिवर्तनीय सार बन जाएंगी? अस्तित्व की धारणाएं मोमेन्ट या क्षण से तय नहीं होंगी। वे अभिलेखीय अवधारणाओं में बदल जायेंगी? एक हाइपर-कनेक्टेड दुनिया में व्यक्तियों की अपनी जगह की अवधारणा तब कैसे तय होंगी।
चित्रगुप्त चित्रगुप्त हैं। वे रिकॉर्ड तो रखते हैं पर गुप्त होने का उनका वायदा अकाट्य है। आधुनिक दुनिया सबसे ज्यादा उन्हीं जैसा बनने की कोशिश कर रही है पर उनके आदर्शों के बिना उन जैसा बनना एक दुःस्वप्न होगा। एक डिजिटल बिइंग की रचना और एक अन्तःकरण, एक अंतरात्मा और एक आकाश की रचना के बीच एक भयावह अन्तराल है। चित्रगुप्त आपको कर्म-स्वातंत्र्य देते हैं पर उनके मशीनी अनुवाद में पहचान की fluidity खत्म हो जाएगी, वह एक fixed पहचान बनकर रह जाएगी। चित्रगुप्त आपके अगले जन्म जन्मांतरों का भविष्य हैं पर उनके जैसी रिकॉर्ड कीपिंग यदि मशीनें करने लगेंगी तो मनुष्य अपने अतीत का बंधक होकर रह जायेगा।