Friday, 31 October 2025

देवीसाधकों के लिए साल में ४० नवरात्र होते हैं।

"गाव: प्रतिष्ठा भूतानाम्" देवीसाधकों के लिए साल में ४० नवरात्र होते हैं। उनमें १२, ४, २ और १ शरन्नवरात्र प्रचलन में है। प्रत्येक नवरात्रों के विभिन्न नाम हैं; यथा- चैत्रनवरात्र का श्रीरामनवरात्र, वैशाख का श्रीसीतानवरात्र, ज्येष्ठ का गङ्गानवरात्रादि। वैसे ही कार्त्तिकमास का नवरात्र गोनवरात्र है। कार्त्तिककृष्ण गोवत्सद्वादशी से शुक्ला गोपाष्टमीपर्यन्त की तिथियाँ गौ की विविध उपासनाओं के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण हैं।

लव जिहाद में इस्तेमाल होती है ये दवाएं !

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AAYUDH

6) DRUG SPECIALIST'S VIEW

Prof. Unnikrishnan (Expert in Role of Drugs in such cases)

Q: Please tell us how these girls are lured within minutes.

A: I don't think that they are being loved within minutes, it takes some time. With the best of my knowledge, can't be done in such a les amount of me. This process can be supplemented by drugs.

Q: What kind of drugs may be used?

A Hard drugs may be used and cosages could be monitored to have the specified effect. They can be added to edible products in such quantities that won't alter the taste and yet have the desired effect

Q: Can you list some of the drugs?

A. Diazepam, Barbiturates, LSD (maybe) und very structured counseling can give this effect.



चण्डिका के पूजाकाल में

चण्डिका के पूजाकाल में
पूजाकाले तु सम्प्राप्ते वासुदेवं स्मरेत्तु यः । पूजाफलं न चाप्नोति नरकं प्रतिपद्यते ॥ १०० ॥

चण्डिका के पूजाकाल में जो वासुदेव का स्मरण करता है उसे पूजाफल प्राप्त करना तो दूर वह सर्वथा नरक का भागी होता है ॥ १०० ॥

वैष्णवं कुसुमं स्पृष्ट्वा पूजाकाले च सर्वदा । हस्तप्रक्षालनाच्छौचमाचामस्तु तदाचरेत् ॥ १०१ ॥

चण्डिका के पूजनकाल में यदि विष्णु के निमित्त चढ़ाये जाने वाले पुष्पों का स्पर्श हो जावे तो साधक हस्त प्रक्षालन कर पुनः आचमन करने पर ही शुद्ध होता है ॥ १०१ ॥

हथकांत चतुर्वेदी ब्राह्मणों की आश्रय स्थली



हथकांत चतुर्वेदी ब्राह्मणों की आश्रय स्थली

हथकांत को बाह तहसील में #चतुर्वेदी ब्राह्मणों के प्राचीन स्थलों में जाना जाता है। अलाउद्दीन खिलजी के समय में समस्त चतुर्वेदी मथुरा से पलायन करके #भदावर महाराज के शरणागत हुए तो उन्हें हथकांत, चंद्रपुर, होलीपुरा, कमतरी, बटेश्वर में बसाया गया। यहाँ का चतुर्वेदी समाज स्वामी श्री हरिदास जी महाराज (टटिया स्थान) को अपने गुरू के रूप में देखता है। श्री स्वामी परम्परा के आचार्य, आचार्य श्री ललित किशोरी देव जी भदावर के हथकांत के ही चतुर्वेदी थे।

यहाँ की आबादी बढ़ती रही और ये एक क़स्बा बना जहां अलग अलग मोहल्ले हो गए और यहाँ कई दर्जन #होली जलती थी। सन 1386 के आस पास सुल्तान फिरोजशाह ने आक्रमण किया, जिससे नगर को भारी क्षति पहुँची थी। हथकांत की जैन धर्म में भी विशेष महत्ता थी यहाँ एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल था, एक प्राचीन जैन मंदिर स्थित बना जिसमे 51 प्रतिष्ठाएँ हुई थीं। सन् 1638 में, हथकांत के #जैन मंदिर से कुछ प्राचीन जैन प्रतिमाओं को ऊँट पर रखकर इटावा के जैन धर्मशाला मंदिर में ले जाया गया था।

मथुरा निवासी ब्राह्मण

यज्ञ-मीमांसा

२२१

× मागधो माथुरश्चैव कापटः कीकटानजौ । पञ्च वित्रा न पूज्यन्ते बृहस्पतिसमा यदि ॥

( अत्रिस्मृति ३८५,३८६ )

'भेड़, बकरी पालनेवाला, चित्रकार, वैद्य और ज्योतिषी- ये चार प्रकारके ब्राह्मण यदि बृहस्पतिके सदृश विद्वान् हों तो भी इनका यज्ञादिमें पूजन नहीं करना चाहिये । 


मागध (स्तुतिपाठक), मथुरानिवासी (बहुभोजी), कपटी, कीकट देश (गया प्रदेश) अर्थात् विहार ( देखिए-भागवत ७।१०।१६ तथा ११।२१।८) और आन देशमें उत्पन्न होनेवाला-ये पाँच प्रकारके ब्राह्मण यदि बृहस्पति के सदृश विद्वान् हों तो भी इनका यज्ञादिमें पूजन नहीं करना चाहिये ।

सर्वपितृ अमावस्या पर सीधा कैसे और कब निकालें

सर्वपितृ अमावस्या पर सीधा कैसे और कब निकालें

1. सर्वपितृ अमावस्या पर सीधा निकालने से विघ्न दूर होकर पितृऋण से मुक्ति मिलती है।

2. यह कार्य सुबह स्नान के बाद पितरों का ध्यान करके करने से घर में बहुत शुभता आती है।

3. एक थाली में चावल, आटा, उड़द दाल, दूध, चीनी, फल, नमक, मसाला, सब्जी, घी और दक्षिणा यथासंभव निकालकर ब्राह्मण को दान देना चाहिए । संभव हो तो बना भोजन ब्राह्मण को खिलाएं।

4. यदि आस-पास ब्राह्मण ना हो तब समान के बदले पैसे निकाल कर रखें। जब संभव हो तब ब्राह्मण को दे दें।

आदित्य हृदय स्तोत्र

आदित्य हृदय स्तोत्र

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥१॥ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्। उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥२॥ राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्। येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥३॥

आदियहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्। जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥४॥

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्। चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥५॥ रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्। पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥६॥ सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।

एष देवासुरगणॉल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥७॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।

महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥८॥ पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।

वायुर्वह्निः प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥९॥ आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्। सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥१०॥ हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्। तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टामार्तान्ड अम्शुमान् ॥११ हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।

अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः ॥१२॥ व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः। घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥१३॥ आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।

कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥१४॥ नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥१५॥ नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥१६॥

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥१९॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः। नमो नमः सहस्राम्शो आदित्याय नमो नमः॥१७॥ नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः। नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥१८॥ ब्रह्मशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने। कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥२०॥ तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे। नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रवये लोकसाक्षिणे ॥२१॥

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः। पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥२२॥ एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।

एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥२३॥ वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।

यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥२४॥ एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५॥ पूजसस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।

एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥२६॥ अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि । एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥२७॥ एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा।

धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥२८॥ आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्। त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥ २९॥ रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।

सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥३०॥ अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः। निशिचरपतिसम्क्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१॥

अग्निवास का परिहार

।। अग्निवास का परिहार ।।

विवाहयात्रा व्रत गोचरेषु चूड़ोपनीति ग्रहणे युगादौ। दुर्गा विधाने सुत प्रसूते नैवाग्नि चक्रं परिचिन्तनीयम् ॥

तिष विज्ञान अर्थात् नित्य नैमित्तिक कार्य, जन्म व मृत्यु के समय, विवाह में, यात्रा आरम्भ या यात्राकाल में, व्रतोद्यापन में, ग्रहों की अनिष्ट गोचर स्थिति में, मुण्डन, उपनयादि संस्कार में, ग्रहण शान्ति, रोग-पीड़ा की शान्ति, नवरात्र-दुर्गा-पूजा, पुत्रादि) सन्तान जन्म काल में अग्निवास का विचार नहीं किया जाता ।

Thursday, 30 October 2025

पंचायतन (पाँच देवताओ) की पुजा का महत्त्व एवं विधि

पंचायतन (पाँच देवताओ) की पुजा का महत्त्व एवं विधि
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हिन्दू पूजा पद्यति में किसी भी कार्य का शुभारंभ करने अथवा जप-अनुष्ठान एवं प्रत्येक मांगलिक कार्य के आरंभ में सुख-समृद्धि देने वाले पांच देवता, एक ही परमात्मा पांच इष्ट रूपों में पूजे जाते है।

एक परम प्रभु चिदानन्दघन परम तत्त्व हैं सर्वाधार ।
सर्वातीत,सर्वगत वे ही अखिलविश्वमय रुप अपार ।।
हरि, हर, भानु, शक्ति, गणपति हैं इनके पांच स्वरूप उदार ।
मान उपास्य उन्हें भजते जन भक्त स्वरुचि श्रद्धा अनुसार ।। (पद-रत्नाकर)

निराकार ब्रह्म के साकार रूप हैं पंचदेव
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परब्रह्म परमात्मा निराकार व अशरीरी है, अत: साधारण मनुष्यों के लिए उसके स्वरूप का ज्ञान असंभव है । इसलिए निराकार ब्रह्म ने अपने साकार रूप में पांच देवों को उपासना के लिए निश्चित किया जिन्हें पंचदेव कहते हैं । ये पंचदेव हैं—विष्णु, शिव, गणेश, सूर्यऔर शक्ति।

आदित्यं गणनाथं च देवीं रुद्रं च केशवम् ।
पंचदैवतभित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत् ।। 
एवं यो भजते विष्णुं रुद्रं दुर्गां गणाधिपम् ।
भास्करं च धिया नित्यं स कदाचिन्न सीदति ।। (उपासनातत्त्व)

अर्थात👉 सूर्य, गणेश, देवी, रुद्र और विष्णु—ये पांच देव सब कामों में पूजने योग्य हैं, जो आदर के साथ इनकी आराधना करते हैं वे कभी हीन नहीं होते, उनके यश-पुण्य और नाम सदैव रहते हैं ।

वेद-पुराणों में पंचदेवों की उपासना को महाफलदायी और उसी तरह आवश्यक बतलाया गया है जैसे नित्य स्नान को । इनकी सेवा से ‘परब्रह्म परमात्मा’ की उपासना हो जाती है ।

अन्य देवताओं की अपेक्षा इन पांच देवों की प्रधानता ही क्यों?

अन्य देवों की अपेक्षा पंचदेवों की प्रधानता के दो कारण हैं—

१.👉 पंचदेव पंचभूतों के अधिष्ठाता (स्वामी) हैं।

पंचदेव आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन पंचभूतों के अधिपति हैं ।

👉 सूर्य वायु तत्त्व के अधिपति हैं इसलिए उनकी अर्घ्य और नमस्कार द्वारा आराधना की जाती है ।

👉 गणेश के जल तत्त्व के अधिपति होने के कारण उनकी सर्वप्रथम पूजा करने का विधान हैं, क्योंकि सृष्टि के आदि में सर्वत्र ‘जल’ तत्त्व ही था ।

👉 शक्ति (देवी, जगदम्बा) अग्नि तत्त्व की अधिपति हैं इसलिए भगवती देवी की अग्निकुण्ड में हवन के द्वारा पूजा करने का विधान हैं ।

👉 शिव पृथ्वी तत्त्व के अधिपति हैं इसलिए उनकी शिवलिंग के रुप में पार्थिव-पूजा करने का विधान हैं ।

👉 विष्णु आकाश तत्त्व के अधिपति हैं इसलिए उनकी शब्दों द्वारा स्तुति करने का विधान हैं ।

२.👉 अन्य देवों की अपेक्षा इन पंचदेवों के नाम के अर्थ ही ऐसे हैं कि जो इनके ब्रह्म होने के सूचक हैं।

विष्णु अर्थात् सबमें व्याप्त, शिव यानी कल्याणकारी, गणेश अर्थात् विश्व के सभी गणों के स्वामी, सूर्य अर्थात् सर्वगत (सभी जगह जाने वाले), शक्ति अर्थात् सामर्थ्य ।

संसार में देवपूजा को स्थायी रखने के उद्देश्य से वेदव्यासजी ने विभिन्न देवताओं के लिए अलग-अलग पुराणों की रचना की। अपने-अपने पुराणों में इन देवताओं को सृष्टि को पैदा करने वाला, पालन करने वाला और संहार करने वाला अर्थात् ब्रह्म माना गया है। जैसे विष्णुपुराण में विष्णु को, शिवपुराण में शिव को, गणेशपुराण में गणेश को, सूर्यपुराण में सूर्य को और शक्तिपुराण में शक्ति को ब्रह्म माना गया है। अत: मनुष्य अपनी रुचि अथवा भावना के अनुसार किसी भी देव को पूजे, उपासना एक ब्रह्म की ही होती है क्योंकि पंचदेव ब्रह्म के ही प्रतिरुप (साकार रूप) हैं। उनकी उपासना या आराधना में ब्रह्म का ही ध्यान होता है और वही इष्टदेव में प्रविष्ट रहकर मनोवांछित फल देते हैं। वही एक परमात्मा अपनी विभूतियों में आप ही बैठा हुआ अपने को सबसे बड़ा कह रहा है वास्तव में न तो कोई देव बड़ा है और न कोई छोटा।

एक उपास्य देव ही करते लीला विविध अनन्त प्रकार।
पूजे जाते वे विभिन्न रूपों में निज-निज रुचि अनुसार ।। (पद रत्नाकर)

पंचदेव और उनके उपासक
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विष्णु के उपासक ‘वैष्णव’ कहलाते हैं,
शिव के उपासक ‘शैव’ के नाम से जाने जाते हैं, गणपति के उपासक ‘गाणपत्य’ कहलाते हैं, सूर्य के उपासक ‘सौर’ होते हैं, और शक्ति के उपासक ‘शाक्त’ कहलाते हैं । इनमें शैव, वैष्णव और शाक्त विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं ।

पंचदेवों के ही विभिन्न नाम और रूप हैं अन्य देवता
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शालग्राम, लक्ष्मीनारायण, सत्यनारायण, गोविन्ददेव, सिद्धिविनायक, हनुमान, भवानी, भैरव, शीतला, संतोषीमाता, वैष्णोदेवी, कामाख्या, अन्नपूर्णा आदि अन्य देवता इन्हीं पंचदेवों के रूपान्तर (विभिन्न रूप) और नामान्तर हैं ।

पंचायतन में किस देवता को किस कोण (दिशा) में स्थापित करें?
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पंचायतन विधि👉 पंचदेवोपासना में पांच देव पूज्य हैं। पूजा की चौकी या सिंहासन पर अपने इष्टदेव को मध्य में स्थापित करके अन्य चार देव चार दिशाओं में स्थापित किए जाते हैं। इसे ‘पंचायतन’ कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन पाँच देवों की मूर्तियों को अपने इष्टदेव के अनुसार सिंहासन में स्थापित करने का भी एक निश्चित क्रम है। इसे ‘पंचायतन विधि’ कहते हैं। जैसे👉

विष्णु पंचायतन
〰️〰️〰️〰️〰️जब विष्णु इष्ट हों तो मध्य में विष्णु, ईशान कोण में शिव, आग्नेय कोण में गणेश, नैऋत्य कोण में सूर्य और वायव्य कोण में शक्ति की स्थापना होगी।

सूर्य पंचायतन
〰️〰️〰️〰️यदि सूर्य को इष्ट के रूप में मध्य में स्थापित किया जाए तो ईशान कोण में शिव, अग्नि कोण में गणेश, नैऋत्य कोण में विष्णु और वायव्य कोण में शक्ति की स्थापना होगी ।

देवी पंचायतन
〰️〰️〰️〰️〰️जब देवी भवानी इष्ट रूप में मध्य में हों तो ईशान कोण में विष्णु, आग्नेय कोण में शिव, नैऋत्य कोण में गणेश और वायव्य कोण में सूर्य रहेंगे ।

शिव पंचायतन
〰️〰️〰️〰️〰️जब शंकर इष्ट रूप में मध्य में हों तो ईशान कोण में विष्णु, आग्नेय कोण में सूर्य, नैऋत्य कोण में गणेश और वायव्य कोण में शक्ति का स्थान होगा।

गणेश पंचायतन
〰️〰️〰️〰️〰️जब इष्ट रूप में मध्य में गणेश की स्थापना है तो ईशान कोण में विष्णु, आग्नेय कोण में शिव, नैऋत्य कोण में सूर्य तथा वायव्य कोण में शक्ति की पूजा होगी।

शास्त्रों के अनुसार यदि पंचायतन में देवों को अपने स्थान पर न रखकर अन्यत्र स्थापित कर दिया जाता है तो वह साधक के दु:ख, शोक और भय का कारण बन जाता है।

देवता चाहे एक हो, अनेक हों, तीन हों या तैंतीस करोड़ हो, उपासना ‘पंचदेवों’ की ही प्रसिद्ध है। इन सबमें गणेश का पूजन अनिवार्य है। यदि अज्ञानवश गणेश का पूजन न किया जाए तो विघ्नराज गणेशजी उसकी पूजा का पूरा फल हर लेते हैं।
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एहि सर मम उत्तर तट बासी

राम के क्रोधित होने पर जब समुद्र प्रकट हुए और उन्होंने बता दिया कि नल-नील रामसेतु का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं तो भगवान राम ने उनसे कहा कि वे बाण को संधान के लिए प्रत्यंचा पर चढ़ा चुके हैं, इसका संधान कहाँ करें तो समुद्र ने कहा कि उत्तर में अहीरों का पवित्र राज्य द्रुमकुल्य है। उनके स्पर्श से मेरा जल दूषित हो जाता है, अतः इसका संधान उन पर करें। इस तरह राम ने निरपराध अहीरों को मार डाला। 

घृणा और जातीय पृथकता का ऐसा निम्न विवेचन सुनकर मुझे बड़ा क्षोभ हुआ। 

जबकि वाल्मीकि रामायण के इस संदर्भ के श्लोक कुछ अलग ही अर्थ देते हैं। 

‎"उत्तरेण तव क्षेत्रं द्रुमकुल्यं नाम विश्रुतम्।
‎तत्र त्वं बाणमेकं तु प्रहरेति मम संनिधौ॥"
‎"उग्रदर्शनकर्माणो बहवस्तत्र दस्यवः।
‎आभीरप्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम॥"

उत्तर क्षेत्र में द्रुमकुल्य नाम का एक विश्रुत राज्य है। (विश्रुत का अर्थ प्रसिद्ध होता है, पवित्र कहीं से नहीं होता) आप इस बाण का वहाँ प्रहार कीजिये। वहाँ बहुत सारे दस्यु हैं, कर्म से उग्रदर्शी अर्थात अपराधी हैं और ये पापी आभीर मेरा जल पीते हैं। आभीर का एक अर्थ होता है जिसे भय न हो, अर्थात वे निर्भय हैं, उन्हे किसी का डर नहीं है। आभीर का अर्थ अहीर से भी लिया जाता है, यह सत्य है। 

लेकिन यदि वे अहीर ही हैं तो भी दस्यु और अपराधी तो हैं ही। क्या अपराधियों का वध करना अनुचित है? 

कौन ऐसा स्वाभिमानी यादव होगा जो स्वयं को ऐसे लोगों का वंशज मानेगा जो अपराधी और डाकू हों? 

हमें यदि कोई रावण से जोड़े तो हम उसके मुँह पर थूक दें। 

किंतु जो हवा चलाई जा रही है, उसमे किसकी बुद्धि किस दिशा में बह जाय, कहा नहीं जा सकता। भगवान कृष्ण से स्वयं को संपृक्त करने वाले एक योद्धा समुदाय को जिस तरह से सनातन से काटा जा रहा है, यह बहुत दुखद है। आप लालू के पीछे चलिए, अखिलेश के पीछे चलिए लेकिन अपने धर्म का नाश तो मत कीजिये भाई। महान इतिहास वाले एक वर्ग में दलित और पतित भाव भरने वाले राजनेता कभी भी उनके हितैषी नहीं हो सकते। 

पता नहीं लोग कब जागेंगे? 


Wednesday, 29 October 2025

चित्रगुप्त





चित्रगुप्त (१)

हमारे भीतर कुछ है, हमारे भीतर कोई है जो साक्षी है। वह संलिप्त नहीं है, पर वह देख रहा है। वह बोलता नहीं है, वह दखल भी नहीं देता, वह हमारी अनुभूतियों और गतिविधियों के संकुल का अंग भी नहीं है। पर उसके प्रेक्षण की एक मौजूदगी है। वह हमारे होने का एक सबसे अंतरंग पहलू है। हमारे चित्त का चित्त। हृदय नहीं है वह, चेतना है। जाग्रति है। 

और जबकि लोग चेतना-प्रवाह की, stream of consciousness की बात करते हैं, वह हमारी भावनाओं की तरह बह नहीं रहा। वह विचारों की धारा की तरह दूरियां नहीं नाप रहा और न विचारधारा की तरह दूरियां बना रहा। वह हमारे अनुभवों और संवेदनाओं की सरिताओं-सा दौड़ भी नहीं रहा। वह सिंहासनस्थ है और बिना हमारे जीवन-नाट्‌य में कोई भूमिका निभाए, बिना हमारे किसी राग-द्वेष से कोई रिश्ता कायम किए हमें देख भर रहा है। 

और उसका देखना दर्शक होना नहीं है, दृष्टा होना है। हमारे तमाम परिवर्तनों के बीच वही एक स्थिर है- कौन है वह अज्ञात ज्ञाता? कौन है वह अनदेखा दृष्टा? हम सबको धोखा दे सकते हैं, देते रहते हैं पर उसे धोखा देना असंभव है। आप कितनी गोपनीयता बरतेंगे, उससे बच नहीं सकेंगे। आप स्वयं को छल सकते हो, छलते ही रहते हो पर आपके भीतर के सभी फुसफुसाते तहखानों तक उसकी पहुंच है। उस मामले में आप विकल्पहीन हो। 

उसके यहां आपके सारे किए धरे के चित्र हैं। आप के विचार और मन्तव्य, आपकी प्रक्रियाएं और क्रियाएं वहां चित्रों में बदलती जाती है। आपका सारा अमूर्त उसके समक्ष मूर्त है। 

अपने भीतर के इस गेस्टापो से आपको भय नहीं लगता क्योंकि इसकी इतनी अनाक्रामक उपस्थिति है। और यह गुप्तचर है कि गवाह है कि न्यायाधीश है, आपको यह भी नहीं पता? 

उस अपरिचय के कारण आपको लगता है कि वह कहीं दूर है। जीवनान्त के बाद परलोक की किसी दूरी में। पर वह जो दूरी है, वह एक अन्तराल की, एक गैप की सूचक है। जब वह अन्तराल है तभी वह एक dispassionate तरह के निर्णय दे सकता है। वह आप को यम की किसी दुनिया में सुदूर काम करता बताया गया है, पर वह आपकी सबसे घनिष्ठ सचाई है। 

उसका चित्र गुप्त है, पर वह आपकी वीडियो लगातार बना रहा है।

चित्रगुप्त (२)

अंतराल अवलोकन को संभव बनाता है। यदि हम दर्पण से चिपक ही जायें तो हमारा अक्स हमें दिखेगा ही नहीं। चित्रगुप्त जो देखते हैं उससे अलग खड़े होते हैं। खड़े नहीं बैठे। वे अवलोकनात्मक भगवान हैं। किन्तु गैर प्रतिक्रियात्मक। नॉन-रिएक्टिव। निर्वैयक्तिक प्रेक्षक। 

उनको (सिंहासन पर ) बैठा हुआ दिखाया जाता है।उसे वही समझ सकता है जो zazen को पहचानता है। यह एक जापानी अवधारणा है। zazen का अर्थ है just sitting, सिर्फ बैठना। शब्दों, विचारों, छवियों और भावनाओं को गुजरते देखना बिना उनमें संसक्त हुए। जीवन की आपाधापी में, भागादौड़ में लगे हुए हम इस बैठने का मूल्य कैसे पहचानेंगे? 

इसका अर्थ किसी तरह की उदासीनता नहीं है। वे कोई वैरागी नहीं हैं। सो तो उनकी दो दो पत्नियाँ हैं।वे ध्यानस्थ भी नहीं हैं, उनकी दृष्टि किसी एक त्राटक बिन्दु पर एकस्थ नहीं है। अनुभवों की खुली जागरूक विशालता उनकी पहचान है। 

उन्हें कोल्ड समझने की भ्रांति में नहीं पड़ें। यदि वे हमारे दुख सुख में स्वयं लिप्त हो जाएँ तो हमारी मदद नहीं कर सकेंगे। उन्हें एक अलग आयाम में होना है ताकि वे यथार्थ को उसकी समग्रता में देख सकें और हमारी संकीर्णता उन्हें, उनके निर्णयों को दूषित न कर सकें। 

और हम उन्हें देखे बिना ही लगातार उनके आर-पार देखते रहते हैं, जैसे बिना आईने के अपना चेहरा देखने की कोशिश कर रहे हों। हम जल में तैरती मछली हैं जो जलराशि के प्रति, उस सिन्धु के प्रति अनभिज्ञ है जिससे उसका अस्तित्व है।

इस परिवर्तनशील संसार में चित्रगुप्त स्थिर बिंदु हैं। वे ऐसा पर्दा हैं जिस पर फिल्म कहें कि चलचित्र चलते हैं, लेकिन जो स्वयं उस पर दिखाई देने वाली चीज़ों से कभी नहीं बदलता।

कायस्थों को नौकरशाही में चिन्हित किया जाता रहा। पर चित्रगुप्त किसी नौकरशाह की तरह निर्णय लेने नहीं बैठते हैं। वे केवल वही पढ़ते हैं जो कर्मों के स्वाभाविक परिणाम की तरह लिखा है। वास्तविकता की पुस्तक से ही पढ़े जाते परिणाम। 

इन चित्रगुप्त को अपने भीतर की स्वयं प्रकाशमान प्रकटीकरणशील और स्वयं के प्रति पारदर्शी चेतना की तरह देखिए और यों कि यह जितना आत्मन् है उतना ब्रह्मन्। 

चित्रगुप्त की आराधना तब ही है जब हमें इस चेतना की चेतना हो। एक meta-consciousness हो। जिन्होंने यह सिद्ध कर लिया उन्होंने बिना एनेस्थीसिया के अपने पर ऑपरेशन होते हुए देखा। उन्होंने वह साक्षी भाव सिद्ध कर लिया जो चित्रगुप्त होने की पारिभाषिकता के अधिक समीप है। 

इस चित्रगुप्त की सिद्धि ही वास्तविक स्वतंत्रता है।


चित्रगुप्त (३)

हमारा जीवन एक थियरी नहीं है, एक पोर्ट्रेट है। सिद्धांत नहीं, एक चित्र है। यह चित्र कुछ टुकड़े टुकड़े सवालों और उनके उतने ही खंडित उत्तरों से बना है। वे इस चित्र का ही अंग हैं। अस्तित्व सार से पहले आता है, यह बात सार्त्र जैसे दार्शनिक बहुत पहले से करते रहे हैं। हम लगातार उस जीवन में से कुछ सिद्धांत निकालने की कोशिश करते रहते हैं और उनके अंतर्विरोधों से उलझते रहते हैं। सिद्धांत व्यापक सामान्यीकरण है। कि महात्मा गाँधी अहिंसा और बुद्ध करुणा हैं- पर हम भूल जाते हैं कि उनके जीवन की अपनी पर्टिकुलेरिटी है। चित्रगुप्त नहीं भूलते। 

उन्हें यह अहसास है कि आप एक चित्रकार के चित्र की तरह रचे गये हो। और आपका पोर्ट्रेट कोई कारखाने का असेंबली लाइन उत्पादन नहीं है। उसमें रचयिता की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। 

निश्चय ही आप एक निरीक्षित और परीक्षित जीवन जी रहे हो, पर वह निरीक्षण-परीक्षण चित्रगुप्त का है। चित्र में, वे जानते हैं कि, उभरा हुआ आकार ही सब कुछ नहीं होता। उसमें पृष्ठभूमि का भी खेल है। उसमें प्रकाश और छाया के समावेशन भी हैं और फ्रेम की भी अपनी भूमिका है। आनुवंशिकी सिर्फ एक फ्रेम देती है पर उसके बाद उस चित्र में अपने संकल्प से भी रंग आते हैं और कई अन्य इंप्रेशंस भी स्थान पाते हैं। 

चित्रगुप्त की गेज़ है पर वे हमारा कोई संदर्भ-च्युत विश्लेषण नहीं करने जा रहे। अस्तित्ववादी दार्शनिक मार्टिन हीडेग्गर इसे ही शायद being-in-the world कहते होंगे। यहाँ बिइंग की अन्त: क्रीड़ा संसार से होती रहती है। यह संसृति, यह प्रकृति, यह जीवन हमें रचता है। हम पर वक़्त की मार पड़ती है। हम उसे स्ट्राइक समझते हैं पर हो सकता है कि वह स्ट्रोक हों, चित्रकार के ब्रश के।

जीवन की कुछ कच्ची तात्कालिकताएँ हैं जिन्हें लेकर हम अपने ही आदर्श पुरुषों की आलोचनाएँ किया करते हैं क्योंकि वे हमारे सिद्धांत के अनुकूल नहीं पड़ते। बल्कि होता यह है कि हम ऐसे पुरुषों की जो मूर्ति अपने मन में धारण करते हैं, वह भी हमारे सिद्धान्त के अनुरूप हो, यह कोशिश रहती है। एक बड़ी हद तक वह होती भी है, पर कोई भी चित्र कई टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं से बनता है, उसमें अस्तित्व की बहुत-सी झुर्रियाँ होती हैं। संघर्ष, असफलताएँ और ख़ामियाँ।

और चित्रगुप्त उस पूरे चित्र को गुप्त ही रखते हैं। उसके आधार पर इसका सार्वजनिक मखौल नहीं उड़ाने लगते। हम लोग चीजों को सरलीकृत करना चाहते हैं और हमारे हिसाब से चीजों का जितना समास हो सके, उतना अच्छा। इतना सामासिक कि एक सूत्र में बदल जाए।

लेकिन हमारे ‘चित्र विचित्र गुपित्र मुनि’ का कहना है कि जीवन सूत्र नहीं है, चित्र है।समास नहीं है, व्यास है। 

विद ऑल इट्स डिटेल्स।


चित्रगुप्त(४)

चित्रगुप्त जब शाश्वत साक्षी हैं तब उनकी सबसे बड़ी विशेषता एक स्वतंत्रता देना है। यहीं वह ‘बिग ब्रदर इज़ वाचिंग यू’ वाले आर्वेलियन डिक्टेटर से भिन्न हो जाते हैं। 

यानी यदि वे साक्षी हैं तो वे हमारी तरह प्रतिक्रियात्मक तादात्म्य में फँसे नहीं हैं। दुख के प्रति हमारी प्रतिक्रियाएँ अक्सर अपनी असुविधा को मैनेज करने के बारे में होती हैं। चित्रगुप्त दुख को उससे अभिभूत हुए बिना स्पष्ट रूप से देखने वाले हैं जिससे अधिक कुशल और स्थायी और करुणामय क्रिया संभव होती है। शल्य चिकित्सक को स्थिर हाथों की आवश्यकता होती है; चित्रगुप्त वही स्थिरता हैं। सच्ची करुणा अनासक्त अवलोकन के उसी चित्रगुप्तत्व से उत्पन्न होती है। 

और इसलिए चित्रगुप्त अंतिम प्रलय के दिनों में, जब विश्व न तो  किसी धमाके और न किसी सिसकी से खत्म हुआ हो, बल्कि वह किसी ईश्वरीय मजिस्ट्रेट के अपनी टेबल पर एक हथौड़ा बजाने के साथ हमेशा के लिए शान्त हो गया हो, न्याय करने वाले नहीं हैं। कि क़यामत के किसी दिन जब किसी भयावह बॉलीवुड मूवी की तरह सभी मुर्दे जीवित उठ खड़े हों। कि आकाश फटे और उसके साथ उस न्यायाधीश के सामने एक ब्रह्मांडीय पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन शुरू हो जिसमें हरेक को न्याय के लिए क़तार में खड़ा होना है। चित्रगुप्त का काम नहीं है खरबों की उस अराजक भीड़ को सँभालना कि जिसमें आदमी भी होंगे और डायनासॉर भी। कि जिसमें एक गुहामानव एक जेन ज़ी से बहस कर रहा हो। 

चित्रगुप्त उस न्याय में हैं जो कर्म के साथ ही जन्म ले लेता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे क्राइम एंड पनिशमेंट के नायक के द्वारा की गई हत्या के साथ दंड जन्मता हो।जैसे रस्कोलनिकोव के द्वारा हत्या के साथ ही उसका दंड उसकी आत्मा में शुरू हो जाता है, वैसे ही चित्रगुप्त हर गलत कर्म के साथ हमारे भीतर जाग उठते हैं, हमारी अंतरात्मा में एक पीड़ा, एक सवाल, एक हिसाब के रूप में। 

चित्रगुप्त हमारी अंतरात्मा हैं—वह चेतना जो हर विचार, हर कर्म, हर इरादे को देखती है और उसे तुरंत तौलती है। यह वह आंतरिक साक्षी है जो किसी बाहरी न्याय की प्रतीक्षा नहीं करता। जैसे ही कोई गलत कर्म होता है—चाहे वह एक छोटा सा झूठ हो, एक चोरी, या रस्कोलनिकोव की तरह एक हत्या—चित्रगुप्त का लेखा-जोखा शुरू हो जाता है। यह लेखा-जोखा कोई कागज़ी किताब में नहीं लिखा जाता, बल्कि आत्मा की गहराइयों में लिखा जाता है जहाँ अपराधबोध, पछतावा, और आत्म-निंदा की लहरें उठने लगती हैं। आत्मा में एक भूकंप आता है। उसका आंतरिक चित्रगुप्त—उसकी अंतरात्मा—उसे तुरंत दोषी ठहराती है। वह बुखार, बेचैनी, और दुःस्वप्नों में डूब जाता है। यह कोई बाहरी जज नहीं है; यह उसकी अपनी चेतना है, जो हर पल उसे उसके कर्म का दर्पण दिखा रही है। जब हम कोई गलत काम करते हैं, हमारी अंतरात्मा हमें तुरंत उसका दर्पण दिखाती है। यह दर्पण कभी-कभी इतना स्पष्ट होता है कि हम उससे बच नहीं सकते। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति अपने परिवार को धोखा देता है, वह बाहर से मुस्कुरा सकता है, लेकिन भीतर से वह टूट रहा होता है। यह चित्रगुप्त का काम है—वह हमें हमारी सच्चाई से रू-ब-रू कराते हैं।

मनुष्य अपने कर्मों के साथ उनके दंड को जन्म देता है। यह दंड हमेशा बाहरी नहीं होता—जैसे जेल, सामाजिक बहिष्कार, या सजा। अधिकतर, यह दंड आंतरिक होता है। एक छोटा सा उदाहरण लें: मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने मित्र से झूठ बोलता है। वह सोचता है कि उसका झूठ छोटा है, कि कोई नुकसान नहीं हुआ। लेकिन जैसे ही वह झूठ बोलता है, उसके भीतर एक बेचैनी शुरू होती है। वह अपने मित्र की आँखों में देखने से कतराता है। वह रात को सोते समय उस पल को याद करता है और असहज हो जाता है। यह चित्रगुप्त का काम है—वह तुरंत आत्मा में एक निशान छोड़ देते हैं, एक ऐसा निशान जो मिटाया नहीं जा सकता, जब तक कि पश्चाताप या सुधार के द्वारा उसका प्रायश्चित न हो जाए।

या शायद वह भी एक अधूरा उदाहरण है क्योंकि मानवता के कई अपराधी ऐसे हैं जिनके भीतर का चित्रगुप्त मर गया है। जब किसी की अंतरात्मा इतनी कुंद हो जाती है कि वह गलत कर्म करने पर भी अपराधबोध महसूस नहीं करती? यह एक भयावह स्थिति है, क्योंकि यह वह अवस्था है जहाँ मनुष्य अपनी मानवता से कट जाता है। भारतीय दर्शन में इसे “अविद्या” (अज्ञान) या “माया” की गहरी परतों में डूबना कहा जाता है। ऐसे लोग अपने कर्मों के परिणामों को अनदेखा कर देते हैं। उदाहरण के लिए, एक भ्रष्ट राजनेता जो बार-बार झूठ बोलता है, या एक व्यापारी जो दूसरों का शोषण करता है, अपनी अंतरात्मा को इतना दबा देता है कि उसे कोई अपराधबोध नहीं होता। लेकिन क्या इसका मतलब है कि चित्रगुप्त वास्तव में मर चुके हैं? शायद नहीं। भारतीय दर्शन कहता है कि चित्रगुप्त कभी पूरी तरह मरते नहीं; वे आत्मा की गहराइयों में छिप जाते हैं, और देर-सबेर, चाहे इस जन्म में या अगले में, उनका हिसाब सामने आता है। कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता। भले ही व्यक्ति अपनी अंतरात्मा को दबा दे, कर्म का फल किसी न किसी रूप में प्रकट होता है—चाहे वह मानसिक अशांति के रूप में हो, सामाजिक परिणामों के रूप में, या अगले जन्म में। चित्रगुप्त की लेखनी कभी रुकती नहीं; वह हमेशा लिख रही है, भले ही हम उसे देख न पाएँ।

चित्रगुप्त इस आत्मा का प्रतीक हैं—वह हिस्सा जो हमें हमारे कर्मों का फल तुरंत दिखाता है। यह विचार पश्चिमी दर्शन में भी प्रतिध्वनित होता है, जैसे प्लेटो के विचार में, जहाँ आत्मा की शुद्धता ही सच्चा न्याय है।

आज का मनुष्य तर्क और विज्ञान के नाम पर अपनी अंतरात्मा को दबाने की कोशिश करता है। हम अपने कर्मों को तर्कसंगत ठहराते हैं—“यह तो व्यापार है,” “यह तो राजनीति है,” “यह तो मेरे लिए जरूरी था।” लेकिन चित्रगुप्त को तर्क से धोखा नहीं दिया जा सकता। वे हमारी आत्मा में गहरे बसे हैं, और उनकी लेखनी हर कर्म को दर्ज करती है।जब हम सामूहिक रूप से गलत करते हैं—जैसे पर्यावरण का विनाश, सामाजिक अन्याय, या युद्ध—हमारे आंतरिक चित्रगुप्त हमें चेतावनी देते हैं। वे हमारे सामूहिक अवचेतन में भी हैं। तब हम जलवायु परिवर्तन के परिणामों को देखते हैं और बेचैनी महसूस करते हैं। हम असमानता को देखते हैं और हमारी अंतरात्मा हमें कचोटती है। यह चित्रगुप्त का काम है—हमें हमारे कर्मों का दर्पण दिखाना, ताकि हम सुधार कर सकें।

सबसे बड़ी चुनौती तब आती है जब हम इस दर्पण से मुँह मोड़ लेते हैं। न्याय कोई बाहरी घटना नहीं है, जो सृष्टि के अंत में होगी। यह एक निरंतर प्रक्रिया है, जो हर पल हमारे भीतर चल रही है। 

जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हैं, जब हम अपने कर्मों का मूल्यांकन करते हैं और उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं, हम चित्रगुप्त के साथ एक संवाद में प्रवेश करते हैं। यह संवाद हमें मुक्ति की ओर ले जाता है—न केवल इस जन्म में, बल्कि उस अनंत यात्रा में जो हमारी आत्मा की है।
चित्रगुप्त (५)

जीवन की सबसे निरंतर बनी रहने वाली चुनौतियों में से एक है आत्म-प्रवंचना। हम अपने हानिकारक कार्यों को उचित ठहराने, अपनी भागीदारी को कम करने, अपनी स्वार्थपरता को आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करने में अद्भुत रूप से निपुण हैं। हम अपने आप को ऐसी कहानियाँ सुनाते हैं जिनमें हम नायक या पीड़ित होते हैं, कभी अपराधी नहीं। 

चित्रगुप्त अंतिम स्तर पर सफल आत्म-प्रवंचना की असंभवता का प्रतिनिधित्व करते हैं। आप जीवन भर खुद को धोखा दे सकते हैं, लेकिन आपकी तर्कसंगतियों से सत्य का लेखा-जोखा अप्रभावित रहता है। जब आप अंततः उससे सामना करते हैं — चाहे मृत्यु के क्षण में या पूरी ईमानदारी के क्षणों में — सत्य उजागर हो जाता है। 

किसी भी बाह्य न्यायाधीश के न्याय से पूर्व, एक अदृश्य आन्तरिक सभागार में आत्म-न्याय का आरम्भ होता है। 

वह न्यायालय न तो किसी स्थान विशेष में स्थित है, न ही किसी सीमा में बन्धित; अपितु वह सर्वत्र व्याप्य है—मनःप्रदेश के उस सूक्ष्म क्षेत्र में जहाँ चेतना का स्वर गूंजित होता है, जहाँ आत्म-विवेचन सम्पन्न होता है, और जहाँ अन्तःस्थ न्यायाधीश हमारे कर्मों का निर्णय करता है। 

यह न्यायाधीश करुणावान् भी है तथा कठोर भी—करुणा इसलिये कि वह हमारी परिस्थितियों तथा संघर्षों से परिचित है, और कठोर इसलिये कि उसे छल, लोभ या पलायन से वश में नहीं किया जा सकता। वह जीवन के प्रत्येक क्षण में सहचर बन कर विद्यमान रहता है, साक्षी रूपेण सर्वं पश्यति, किंचित् अपि न विस्मरति।

चित्रगुप्त का दैवी आख्यान—जो कर्मफलों का लेखाकार माने जाते हैं और मृत्यु के पश्चात् जीव के समस्त कर्मों का लेखा उद्घाटित करते हैं—इस अंतःस्थ न्यायाधीश का मूर्त प्रतिरूप है। यद्यपि कथा में चित्रगुप्त को निष्पक्ष दिव्य गणक रूपेण वर्णित किया गया है, तथापि मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से वे हमारे आत्म-प्रकाश एवं अन्तःविवेचन-शक्ति के प्रतीक हैं। चित्रगुप्त के माध्यम से हम अन्तःकरण की संरचना, आत्म-न्याय की मानस-प्रवृत्ति और उस अन्तःपरिवर्तन का अभ्यास कर सकते हैं जो तब घटित होता है जब जीव अपने ही इस सर्वदृष्टा न्यायाधीश से साक्षात्कार करता है।

चित्रगुप्त अन्तरात्मा हैं, सिर्फ उसका स्थापत्य नहीं हैं। वे सिर्फ नैतिक स्वर का उद्गम नहीं हैं। बाल्यावस्था से ही मनुष्य शील, मर्यादा तथा नैतिकता के मापदण्ड आत्मसात् करने लगता है। माता-पिता, समाज, संस्कृति, रिलीजन तथा अनुभूति—ये सभी मिलकर अन्तःकरण में एक नैतिक स्वर की रचना करते हैं, जो कर्मपरायणता का मापन करता है। पर चित्रगुप्त सोशल कोड का इंटर्नलाइजेशन नहीं हैं। वे धर्म हैं, रिलीजन नहीं है। 

फ्रायड ने जिसे “सुपरईगो” कहा है, अर्थात् वह मानसरचना जो सामाजिक-संस्कारों और सांस्कृतिक मध्यस्थता का अन्तरन्यस्त रूप है।किन्तु यह अन्तःस्थ न्यायाधीश केवल अर्जित संस्कारों का प्रतिबिम्ब नहीं, अपितु वह चैतन्य-शक्ति है जो आत्म-उत्तरदायित्व का बोध उत्पन्न करती है और कर्म को धर्ममूल्य से तौलती है।

यह स्वर अनेक रूपों में प्रकट होता है। कभी यह दारुण और दण्डात्मक प्रतीत होता है—“तुम अधम हो, तुम सदैव असफल होते हो, दुःख तुम्हारा भाग्य है।” कभी यह विवेकशील और शान्त भाव से कहता है—“यह तुम्हारा श्रेष्ठ क्षण नहीं था, किन्तु सुधार का अवसर विद्यमान है।” और कभी यह करुणामय किंतु सत्यप्रिय होकर उच्चरित होता है—“तुमसे त्रुटि हुई, परन्तु तुम प्रायश्चित्त में प्रवृत्त हो।” स्वर चाहे जैसा हो, उद्देश्य एक ही है—स्वयं का निरीक्षण। 

चित्रगुप्त इसी स्वर का परम एवं सर्वज्ञ स्वरूप हैं। वे न केवल कर्म का ज्ञान रखते हैं, अपितु उसके मूल हेतु, भावनाओं तथा आत्म-गोपन प्रवृत्तियों का भी बोध रखते हैं। उनके पत्रों में अंकित लेख वास्तव में हमारे आत्मज्ञान का प्रत्यक्ष आकार हैं—अखण्ड, अव्यभिचारी और मुक्तिदायक।

अन्तःस्थ न्यायाधीश के बारे में कह लें कि —द्वे आयामौ स्तः—साक्षित्वं च निर्णयनम् च। प्रथमं स साक्षी रूपेण अवलोकनं करोति, श्रवणं करोति, मनोविकारान् अनुभवनं करोति। साक्षित्व निरन्तर प्रवहमान है, यद्यपि बहुधा अवचेतन गति में है। मनुष्य सम्भवतः प्रत्येक क्षण को स्मरण न कर सके, तथापि अन्तःकरण का एक अंश सब कुछ का संग्रह करता जाता है —प्रत्येक शब्द, प्रत्येक भाव, प्रत्येक छवि अमिट रूपेण अंकित रहती है, मानो कालस्वरूप लेखे में प्रतिष्ठित हो।

ईसाई धर्म में स्वीकारोक्ति, यहूदी धर्म में तेशूवह (पश्चाताप), बौद्ध धर्म में प्रातिमोक्ष (आत्म-चिंतन)की साधनाएँ भी वस्तुत: आपको अपना स्वयं का चित्रगुप्त बनने को कहती हैं — अपने लेखे को ईमानदारी से पढ़ना, बिना बचाव के, बिना औचित्य के। उपचार इस बात में नहीं है कि लिखा हुआ मिटा दिया जाए, बल्कि इस बात में है कि उसे पूरी तरह स्वीकार किया जाए, स्वयं को स्पष्ट रूप से देखा जाए, और अपने कर्मों का भार स्वीकार किया जाए। 

मनोवैज्ञानिक रूप से, यह शर्म (सत्य से छिपना) से अपराधबोध (सत्य को स्वीकारना), फिर जिम्मेदारी (उसे अपनाना), और अंततः प्रायश्चित (उसे सुधारना) तक की यात्रा है। 

हर चरण में चित्रगुप्त वही रहते हैं — साक्षी जो सच्चाई देखते हैं — लेकिन हमारा उनसे संबंध बदलता रहता है। प्रारंभ में वे भयावह न्यायाधीश प्रतीत होते हैं, जिनसे हम बचना चाहते हैं; पर अंततः वे वह ईमानदार दर्पण बन जाते हैं जिसके माध्यम से हम स्वयं को सही रूप में देख सकते हैं। और सच्ची करुणा क्या है? जीवन में सबसे मुक्तिदायक संबंध वे होते हैं जहाँ हम पूरी तरह जाने जाते हैं और फिर भी स्वीकार किए जाते हैं। अपने पॉलिश्ड और प्रसाधनपूर्ण रूप में नहीं। जैसे हैं वैसे। 

चित्रगुप्त की कथा एक ब्रह्मांडीय रूप प्रस्तुत करती है — आप संपूर्ण रूप से ज्ञात हैं, उस  के द्वारा। तब प्रश्न यह बनता है कि क्या आप स्वयं को वैसे ही स्वीकार कर सकते हैं, जैसे आप हैं, यह जानते हुए कि आप जाने जा चुके हैं। 

और चित्रगुप्त की अवधारणा सामान्यतः व्यक्तिगत रूप में समझी जाती है कि प्रत्येक व्यक्ति का लेखा पृथक रूप से पढ़ा जाता है — पर यह चित्रगुप्त सैद्धांतिकी सामूहिक उत्तरदायित्व तक भी विस्तारित है। राष्ट्र, संस्कृतियाँ, आंदोलन, और समुदाय भी अपने सामूहिक कर्मों द्वारा अपने कर्म-लेख संचित करते हैं

चित्रगुप्त (६)

चित्रगुप्त के बहीखाते एक अन्य रहस्यमयी परंपरा से मेल खाते हैं—आकाशिक रिकॉर्ड्स की अवधारणा से जो यह मानती है कि ब्रह्मांड में अब तक घटी हर घटना का संपूर्ण लेखा-जोखा सुरक्षित है। संस्कृत में “आकाश” का अर्थ होता है “ether” या “space”—वह मूल तत्व जिसमें सभी घटनाएँ घटित होती हैं। आकाशिक रिकॉर्ड्स का विचार बताता है कि स्वयं अंतरिक्ष ही रिकॉर्डिंग माध्यम है—कि शून्य वास्तव में एक पूर्ण अभिलेखागार है।

इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो चित्रगुप्त रिकॉर्ड बनाते नहीं हैं, बल्कि उन्हें पढ़ते हैं। वे एक ऐसे पाठ के व्याख्याकार हैं जो स्वयं अस्तित्व द्वारा निरंतर लिखा जा रहा है। उनका कार्य है जो अप्रकट है उसे प्रकट करना, उस छिपे हुए लेखा-जोखे को उजागर करना जो हमेशा से मौजूद रहा है। जब आत्माएँ मृत्यु के बाद उनके समक्ष आती हैं, तो वे न्याय नहीं सुनाते; वे केवल उन्हें वह दिखाते हैं जो उन्होंने स्वयं लिखा है—उनके कर्मों का आईना।

यह दोष या जिम्मेदारी की अवधारणा को दिलचस्प रूप से बदल देता है। जैसे आप दर्पण को अपने प्रतिबिंब के लिए दोष नहीं दे सकते, वैसे ही आप चित्रगुप्त को अपने भाग्य के लिए दोष नहीं दे सकते। अभिलेख स्वयं रिकॉर्डकर्ता से पहले से मौजूद है। वे बस उसे पढ़ने योग्य बनाते हैं।

यह विचार, जिसे क्लॉड शैनन जैसे विचारकों ने प्रस्तुत किया और बाद में क्वांटम सूचना सिद्धांत में विस्तार से समझाया गया, यह सुझाव देता है कि सूचना कभी नष्ट नहीं होती। जब कोई किताब जलती है या कोई कंप्यूटर क्रैश हो जाता है, तब भी जानकारी गायब नहीं होती—वह केवल उलझ जाती है, बिखर जाती है, और एंट्रॉपी में परिवर्तित हो जाती है। भौतिक विज्ञानी जब यह बहस करते हैं कि ब्लैक होल में सूचना खो जाती है या नहीं, तो वे मूल रूप से यह पूछ रहे होते हैं कि क्या ब्रह्मांड की स्मृति पूर्ण है।

यदि चेतना का भौतिक ब्रह्मांड से संपर्क होता है—और अवश्य होता है, क्योंकि चेतन निर्णय भौतिक क्रियाओं को जन्म देते हैं—तो संभवतः कर्म-स्मृति का भी कोई भौतिक आधार होता है। प्रत्येक क्रिया स्पेस-टाइम में हलकी लेकिन वास्तविक तरंगें उत्पन्न करती है, जो क्वांटम क्षेत्र में जानकारी के रूप में अंकित हो जाती हैं—ऐसे रूप में जिन्हें हम अभी पूरी तरह नहीं समझते, लेकिन जिन्हें मिटाया नहीं जा सकता। चित्रगुप्त इस अस्तित्व की आंतरिक, सूचना-संरक्षण करने वाली गुणवत्ता का प्रतीक बन जाते हैं।

चित्रगुप्त समय की स्मृति है, यह सिद्धांत कि अतीत बना रहता है। यह किसी भूतिया प्रतिध्वनि के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान की शर्त के रूप में—उस नींव के रूप में जिस पर ‘अब’ खड़ा है। आपका वर्तमान क्षण पूर्ण रूप से संचित अतीत से निर्मित है—उन सभी कर्मों और विकल्पों से जिन्होंने आपको यहाँ तक पहुँचाया। यह “अभिलेख” वास्तविकता से अलग नहीं है—यह वास्तविकता की अपनी निरंतरता है। 

हमें यह पहचानने के लिए रहस्यमय दावों की आवश्यकता नहीं कि कर्म—स्मृति के रूप में—जीवन में कैसे कार्य करता है। आघात संबंधी शोध बताता है कि अनुभव—विशेष रूप से तीव्र या बार-बार होने वाले अनुभव—शाब्दिक रूप से न्यूरल पथों को पुनः आकार देते हैं। शरीर स्वयं अभिलेख रखता है, जैसा कि बेसल वान डर कोलक की प्रभावशाली पुस्तक का शीर्षक बताता है। स्मृति शरीर में लिखी जाती है—तंत्रिका तंत्र की स्वचालित प्रतिक्रियाओं में, उन हार्मोनल प्रतिक्रियाओं में जो सचेत विचार के पहले सक्रिय हो जाती हैं। 

जो व्यक्ति हिंसा के वातावरण में बढ़ता है, वह केवल हिंसा को याद नहीं करता; वह उसे अपने शरीर की प्रत्याशित प्रतिक्रियाओं में, आराम न कर पाने में, और अतिसतर्कता में ढोता है। आघात “अतीत” में नहीं है—वह वर्तमान क्षण के शरीर-क्रियात्मक और मनोवैज्ञानिक ढाँचे में कूटित है। यही संस्कार का सबसे ठोस रूप है: वह स्मृति जो चल रहे अनुभव को आकार देती है, वह इतिहास जो प्रवृत्ति के रूप में चलता रहता है। 

इसी प्रकार, सुरक्षा, प्रेम और सामंजस्य के आवर्ती अनुभव अपने संस्कार बनाते हैं—सुरक्षित लगाव के पैटर्न, विश्वास की क्षमता, कठिनाइयों के सामने लचीलापन। ये “अच्छे कर्म” का प्रतिफल नहीं हैं; ये मनुष्य के भीतर अनुभवों द्वारा लिखे गए स्वाभाविक परिणाम हैं।इस पहचान में एक गहराई है कि हम वह सब कुछ ढोते हैं जो हमने कभी किया है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चित्रगुप्त की लेखा-पुस्तक वह योग है, जिसके द्वारा हमारा अतीत हमारी वर्तमान जीवन-प्रतिक्रिया की क्षमता को आकार देता है।


चित्रगुप्त (७)

क्या ऐसा नहीं लगता कि हम अब ज्यादा से ज्यादा एक प्रकार के चित्रगुप्त-जगत में जी रहे हैं। हर डिजिटल क्रिया—हर खोज, ख़रीद, संदेश, और स्थान—संगृहीत होती है। निगम और सरकारें किसी दिव्य लेखाकार जितनी सावधानी से बही रखते हैं, हमारे व्यवहार के पैटर्न का पता लगाते हैं, भविष्यवाणी करते हैं, और हमें अपनी स्मृतियों के माध्यम से जवाबदेह (या असुरक्षित) बनाते हैं।

चित्रगुप्त का यह प्राचीन कथ्य आधुनिक युग की निजता, निगरानी, और डिजिटल पदचिह्नों की स्थायित्व संबंधी चिंताओं से सीधा संवाद करता है। एक बार कुछ ऑनलाइन चला गया, तो वह लगभग स्थायी हो गया। इंटरनेट कभी नहीं भूलता। हर मूर्खतापूर्ण वक्तव्य, हर जवानी की गलती, हर भूल—सब किसी सर्वर पर, किसी अभिलेखागार में संग्रहीत रहती है, तैयार रहती है दोबारा सामने लाए जाने और हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने के लिए।

यह तकनीकी विकास उसी सत्य को मूर्त रूप देता है जिसका संकेत चित्रगुप्त सदियों से देते आये हैं कि हम एक ऐसे ब्रह्मांड में रह रहे हैं जहाँ सब कुछ स्थायी रूप से दर्ज रहता है। फर्क बस इतना है कि पहले ब्रह्मांडीय लेखे ईश्वर के पास होते थे, जो सर्वज्ञ और न्यायप्रिय माने जाते थे; अब वे रिकॉर्ड कंपनियों और सरकारों के पास हैं, जो लाभ और नियंत्रण की खोज में रहते हैं। 

चित्रगुप्त कभी हमारे कर्मों को विज्ञापनदाताओं को नहीं बेचते थे और न हमारे अतीत को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे।

ब्लॉकचेन तकनीक इस सिद्धांत का एक ठोस रूपांतर प्रस्तुत करती है। ब्लॉकचेन एक अपरिवर्तनीय, वितरित बही है — एक बार कोई लेन-देन दर्ज हो जाए, तो उसे बदला या मिटाया नहीं जा सकता। यह रिकॉर्ड किसी केंद्रीय प्राधिकारी के बजाय पूरे नेटवर्क द्वारा संरक्षित रहता है, ठीक वैसे ही जैसे कर्मफलों का लेखा किसी बाहरी देवता द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं वास्तविकता के स्वभाव द्वारा रखा जाता है।

क्रिप्टोकरेंसी के समर्थक इस प्रणाली को “ट्रस्टलेस” कहते हैं — इसमें किसी केंद्रीय संस्था पर भरोसा करने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि रिकॉर्ड गणितीय रूप से सुनिश्चित, वितरित और स्थायी होता है। यह तकनीकी रूप में चित्रगुप्त-सिद्धांत का प्रकटीकरण है: अदोष स्मृति के माध्यम से जवाबदेही, पूर्ण रिकॉर्ड-रखने से न्याय, और अपरिवर्तनीय सूचना से परिणाम।

परंतु ब्लॉकचेन स्थायी स्मृति के संभावित अत्याचार को भी उजागर करता है। यदि हर लेन-देन सदा के लिए अंकित हो जाए, तो भूलने, पुनः प्रारंभ करने, या युवावस्था की भूलों को मिटाने का कोई अवसर नहीं बचेगा। वही स्थायित्व जो धोखाधड़ी से बचाता है, मोक्ष की संभावना को भी मिटाता है; जो जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है, वही अपरिहार्यता भी स्थापित करता है।  

आज की तकनीक हमारे भौतिक अस्तित्व को ऑंटोलॉजिकल रूप से पुनर्परिभाषित करती है। डिजिटल अस्तित्व के नए रूप सामने आ रहे हैं जहां इकाइयां distributed लेजर पर अपरिवर्तनीय प्रविष्टियों के रूप में मौजूद होती हैं, जो Reality की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती हैं। यह तकनीक एक समानांतर ऑंटोलॉजी बनाती है, जो भौतिक और आभासी क्षेत्रों को गड्ड मड्ड करती है, क्योंकि डेटा ब्लॉक सेल्फ सस्टेनिंग प्रणालियां बनाते हैं जो ओनरशिप और आइडेंटिटी को बदल के रख देंगी। 

दार्शनिक रूप से, यह सवाल उठाता है कि क्या मानवीय अस्तित्व को क्रिप्टोग्राफिक टोकनों तक सीमित किया जा सकता है? क्या वह एक विखंडित सेल्फ को जन्म नहीं देगा जहां व्यक्तिगत इतिहास हमेशा के लिए तय होंगे, जहाँ तरलता और विकास की गुंजाइश भी कम हो जाएगी? 

रिकॉर्ड का स्थायित्व जीवन के एक नियतिवादी दृष्टिकोण की ओर ले जा सकता है जहां अतीत की कार्रवाइयां अपरिवर्तनीय सार बन जाएंगी? अस्तित्व की धारणाएं मोमेन्ट या क्षण से तय नहीं होंगी। वे अभिलेखीय अवधारणाओं में बदल जायेंगी? एक हाइपर-कनेक्टेड दुनिया में व्यक्तियों की अपनी जगह की अवधारणा तब कैसे तय होंगी। 

चित्रगुप्त चित्रगुप्त हैं। वे रिकॉर्ड तो रखते हैं पर गुप्त होने का उनका वायदा अकाट्य है। आधुनिक दुनिया सबसे ज्यादा उन्हीं जैसा बनने की कोशिश कर रही है पर उनके आदर्शों के बिना उन जैसा बनना एक दुःस्वप्न होगा। एक डिजिटल बिइंग की रचना और एक अन्तःकरण, एक अंतरात्मा और एक आकाश की रचना के बीच एक भयावह अन्तराल है। चित्रगुप्त आपको कर्म-स्वातंत्र्य देते हैं पर उनके मशीनी अनुवाद में पहचान की fluidity खत्म हो जाएगी, वह एक fixed पहचान बनकर रह जाएगी। चित्रगुप्त आपके अगले जन्म जन्मांतरों का भविष्य हैं पर उनके जैसी रिकॉर्ड कीपिंग यदि मशीनें करने लगेंगी तो मनुष्य अपने अतीत का बंधक होकर रह जायेगा।

Monday, 27 October 2025

आयुर्वेद

1.जहाँ कहीं भी आपको,काँटा कोइ लग जाय। दूधी पीस लगाइये, काँटा बाहर आय।।
2.मिश्री कत्था तनिक सा,चूसें मुँह में डाल। मुँह में छाले हों अगर,दूर होंय
तत्काल।।
3.पौदीना औ इलायची, लीजै दो-दो ग्राम। खायें उसे उबाल कर, उल्टी से आराम।।
4.छिलका लेंय इलायची,दो या तीन गिराम। सिर दर्द मुँह सूजना, लगा होय आराम।।
5.अण्डी पत्ता वृंत पर, चुना तनिक मिलाय। बार-बार तिल पर घिसे,तिल बाहर आ
जाय।।
6.गाजर का रस पीजिये, आवश्कतानुसार। सभी जगह उपलब्ध यह,दूर करे अतिसार।।

7.खट्टा दामिड़ रस, दही,गाजर शाक पकाय। दूर करेगा अर्श को,जो भी इसको खाय।।
8.रस अनार की कली का,नाक बूँद दो डाल। खून बहे जो नाक से, बंद होय तत्काल।।
9.भून मुनक्का शुद्ध घी,सैंधा नमक मिलाय। चक्कर आना बंद हों,जो भी इसको खाय।।
10.मूली की शाखों का रस,ले निकाल सौ ग्राम। तीन बार दिन में पियें, पथरी से
आराम।।
11.दो चम्मच रस प्याज की,मिश्री सँग पी जाय। पथरी केवल बीस दिन,में गल बाहर
जाय।।
12.आधा कप अंगूर रस, केसर जरा मिलाय। पथरी से आराम हो, रोगी प्रतिदिन खाय।।
13.सदा करेला रस पिये,सुबहा हो औ शाम। दो चम्मच की मात्रा, पथरी से आराम।।
14.एक डेढ़ अनुपात कप, पालक रस चौलाइ। चीनी सँग लें बीस दिन,पथरी दे न दिखाइ।।
15.खीरे का रस लीजिये,कुछ दिन तीस ग्राम। लगातार सेवन करें, पथरी से आराम।।
16.बैगन भुर्ता बीज बिन,पन्द्रह दिन गर खाय। गल-गल करके आपकी,पथरी बाहर आय।।
17.लेकर कुलथी दाल को,पतली मगर बनाय। इसको नियमित खाय तो,पथरी बाहर आय।।
18.दामिड़(अनार) छिलका सुखाकर,पीसे चूर बनाय। सुबह-शाम जल डाल कम, पी मुँह
बदबू जाय।।
19. चूना घी और शहद को, ले सम भाग मिलाय। बिच्छू को विष दूर हो, इसको यदि
लगाय।।
20. गरम नीर को कीजिये, उसमें शहद मिलाय। तीन बार दिन लीजिये, तो जुकाम मिट
जाय।।
21. अदरक रस मधु(शहद) भाग सम, करें अगर उपयोग। दूर आपसे होयगा, कफ औ खाँसी
रोग।।
22. ताजे तुलसी-पत्र का, पीजे रस दस ग्राम। पेट दर्द से पायँगे, कुछ पल का
आराम।।
23.बहुत सहज उपचार है, यदि आग जल जाय। मींगी पीस कपास की, फौरन जले लगाय।।
24.रुई जलाकर भस्म कर, वहाँ करें भुरकाव। जल्दी ही आराम हो, होय जहाँ पर घाव।।
25.नीम-पत्र के चूर्ण मैं, अजवायन इक ग्राम। गुण संग पीजै पेट के, कीड़ों से
आराम।।
26.दो-दो चम्मच शहद औ, रस ले नीम का पात। रोग पीलिया दूर हो, उठे पिये जो
प्रात।।
27.मिश्री के संग पीजिये, रस ये पत्ते नीम। पेंचिश के ये रोग में, काम न कोई
हकीम।।
28.हरड बहेडा आँवला चौथी नीम गिलोय, पंचम जीरा डालकर सुमिरन काया होय॥
29.सावन में गुड खावै, सो मौहर बराबर पावै॥

Sunday, 26 October 2025

ब्राह्मण और अंग्रेज शासन

ब्राह्मणों ने न केवल अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह/ संग्राम का बार बार नेत्तृत्व किया था बल्कि उनका अंग्रेजों से विरोध इस हद तक था कि यदि वे डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर भी हों तो भी रसोई के लिए पुरोहित के रूप में ब्राह्मण अपनी सेवाएँ देने राज़ी न हुए। दरिद्र से दरिद्र ब्राह्मण ने भी देश को गुलाम बनाने वालों को खाना खिलाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। 

ब्राह्मणों के इस भीतरी विरोध पर ध्यान दिया ही नहीं गया है। बल्कि इसे यों प्रस्तुत किया गया कि उच्च जाति के हिंदू (ब्राह्मण, क्षत्रिय) गोमांस, सुअर का मांस, या शराब को छूने की उन वर्जनाओं के कारण यूरोपियनों के लिए खाना बनाने से बचते थे, जो ब्रिटिश आहार में आम थीं। यह कार्य “अपवित्र” और निम्न-स्थिति का माना जाता था। इसलिए, रसोइए आमतौर पर शूद्र (श्रमिक) या “अछूत” (दलित/परिया) समुदायों से, या गैर-हिंदू जैसे गोवा के कैथोलिक या मुस्लिम होते थे। शूद्र, हिंदू समाज में चौथा वर्ण, सेवा व्यवसायों से जुड़े थे और औपनिवेशिक भारत में घरेलू श्रम का मुख्य स्रोत थे। मेमसाहिब्स एंड देयर सर्वेंट्स इन नाइनटीन्थ-सेंचुरी इंडिया, 1994 पढ़िये तो पता चलेगा कि निम्न जाति के हिंदू” या “अछूत” रसोई के लिए पसंद किए जाते थे ताकि मिश्रित मांस और शराब को समायोजित किया जा सके। कास्ट, फूड एंड कोलोनियलिज्म (2024) में बताया गया है कि  मद्रास प्रेसीडेंसी (तुलनीय प्रशासकीय क्षेत्र) में, परिया (अछूत) रसोइए “अंग्रेजी, फ्रांसीसी और इतालवी पुडिंग” बनाने की अपनी क्षमता का विज्ञापन करते थे। हू इज (नॉट) अ सर्वेंट, एनीवे? (2020) में यह बताया गया है कि ये रसोईये दो तीन तरह के और भी काम कर लेते थे। 

अंग्रेजी शासन काल में एक हजार से ज्यादा डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर हुए।सबने कथित शूद्र रसोइये रखे। ये अधिकारी, अक्सर 20-30 वर्ष की आयु के युवा आईसीएस अधिकारी, एकांत बंगलों में रहते थे और स्थानीय भारतीय घरेलू कर्मचारियों पर बहुत अधिक निर्भर रहते थे, जिसमें खाना पकाने जैसे कार्य भी शामिल थे, क्योंकि उष्णकटिबंधीय जलवायु और स्थानीय भोजन तैयार करने की अपरिचितता थी। कहा यह गया कि cultural friction से British comfort न प्रभावित हो जाये, इसलिए यह हुआ और यह सिर्फ कलेक्टर स्तर की बात न थी, हर ब्रिटिश अधिकारी का यही तौर तरीका था। After Five Years in India पुस्तक में Anne C. Wilson(1895) ने  एक ब्रिटिश अधिकारी के घर के हाल बताए हैं। उससे भी इसकी पुष्टि होती है। भारत में ब्रिटिश घरों, जिसमें डीसी के घर शामिल थे, में औसतन 10–20 नौकर काम करते थे, जो सस्ते श्रम और औपनिवेशिक जीवनशैली के “प्रतिष्ठा” पर जोर के कारण संभव था। रसोइए (बावर्ची या खानसामा) आवश्यक थे, क्योंकि ब्रिटिश अधिकारी करी जैसे भारतीय भोजन के साथ-साथ यूरोपीय शैली के व्यंजनों (जैसे रोस्ट, पुडिंग) को पसंद करते थे। मेमसाहिबों के गाइड (उदाहरण के लिए, फ्लोरा एनी स्टील की द कम्प्लीट इंडियन हाउसकीपर एंड कुक, 1888) और संस्मरणों में रसोइए पुरुष गैर ब्राह्मण भारतीय थे। वे इस पुस्तक में इस बात पर दुख जताती हैं कि जातीय प्रतिबंधों (caste restrictions) ने  servant versatility को सीमित कर दिया। अंग्रेजों ने इस आधार पर यह अवधारणा भी बनाई कि भारत के लोग lazy होते हैं और काम करने से मना करने के बहाने बनाते हैं। 

Servants’ Pasts: Late-Eighteenth to Twentieth-Century South Asia (2019) में नितिन शर्मा और नितिन वर्मा भी अंग्रेजों के इस दृष्टिकोण से सहानुभूति रखते प्रतीत होते हैं : The Europeans in India incessantly complained of being forced to hire innumerable servants because of the alleged caste taboos that defined work. Tied to this was the idea that servants were characteristically lazy, who often gave the excuse of caste prohibitions in order not to perform certain tasks. In this orientalising mix of caste and essentialised native character, where does the possibility of recovering agency on the part of servants lie?” (pp. 34–35).

उत्सा रॉय अपनी किताब Culture of Food in Colonial Bengal (2009) में भी इसका उल्लेख करती हैं कि ब्राह्मण कैसे इस कार्य को करने से इन्कार करते रहे। 

पंचकारी बंदोपाध्याय और महेंद्रनाथ दत्ता के विवरण भी यही बताते हैं कि Brahmins never took up cooking at other people’s houses… [it was seen as] disrespectful.”

तनिका सरकार caste–ing servants in colonial Calcutta नामक अपने लेख में 19 वीं सदी की सैनिटेशन रिपोर्ट्स का हवाला देकर इस तरह के caste avoidance की पुष्टि करती हैं।

ब्राह्मणों की इस अवज्ञा ने caste reinforcement में क्या भूमिका निभाई होगी? क्या अंग्रेज अधिकारी ब्राह्मणों के द्वारा किये जा रहे इस रिजेक्शन के वास्तविक अर्थ नहीं समझ रहे होंगे? क्या वे इससे अपमानित नहीं महसूस करते होंगे ? क्या ब्राह्मणों को उन्होंने इसका सबक न सिखाना चाहा होगा? 

और इसलिए ब्राह्मिनिज्म के विरोध में उन्होंने अपना मानस दृढ़तर बना लिया? 

क्या अस्पृश्यता के सवाल को कभी सामाजिक दमन की जगह शुद्धता और पवित्रता के इस आग्रह से कभी देखा गया? कि ब्राह्मण प्रभुता के निरंकुशत्व से सम्पन्न अंग्रेजों के साथ छुआछूत बरत रहे थे। 

और इसलिए ब्राह्मण इसकी कीमत चुकाते रहे और अंग्रेजों से ब्राह्मणों से अपनी घृणा का स्थानांतरण भारतीय समाज के दूसरे वर्गों में करने के लिए वे नैरेटिव्स बोने शुरू कर दिये जिसकी फसल आज भी काटी जा रही है।

Thursday, 23 October 2025

astro net 24/10/25

गुरु सूर्य बुध 3,6,7,8,10,12

आराधना एस्ट्रो वर्ल्ड की रिसर्च & वास्तु

बुद्ध का खाली गोल-गोल होता है चक्कर गुरु सूर्य दो मित्रों के फल को देता है टक्कर सरकारी काम धंधे में अक्सर होती है बरकत गृहस्थ परिवार बिजनेस में दुख देते हैं शिरकत

-आराधना एस्ट्रो वर्ल्ड

वास्तु & उपाय (राशि कुंडली अनुसार) (पुखराज)

आराधना एस्ट्रो वर्ल्ड

रात को use कर पिता का बिस्तर पलंग या चारपाई लाल कपड़े में केसर सौंप तिजोरी में कायम करके रखना भाई तांबे के गोल सिक्कों से दूर होता हैं खराब फल शेरनी और उसके बच्चों की फोटो लगाने से निकलता है हल लिटिल फिंगर में तांबे में पुखराज पहनने से मुसीबत जाती है टल

कार्तिक शुक्ल द्वितीया पर कलम पूजन

कार्तिक शुक्ला द्वितीया पर पूजन
🪔
1. लेखनी ( कलम), 
2. दवात ( स्याही, मसी पात्र ),
3. पोथी ( बही, पुस्तक, पत्रिका आदि)

वैसे तो दीपोत्सव पर ही बही पूजन होता है। आगे कुंकुम से स्वस्तिक, दो दो आंगल, पांच - पांच दिशा बिंदी जैसे लक्ष्म अंकित किए जाते हैं। पुरानी और नवीन दोनों तरह की बही, नोन्ध, खाता या चोपड़ी हो, ऐसा करने की परम्परा है। उस पर वस्त्र, तांबूल पत्र निवेदित किया जाता है। कलम में स्याही पूरी जाती है और तिलक सहित मौली बंधन किया जाता है। लेकिन, लेखन कार्य यम द्वितीया से शुरू किया जाता है। इस दिन फिर से धूप और दीपदान के साथ कलम और दवात पूजन होता है और स्वस्ति स्वरूप में देवी देवताओं के आशी सूचक राशिदायक, जयकारक वचन और शुभ संख्यक श्री श्री श्री श्री श्री आदि लिखे जाते हैं। ( लेखन पद्धति : भारतीय ज्ञान परंपरा : श्रीकृष्ण जुगनू)

यह सरस्वती विधि या सारस्वत विधान माना जाता है और कामना की जाती है कि किसी भी तरह के लेन - देन से पहले अक्षर स्वरूप बही का लेखन सदैव स्मरण रहे : पहले लिख, पीछे दे ; भूल पड़े कागज से ले। लेखनी देवी और अक्षर ब्रह्म का ध्यान किया जाता है। यह समय को जीतने का भी उपाय है। काल के देवता यमराज भी स्मरण के लिए लेखनी रखते हैं। उनके हाथ में लेखनी और पुस्तक होते हैं। यह बहुत सुविचारित सत्य है। ( यहां एक चित्र श्री हर्षद कुमार कड़ियां के संग्रह से दिया जा रहा है) उनके दरबार के लेखन विशारद श्री चित्रगुप्त की तो कथा प्रचलित है ही। कायस्थ समाज में यह भगवान् चित्रगुप्त की पूजा का पर्व है। 

अधिक समय नहीं हुआ, जब दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के रूप में यह सारस्वत पूजन ही किया जाता है और शुभ कामनाओं के रूप में ऐसी का सूचना पत्र मित्र और परिचित तथा व्यवहारियों को भेजा जाता। आदि पोथी वाचकों के समुदाय में इस दिन पोथी को पाट पर रखकर पूजा करने और नवीन ओली देने की रीति देखने में आई है। 

Wednesday, 22 October 2025

दिशाओं की बातें

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आज सुबह जब मैं अपने घर के बगीचे में टहल रहा था तो मैंने सूर्य को उदय होते हुए देखा। मैंने सूर्य के उदय होने की दिशा देखी। मैंने गौर किया कि मेरे घर की दिशा के सापेक्ष जून में सूर्य मुझे अभी की अपेक्षा उत्तर की ओर से उदित होता हुआ दिखाई पड़ता था और जाड़ों में दक्षिण की ओर से। मुझे याद आया कि अभी 3 दिन पहले - 22 सितंबर को - उत्तरी गोलार्ध का ऑटम इक्विनॉक्स होकर चुका है। इसका अर्थ हुआ कि इस समय सूर्य भूमध्य रेखा के ऊपर है। जब उत्तरी गोलार्ध में गर्मियां पड़ती हैं तब वह 23.5 डिग्री उत्तर - कर्क रेखा - के ऊपर और यहां जाड़े पड़ने पर 23.5 डिग्री दक्षिण में मकर रेखा के ऊपर होता है। यहां तुलना के लिए यह जानना अच्छा होगा कि हमारी दिल्ली लगभग 28.7 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित है और भूमध्य रेखा अफ्रीका महाद्वीप के लगभग बीच से गुजरती है।

यह देख कर मेरे मन में विचार आया कि पूर्व दिशा क्या है। हम लोग बचपन में पढ़ते हैं कि जिस दिशा से सूर्य उदित होता है, वह पूर्व दिशा होती है। इसकी ओर मुंह करके खड़े होने पर हमारी पीठ पीछे पश्चिम दिशा, बाएं हाथ की ओर उत्तर दिशा और दाएं हाथ की ओर दक्षिण दिशा होती है। लेकिन सूर्य तो किसी एक निश्चित दिशा से उदित नहीं होता है। यह आभासी रूप से 23.5 डिग्री उत्तर अक्षांश से 23.5 डिग्री दक्षिण अक्षांश के बीच घूमता हुआ दिखाई पड़ता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने के तल के लंब के सापेक्ष पृथ्वी के अक्ष का जो झुकाव है - जो इस समय लगभग 23.5 डिग्री है - वह झुकाव पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा के दौरान सूर्य के सापेक्ष अपनी दिशा परिवर्तित करता रहता है। क्योंकि सूर्य आभासी रूप से पृथ्वी की सतह के सापेक्ष अपने उदय और अस्त होने के स्थान एवं परिक्रमा-पथ को बदलता हुआ दिखाई पड़ता है, इसलिए हम पूर्व दिशा किसे मानेंगे और इसके अनुसार पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा किसे मानेंगे? 

यह कहना गलत है कि पृथ्वी के केन्द्र से सूर्य के केन्द्र की ओर जाने वाली दिशा पूर्व दिशा होती है। सूर्य के चारों ओर पृथ्वी द्वारा अपनी यात्रा के पथ में हर बिंदु पर यह दिशा बदलती रहती है। वास्तव में कोई भी 'कार्डिनल' दिशा पृथ्वी की सतह के सापेक्ष देखी जाती है। पृथ्वी की सतह के किसी स्थान से हमें सूर्य जिस ओर से उदित होता हुआ दिखाई पड़ता है, आम तौर पर उसे पूर्व दिशा कह दिया जाता है। किन्तु क्या यह एक सही परिभाषा है? 

फिर, ध्रुव प्रदेशों में तो 6 महीने का दिन और 6 महीने की रात होती है। वहां 6 महीने तो सूर्य दिखाई ही नहीं पड़ता है और जब दिखाई भी पड़ता है तो वह कुछ समय के लिए बहुत कम देर के लिए उदित होता हुआ और आसमान में रहता हुआ दिखाई पड़ता है और फिर क्षितिज के समानांतर एक गोल चक्कर लगाता दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में वहां दिशाएं तय करने में अत्यंत कठिनाई होगी। फिर जितना हम ध्रुवों की ओर बढ़ते जाएंगे, उतनी ही दिशाएं समाप्त होती जाएंगी। ठीक ध्रुवों पर केवल एक ही दिशा रह जाएगी।

यह कहना भी गलत है कि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। पृथ्वी किसी भी ओर से घूमे, हम उसे पश्चिम से पूर्व या पूर्व से पश्चिम कह सकते हैं। कहने का सही तरीका यह है कि यदि हम पृथ्वी को उसके उत्तरी ध्रुव के ऊपर अंतरिक्ष से नीचे की ओर देखें तो वह हमें घड़ी की सुइयों के चलने की विपरीत दिशा में चलती हुई - या घूमती हुई - दिखाई पड़ेगी। या इसे हम ऐसे कह सकते हैं कि हम पृथ्वी को दक्षिणी ध्रुव के ऊपर अंतरिक्ष से नीचे देखें तो वह हमें घड़ी की सुइयों की दिशा में चलती हुई दिखाई पड़ेगी।

पृथ्वी की सतह पर दिशाएं उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव से भी तय की जा सकती हैं। लेकिन यहां पर चुंबकीय ध्रुवों और भौगोलिक ध्रुवों का अंतर भी सामने आता है। कहीं पर चुंबकीय ध्रुवों को देखा जाता है और कहीं पर भौगोलिक ध्रुवों को। इसके विभिन्न कारण होते हैं।

अंतरिक्ष में वैसे तो कोई दिशा नहीं होती है - या कहना चाहिए कि पृथ्वी की सतह के सापेक्ष वाली कोई दिशा नहीं होती है - लेकिन फिर वहां दिशाएं होती भी हैं। वह दिशाएं अनेक प्रकार से देखी जाती हैं, उदाहरण के लिए गैलेक्टिक एक्सिस से, हमारी गैलेक्सी या गैलेक्सी के बाहर की विभिन्न सेलेस्टियल बॉडीज के कोऑर्डिनेट्स से, पृथ्वी के पोल्स के एक्सटेंशन से, उसकी भूमध्य रेखा के एक्सटेंशन से, 'राइट एसेंशन' और 'राइट डेक्लीनेशन' से और अनेक अन्य प्रकार से। और अंतरिक्ष में 'ऊपर' और 'नीचे' भी नहीं होता है। और पृथ्वी की सतह के हर स्थान पर ऊपर और नीचे की दिशा एक-दूसरे के सापेक्ष भिन्न-भिन्न होती है। 

इसी प्रकार उत्तरी ध्रुव में केवल दक्षिण दिशा होती है और दक्षिणी ध्रुव में केवल उत्तरी दिशा। उत्तरी ध्रुव से हर रास्ता केवल दक्षिण की ओर जाता है और इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव से हर रास्ता केवल उत्तर की ओर। पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव समय के साथ-साथ अपना स्थान थोड़ा-थोड़ा बदलते भी रहते हैं। बल्कि पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुवों ने तो पृथ्वी के इतिहास में अनेक बार एक-दूसरे के साथ भी स्थान बदला है। जहां इस समय उत्तरी ध्रुव है, कभी वहां दक्षिणी ध्रुव था, और जहां दक्षिणी ध्रुव है, वहां उत्तरी ध्रुव। ऐसा उसके अंदर के लोहे के क्रोड की स्थिति में परिवर्तन के कारण होता है। पृथ्वी के भौगोलिक ध्रुव भी अंतरिक्ष के तारों के सापेक्ष एक लट्टू के समान चक्कर लगाते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पूर्व और पश्चिम दिशा एक निश्चित दिशा नहीं है। हम यह मोटे तौर पर कहते हैं कि जिस दिशा से सूर्य उदय होता है, वह पूर्व दिशा होती है। 

तो, दिशाओं का संसार बहुत रोचक है। 'दिशाओं' से मुझे 'दिग्गजों' की याद आ रही है। दिग्गज - अर्थात् दिक् + गज - अर्थात् दिशाओं के हाथी। कभी यह माना जाता था कि चार दिशाओं में चार बड़े-बड़े हाथी होते हैं जो पृथ्वी को अपनी पीठ पर धारण किए रहते हैं। कैसी-कैसी धारणाएं थीं! कछुए की पीठ पर, वराह के दांतों पर, शेषनाग के फन पर, हाथी की पीठ पर टिकी पृथ्वी, चपटी पृथ्वी और किसी देवता के मुख, हाथों, पैरों, पेट से अथवा जमीन फाड़ कर पैदा होते इंसान, आदि क्या-क्या नहीं। ‌लेकिन क्या अभी भी हम लोग अपनी धारणाओं में बहुत सुसंगत हो पाए हैं? क्या अभी भी हम अनेक अतार्किक धारणाएं नहीं पाले बैठे हैं? क्या अभी भी हमारे समाज की एक वैज्ञानिक मानसिकता बन पायी है? क्या अभी भी अधिकांश धार्मिक और पांथिक मतों को वैज्ञानिक मानसिकता की बात करने पर बिजली का झटका नहीं लग जाता है? 🤔

चांद और पृथ्वी

.                          हम पर गिरता चांद?
                                   

पिछले दिनों मैं अपने एक वैचारिक मित्र का एक संप्रेषण पढ़ रहा था जिसमें अंतरराष्ट्रीय चंद्र-निशा अवलोकन के बारे में बताया गया था। यह चांद को देखने के लिए एक आयोजन होता है। इसे पढ़ कर मुझे अपने बचपन और बाद की चांद के विषय की कुछ कल्पनाएं, धारणाएं और तथ्य याद हो आए। मैं उनको मित्रों के साथ साझा करता हूं।

अपने बचपन में एक बार मैंने एक सपना देखा कि मैं एक रॉकेट से चांद पर पहुंच गया हूं। यह चांद उतना ही बड़ा था जितना पृथ्वी से दिखाई पड़ता है। इस छोटे से चांद पर मैं मुश्किल से खड़ा हुआ था और इस भय से कांप रहा था कि नीचे दिखाई पड़ने वाली धरती (पृथ्वी) पर कहीं मैं इतनी ऊंचाई से गिर न जाऊं। मुझे याद नहीं है कि अपने सपने में फिर मैं उस चांद से अपनी पृथ्वी तक वापस कैसे आया! हो सकता है कि भय से मेरी आंख खुल गई हो और मैंने अपने आप को अपने बिस्तर पर पाया हो! 🙂

मैं चांद से नीचे भले ही न गिरा हूं, अपने बचपन में कभी-कभी यह प्रश्न तो मेरे मन में आता ही था कि पृथ्वी चांद को नीचे खींचती है तो क्या कभी यह चांद नीचे पृथ्वी पर गिर सकता है? और यदि ऐसा हो गया तब तो दोनों ही संसार नष्ट हो जाएंगे! 

बचपन में एक बार मैंने अपनी मां से यह प्रश्न पूछा था कि ये तमाम तारे एक-दूसरे को खींचते हैं तो ये आपस में एक स्थान पर एकत्र क्यों नहीं हो जाते हैं! यह एक उचित प्रश्न था। मेरी मां ने मुझे बताया कि ये तमाम तारे एक-दूसरे को खींचते रहते हैं इसलिए ये संतुलन में रहते हैं। लेकिन, अब मैं जानता हूं कि, यह एक सही उत्तर नहीं था। कुछ चीजों द्वारा एक-दूसरे को खींचे जाने पर वह एक कॉमन सेंटर ऑफ फोर्स में एकत्र हो जाएंगी। तारों के केस में यह फोर्स गुरुत्वाकर्षण होता है। एक-दूसरे के द्वारा खींचे जाने पर उन तारों द्वारा बीच में एकत्र न होने के लिए अनन्त तारों की आवश्यकता होगी। अथवा उन्हें गिरने से रोकने के लिए किसी अन्य बल की आवश्यकता होगी जो गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित कर ले। अब मैं जानता हूं कि चांद को पृथ्वी पर गिरने से रोकने के लिए, पृथ्वी और अन्य ग्रहों को सूर्य में गिरने से रोकने के लिए और सभी तारों को केन्द्र में इकट्ठा होने से बचाने के लिए उनकी गति उत्तरदायी होती है। उस गति से प्राप्त अपकेन्द्रीय बल एवं अन्य कारक इसके लिए उत्तरदायी होते हैं। प्रारम्भिक रूप से वह गति कहां से आयी होती है, यह जानना भी अत्यन्त महत्वपूर्ण और रोचक होता है।

मैं तो बालक ही था जब ये प्रश्न मेरे मन में आते थे। लेकिन ये प्रश्न बहुत लंबे समय से मानव-जाति के मन में आते रहे हैं और वह उनके उत्तर ढूंढ़ने का प्रयत्न करती रही है। अपने कॉसमॉस के विषय में मनुष्य की धारणाओं का विकास पढ़ना एक बहुत रोचक अध्ययन है। यह जानना रोचक है कि कैसे पहले सूर्य को एक गर्म पत्थर माना जाता था, फिर कहा गया कि नहीं, वह उससे कुछ बड़ा है, फिर कहा गया कि वह और बड़ा है और वह मास्को शहर के लाल चौक (Red Square) के बराबर है। अब हम जानते हैं कि सूर्य इतना बड़ा है कि उसमें 13 लाख पृथ्वियां समा सकती हैं। अब हम जानते हैं कि 'नीचे' और 'ऊपर' केवल सापेक्ष शब्द हैं। यह कोई विशेष दिशाएं नहीं होती हैं - यह गुरुत्वाकर्षण के केन्द्र और उसके सापेक्ष हमारी स्थिति पर निर्भर करती हैं। अब हम जानते हैं कि चांद की सतह पर खड़े होकर हम 'नीचे' पृथ्वी की ओर नहीं गिर सकते हैं। उसका अपना गुरुत्वाकर्षण बल है जो हमें उसकी सतह से जोड़ कर रखेगा। वहां पर खड़े होकर हमारे लिए 'नीचे' उसके केन्द्र की ओर होगा। अब हम जानते हैं कि चांद पृथ्वी के चारों ओर क्यों घूमता है और क्या वह कभी पृथ्वी पर गिर सकता है! हम जानते हैं कि वस्तुतः चांद पृथ्वी पर इन अर्थों में निरन्तर गिर रहा है कि वह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। वह पृथ्वी की ओर गिर रहा है लेकिन पृथ्वी के गोल होने और अपनी क्षैतिज (Tangential) गति के कारण पृथ्वी से टकरा नहीं रहा है। अब हम जानते हैं कि वस्तुतः चांद पृथ्वी से दूर ही जा रहा है। पृथ्वी से उसकी औसत दूरी निरन्तर बढ़ रही है। आइए, हम चांद के विषय में कुछ तथ्यों को देखें।

मैं इस बात के विस्तार में नहीं जाऊंगा, लेकिन यह एक तथ्य है कि चांद और पृथ्वी के एक-दूसरे पर गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव के कारण इन दोनों पिण्डों में ही ज्वार-भाटीय तरंगें (Tidal waves) उत्पन्न होती हैं। इन तरंगों के कारण इन पिण्डों के घूमने में प्रतिरोध पैदा होता है और इनकी अपने अक्ष पर घूर्णन (Rotation) की गति कम होती जाती है। अंततः विभिन्न समयों में ये दोनों पिण्ड एक-दूसरे के साथ 'Gravitationally या Tidally - locked' हो जाते हैं। इस समय चांद पृथ्वी के साथ ग्रैवीटेशनली या टाइडली लॉक्ड स्थिति में है।‌ यही कारण है कि चांद का अपने अक्ष पर और पृथ्वी के चारों ओर घूमने का समय बिल्कुल बराबर - 27.322 दिन - है। यही कारण है कि हम चांद का केवल एक पक्ष देख पाते हैं। हां, चांद के पृथ्वी के चारों ओर घूमने (Revolution) के परवलयाकार (Elliptical) होने के कारण चांद की सतह में पृथ्वी की सतह के सापेक्ष एक दोलन (Oscillation) होता है जिसके कारण हम उसकी सतह का 50 प्रतिशत से कुछ अधिक भाग देख पाते हैं। इस दोलन को वैज्ञानिक भाषा में हम 'Liberation' कहते हैं।

पृथ्वी के घूर्णन में भी इस प्रतिरोध के कारण कमी आती है। पृथ्वी की घूर्णन ऊर्जा में प्रति मिनट 20 से 40 अरब किलो कैलोरी ऊर्जा की कमी आती है। लेकिन यह बहुत अधिक ऊर्जा भी पृथ्वी की घूर्णन ऊर्जा के महान भंडार के आगे बहुत कम है, इसलिए पृथ्वी के घूर्णन में प्रति 62,500 साल में केवल एक सैकेंड की कमी आती है। इसका अर्थ है कि आने वाली हर शताब्दी में पृथ्वी का दिन 0.0016 सैकेंड बड़ा हो जाता है या प्रतिदिन यह 0.000000044 सैकेंड बड़ा होता रहता है। अब से 4.6 अरब साल पहले - जब पृथ्वी बनी थी - पृथ्वी का दिन 24 घंटे का नहीं बल्कि केवल 3.6 घंटे का था। अब से 40 करोड़ साल पहले के कोरल के जीवाश्मों में प्राप्त लाइनों में हम पृथ्वी की गति क्रमशः धीमी होने की इस बात को देख सकते हैं। यदि पृथ्वी विद्यमान रही तो अब से बहुत समय बाद यह भी चांद के साथ ग्रेविटेशनल लॉकिंग की स्थिति में पहुंच जाएगी और तब चांद से भी इसके केवल एक पक्ष को ही देखा जा सकेगा।

इन Tidal forces के कारण ही चांद धीरे-धीरे पृथ्वी के Equatorial plane में आता जा रहा है। ये बातें ऊर्जा के संरक्षण के नियम से नियंत्रित होती हैं। 

पृथ्वी और चांद एक कॉमन सेंटर ऑफ ग्रेविटी के चारों ओर घूमते हैं। क्योंकि पृथ्वी चांद से 81 गुना भारी है इसलिए यह कॉमन सेंटर ऑफ ग्रेविटी पृथ्वी के बहुत पास पड़ता है। वस्तुतः यह पृथ्वी की सतह के नीचे पड़ता है। यह पृथ्वी के केन्द्र से 4728 किलोमीटर दूर पड़ता है जबकि पृथ्वी की त्रिज्या 6378 किलोमीटर है। यह कॉमन सेंटर ऑफ ग्रेविटी पृथ्वी की सतह के नीचे 1377 किलोमीटर से लेकर 1995 किलोमीटर के बीच बदलता रहता है। 

जब पृथ्वी और चांद एक-दूसरे के चारों ओर इस प्रकार घूमते हैं तो उनके अंदर एक घूर्णीय कोणीय जड़त्व आघूर्ण (Revolutionary Angular Momentum) होता है। यह उन दोनों के बीच की दूरी और उनकी मात्रा पर निर्भर करता है।

ऊर्जा के संरक्षण के नियम के अनुसार पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने के जड़त्व आघूर्ण में जो कमी आती है वह उसके और चांद के बीच घूर्णीय कोणीय जड़त्व आघूर्ण के बढ़ाने से पूरी की जा सकती है। अब क्योंकि पृथ्वी और चांद की मात्रा तो निश्चित ही है इसलिए यह आघूर्ण उनके बीच की दूरी बढ़ा कर ही पूरा किया जा सकता है। 

यह कहने का अर्थ है कि पृथ्वी और चांद की बीच की दूरी निरंतर बढ़ रही है। यह लगभग 3 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है या हम कह सकते हैं कि यह लगभग ढाई मिलीमीटर चांद के पृथ्वी के चारों ओर प्रति चक्कर बढ़ रही है। हम कह सकते हैं कि जैसा कि मैं अपने बचपन में डरता था, उसके विपरीत, चांद पृथ्वी पर गिर नहीं रहा है बल्कि यह हमसे दूर ही जा रहा है। हां, यदि ये दोनों खगोलीय पिंड विद्यमान रहे तो अब से बहुत समय बाद ये एक-दूसरे के पास आना शुरू करेंगे। इसके अपने कारण हैं। ये एक-दूसरे के कितने पास हो जाएंगे और ऐसा कब होगा और उसके एक-दूसरे पर क्या प्रभाव पड़ेंगे, इनको समझा जा सकता है।

हमारे सबसे पास के इस खगोलीय पिंड के बारे में अनेक रोचक तथ्य हैं। हम जानते हैं कि चांद पृथ्वी के चारों ओर एक इलिप्टिकल ऑर्बिट में घूमता है जिसमें यह कभी पृथ्वी के पास होता है और कभी दूर। इसकी पृथ्वी के सबसे पास की दूरी लगभग 3,60,000 किलोमीटर और सबसे अधिक दूरी लगभग 4,05,000 किलोमीटर होती है। अपनी कक्षा में पृथ्वी से अपनी दूरी के अनुसार इसकी गति तेज और धीमी होती रहती है। इस विषय पर मेरे मित्र डॉक्टर चंद्रमौली झा जी ने मुझसे कुछ प्रश्न पूछे थे, जिनके उत्तर लिखने के लिए मैं बैठ नहीं पाया। मुझे बहुत प्रसन्नता होती यदि मैं उस विषय पर एक लेख लिख कर उनको भेज पाता। चांद पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर 27.322 दिन में लगा लेता है किंतु पृथ्वी की सतह के किसी स्थान पर देखी जा रही इसकी एक कला से उसी कला तक पुनः आने में 29.5 दिन का समय लगता है। जैसे किसी स्थान पर एक पूर्णमासी से अगली पूर्णमासी 29.5 दिन में होगी। ऐसा इसलिए होता है कि पृथ्वी भी अपने अक्ष पर घूमती रहती है, उसका एक स्थान चांद के सापेक्ष आगे बढ़ जाता है और पृथ्वी के एक स्थान के सामने पुनः आने के लिए चांद को 27.322 दिन से अधिक समय लग जाता है।

चांद और पृथ्वी के बीच के इस संबंध को मैंने बहुत संक्षेप में बताया है। वास्तव में यह संबंध बहुत व्यापक है, इसमें अनेक रोचक तथ्य हैं, इसकी अपनी गणितीय व्याख्याएं हैं और इसको काफी अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। जब चांद का निर्माण अब से लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व हुआ था, तब यह पृथ्वी के बहुत पास रहा होगा और इसके अनेक निहितार्थ हैं, अनेक प्रभाव हैं। पृथ्वी के पास होने पर इसका ज्वार-भाटीय प्रभाव भी बहुत अधिक रहा होगा। उसका प्रभाव पृथ्वी की भू-पर्पटी में रेडियोएक्टिव पदार्थों के इकट्ठे होने पर भी होता है। यह रेडियोधर्मी पदार्थ जीवित प्राणियों के जीन्स में म्यूटेशन्स पैदा करते हैं जो नयी जातियों के निर्माण में सहायक होते हैं। यह एक कारण हो सकता है कि पृथ्वी पर इतनी अधिक विभिन्न जीव-जातियां दिखाई पड़ती हैं।

चांद और पृथ्वी का यह संबंध बहुत रोचक है। हमारे बच्चों का वह चंदा मामा, वह सूत कातती बुढ़िया और खरगोशों वाला चांद, वह परियों का निवास-स्थान कहलाने वाला चांद, वह अपने लिए जाड़े की रात के लिए अपनी मां से एक कुर्ता सिलवा देने का अनुरोध करने वाली कविताओं का चांद, वह कवियों की कल्पनाओं और प्रेमियों की उपमाओं का चांद, वह 'चांद सा रोशन चेहरा' जैसे वाक्यांशों को जन्म देने वाला चांद, वह लोक-कथाओं में स्थान रखने वाला चांद, वह बच्चों की लोरियों में स्थान रखने वाला चांद - "चंदा मामा दूर के, पुए पकाएं पूर के, आप खाएं थाली में, मुन्ने को दें प्याली में", वह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके पृथ्वी पर चांदनी फैलाता हुआ चांद, अंतरिक्ष में हमारा सबसे पास का वह पड़ोसी और वस्तुतः हमारी पृथ्वी से ही जन्म लेने वाला पृथ्वी का पुत्र - जो हमारा मामा नहीं वरन् हमारा भाई कहा जा सकता है, ऊबड़-खाबड़ और गड्ढों से भरी चट्टानों से बना हुआ वह चांद - जिस पर मनुष्य अपना झंडा गाड़ चुका है और चल चुका है - हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगले कुछ वर्षों में वहां पर मानव की कॉलोनियां बस जाने का अनुमान भी है। उस चंदा मामा को देख कर अब मुझे ऐसा लगता है कि चंदा मामा अब दूर के नहीं हैं - अब वह 'टूर' के हैं - हम उन्हें हाथ बढ़ा कर छू सकते हैं, हम वहां 'टूर' पर जा सकते हैं। कोई आश्चर्य नहीं है कि चांद को देखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय निशा का आयोजन किया जाता है।

सात जन्म

समाज के कन्धों पर चढ़कर ... ...
अधिकांश लोगों में न तो कला को अनुभव करने वाला हृदय कार्यरत रहता है और न विज्ञान को समझने वाला मस्तिष्क — क्योंकि उनके हृदय और मस्तिष्क पर महिषासुर का जंजाल छाया रहता है जिसे हम आजकल “समाज” कहते हैं ।

समाजवाद का भूत था तो मधु−कैटभ के काल से,किन्तु “समाजवाद” नाम से यह भूत पहले आधुनिक यूरोप में पैदा हुआ और १९वीं शती में भारत आया । मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव युंग ने इसे “सामूहिक अचेतन” का नाम दिया । किन्तु उनको भी पता नहीं था कि इस समाजवादी अचेतन के नीचे “सामूहिक चेतन” छुपा है जिनको प्राचीन भारत में साक्षीभाव से देखने वाला ईश्वर कहा जाता था — जो समष्टि हैं,सर्वव्यापी हैं । जीव के पापों के कारण उनसे विलगाव का भाव उत्पन्न होता है और तब समष्टि से भिन्न अस्मिता वाला “व्यक्ति” प्रकट होता है;वही जीव है ।

जिसे पाप की परख नहीं वह पुण्य को पहचान नहीं सकता । जिसे अचेतन असुर की पहचान नहीं वह ईश्वर को नहीं जान सकता । “सामूहिक अचेतन” को ही सेमेटिक मजहबों में “शैतान” कहा गया,क्योंकि सत्य पर चलने वालों को “शैतान” बहकाता है ।

जिनकी चेतना सुन सकती है उनको “शैतान” की आवाज सुनाई देती है जिस कारण “शैतान” को पृथक सत्ता रखने वाला कोई महाशक्तिशाली बुरी आत्मा मानने की भूल करते हैं ।

किन्तु जिनकी चेतना उससे भी अन्दर की बात सुन सकती है उनको ईश्वर की वाणी सुनाई देती है । वे जानते हैं कि “शैतान” का पृथक अस्तित्व नहीं होता,वह व्यक्ति के ही पापों का फलन है । स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में यही कहा था कि व्यक्ति अपने पापों का दायित्व किसी बाहरी “शैतान” पर थोपकर पापमुक्त होने का भ्रम नहीं पाल सकता,हर व्यक्ति को अपने कर्मों के फल भोगने ही है ।

समष्टि में जो हाइ डिफिनिशन डिटेल हैं वही व्यक्ति है,शैतान हैं । अंग्रेजी में एक नयी कहावत है — “the Devil is in the details.”।
१९६३ ईस्वी में इस वाक्य का प्रचार आरम्भ हुआ (Richard Mayne’s The Community of Europe) और १९६९ ई⋅ में इसे कहावत माना जाने लगा । तात्पर्य यह था कि स्थूल तौर पर जो बात वा वस्तु ठीक दिखती है उसके अन्दर सूक्ष्म बुराईयाँ हो सकती हैं ।

किन्तु इससे पुरानी कहावत थी “God is in the details”,अर्थात् सत्य एवं कौशल सूक्ष्मता पर ध्यान देने में है । फ्रेंच में Gustave Flaubert की उक्ति “Le bon Dieu est dans le détail” (”ल बोँ द्ये ए दाँ ल देताय” lə bɔ̃ djø ɛ dɑ̃ lə detaj) से इस उक्ति का प्रचार १९वीं शती में आरम्भ हुआ ।

दोनों बातें अपने अपने सन्दर्भ में सही हैं । अतः महत्व इस बात का है कि सूक्ष्मता पर सदैव ध्यान देते रहना चाहिए,ताकि सूक्ष्मता सही हो तो लागू करें और गलत हो तो त्याग दें । किन्तु अधिकांश लोग सूक्ष्मता से बचते हैं,शार्टकट चाहते हैं,स्वतन्त्र चिन्तन यदि सत्य की प्रेरणा भी दे तो समाज के नाम पर अपनी गलत ईच्छाओं का पालन करना चाहते हैं । समाज एक बहाना है,अपनी गन्दी वासनाओं की पूर्ति का हेतु है । समाज कोई सजीव प्राणी नहीं,बल्कि प्राणियों का झुण्ड है । झुण्ड अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी,किन्तु इस अर्थ में झुण्ड और समाज सदैव बुरे ही हैं कि वे स्वतन्त्र चिन्तन को कुचलते हैं ।

सनातन धर्म साम्यवादी है,समष्टिवादी है । किन्तु वहाँ तक पँहुचने का पथ अत्यन्त व्यक्तिवादी है । समाज के कन्धों पर चढ़कर सत्य तक नहीं पँहुचा जा सकता । समाज कितना ही अच्छा क्यों न हो,केवल अवयस्क मानसिकता वालों को ही सहारा दे सकता है,और यह सहारा भी एक सीमा तक ही — जिसके पार अनन्त तक अथाह सागर अकेले तैरना पड़ता है ।

अकेलापन से लोग घबड़ाते हैं । समाज नाम का नशा चाहिए अकेलापन को भुलाने के लिए । किन्तु नशा कभी सच्चाई नहीं बन सकता । व्यक्ति जब इस सत्य को स्वीकार कर लेता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में वह वास्तव में अकेला है तभी वह वयस्क बनता है । तभी ईश्वर का साक्षात्कार होने का पथ खुलता है । कई अभागे वहाँ से वापस लौट आते हैं ⋅⋅⋅

सारे सामाजिक सम्बन्ध क्षणिक हैं । धर्मसम्मत विवाह हो अथवा माता−पिता भाई−बहन का सम्बन्ध,कोई भी सम्बन्ध सात जन्मों से अधिक साथ नहीं देता । सात पीढ़ियों तक ही पूर्वजों का भी सम्बन्ध रहता है । भवन भी सात मंजिल तक ही शुभ रहते हैं,शास्त्र में स्पष्ट आदेश है । पेशवा बाजीराव ने १३ मंजिल बनायी,तो उसमें पैदा होने वाले नालायक पुत्र ने मराठा साम्राज्य को ही नष्ट कर डाला — अब्दाली को खैबर पार खदेड़ने वाले रघुनाथराव को ईर्ष्यावश हटाकर अपनी ही तरह नालायक सदाशिवराव को कमान सौंपकर पानीपत में चार लाख मराठों को कटवा दिया । धर्मपत्नी भी सात जन्मों से अधिक साथ नहीं देती,क्योंकि मर्त्यों में तेरह जन्मों से अधिक एक योनि में नहीं आ सकते । मोक्ष नहीं मिला तो निचली योनि मिलेगी । धर्मपत्नी भी आठवें जन्म में मिल गयी तो विवाहेतर मिलेगी — कुण्डली में अधर्म हावी हुआ तो अवैध सम्बन्ध बनेगा,धर्म हावी हुआ तो उर्वशी कहेगी पुरुरवा से — “दुरापना वात इवाहस्मि”!(ऋग्वेद= मैं वायु की तरह दुष्प्राप्य हूँ ।)

किशोरावस्था में साहित्यकार बनने की लालसा थी और वैज्ञानिक भी । दोनों में से कुछ नहीं बन सका,

क्योंकि वेद और ज्योतिष ने सिखा दिया कि सारा कथानक ⁄ प्लॉट तो देवगण रचते हैं तो साहित्यकार की कोई भूमिका ही नहीं बची,

और समस्त आधुनिक विज्ञान आसुरी भौतिकवाद है तो वैज्ञानिक बनने का प्रश्न ही समाप्त!

मेरे पुराने परिचित और सम्बन्धी मेरे बारे में कहते हैं कि था तो मेधावी किन्तु कुछ नहीं बन सका,निकम्मा निकल गया!अंग्रेज और उनके समस्त मानसपुत्र भी कहते हैं कि मोक्षवादी सनातन धर्म पलायनवाद है ।

मैं तो बस साक्षी हूँ ।

“नागिन” फिल्म मैंने युवावस्था में नहीं देखी,किन्तु बाँसुरी मुरली हारमोनियम बैंजो किशोरावस्था से ही सीखने लगा तो इसी फिल्म की धुन “मन डोले ⋅⋅⋅” से सीखना आरम्भ किया था । १९५४ ई⋅ में बनी थी । ६० वर्षों से पहले की फिल्में कॉपीराइट से मुक्त है । कृत्रिम बुद्धि हेतु कम्प्यूटर में विभिन्न लाइब्रेरियों और पैकेजों की जाँच के दौरान निम्न क्लिप का  सुपर−रिजॉल्यूशन और रङ्गीकरण किया,480p की बुरी अवस्था वाली मिली जिसे प्रयास करने पर भी पूरा ठीक नहीं कर सका । 1080p का वर्सन अपलोड कर रहा हूँ । 4K का परिष्कृत संस्करण बनाने में बहुत समय लगेगा और फाइल भी बहुत बड़ा हो जायगा,किन्तु जबतक अच्छी श्यामश्वेत डिजिटल फाइल न मिले तबतक प्रयास करना व्यर्थ है । रङ्गीकरण के उपलब्ध सर्वोत्तम पैकेजों में पायथन प्रोग्रामों को बदलकर मैंने RTX3090 हेतु रङ्गीकरण प्रोग्राम को सुधारा है,कुडा संस्करण के साथ साथ पाइटॉर्च एवं बहुत सी लाइब्रेरियों का नवीनीकरण किया और सहस्रों इण्टरमीडिएट फाइलों को डिस्क की बजाय रैम पर चलाया ताकि डिस्क का क्षरण न हो । फलतः गति भी बढ़ी । जिनको डाउनलोड करना हो कर लें,बाद में गूगल ड्राइव से हटा दूँगा । अंग्रेज सच कहते हैं कि भारत सँपेरों का देश है,सँपेरों पर बनी इस फिल्म ने दशकों तक पूरे देश को झुमाया । कुण्डली में कुछ योग तगड़े हों तो लैलाओं और मँजनुओं को ७ वा १३ जन्मों के पश्चात भी नाग−नागिन आदि बनना पड़ता है । तब बैखरी तो नहीं मिलती,पश्यन्ती में दोगाना गाते हैं ।

सारे “ॐ” चिह्न हटाने पर लिंक मिलेगा=
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सङगीत में राग ताल मात्रा आदि सीखने पर केवल स्थूल ज्ञान प्राप्त होता है,वास्तविक कलाकारी तो बारीकी में है जो कुण्डली में सङगीत का योग रहने पर ही सम्भव है =God is in the details ;

किन्तु  कृत्रिम बुद्धि में कोई भी कार्य हो,सूक्ष्मता की एक सीमा होती है जिसके पश्चात मॉडल की ट्रेनिंग रोकनी पड़ती है,वरना ओवरफिटिंग के कारण ट्रेण्ड मॉडल निरर्थक हो जाता है =the Devil is in the details

गोवर्द्धन पूजा

मुझे गोवर्द्धन पूजा का यह नाम बड़ा अच्छा लगता है। इसमें श्लेष अलंकार है। पर्वत की भी बात है और गौओं की भी। भारतीय प्रज्ञा पर्वत और गायों को एक दूसरे के विरोध में नहीं देखती, उनकी सहचारिता में देखती है। गो-वर्धन गायों का भी वर्धन है। भागवत में कृष्ण कहते हैं: 'वार्ता चतु‌र्विधा तत्र वयं गोवृत्तयो' कि आजीविका चार तरह की हैं:- कृषि, वाणिज्य, ब्याज और गोवृत्त। हमारी आजीविका गोवृत्त है- गाय के इर्द गिर्द घूमती है। कृष्ण कहते हैं कि हम तो 'वनशैल निवासिनः' हैं- वन और पर्वत ही हमारे घर हैं। फिर क्या होता है: गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्रः प्रदक्षिणम् - गौओं को आगे करके गिरिराज की प्रदक्षिणा की जाती है। 

गोवर्धन पर्वत भी भारत के उसी पवित्र भूगोल का हिस्सा है जिसमें गोचारण होता था। यह sacred geography हमारी संस्कृति की विशेषता है जिसमें नदियाँ पर्वत सब एक दिव्यत्व की आभा से जगमगाते हैं। एक पर्वत के रूप में गोवर्धन को गिरिराज कहा गया और हमारी संस्कृति हमें कभी गोवर्धन की तो कभी कामदगिरि की परिक्रमा सिखाती है। पर्वत हमारा पोषण करते हैं, इसीलिए गोवर्धन पूजा को अन्नकूट भी कहते हैं। 

गोवर्धन पूजा की भागवत में आई कथा सिर्फ कृष्ण की चामत्कारिक शक्ति की कथा नहीं है। उस एलीगरी है जिसे आध्यात्मिक, नैतिक, पर्यावरणीय और आस्तिविक मनीषा की कितनी ही लेयर्स ने मिलकर बुना है। ईश्वर की एक उंगली अकेले ब्रज के लिए क्या, सारी दुनिया को बचाने के लिए पर्याप्त है। जब तक ईशानुकंपा का छत्र है, जीवन के सारे तूफानों और आपदाओं के विरुद्ध आपको एक शरण्य है। गोवर्धन उसी शरण्य का प्रतीक है, तब आप के अस्तित्व का भार, आपका योगक्षेम ईश्वर ही वहन करेगा। कृष्ण का यही अभिवचन है, हमारे कर्म- पर्वत को वही उठायेंगे। 

यह प्रसंग यह भी संदेश देता है कि वर्षा आकाशीय कृपा से नहीं, अपनी पृथ्वी के पेड़-पर्वतों और पर्यावरण का सत्कार करने से होती हैआज जब हम देखते हैं कि हमारे पर्वतों का क्षरण हो रहा है, स्वयं गोवर्धन का क्षरण हो रहा है, लैंड स्लाइड्स हो रहे हैं, पर्वतों के पेड़ काट काट कर हमने उन्हें नंगा कर दिया है, क्लाउड बर्स्ट हो रहे हैं, तब हमें गोवर्धन पूजा के माध्यम से रेखांकित किये जा रहे संदेश की गंभीरता को समझना चाहिए। 

पर्वत पृथ्वी का गौरव हैं, वे सिर्फ geographical temerity नहीं हैं, वे पृथ्वी का स्वप्न हैं, पृथ्वी की महत्त्वाकांक्षा हैं। 

राजेश जोशी जी की एक कविता है: 

स्वप्न अगर आसमान में थे/ तो पहाड़ों के सबसे करीब थे / स्वप्न अगर लुककर बैठ गये थे / तो हमें विश्वास था/वे पहाड़ों में कहीं छुपे होंगे/ हम स्वप्नों की खोज में गये थे/पहाड़ों की ओर/और हम जानते थे/पहाड़ दोगले नहीं हुए हैं/ वे हमारी हिफाजत करते रहेंगे।

तो गोवर्धन ने ब्रजवासियों की रक्षा की थी। यह एक ग्रीन रिलेशनशिप है, हरित रिश्तेदारी। धर्मो रक्षति रक्षितः की तरह। आप पर्वतों की रक्षा करें, पर्वत आपकी करेंगे। कृष्ण ने इंद्र की पूजा की जगह गोवर्धन की पूजा की बात की - रिचुअलिज़्म की जगह नेचुरलिज़्म की। इंद्र अमूर्त हैं, intangible हैं, पर्वत प्रत्यक्ष हैं, पड़ोसी हैं।

विलियम ब्लेक की एक कविता थी:

Great things are done when men and mountains meet
This is not done by jostling in the street.

यह प्रसंग प्रकृति के साथ हार्मनी का प्रसंग है। यहां environmenta Stewardship को एक sacred duty माना गया। यह प्रसंग बताता है कि यूनिटी इन कम्युनिटी क्या होती है और कृष्ण की शरण्य से कैसे एक कलेक्टिव बांड पैदा होता है, तब जात- प्रतिष्ठा सब के भेद छोड़कर एक ईश्वर की छत्रछाया में सब जाते हैं- आज भारत की सामाजिक एकता का जो फ्रेग्मेंटेशन करने की कोशिश हो रही है, तब हमें कृष्ण की उस एक उँगली की शक्ति पर भरोसा करना है। 

इस प्रसंग में कृष्ण भी हैं तो बाल गोपाल ही, इसकी अबोधता ही, इसकी मासूमियत, इसकी निर्दोषता इन्द्र की Cosmic forces पर भी भारी पड़ती है। बाल कृष्ण खेल खेल में गोवर्धन उठा लेते हैं इसे ही जैसे बाल सीता ने खेल खेल में शिवजी का धनुष उठा लिया था। मतलब यह कि Approach God as play, not puzzle. 

अनिल कपूर की एक फिल्म भाई थी वे सात दिन। पर ब्रज के इन सात दिनों पर कोई फिल्म नहीं बनी है। 

कृष्ण लीला का यही तो आनंद है। एक उँगली minimal effort का प्रतीक है पर वह पहाड़ का भी बोझ उठा लेती है. जो असंभव था, ब्रजवासियों का प्यार और विश्वास उसे संभव बना देता है, उसे ईशकृपा संभव बना देती है, प्यार का प्रतिदान संभव बना देता है। 

मैं गौ पूजक और कुकुर पूजक संस्कृति में लॉक और रूसो की सैद्धान्तिकी का द्वंद्व देखता हूँ। कुकुर पूजक संस्कृति में हर व्यक्ति के बारे में प्रारंभिक उपकल्पना एक चोर की, एक संदिग्ध व्यक्ति की है। कि वह Inherently selfish, violent, competitive, nasty, brutish है जब तक कि अन्यथा नहीं प्रमाणित कर दिया जाता। प्रवेश करते ही कुत्ता सूँघ सूँघ कर बताता है कि आप निरापद हो। गौपूजक संस्कृति में अतिथि देवता है तो आप उसका स्वागत दूध और उससे बने द्रव्य या मिठाई से करते हो। यह रूसो की तरह है जो मनुष्य को Inherently good, free, and compassionate मानता था। 

आज का दिन गौपूजा का है।



गोवर्धन पूजा की विस्तृत व्याख्या ने सच पूछिए मुझे तो भ्रमित कर दिया।हम किसान पुत्र अति व्याख्या में नहीं जाते।यह विद्वानों और शोधकर्ताओं का कार्य है।ग्रामीण क्षेत्रों में गाय जितनी पवित्र मानी जाती है उतनी ही उपेक्षित है।उसका दूध निकालकर उसे कचड़े में अपने पवित्र मुख से मल खाने को विवश होना पड़ता है।हमारे जिले भिण्ड में दो कस्बे हैं। गोरमी और गोहद। गौरमी में कृष्ण गाय चराते हुए एक रात रुकते थे तो गोहद उनका आखिरी पड़ाव माना जाता है।कहते हैं कि बृज भूमि की सीमाएं मथुरा से चारों ओर 84 कोस तक मानी जाती हैं।यद्यपि किसी ने नापा तो नहीं है पर मथुरा से गोहद की दूरी 84 कोस अर्थात 164 मील तक ही होना चाहिए।(पुराना मील न कि दसमलिक प्रणाली से किलोमीटर)
आदरणीय मनोज सर!अपने गोवर्धन पर्वत का वर्णन बड़ी विद्वता से की है पर मेरी मान्यता यह है कि वह एक बांध है जिसे यमुना नदी के प्रकोप से मथुरा को बचाने के लिए श्रीकृष्ण जी ने जन सहयोग से बनवाया होगा। जैसाकि मैने स्वयं देखा कि इस कथित पर्वताकार बांध का निर्माण मिट्टी,पत्थर और कचड़े से निर्मित है।उसका आकर लम्बाकार है न कि ऊर्धाकार। श्रीकृष्ण उस समय द्वापर के सर्वमान्य जननायक थे।उन्होंने महा अताताई कंस को परास्त जो किया था।वे महान गोरक्षक, लोककलाओं के संबर्धक और शाश्वत प्रेम के उपासक थे।उन्होंने पहाड़ कहा तो सबने आंख बंद कर मान लिया । मैने इतना लम्बा आपके शोध पर प्रतिक्रिया दी है।आपकी बात काटने का इरादाा कतई नहीं है।फिर भी कुछ धृष्टता हुई हो तो क्षमा करने का कष्ट करें।

Tuesday, 21 October 2025

गौ पृथ्वी में कामधेनु भारत-

गौ पृथ्वी में कामधेनु भारत-
पृथ्वी को उत्पादन स्रोत के रूप में गौ कहा गया है, जिसके ४ स्तन रूपी ४ समुद्र हैं-(१) जल मण्डल, (२) वायु मण्डल, (३) भूमण्डल (ठोस स्थल भाग), (४) जीव मण्डल। इनको अंग्रेजी में स्फियर (Sphere) कहते हैं-हाइड्रोस्फियर (Hydrosphere), एटमोस्फियर (Atmosphere), लिथोस्फियर (Lithiosphere), बायोस्फियर (Biosphere)। जब भी पृथ्वी पर अत्याचार होता था, गोरूपधारी पृथ्वी ब्रह्मा के साथ विष्णु भगवान् के पास जाती थी। ग्रीक में भी पृथ्वी को गैया (Gaia) कहते थे जिससे जिओ (Geo) शब्द बना है-Geography, Geology। 
पयोधरी भूतचतुः समुद्रां जुगोप गोरूप धरामिवोर्वीम्। (रघुवंश, २/३)
अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनु-र्मातेव वा ऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१)
भूमिर्दृप्त नृपव्याज दैत्यानीक शतायुतैः।
आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययौ॥१७॥
गौर्भूत्वा-श्रुमुखी खिन्ना क्रन्दन्ती करुणं विभोः।
उपस्थितान्तिके तस्मै व्यसनं स्वमवोचत॥१८॥
ब्रह्मा तदुपधार्याथ सह देवैस्तया सह।
जगाम सत्र्नयनस्तीरं क्षीर पयोनिधेः॥१९॥
(भागवत पुराण, अध्याय १०/१)
राजा पृथु ने भी पृथ्वी से खनिजों, फल मूल, आहार आदि का दोहन करने के लिए उसे गौ कहा है।
तत उत्सारयामास शिला-जालानि सर्वशः।
धनुष्कोट्या ततो वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः॥१६७॥
मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमासीद् वसुन्धरा। स्वभावेना-भवं-स्तस्याः समानि विषमाणि च॥१६८॥
आहारः फलमूलं तु प्रजानाम-भवत् किल। वैन्यात् प्रभृति लोके ऽस्मिन् सर्वस्यैतस्य सम्भवः॥१७२॥
शैलैश्च स्तूयते दुग्धा पुनर्देवी वसुन्धरा। तत्रौषधी र्मूर्त्तिमती रत्नानि विविधानि च॥१८६॥
(वायुपुराण, उत्तरार्ध, अध्याय १)
पृथ्वी पर भारत उत्पादन का सबसे बड़ा केन्द्र था। विश्व का भरण पोषण करने के कारण इसे भारत कहा गया। मेगास्थनीज आदि ने भी लिखा है कि भारत सदा से खनिज तथा अन्न में स्वावलम्बी था, अतः भारत ने १५,००० वर्षों में किसी पर आक्रमण नहीं किया। (इण्डिका, पारा ३६-बाद में मैक्रिण्डल ने इसे हटा दिया)। अतः भारत को कामधेनु गौ कहते है। इस कामधेनु के सीमावर्त्ती जातियों का उल्लेख वसिष्ठ तथा जमदग्नि के कामधेनु हरण प्रसंगों में है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण (३/२४/५९-६४)-
इत्युक्त्वा कामधेनुश्च सुषाव विविधानि च। शस्त्राण्यस्त्राणि सैन्यानि सूर्यतुल्य प्रभाणि च॥५९॥
निर्गताः कपिलावक्त्रा त्रिकोट्यः खड्गधारिणाम्। विनिस्सृता नासिकायाः शूलिनः पञ्चकोटयः॥६०॥
विनिस्सृता लोचनाभ्यां शतकोटि धनुर्द्धराः। कपालान्निस्सृता वीरास्त्रिकोट्यो दण्डधारिणाम्॥६१॥
वक्षस्स्थलान्निस्सृताश्च त्रिकोट्यश्शक्तिधारिणाम्॥ शतकोट्यो गदा हस्ताः पृष्ठदेशाद्विनिर्गताः॥६२॥
विनिस्सृताः पादतलाद्वाद्यभाण्डाः सहस्रशः। जंघादेशान्निस्सृताश्च त्रिकोट्यो राजपुत्रकाः॥६३॥ 
विनिर्गता गुह्यदेशास्त्रिकोटिम्लेच्छजातयः। दत्त्वासैन्यानि कपिला मुनये चाभयं ददौ॥६४॥
वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड (५४/१८-२३, ५५/२-३), ब्रह्माण्ड पुराण (२/३/२९/१८-२१), स्कन्द पुराण (६/६६/५२-५३) भी द्रष्टव्य।
कामधेनु से उत्पन्न जातियां-(१) पह्लव-पारस, काञ्ची के पल्लव। पल्लव का अर्थ पत्ता है। व्यायाम करने से पत्ते के रेशों की तरह मांसपेशी दीखती है। अतः पह्लव का अर्थ मल्ल (पहलवान) है। (२) कम्बुज हुंकार से उत्पन्न हुए। कम्बुज के २ अर्थ हैं। कम्बु = शंख से कम्बुज या कम्बोडिया। कामभोज = स्वेच्छाचारी से पारस के पश्चिमोत्तर भाग के निवासी। (३) शक-मध्य एशिया तथा पूर्व यूरोप की बिखरी जातियां, कामधेनु के सकृद् भाग से (सकृद् = १ बार उत्पन्न), (४) यवन-योनि भाग से -कुर्द के दक्षिण अरब के। (५) शक-यवन के मिश्रण, (६) बर्बर-असभ्य, ब्रह्माण्ड पुराण (१/२//१६/४९) इसे भारत ने पश्चिमोत्तर में कहता है। मत्स्य पुराण (१२१/४५) भी इसे उधर की चक्षु (आमू दरिया-Oxus) किनारे कहता है। (७) लोम से म्लेच्छ, हारीत, किरात (असम के पूर्व, दक्षिण चीन), (८) खुर से खुरद या खुर्द-तुर्की का दक्षिण भाग। (९) पुलिन्द (पश्चिम भारत-मार्कण्डेय पुराण, ५४/४७), मेद, दारुण-सभी मुख से। 
कामधेनु अर्थ में वेद में इसे हिंकृण्वती (हिंकार करने वाली) वसुपत्नी (धन देने वाली-मुखिया पत्नी अर्थ में कन्नड़ में हेग्गड़ती), इस रूप में दुही गयी कहा है। 
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनाम् वत्समिच्छन्ति मनसाभ्यागात्।
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धतां महते सौभगाय॥
(ऋक्, १/१६४/२७, अथर्व, ७/७३/८, ९/१०/५, ऐतरेय ब्राह्मण, १/२२/२)
इसके बाद के २ ऋक् मन्त्र भी भारत की गोमाता रूप में वर्णन करते हैं। मन्त्र के दोनो पंक्तियों के प्रथम अक्षरों को मिलाने से हिन्दू शब्द बनता है, जिसका अर्थ हुआ भारतमाता का पुत्र।

भगवती लक्ष्मी और रुक्मणी

भगवती लक्ष्मी ने देवी रुक्मिणी से कहा : 
वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने।
अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्त्वे।।
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अर्थात् मैं सदैव ऐसे पुरुषों के हृदय में निवास करती हूँ जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, देवाराधन में उत्सुक, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा सत्वगुण से भरे हो। (अनुशासन पर्व 11, 6)
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Monday, 20 October 2025

चतुर्मुख दीप दान दीपावली

** चतुर्मुख दीप दान **
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को रात्रि में एक बत्ती वाला दीप तथा चतुर्दशी को रात्रि में घर से बाहर चार बत्तियों वाला दीप जलाया जाता है। पहले दक्षिण दिशा वाली बत्ती जलाई जाती है। पुनः प्रदक्षिणा क्रम से अन्य तीनों को जलाते हैं। जलाने के बाद प्रार्थना करते हैं .....
मृत्युना पाशदंडाभ्यां स्थितो श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीप दानेन सूर्यज: प्रीयतां मम ।।
सूर्यपुत्र यम (वैवस्वत) हाथ में पाश और यम दण्ड लिए अपनी पत्नी श्यामा के साथ हमेशा स्थित रहते हैं।आप दीप दान से अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।
यम सभी दिशाओं में एक साथ सक्रिय रहते हैं। ऊर्ध्व और अध: दिशाओं को भी वे अपने प्रभाव में रखते हैं। इसीलिए यम को चारों दिशाओं वाली बत्ती से दीप दान किया जाता है।
दीप दान का महत्व आगम ग्रंथों और धर्मशास्त्र के ग्रंथों में अलग अलग विस्तार से वर्णित है।देवी जी को एकादश बत्तियों वाला दीप अधिक प्रिय है।इसे रुद्र वर्ती दीप कहा गया है।हजार दीपों वाले स्तम्भ प्राचीन भारत में मंदिरों में बने रहते थे।इन्हें ऊपर से नीचे जलाते हुए अभ्यस्त लोग उतरते हैं।कार्तिक मासमें आकाश दीपदान देने की परंपरा 
रही है। काशी के घाट इन दीपों से जगमगाते रहते हैं।
         दीप अंधकार को दूर करने का सबसे छोटा माध्यम
है। रात्रि में दीप जलाकर जो भी व्यक्ति आराधना करता है वह सहजता से सफलता को प्राप्त करता है।सरसों तेल का दीप कार्तिक मास में जलाने से वातावरण विष रहित होता है। तेल का दीप आराधना के समय वाम भाग में और घृत का दीप दक्षिण भाग में रखा जाता है। तेल का दीप शत्रु नाशक होता है।घृत का दीप आयुष्य वर्धक होता है।
आज हमने भी चतुर्मुखी दीप जलाए।
असतो मा सद्गमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय 
मृत्यो र्मा अमृतं गमय 
भारत में असत से सत की ओर,तम से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमृत की ओर जाने की प्रथा अनादि काल से चली आ रही है।
प्रकाश का पर्व दीपों की अवलि से जगमगाता रहता है।
जिन्हें दीपों से शत्रुता हैं वे अंधकार को पसंद करते हैं।
भारतीय महिलाएं दीप से भगवती की आराधना करती रहती हैं। गहन अंधकार को चीर कर रखने की क्षमता एक नन्हे दीपक में होती है।
दीप को नमस्कार है।

Saturday, 18 October 2025

रावण

रावण महान था। उसने सीता का अपहरण अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए किया था। और उसने सीता को ससम्मान लंका में रखा, कोई जबरदस्ती नहीं की। 

दशहरे-दीपावली के समय आपको कई जगहों पर ऊपर लिखी बातें पढ़ने को मिलेंगी। और विश्वास जानिए, हममें से अधिकांश ऐसे हैं जो इन बातों पर कहते मिल जाते हैं, बल्कि उनका दृढ़ विश्वास है कि ऐसे लोगों और ऐसे लेखों को इग्नोर कर देना चाहिए। 

जबकि होता यह है कि आम जनता जो अपने दैनिक कामों में, रोजमर्रा की जिंदगी में उलझी है, वह इतनी सरल और स्पष्टता से लिखी बात को, इस लॉजिक को सही मान लेती हैं। 

पर क्या यह सब सही है? सच में रामायण में ऐसा है? 

रामायण के अनुसार, शूर्पणखा बहुत ही गंदी, घिनौनी दिखने वाली, गंदी सोच और व्यवहार वाली स्त्री है। वह वन में सुंदर शरीर के स्वामी राम को देखती है तो उनपर मोहित हो जाती है। माया से (मतलब मेकअप वगैरह करके) राम के पास आती है और उन्हें प्रपोज करती है। यहाँ तक कोई बुराई नहीं है। किसी को कोई पसन्द आ जाये तो प्रपोज करना गलत नहीं है। पर राम द्वारा यह बताने पर कि वे अयोध्या के राजकुमार हैं और वनवास मिलने के कारण अपनी पत्नी और भाई के साथ वन में आए हैं, शूर्पणखा सीता और लक्ष्मण को मार देने की बात कहती है, ताकि राम इत्मीनान से उसके साथ मौज कर सकें। वो सीता को चिपके पेट वाली, कमजोर, बदसूरत वगैरह भी कहती है। 

ऐसी बातों को सुनकर, मतलब कोई आपकी पत्नी की बेइज्जती करे, उसे और आपके भाई को मारने की बात करे, तो किसी को भी गुस्सा आएगा। पर समझदार लोग इन बातों को किसी पागल का प्रलाप मानकर हँसी में उड़ा देते हैं। 

ऐसी बातों को सुनकर राम परिहास में कहते हैं कि वे तो अपनी पत्नी के साथ हैं, लक्ष्मण नहीं हैं, अतः वो लक्ष्मण से पूछ ले। लक्ष्मण की सहमति हो तो उनसे विवाह कर लें। फिर वो लक्ष्मण के पास जाती है और उन्हें प्रपोज करती है। लक्ष्मण उत्तर देते हैं कि वे तो राम और सीता की सेवा करते हैं, अगर शूर्पणखा को अपना लेंगे तो उसे भी राम और सीता की सेवा करनी पड़ेगी। 

दोनों पुरुषों द्वारा नकारे जाने पर वह गुस्से में आकर सीता को मारने दौड़ती है, जिसपर राम शूर्पणखा को दंड देने के लिए लक्ष्मण को आदेश देते हैं और लक्ष्मण उसके कान और नाक काट लेते हैं।  (अरण्यकाण्ड, 17वाँ और 18वाँ सर्ग)

बताइए। प्रपोजल पर कोई दिक्कत नहीं थी किसी को। धमकी तक तो बर्दाश्त कर लिया। पर अटेम्प-टू-मर्डर पर सजा तो मिलेगी न?

फिर शूर्पणखा दंडकारण्य के गवर्नर (रावण के ऑक्युपाइड साम्राज्य के उस क्षेत्र के गवर्नर) खर के पास जाती है। खर अपने सेनापतियों दूषण और त्रिशरा तथा चौदह हजार सेना के साथ राम-लक्ष्मण को मारने आता है, जिन्हें अकेले राम लगभग सवा घण्टे (तीन घड़ी) में निपटा देते हैं। [एक मुहूर्त = दो घड़ी, एक घड़ी = 24 मिनट]

उन राक्षसों में से एक अकम्पन जान बचाकर निकल जाता है और लंका पहुँचकर इस युद्ध के बारे में रावण को बताता है। रावण राम-लक्ष्मण को मारने और सीता को उठा लाने की तैयारी करता है। वह मारीच के पास जाता है। मारीच उसे राम की ताकत बताता है, बताता है कि राम से लड़कर क्यों अपनी जान खामख्वाह गंवाना चाहते हो, बेमौत मरोगे, इत्यादि। यह सब सुनकर रावण ठंडा हो जाता है और अपने महल लौट जाता है। (अरण्यकाण्ड, 31वाँ सर्ग)

कुछ समय (दिन, या हफ्ते) बाद शूर्पणखा रावण के पास आती है और सीता जी के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन करती है। ऐसा वर्णन कि मैं उसे यहाँ लिख नहीं सकता। कहती है कि उसने सोचा कि ऐसी सुंदर स्त्री तो उसके भाई रावण के पास होनी चाहिए, तो वह अपने भाई के लिए उस स्त्री को उठाने गई, और दुष्ट लक्ष्मण ने इस बात पर उसके कान-नाक काट लिए। (अरण्यकाण्ड, सर्ग 34, श्लोक 21) 

बताइए, वह अपनी बात, अपनी कामपिपासा छुपा ले गई, सीता को मारने चली थी, और रावण को बता रही है कि वो तो रावण के लिए सीता को उठा रही थी। ऐसी तो सत्यवादी बहन थी वह। 

रावण शूर्पणखा का बदला लेने के लिए नहीं, बल्कि स्त्रियों के प्रति अपनी भूख के कारण सीता को किडनैप करने गया था।

वह पहले भी कई स्त्रियों का हरण कर चुका था। वो यह बात खुद कहता है कि मैं इधर-उधर से बहुत सारी सुंदर स्त्रियों को हर लाया हूँ (अरण्यकाण्ड, 48वां सर्ग, श्लोक 28)। क्या इन बहुत सारी सुंदर स्त्रियों के पतियों ने भी उसकी बहन का अपमान किया था? 

उसने भोगवती नगरी में नागराज वासुकी को हराया था। तक्षक को हराकर उसकी पत्नी को उठा लाया था। पर सीता के मामले में, अपने समान बलशाली खर, दूषण और त्रिशरा, और चौदह हजार राक्षसों का राम द्वारा बस सवा घण्टे में वध कर दिए जाने के कारण, फिर मारीच के समझाने के कारण उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह राम से लड़कर सीता को उठा सके। तो उस तथाकथित महान रावण ने चोरों की भाँति सीता का हरण किया। बेचारे मारीच की बलि चढ़ा दी, जो पहले भी राम से दो बार पिट चुका था। 

किडनैप कर लिया, फिर भी सीता के साथ कोई जबरदस्ती नहीं की, तो इसपर भी सुन लीजिए। 

जब रावण सीता जी का हरण कर लंका लाया और अपने महल के ऐश्वर्य को दिखा-दिखाकर उन्हें ललचाने का, बात मान जाने का प्रलोभन दे रहा था, तब माता सीता उसे खूब खरीखोटी सुनाने के बाद कहती हैं कि तू इस संज्ञाशून्य शरीर को बांधकर रख या काट, मैं खुद ही इस शरीर और जीवन को नहीं रखना चाहती। (अरण्यकाण्ड, 56वां सर्ग, श्लोक 21)

मतलब क्या हुआ इस बात का? यही न कि तू मेरे निकट आएगा उससे पहले ही मैं मर जाऊंगी। 

इसपर 'स्त्री को ससम्मान रखने वाला महान रावण' कहता है कि ठीक है, मैं तुझे 12 महीने का समय देता हूँ। इतने समय में तू अपनी मर्जी से मेरे पास आ जाना। और अगर 12 महीने बाद भी तू मेरे पास नहीं आई तो मेरे सुबह के भोजन के लिए रसोइए तुझे काटकर पका देंगे। (अरण्यकाण्ड, 56वां सर्ग, श्लोक 24, 25)

कितना महान था न रावण? 


दीपावली कब मनाये

दीपावली कब मनाये (शंका समाधान)
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प्रदोष व्यापिनी कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन दीपावली का पर्व
मनाया जाता है।

भविष्यपुराण का कथन है कि "प्रदोषसमये लक्ष्मीं पूजयित्वा यथाक्रमम्
। दीपवृक्षास्तथा कार्याः शक्त्यादेव गृहेषु च।।" 

विक्रम् संवत् 2082 में कार्तिक कृष्ण पक्ष में 20 अक्टूबर को चतुर्दशी
अपराह्न 03:45 तक है, और इस दिन सूर्यास्त सायं 05:50 पर हुआ,
जबकि 21 अक्टूबर 2025 को अमावस्या सायं 05:55 तक है और
इस दिन सूर्यास्त सायं 05:49 पर हुआ है अर्थात् इस वर्ष अमावस्या 20
अक्टूबर और 21 अक्टूबर, दोनों दिन प्रदोष काल मे व्याप्त है। पहले
दिन सम्पूर्ण प्रदोष काल में दूसरे दिन केवल 07 मिनट ही व्याप्त है।
निर्णय सिन्धु प्रथम परिच्छेद के पृष्ठ 26 के अनुसार जब तिथि दो दिन
कर्मकाल में विद्यमान हो तो निर्णय युग्मानुसार करें। इस हेतु अमावस्या
प्रतिपदा का युग्म शुभ माना गया है अर्थात् अमावस्या को प्रतिपदा युता
ग्रहण महाफलदायी होता है और लिखा है कि उलटा होय (अर्थात् पहले
दिन चतुर्दशी युता अमावस्या ग्रहण की जाये) तो महादोष होता है और
पूर्व किये पुण्यों को नष्ट करता है। दीपावली निर्णय प्रकरण में धर्मसिन्धु
में लेख है कि 

"तत्र सूर्योदयं व्याप्यास्तोत्तरं घटिकादि रात्रि व्यापिनी दर्श न सन्देहः" 

अर्थात् जहाँ सूर्योदय में व्याप्त होकर अस्तकाल के उपरान्त एक घटिका
से अधिक व्याप्त होकर अमावस्या होवे, तब सन्देह नहीं है। तदनुसार
21 अक्टूबर 2025 को दूसरे दिन सिन्धुकार आगे लिखते है

"तथा च परदिने एव दिनद्वये वा प्रदोषव्याप्तौ परा। पूर्वत्रैव प्रदोषव्याप्ती
लक्ष्मीपूजादौ पूर्वा, अभ्यंग स्नानादौ पदा, एवमुभयत्र प्रदोष
व्याप्त्यभावेऽपि ।।"

निर्णयसिन्धु के द्वितीय परिच्छेद के पृष्ठ 300 पर लेख है कि 

"दण्डैक रजनी योगे दर्शः स्यात्तु परेऽहवि। तदा विहाये पूर्वेद्युः परेऽहनि
सुखरात्रिकाः ।।" 

अर्थात् यदि अमावस्या दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी होवे तो अगले दिन ही
करना चाहिए क्योंकि तिथि तत्त्व के अनुसार एक घड़ी रात्रि का योग
होये तो अमावस्या दूसरे दिन होती है, तब प्रथम दिन छोड़कर अगले
दिन सुखरात्रि होती है। व्रतपर्व-विवेक के अनुसार...

"इयं प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या, दिनद्वये सत्त्वाऽसत्त्वे परा" (तिथिनिर्णय) 

अर्थात् यदि अमावस्या दोनों दिन प्रदोष को स्पर्श न करें तो दूसरे दिन ही
लक्ष्मीपूजन करना चाहिए, इसमें यह अर्थ भी अन्तर्निहित है कि
अमावस्या दोनों दिन प्रदोष को स्पर्श करे तो लक्ष्मीपूजन दूसरे दिन ही
करना चाहिए।

इस प्रकार उपरोक्त सभी ग्रन्थों का सार यह है कि अमावस्या दूसरे दिन
प्रदोषकाल में एक घटी से अधिक व्याप्त है तो प्रथम दिन प्रदोष में
सम्पूर्ण व्याप्ति को छोड़कर दूसरे दिन प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन
करना चाहिए, किन्तु कहीं भी ऐसा लेख नहीं मिलता है कि दो दिन
प्रदोष में व्याप्ति है तो अधिक व्याप्ति वाले प्रथम दिन लक्ष्मी पूजन
करना चाहिए।

अतः उपरोक्त सभी तथ्यों का परिशीलन करने के उपरान्त यह निर्णय
लिया जाना शास्त्र सम्मत है कि दूसरे दिन अर्थात् 21 अक्टूबर 2025
को श्रीमहालक्ष्मी पूजन (दीपावली) किया जाना शास्त्र सम्मत है। इस
दिन सूर्योदय से सूर्यास्त उपरान्त विद्यमान होने से अमावस्या
साकल्यापादिता तिथि जो सम्पूर्ण रात्रि और अगले दिन सूर्योदय तक
विद्यमान मानी जाकर सम्पूर्ण प्रदोषकाल, वृषलग्न, निशीथ में सिंहलग्न
में लक्ष्मीपूजन के लिए प्रशस्त होगी।


Tuesday, 14 October 2025

होम्योपैथी आयुर्वेद

*साइटिका का उपचार होम्योपैथी के द्वारा*


 होम्योपैथिक दवा जो साइटिका के मरीजों को दिया गया और एक साथ चार मरीजों को दिया गया और 72 घंटे के अंदर उसके ऐसे परीक्षित परिणाम मिले हैं जो अकल्पनीय है

मेरे पिताजी जिनकी उम्र 74 वर्ष 

मेरे एक मित्र जिनकी उम्र 50 वर्ष 

मेरे एक परिचित की पत्नी जिनकी उम्र 34 वर्ष 

इंदौर की एक मरीज जिनकी उम्र 46 वर्ष 

भाई जी चारों को साइटिका की समस्या थी और सभी काआयुर्वेदिक दवाएं होम्योपैथी की दवाई एवं एलोपैथ की दवाएं सभी की चल रही थी लेकिन साइटिका में दर्द में किसी को 20% किसी को 40% किसी को 30% आराम था 

फिर मैं होम्योपैथिक के दबा के बारे में पूछा तो उन्होंने 

ब्रायोनिया 200

अर्निका 200 

कोलोसिंथ 200

तीनों दावों को बराबर मात्रा में लेकर आपस में मिलाकर दो-दो बूंद प् प्रत्येक दो-दो घंटे पर जब पर लेने के लिए बताया

भाई जी आप लोग यकीन नहीं करेंगे आश्चर्यचकित होंगे 

तीन मरीजों को 72 घंटे के अंदर बिल्कुल दर्द नहीं हुआ 

एक मरीज को 72 घंटे में 80% का लाभ मिला 

शत शत प्रणाम है होम्योपैथिक आयुर्वेदिक रसोई चिकित्सा एक्यूप्रेशर जैसी विद्या का। तो अगर आपको भी यह समस्या है तो एक बार आप भी प्रयोग करेंगे।



*पेशाब का अचानक रुक जाने का कारण...*

जब किसी कारण से मूत्राशय में रुकावट होती है तो पेशाब आना बंद हो जाता है। ऐसे में रोगी को पेशाब करने का तो एहसास होता है परंतु पेशाब नहीं हो पता है। इस रोग को आयुर्वेद में मूत्रकृच्छ, मूत्ररोध या पेशाब का न आना कहते हैं।

इन दोनों रोगों में पेशाब आना बंद हो जाता है। तथा रोगी को अधिक कष्ट होता है। दोनों रोगों में फर्क सिर्फ का इतना है कि मूत्रनाश में मूत्राशय में पेशाब नहीं बनता। इसीलिए रोगी को पेशाब नहीं लगता जबकि मूत्ररोध में पेशाब बनने के बाद पेशाब तो लगता है परंतु पेशाब नहीं आता। 

पेशाब न होने के कारण...

खून के थक्के जमने के वजह से भी कई बार बूंद बूंद करके पेशाब आता है। 

पुरुषों में उम्र बढ़ाने के कारण कई बार प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाती है। जो यूरिन ना आने का कारण भी बन सकते हैं।

यूरिन इन्फेक्शन से भी कई बार पेशाब का आना बंद हो जाता है। 

पेशाब के रास्ते में पथरी फंसने से भी रुकावट उत्पन्न करती है। 

पाचन तंत्र में हुई बीमारियों के कारण भी पेशाब का आना बंद हो जाता है। 

पित्त वृद्धि के कारण होने वाले मूत्रकृच्छ, मूत्रदाह में..

*प्रवाल पिष्टी २ रत्ती*

*श्वेत parpati २ रत्ती,*

*मूत्रकृच्छांतक रस 1 रत्ति*,

यह एक मात्रा सुबह - शाम 

शरबत अनार या शहद के साथ दें।

*गोक्षुरादि गु. १ - १ गोली सुबह - शाम जल से दे।*

अगर मूत्राशय में पथरी है तो वृक हर क्वाथ के साथ देवें।

50 ml सुबह और 50 ml शाम को।

भोजन के बाद.. *चंदनासव तीन चम्मच बराबर जल

 के साथ।*दिन में दो बार देवें ।


पिपली कल्प


 छोटी पिपली 5 दाने आधा किलो दूध में डालकर इतना पकाएँ कि पिपली नर्म हो जाएँ। फिर पिपली को निकालकर खा लें और दूध में मिश्री मिलाकर पी लें। अगले दिन 3 पिपली बढ़ा दें और 8 दिन तक निरन्तर 3-3 पीपली बढ़ाते रहें,9वे दिन से 3-3 पिपली घटाते जाएँ, यहाँ तक कि 5 पीपली पर आ जाएँ ।


यह आयुर्वेद की एक अद्भुत और अनोखा योग है। इसके सेवन से पुराने-से-पुराना बुखार, खाँसी, श्वास, दमा, क्षय टी.बी., हिचकी, विषम ज्वर, आवाज़ बिगड़ना, बवासीर, पेट का वायुगोला, जुकाम आदि दूर हो जाते हैं। भूख खूब बढ़ती है। वर्धमान पपिपली का प्रयोग मोटा करता है, आवाज़ को सुरीली बनाता है, तिल्ली और दूसरे रोगों को दूर करता है, आयु और बुद्धि को बढ़ाता है। पाण्डु पीलिया रोग के लिए रामबाण दवा है।

औषध सेवन काल में दूध और भात के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं खानी चाहिए।


वृद्ध, कोमल प्रकृतिवाले यदि इतनी पीपली न खा सकें तो उन्हें केवल दूध ही पीना चाहिए , लेकिन पिपली इसी संख्या से बढ़ाते जाएँ।