Tuesday, 21 October 2025

गौ पृथ्वी में कामधेनु भारत-

गौ पृथ्वी में कामधेनु भारत-
पृथ्वी को उत्पादन स्रोत के रूप में गौ कहा गया है, जिसके ४ स्तन रूपी ४ समुद्र हैं-(१) जल मण्डल, (२) वायु मण्डल, (३) भूमण्डल (ठोस स्थल भाग), (४) जीव मण्डल। इनको अंग्रेजी में स्फियर (Sphere) कहते हैं-हाइड्रोस्फियर (Hydrosphere), एटमोस्फियर (Atmosphere), लिथोस्फियर (Lithiosphere), बायोस्फियर (Biosphere)। जब भी पृथ्वी पर अत्याचार होता था, गोरूपधारी पृथ्वी ब्रह्मा के साथ विष्णु भगवान् के पास जाती थी। ग्रीक में भी पृथ्वी को गैया (Gaia) कहते थे जिससे जिओ (Geo) शब्द बना है-Geography, Geology। 
पयोधरी भूतचतुः समुद्रां जुगोप गोरूप धरामिवोर्वीम्। (रघुवंश, २/३)
अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनु-र्मातेव वा ऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१)
भूमिर्दृप्त नृपव्याज दैत्यानीक शतायुतैः।
आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययौ॥१७॥
गौर्भूत्वा-श्रुमुखी खिन्ना क्रन्दन्ती करुणं विभोः।
उपस्थितान्तिके तस्मै व्यसनं स्वमवोचत॥१८॥
ब्रह्मा तदुपधार्याथ सह देवैस्तया सह।
जगाम सत्र्नयनस्तीरं क्षीर पयोनिधेः॥१९॥
(भागवत पुराण, अध्याय १०/१)
राजा पृथु ने भी पृथ्वी से खनिजों, फल मूल, आहार आदि का दोहन करने के लिए उसे गौ कहा है।
तत उत्सारयामास शिला-जालानि सर्वशः।
धनुष्कोट्या ततो वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः॥१६७॥
मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमासीद् वसुन्धरा। स्वभावेना-भवं-स्तस्याः समानि विषमाणि च॥१६८॥
आहारः फलमूलं तु प्रजानाम-भवत् किल। वैन्यात् प्रभृति लोके ऽस्मिन् सर्वस्यैतस्य सम्भवः॥१७२॥
शैलैश्च स्तूयते दुग्धा पुनर्देवी वसुन्धरा। तत्रौषधी र्मूर्त्तिमती रत्नानि विविधानि च॥१८६॥
(वायुपुराण, उत्तरार्ध, अध्याय १)
पृथ्वी पर भारत उत्पादन का सबसे बड़ा केन्द्र था। विश्व का भरण पोषण करने के कारण इसे भारत कहा गया। मेगास्थनीज आदि ने भी लिखा है कि भारत सदा से खनिज तथा अन्न में स्वावलम्बी था, अतः भारत ने १५,००० वर्षों में किसी पर आक्रमण नहीं किया। (इण्डिका, पारा ३६-बाद में मैक्रिण्डल ने इसे हटा दिया)। अतः भारत को कामधेनु गौ कहते है। इस कामधेनु के सीमावर्त्ती जातियों का उल्लेख वसिष्ठ तथा जमदग्नि के कामधेनु हरण प्रसंगों में है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण (३/२४/५९-६४)-
इत्युक्त्वा कामधेनुश्च सुषाव विविधानि च। शस्त्राण्यस्त्राणि सैन्यानि सूर्यतुल्य प्रभाणि च॥५९॥
निर्गताः कपिलावक्त्रा त्रिकोट्यः खड्गधारिणाम्। विनिस्सृता नासिकायाः शूलिनः पञ्चकोटयः॥६०॥
विनिस्सृता लोचनाभ्यां शतकोटि धनुर्द्धराः। कपालान्निस्सृता वीरास्त्रिकोट्यो दण्डधारिणाम्॥६१॥
वक्षस्स्थलान्निस्सृताश्च त्रिकोट्यश्शक्तिधारिणाम्॥ शतकोट्यो गदा हस्ताः पृष्ठदेशाद्विनिर्गताः॥६२॥
विनिस्सृताः पादतलाद्वाद्यभाण्डाः सहस्रशः। जंघादेशान्निस्सृताश्च त्रिकोट्यो राजपुत्रकाः॥६३॥ 
विनिर्गता गुह्यदेशास्त्रिकोटिम्लेच्छजातयः। दत्त्वासैन्यानि कपिला मुनये चाभयं ददौ॥६४॥
वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड (५४/१८-२३, ५५/२-३), ब्रह्माण्ड पुराण (२/३/२९/१८-२१), स्कन्द पुराण (६/६६/५२-५३) भी द्रष्टव्य।
कामधेनु से उत्पन्न जातियां-(१) पह्लव-पारस, काञ्ची के पल्लव। पल्लव का अर्थ पत्ता है। व्यायाम करने से पत्ते के रेशों की तरह मांसपेशी दीखती है। अतः पह्लव का अर्थ मल्ल (पहलवान) है। (२) कम्बुज हुंकार से उत्पन्न हुए। कम्बुज के २ अर्थ हैं। कम्बु = शंख से कम्बुज या कम्बोडिया। कामभोज = स्वेच्छाचारी से पारस के पश्चिमोत्तर भाग के निवासी। (३) शक-मध्य एशिया तथा पूर्व यूरोप की बिखरी जातियां, कामधेनु के सकृद् भाग से (सकृद् = १ बार उत्पन्न), (४) यवन-योनि भाग से -कुर्द के दक्षिण अरब के। (५) शक-यवन के मिश्रण, (६) बर्बर-असभ्य, ब्रह्माण्ड पुराण (१/२//१६/४९) इसे भारत ने पश्चिमोत्तर में कहता है। मत्स्य पुराण (१२१/४५) भी इसे उधर की चक्षु (आमू दरिया-Oxus) किनारे कहता है। (७) लोम से म्लेच्छ, हारीत, किरात (असम के पूर्व, दक्षिण चीन), (८) खुर से खुरद या खुर्द-तुर्की का दक्षिण भाग। (९) पुलिन्द (पश्चिम भारत-मार्कण्डेय पुराण, ५४/४७), मेद, दारुण-सभी मुख से। 
कामधेनु अर्थ में वेद में इसे हिंकृण्वती (हिंकार करने वाली) वसुपत्नी (धन देने वाली-मुखिया पत्नी अर्थ में कन्नड़ में हेग्गड़ती), इस रूप में दुही गयी कहा है। 
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनाम् वत्समिच्छन्ति मनसाभ्यागात्।
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धतां महते सौभगाय॥
(ऋक्, १/१६४/२७, अथर्व, ७/७३/८, ९/१०/५, ऐतरेय ब्राह्मण, १/२२/२)
इसके बाद के २ ऋक् मन्त्र भी भारत की गोमाता रूप में वर्णन करते हैं। मन्त्र के दोनो पंक्तियों के प्रथम अक्षरों को मिलाने से हिन्दू शब्द बनता है, जिसका अर्थ हुआ भारतमाता का पुत्र।

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