वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने।
अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्त्वे।।
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अर्थात् मैं सदैव ऐसे पुरुषों के हृदय में निवास करती हूँ जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, देवाराधन में उत्सुक, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा सत्वगुण से भरे हो। (अनुशासन पर्व 11, 6)
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