. दिशाओं की बातें
आज सुबह जब मैं अपने घर के बगीचे में टहल रहा था तो मैंने सूर्य को उदय होते हुए देखा। मैंने सूर्य के उदय होने की दिशा देखी। मैंने गौर किया कि मेरे घर की दिशा के सापेक्ष जून में सूर्य मुझे अभी की अपेक्षा उत्तर की ओर से उदित होता हुआ दिखाई पड़ता था और जाड़ों में दक्षिण की ओर से। मुझे याद आया कि अभी 3 दिन पहले - 22 सितंबर को - उत्तरी गोलार्ध का ऑटम इक्विनॉक्स होकर चुका है। इसका अर्थ हुआ कि इस समय सूर्य भूमध्य रेखा के ऊपर है। जब उत्तरी गोलार्ध में गर्मियां पड़ती हैं तब वह 23.5 डिग्री उत्तर - कर्क रेखा - के ऊपर और यहां जाड़े पड़ने पर 23.5 डिग्री दक्षिण में मकर रेखा के ऊपर होता है। यहां तुलना के लिए यह जानना अच्छा होगा कि हमारी दिल्ली लगभग 28.7 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित है और भूमध्य रेखा अफ्रीका महाद्वीप के लगभग बीच से गुजरती है।
यह देख कर मेरे मन में विचार आया कि पूर्व दिशा क्या है। हम लोग बचपन में पढ़ते हैं कि जिस दिशा से सूर्य उदित होता है, वह पूर्व दिशा होती है। इसकी ओर मुंह करके खड़े होने पर हमारी पीठ पीछे पश्चिम दिशा, बाएं हाथ की ओर उत्तर दिशा और दाएं हाथ की ओर दक्षिण दिशा होती है। लेकिन सूर्य तो किसी एक निश्चित दिशा से उदित नहीं होता है। यह आभासी रूप से 23.5 डिग्री उत्तर अक्षांश से 23.5 डिग्री दक्षिण अक्षांश के बीच घूमता हुआ दिखाई पड़ता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने के तल के लंब के सापेक्ष पृथ्वी के अक्ष का जो झुकाव है - जो इस समय लगभग 23.5 डिग्री है - वह झुकाव पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा के दौरान सूर्य के सापेक्ष अपनी दिशा परिवर्तित करता रहता है। क्योंकि सूर्य आभासी रूप से पृथ्वी की सतह के सापेक्ष अपने उदय और अस्त होने के स्थान एवं परिक्रमा-पथ को बदलता हुआ दिखाई पड़ता है, इसलिए हम पूर्व दिशा किसे मानेंगे और इसके अनुसार पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा किसे मानेंगे?
यह कहना गलत है कि पृथ्वी के केन्द्र से सूर्य के केन्द्र की ओर जाने वाली दिशा पूर्व दिशा होती है। सूर्य के चारों ओर पृथ्वी द्वारा अपनी यात्रा के पथ में हर बिंदु पर यह दिशा बदलती रहती है। वास्तव में कोई भी 'कार्डिनल' दिशा पृथ्वी की सतह के सापेक्ष देखी जाती है। पृथ्वी की सतह के किसी स्थान से हमें सूर्य जिस ओर से उदित होता हुआ दिखाई पड़ता है, आम तौर पर उसे पूर्व दिशा कह दिया जाता है। किन्तु क्या यह एक सही परिभाषा है?
फिर, ध्रुव प्रदेशों में तो 6 महीने का दिन और 6 महीने की रात होती है। वहां 6 महीने तो सूर्य दिखाई ही नहीं पड़ता है और जब दिखाई भी पड़ता है तो वह कुछ समय के लिए बहुत कम देर के लिए उदित होता हुआ और आसमान में रहता हुआ दिखाई पड़ता है और फिर क्षितिज के समानांतर एक गोल चक्कर लगाता दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में वहां दिशाएं तय करने में अत्यंत कठिनाई होगी। फिर जितना हम ध्रुवों की ओर बढ़ते जाएंगे, उतनी ही दिशाएं समाप्त होती जाएंगी। ठीक ध्रुवों पर केवल एक ही दिशा रह जाएगी।
यह कहना भी गलत है कि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। पृथ्वी किसी भी ओर से घूमे, हम उसे पश्चिम से पूर्व या पूर्व से पश्चिम कह सकते हैं। कहने का सही तरीका यह है कि यदि हम पृथ्वी को उसके उत्तरी ध्रुव के ऊपर अंतरिक्ष से नीचे की ओर देखें तो वह हमें घड़ी की सुइयों के चलने की विपरीत दिशा में चलती हुई - या घूमती हुई - दिखाई पड़ेगी। या इसे हम ऐसे कह सकते हैं कि हम पृथ्वी को दक्षिणी ध्रुव के ऊपर अंतरिक्ष से नीचे देखें तो वह हमें घड़ी की सुइयों की दिशा में चलती हुई दिखाई पड़ेगी।
पृथ्वी की सतह पर दिशाएं उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव से भी तय की जा सकती हैं। लेकिन यहां पर चुंबकीय ध्रुवों और भौगोलिक ध्रुवों का अंतर भी सामने आता है। कहीं पर चुंबकीय ध्रुवों को देखा जाता है और कहीं पर भौगोलिक ध्रुवों को। इसके विभिन्न कारण होते हैं।
अंतरिक्ष में वैसे तो कोई दिशा नहीं होती है - या कहना चाहिए कि पृथ्वी की सतह के सापेक्ष वाली कोई दिशा नहीं होती है - लेकिन फिर वहां दिशाएं होती भी हैं। वह दिशाएं अनेक प्रकार से देखी जाती हैं, उदाहरण के लिए गैलेक्टिक एक्सिस से, हमारी गैलेक्सी या गैलेक्सी के बाहर की विभिन्न सेलेस्टियल बॉडीज के कोऑर्डिनेट्स से, पृथ्वी के पोल्स के एक्सटेंशन से, उसकी भूमध्य रेखा के एक्सटेंशन से, 'राइट एसेंशन' और 'राइट डेक्लीनेशन' से और अनेक अन्य प्रकार से। और अंतरिक्ष में 'ऊपर' और 'नीचे' भी नहीं होता है। और पृथ्वी की सतह के हर स्थान पर ऊपर और नीचे की दिशा एक-दूसरे के सापेक्ष भिन्न-भिन्न होती है।
इसी प्रकार उत्तरी ध्रुव में केवल दक्षिण दिशा होती है और दक्षिणी ध्रुव में केवल उत्तरी दिशा। उत्तरी ध्रुव से हर रास्ता केवल दक्षिण की ओर जाता है और इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव से हर रास्ता केवल उत्तर की ओर। पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव समय के साथ-साथ अपना स्थान थोड़ा-थोड़ा बदलते भी रहते हैं। बल्कि पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुवों ने तो पृथ्वी के इतिहास में अनेक बार एक-दूसरे के साथ भी स्थान बदला है। जहां इस समय उत्तरी ध्रुव है, कभी वहां दक्षिणी ध्रुव था, और जहां दक्षिणी ध्रुव है, वहां उत्तरी ध्रुव। ऐसा उसके अंदर के लोहे के क्रोड की स्थिति में परिवर्तन के कारण होता है। पृथ्वी के भौगोलिक ध्रुव भी अंतरिक्ष के तारों के सापेक्ष एक लट्टू के समान चक्कर लगाते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पूर्व और पश्चिम दिशा एक निश्चित दिशा नहीं है। हम यह मोटे तौर पर कहते हैं कि जिस दिशा से सूर्य उदय होता है, वह पूर्व दिशा होती है।
तो, दिशाओं का संसार बहुत रोचक है। 'दिशाओं' से मुझे 'दिग्गजों' की याद आ रही है। दिग्गज - अर्थात् दिक् + गज - अर्थात् दिशाओं के हाथी। कभी यह माना जाता था कि चार दिशाओं में चार बड़े-बड़े हाथी होते हैं जो पृथ्वी को अपनी पीठ पर धारण किए रहते हैं। कैसी-कैसी धारणाएं थीं! कछुए की पीठ पर, वराह के दांतों पर, शेषनाग के फन पर, हाथी की पीठ पर टिकी पृथ्वी, चपटी पृथ्वी और किसी देवता के मुख, हाथों, पैरों, पेट से अथवा जमीन फाड़ कर पैदा होते इंसान, आदि क्या-क्या नहीं। लेकिन क्या अभी भी हम लोग अपनी धारणाओं में बहुत सुसंगत हो पाए हैं? क्या अभी भी हम अनेक अतार्किक धारणाएं नहीं पाले बैठे हैं? क्या अभी भी हमारे समाज की एक वैज्ञानिक मानसिकता बन पायी है? क्या अभी भी अधिकांश धार्मिक और पांथिक मतों को वैज्ञानिक मानसिकता की बात करने पर बिजली का झटका नहीं लग जाता है? 🤔
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