पूजाकाले तु सम्प्राप्ते वासुदेवं स्मरेत्तु यः । पूजाफलं न चाप्नोति नरकं प्रतिपद्यते ॥ १०० ॥
चण्डिका के पूजाकाल में जो वासुदेव का स्मरण करता है उसे पूजाफल प्राप्त करना तो दूर वह सर्वथा नरक का भागी होता है ॥ १०० ॥
वैष्णवं कुसुमं स्पृष्ट्वा पूजाकाले च सर्वदा । हस्तप्रक्षालनाच्छौचमाचामस्तु तदाचरेत् ॥ १०१ ॥
चण्डिका के पूजनकाल में यदि विष्णु के निमित्त चढ़ाये जाने वाले पुष्पों का स्पर्श हो जावे तो साधक हस्त प्रक्षालन कर पुनः आचमन करने पर ही शुद्ध होता है ॥ १०१ ॥
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