समाज के कन्धों पर चढ़कर ... ...
अधिकांश लोगों में न तो कला को अनुभव करने वाला हृदय कार्यरत रहता है और न विज्ञान को समझने वाला मस्तिष्क — क्योंकि उनके हृदय और मस्तिष्क पर महिषासुर का जंजाल छाया रहता है जिसे हम आजकल “समाज” कहते हैं ।
समाजवाद का भूत था तो मधु−कैटभ के काल से,किन्तु “समाजवाद” नाम से यह भूत पहले आधुनिक यूरोप में पैदा हुआ और १९वीं शती में भारत आया । मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव युंग ने इसे “सामूहिक अचेतन” का नाम दिया । किन्तु उनको भी पता नहीं था कि इस समाजवादी अचेतन के नीचे “सामूहिक चेतन” छुपा है जिनको प्राचीन भारत में साक्षीभाव से देखने वाला ईश्वर कहा जाता था — जो समष्टि हैं,सर्वव्यापी हैं । जीव के पापों के कारण उनसे विलगाव का भाव उत्पन्न होता है और तब समष्टि से भिन्न अस्मिता वाला “व्यक्ति” प्रकट होता है;वही जीव है ।
जिसे पाप की परख नहीं वह पुण्य को पहचान नहीं सकता । जिसे अचेतन असुर की पहचान नहीं वह ईश्वर को नहीं जान सकता । “सामूहिक अचेतन” को ही सेमेटिक मजहबों में “शैतान” कहा गया,क्योंकि सत्य पर चलने वालों को “शैतान” बहकाता है ।
जिनकी चेतना सुन सकती है उनको “शैतान” की आवाज सुनाई देती है जिस कारण “शैतान” को पृथक सत्ता रखने वाला कोई महाशक्तिशाली बुरी आत्मा मानने की भूल करते हैं ।
किन्तु जिनकी चेतना उससे भी अन्दर की बात सुन सकती है उनको ईश्वर की वाणी सुनाई देती है । वे जानते हैं कि “शैतान” का पृथक अस्तित्व नहीं होता,वह व्यक्ति के ही पापों का फलन है । स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में यही कहा था कि व्यक्ति अपने पापों का दायित्व किसी बाहरी “शैतान” पर थोपकर पापमुक्त होने का भ्रम नहीं पाल सकता,हर व्यक्ति को अपने कर्मों के फल भोगने ही है ।
समष्टि में जो हाइ डिफिनिशन डिटेल हैं वही व्यक्ति है,शैतान हैं । अंग्रेजी में एक नयी कहावत है — “the Devil is in the details.”।
१९६३ ईस्वी में इस वाक्य का प्रचार आरम्भ हुआ (Richard Mayne’s The Community of Europe) और १९६९ ई⋅ में इसे कहावत माना जाने लगा । तात्पर्य यह था कि स्थूल तौर पर जो बात वा वस्तु ठीक दिखती है उसके अन्दर सूक्ष्म बुराईयाँ हो सकती हैं ।
किन्तु इससे पुरानी कहावत थी “God is in the details”,अर्थात् सत्य एवं कौशल सूक्ष्मता पर ध्यान देने में है । फ्रेंच में Gustave Flaubert की उक्ति “Le bon Dieu est dans le détail” (”ल बोँ द्ये ए दाँ ल देताय” lə bɔ̃ djø ɛ dɑ̃ lə detaj) से इस उक्ति का प्रचार १९वीं शती में आरम्भ हुआ ।
दोनों बातें अपने अपने सन्दर्भ में सही हैं । अतः महत्व इस बात का है कि सूक्ष्मता पर सदैव ध्यान देते रहना चाहिए,ताकि सूक्ष्मता सही हो तो लागू करें और गलत हो तो त्याग दें । किन्तु अधिकांश लोग सूक्ष्मता से बचते हैं,शार्टकट चाहते हैं,स्वतन्त्र चिन्तन यदि सत्य की प्रेरणा भी दे तो समाज के नाम पर अपनी गलत ईच्छाओं का पालन करना चाहते हैं । समाज एक बहाना है,अपनी गन्दी वासनाओं की पूर्ति का हेतु है । समाज कोई सजीव प्राणी नहीं,बल्कि प्राणियों का झुण्ड है । झुण्ड अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी,किन्तु इस अर्थ में झुण्ड और समाज सदैव बुरे ही हैं कि वे स्वतन्त्र चिन्तन को कुचलते हैं ।
सनातन धर्म साम्यवादी है,समष्टिवादी है । किन्तु वहाँ तक पँहुचने का पथ अत्यन्त व्यक्तिवादी है । समाज के कन्धों पर चढ़कर सत्य तक नहीं पँहुचा जा सकता । समाज कितना ही अच्छा क्यों न हो,केवल अवयस्क मानसिकता वालों को ही सहारा दे सकता है,और यह सहारा भी एक सीमा तक ही — जिसके पार अनन्त तक अथाह सागर अकेले तैरना पड़ता है ।
अकेलापन से लोग घबड़ाते हैं । समाज नाम का नशा चाहिए अकेलापन को भुलाने के लिए । किन्तु नशा कभी सच्चाई नहीं बन सकता । व्यक्ति जब इस सत्य को स्वीकार कर लेता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में वह वास्तव में अकेला है तभी वह वयस्क बनता है । तभी ईश्वर का साक्षात्कार होने का पथ खुलता है । कई अभागे वहाँ से वापस लौट आते हैं ⋅⋅⋅
सारे सामाजिक सम्बन्ध क्षणिक हैं । धर्मसम्मत विवाह हो अथवा माता−पिता भाई−बहन का सम्बन्ध,कोई भी सम्बन्ध सात जन्मों से अधिक साथ नहीं देता । सात पीढ़ियों तक ही पूर्वजों का भी सम्बन्ध रहता है । भवन भी सात मंजिल तक ही शुभ रहते हैं,शास्त्र में स्पष्ट आदेश है । पेशवा बाजीराव ने १३ मंजिल बनायी,तो उसमें पैदा होने वाले नालायक पुत्र ने मराठा साम्राज्य को ही नष्ट कर डाला — अब्दाली को खैबर पार खदेड़ने वाले रघुनाथराव को ईर्ष्यावश हटाकर अपनी ही तरह नालायक सदाशिवराव को कमान सौंपकर पानीपत में चार लाख मराठों को कटवा दिया । धर्मपत्नी भी सात जन्मों से अधिक साथ नहीं देती,क्योंकि मर्त्यों में तेरह जन्मों से अधिक एक योनि में नहीं आ सकते । मोक्ष नहीं मिला तो निचली योनि मिलेगी । धर्मपत्नी भी आठवें जन्म में मिल गयी तो विवाहेतर मिलेगी — कुण्डली में अधर्म हावी हुआ तो अवैध सम्बन्ध बनेगा,धर्म हावी हुआ तो उर्वशी कहेगी पुरुरवा से — “दुरापना वात इवाहस्मि”!(ऋग्वेद= मैं वायु की तरह दुष्प्राप्य हूँ ।)
किशोरावस्था में साहित्यकार बनने की लालसा थी और वैज्ञानिक भी । दोनों में से कुछ नहीं बन सका,
क्योंकि वेद और ज्योतिष ने सिखा दिया कि सारा कथानक ⁄ प्लॉट तो देवगण रचते हैं तो साहित्यकार की कोई भूमिका ही नहीं बची,
और समस्त आधुनिक विज्ञान आसुरी भौतिकवाद है तो वैज्ञानिक बनने का प्रश्न ही समाप्त!
मेरे पुराने परिचित और सम्बन्धी मेरे बारे में कहते हैं कि था तो मेधावी किन्तु कुछ नहीं बन सका,निकम्मा निकल गया!अंग्रेज और उनके समस्त मानसपुत्र भी कहते हैं कि मोक्षवादी सनातन धर्म पलायनवाद है ।
मैं तो बस साक्षी हूँ ।
“नागिन” फिल्म मैंने युवावस्था में नहीं देखी,किन्तु बाँसुरी मुरली हारमोनियम बैंजो किशोरावस्था से ही सीखने लगा तो इसी फिल्म की धुन “मन डोले ⋅⋅⋅” से सीखना आरम्भ किया था । १९५४ ई⋅ में बनी थी । ६० वर्षों से पहले की फिल्में कॉपीराइट से मुक्त है । कृत्रिम बुद्धि हेतु कम्प्यूटर में विभिन्न लाइब्रेरियों और पैकेजों की जाँच के दौरान निम्न क्लिप का सुपर−रिजॉल्यूशन और रङ्गीकरण किया,480p की बुरी अवस्था वाली मिली जिसे प्रयास करने पर भी पूरा ठीक नहीं कर सका । 1080p का वर्सन अपलोड कर रहा हूँ । 4K का परिष्कृत संस्करण बनाने में बहुत समय लगेगा और फाइल भी बहुत बड़ा हो जायगा,किन्तु जबतक अच्छी श्यामश्वेत डिजिटल फाइल न मिले तबतक प्रयास करना व्यर्थ है । रङ्गीकरण के उपलब्ध सर्वोत्तम पैकेजों में पायथन प्रोग्रामों को बदलकर मैंने RTX3090 हेतु रङ्गीकरण प्रोग्राम को सुधारा है,कुडा संस्करण के साथ साथ पाइटॉर्च एवं बहुत सी लाइब्रेरियों का नवीनीकरण किया और सहस्रों इण्टरमीडिएट फाइलों को डिस्क की बजाय रैम पर चलाया ताकि डिस्क का क्षरण न हो । फलतः गति भी बढ़ी । जिनको डाउनलोड करना हो कर लें,बाद में गूगल ड्राइव से हटा दूँगा । अंग्रेज सच कहते हैं कि भारत सँपेरों का देश है,सँपेरों पर बनी इस फिल्म ने दशकों तक पूरे देश को झुमाया । कुण्डली में कुछ योग तगड़े हों तो लैलाओं और मँजनुओं को ७ वा १३ जन्मों के पश्चात भी नाग−नागिन आदि बनना पड़ता है । तब बैखरी तो नहीं मिलती,पश्यन्ती में दोगाना गाते हैं ।
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सङगीत में राग ताल मात्रा आदि सीखने पर केवल स्थूल ज्ञान प्राप्त होता है,वास्तविक कलाकारी तो बारीकी में है जो कुण्डली में सङगीत का योग रहने पर ही सम्भव है =God is in the details ;
किन्तु कृत्रिम बुद्धि में कोई भी कार्य हो,सूक्ष्मता की एक सीमा होती है जिसके पश्चात मॉडल की ट्रेनिंग रोकनी पड़ती है,वरना ओवरफिटिंग के कारण ट्रेण्ड मॉडल निरर्थक हो जाता है =the Devil is in the details
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