Monday, 20 October 2025

चतुर्मुख दीप दान दीपावली

** चतुर्मुख दीप दान **
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को रात्रि में एक बत्ती वाला दीप तथा चतुर्दशी को रात्रि में घर से बाहर चार बत्तियों वाला दीप जलाया जाता है। पहले दक्षिण दिशा वाली बत्ती जलाई जाती है। पुनः प्रदक्षिणा क्रम से अन्य तीनों को जलाते हैं। जलाने के बाद प्रार्थना करते हैं .....
मृत्युना पाशदंडाभ्यां स्थितो श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीप दानेन सूर्यज: प्रीयतां मम ।।
सूर्यपुत्र यम (वैवस्वत) हाथ में पाश और यम दण्ड लिए अपनी पत्नी श्यामा के साथ हमेशा स्थित रहते हैं।आप दीप दान से अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।
यम सभी दिशाओं में एक साथ सक्रिय रहते हैं। ऊर्ध्व और अध: दिशाओं को भी वे अपने प्रभाव में रखते हैं। इसीलिए यम को चारों दिशाओं वाली बत्ती से दीप दान किया जाता है।
दीप दान का महत्व आगम ग्रंथों और धर्मशास्त्र के ग्रंथों में अलग अलग विस्तार से वर्णित है।देवी जी को एकादश बत्तियों वाला दीप अधिक प्रिय है।इसे रुद्र वर्ती दीप कहा गया है।हजार दीपों वाले स्तम्भ प्राचीन भारत में मंदिरों में बने रहते थे।इन्हें ऊपर से नीचे जलाते हुए अभ्यस्त लोग उतरते हैं।कार्तिक मासमें आकाश दीपदान देने की परंपरा 
रही है। काशी के घाट इन दीपों से जगमगाते रहते हैं।
         दीप अंधकार को दूर करने का सबसे छोटा माध्यम
है। रात्रि में दीप जलाकर जो भी व्यक्ति आराधना करता है वह सहजता से सफलता को प्राप्त करता है।सरसों तेल का दीप कार्तिक मास में जलाने से वातावरण विष रहित होता है। तेल का दीप आराधना के समय वाम भाग में और घृत का दीप दक्षिण भाग में रखा जाता है। तेल का दीप शत्रु नाशक होता है।घृत का दीप आयुष्य वर्धक होता है।
आज हमने भी चतुर्मुखी दीप जलाए।
असतो मा सद्गमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय 
मृत्यो र्मा अमृतं गमय 
भारत में असत से सत की ओर,तम से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमृत की ओर जाने की प्रथा अनादि काल से चली आ रही है।
प्रकाश का पर्व दीपों की अवलि से जगमगाता रहता है।
जिन्हें दीपों से शत्रुता हैं वे अंधकार को पसंद करते हैं।
भारतीय महिलाएं दीप से भगवती की आराधना करती रहती हैं। गहन अंधकार को चीर कर रखने की क्षमता एक नन्हे दीपक में होती है।
दीप को नमस्कार है।

No comments:

Post a Comment