. हम पर गिरता चांद?
पिछले दिनों मैं अपने एक वैचारिक मित्र का एक संप्रेषण पढ़ रहा था जिसमें अंतरराष्ट्रीय चंद्र-निशा अवलोकन के बारे में बताया गया था। यह चांद को देखने के लिए एक आयोजन होता है। इसे पढ़ कर मुझे अपने बचपन और बाद की चांद के विषय की कुछ कल्पनाएं, धारणाएं और तथ्य याद हो आए। मैं उनको मित्रों के साथ साझा करता हूं।
अपने बचपन में एक बार मैंने एक सपना देखा कि मैं एक रॉकेट से चांद पर पहुंच गया हूं। यह चांद उतना ही बड़ा था जितना पृथ्वी से दिखाई पड़ता है। इस छोटे से चांद पर मैं मुश्किल से खड़ा हुआ था और इस भय से कांप रहा था कि नीचे दिखाई पड़ने वाली धरती (पृथ्वी) पर कहीं मैं इतनी ऊंचाई से गिर न जाऊं। मुझे याद नहीं है कि अपने सपने में फिर मैं उस चांद से अपनी पृथ्वी तक वापस कैसे आया! हो सकता है कि भय से मेरी आंख खुल गई हो और मैंने अपने आप को अपने बिस्तर पर पाया हो! 🙂
मैं चांद से नीचे भले ही न गिरा हूं, अपने बचपन में कभी-कभी यह प्रश्न तो मेरे मन में आता ही था कि पृथ्वी चांद को नीचे खींचती है तो क्या कभी यह चांद नीचे पृथ्वी पर गिर सकता है? और यदि ऐसा हो गया तब तो दोनों ही संसार नष्ट हो जाएंगे!
बचपन में एक बार मैंने अपनी मां से यह प्रश्न पूछा था कि ये तमाम तारे एक-दूसरे को खींचते हैं तो ये आपस में एक स्थान पर एकत्र क्यों नहीं हो जाते हैं! यह एक उचित प्रश्न था। मेरी मां ने मुझे बताया कि ये तमाम तारे एक-दूसरे को खींचते रहते हैं इसलिए ये संतुलन में रहते हैं। लेकिन, अब मैं जानता हूं कि, यह एक सही उत्तर नहीं था। कुछ चीजों द्वारा एक-दूसरे को खींचे जाने पर वह एक कॉमन सेंटर ऑफ फोर्स में एकत्र हो जाएंगी। तारों के केस में यह फोर्स गुरुत्वाकर्षण होता है। एक-दूसरे के द्वारा खींचे जाने पर उन तारों द्वारा बीच में एकत्र न होने के लिए अनन्त तारों की आवश्यकता होगी। अथवा उन्हें गिरने से रोकने के लिए किसी अन्य बल की आवश्यकता होगी जो गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित कर ले। अब मैं जानता हूं कि चांद को पृथ्वी पर गिरने से रोकने के लिए, पृथ्वी और अन्य ग्रहों को सूर्य में गिरने से रोकने के लिए और सभी तारों को केन्द्र में इकट्ठा होने से बचाने के लिए उनकी गति उत्तरदायी होती है। उस गति से प्राप्त अपकेन्द्रीय बल एवं अन्य कारक इसके लिए उत्तरदायी होते हैं। प्रारम्भिक रूप से वह गति कहां से आयी होती है, यह जानना भी अत्यन्त महत्वपूर्ण और रोचक होता है।
मैं तो बालक ही था जब ये प्रश्न मेरे मन में आते थे। लेकिन ये प्रश्न बहुत लंबे समय से मानव-जाति के मन में आते रहे हैं और वह उनके उत्तर ढूंढ़ने का प्रयत्न करती रही है। अपने कॉसमॉस के विषय में मनुष्य की धारणाओं का विकास पढ़ना एक बहुत रोचक अध्ययन है। यह जानना रोचक है कि कैसे पहले सूर्य को एक गर्म पत्थर माना जाता था, फिर कहा गया कि नहीं, वह उससे कुछ बड़ा है, फिर कहा गया कि वह और बड़ा है और वह मास्को शहर के लाल चौक (Red Square) के बराबर है। अब हम जानते हैं कि सूर्य इतना बड़ा है कि उसमें 13 लाख पृथ्वियां समा सकती हैं। अब हम जानते हैं कि 'नीचे' और 'ऊपर' केवल सापेक्ष शब्द हैं। यह कोई विशेष दिशाएं नहीं होती हैं - यह गुरुत्वाकर्षण के केन्द्र और उसके सापेक्ष हमारी स्थिति पर निर्भर करती हैं। अब हम जानते हैं कि चांद की सतह पर खड़े होकर हम 'नीचे' पृथ्वी की ओर नहीं गिर सकते हैं। उसका अपना गुरुत्वाकर्षण बल है जो हमें उसकी सतह से जोड़ कर रखेगा। वहां पर खड़े होकर हमारे लिए 'नीचे' उसके केन्द्र की ओर होगा। अब हम जानते हैं कि चांद पृथ्वी के चारों ओर क्यों घूमता है और क्या वह कभी पृथ्वी पर गिर सकता है! हम जानते हैं कि वस्तुतः चांद पृथ्वी पर इन अर्थों में निरन्तर गिर रहा है कि वह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। वह पृथ्वी की ओर गिर रहा है लेकिन पृथ्वी के गोल होने और अपनी क्षैतिज (Tangential) गति के कारण पृथ्वी से टकरा नहीं रहा है। अब हम जानते हैं कि वस्तुतः चांद पृथ्वी से दूर ही जा रहा है। पृथ्वी से उसकी औसत दूरी निरन्तर बढ़ रही है। आइए, हम चांद के विषय में कुछ तथ्यों को देखें।
मैं इस बात के विस्तार में नहीं जाऊंगा, लेकिन यह एक तथ्य है कि चांद और पृथ्वी के एक-दूसरे पर गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव के कारण इन दोनों पिण्डों में ही ज्वार-भाटीय तरंगें (Tidal waves) उत्पन्न होती हैं। इन तरंगों के कारण इन पिण्डों के घूमने में प्रतिरोध पैदा होता है और इनकी अपने अक्ष पर घूर्णन (Rotation) की गति कम होती जाती है। अंततः विभिन्न समयों में ये दोनों पिण्ड एक-दूसरे के साथ 'Gravitationally या Tidally - locked' हो जाते हैं। इस समय चांद पृथ्वी के साथ ग्रैवीटेशनली या टाइडली लॉक्ड स्थिति में है। यही कारण है कि चांद का अपने अक्ष पर और पृथ्वी के चारों ओर घूमने का समय बिल्कुल बराबर - 27.322 दिन - है। यही कारण है कि हम चांद का केवल एक पक्ष देख पाते हैं। हां, चांद के पृथ्वी के चारों ओर घूमने (Revolution) के परवलयाकार (Elliptical) होने के कारण चांद की सतह में पृथ्वी की सतह के सापेक्ष एक दोलन (Oscillation) होता है जिसके कारण हम उसकी सतह का 50 प्रतिशत से कुछ अधिक भाग देख पाते हैं। इस दोलन को वैज्ञानिक भाषा में हम 'Liberation' कहते हैं।
पृथ्वी के घूर्णन में भी इस प्रतिरोध के कारण कमी आती है। पृथ्वी की घूर्णन ऊर्जा में प्रति मिनट 20 से 40 अरब किलो कैलोरी ऊर्जा की कमी आती है। लेकिन यह बहुत अधिक ऊर्जा भी पृथ्वी की घूर्णन ऊर्जा के महान भंडार के आगे बहुत कम है, इसलिए पृथ्वी के घूर्णन में प्रति 62,500 साल में केवल एक सैकेंड की कमी आती है। इसका अर्थ है कि आने वाली हर शताब्दी में पृथ्वी का दिन 0.0016 सैकेंड बड़ा हो जाता है या प्रतिदिन यह 0.000000044 सैकेंड बड़ा होता रहता है। अब से 4.6 अरब साल पहले - जब पृथ्वी बनी थी - पृथ्वी का दिन 24 घंटे का नहीं बल्कि केवल 3.6 घंटे का था। अब से 40 करोड़ साल पहले के कोरल के जीवाश्मों में प्राप्त लाइनों में हम पृथ्वी की गति क्रमशः धीमी होने की इस बात को देख सकते हैं। यदि पृथ्वी विद्यमान रही तो अब से बहुत समय बाद यह भी चांद के साथ ग्रेविटेशनल लॉकिंग की स्थिति में पहुंच जाएगी और तब चांद से भी इसके केवल एक पक्ष को ही देखा जा सकेगा।
इन Tidal forces के कारण ही चांद धीरे-धीरे पृथ्वी के Equatorial plane में आता जा रहा है। ये बातें ऊर्जा के संरक्षण के नियम से नियंत्रित होती हैं।
पृथ्वी और चांद एक कॉमन सेंटर ऑफ ग्रेविटी के चारों ओर घूमते हैं। क्योंकि पृथ्वी चांद से 81 गुना भारी है इसलिए यह कॉमन सेंटर ऑफ ग्रेविटी पृथ्वी के बहुत पास पड़ता है। वस्तुतः यह पृथ्वी की सतह के नीचे पड़ता है। यह पृथ्वी के केन्द्र से 4728 किलोमीटर दूर पड़ता है जबकि पृथ्वी की त्रिज्या 6378 किलोमीटर है। यह कॉमन सेंटर ऑफ ग्रेविटी पृथ्वी की सतह के नीचे 1377 किलोमीटर से लेकर 1995 किलोमीटर के बीच बदलता रहता है।
जब पृथ्वी और चांद एक-दूसरे के चारों ओर इस प्रकार घूमते हैं तो उनके अंदर एक घूर्णीय कोणीय जड़त्व आघूर्ण (Revolutionary Angular Momentum) होता है। यह उन दोनों के बीच की दूरी और उनकी मात्रा पर निर्भर करता है।
ऊर्जा के संरक्षण के नियम के अनुसार पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने के जड़त्व आघूर्ण में जो कमी आती है वह उसके और चांद के बीच घूर्णीय कोणीय जड़त्व आघूर्ण के बढ़ाने से पूरी की जा सकती है। अब क्योंकि पृथ्वी और चांद की मात्रा तो निश्चित ही है इसलिए यह आघूर्ण उनके बीच की दूरी बढ़ा कर ही पूरा किया जा सकता है।
यह कहने का अर्थ है कि पृथ्वी और चांद की बीच की दूरी निरंतर बढ़ रही है। यह लगभग 3 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है या हम कह सकते हैं कि यह लगभग ढाई मिलीमीटर चांद के पृथ्वी के चारों ओर प्रति चक्कर बढ़ रही है। हम कह सकते हैं कि जैसा कि मैं अपने बचपन में डरता था, उसके विपरीत, चांद पृथ्वी पर गिर नहीं रहा है बल्कि यह हमसे दूर ही जा रहा है। हां, यदि ये दोनों खगोलीय पिंड विद्यमान रहे तो अब से बहुत समय बाद ये एक-दूसरे के पास आना शुरू करेंगे। इसके अपने कारण हैं। ये एक-दूसरे के कितने पास हो जाएंगे और ऐसा कब होगा और उसके एक-दूसरे पर क्या प्रभाव पड़ेंगे, इनको समझा जा सकता है।
हमारे सबसे पास के इस खगोलीय पिंड के बारे में अनेक रोचक तथ्य हैं। हम जानते हैं कि चांद पृथ्वी के चारों ओर एक इलिप्टिकल ऑर्बिट में घूमता है जिसमें यह कभी पृथ्वी के पास होता है और कभी दूर। इसकी पृथ्वी के सबसे पास की दूरी लगभग 3,60,000 किलोमीटर और सबसे अधिक दूरी लगभग 4,05,000 किलोमीटर होती है। अपनी कक्षा में पृथ्वी से अपनी दूरी के अनुसार इसकी गति तेज और धीमी होती रहती है। इस विषय पर मेरे मित्र डॉक्टर चंद्रमौली झा जी ने मुझसे कुछ प्रश्न पूछे थे, जिनके उत्तर लिखने के लिए मैं बैठ नहीं पाया। मुझे बहुत प्रसन्नता होती यदि मैं उस विषय पर एक लेख लिख कर उनको भेज पाता। चांद पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर 27.322 दिन में लगा लेता है किंतु पृथ्वी की सतह के किसी स्थान पर देखी जा रही इसकी एक कला से उसी कला तक पुनः आने में 29.5 दिन का समय लगता है। जैसे किसी स्थान पर एक पूर्णमासी से अगली पूर्णमासी 29.5 दिन में होगी। ऐसा इसलिए होता है कि पृथ्वी भी अपने अक्ष पर घूमती रहती है, उसका एक स्थान चांद के सापेक्ष आगे बढ़ जाता है और पृथ्वी के एक स्थान के सामने पुनः आने के लिए चांद को 27.322 दिन से अधिक समय लग जाता है।
चांद और पृथ्वी के बीच के इस संबंध को मैंने बहुत संक्षेप में बताया है। वास्तव में यह संबंध बहुत व्यापक है, इसमें अनेक रोचक तथ्य हैं, इसकी अपनी गणितीय व्याख्याएं हैं और इसको काफी अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। जब चांद का निर्माण अब से लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व हुआ था, तब यह पृथ्वी के बहुत पास रहा होगा और इसके अनेक निहितार्थ हैं, अनेक प्रभाव हैं। पृथ्वी के पास होने पर इसका ज्वार-भाटीय प्रभाव भी बहुत अधिक रहा होगा। उसका प्रभाव पृथ्वी की भू-पर्पटी में रेडियोएक्टिव पदार्थों के इकट्ठे होने पर भी होता है। यह रेडियोधर्मी पदार्थ जीवित प्राणियों के जीन्स में म्यूटेशन्स पैदा करते हैं जो नयी जातियों के निर्माण में सहायक होते हैं। यह एक कारण हो सकता है कि पृथ्वी पर इतनी अधिक विभिन्न जीव-जातियां दिखाई पड़ती हैं।
चांद और पृथ्वी का यह संबंध बहुत रोचक है। हमारे बच्चों का वह चंदा मामा, वह सूत कातती बुढ़िया और खरगोशों वाला चांद, वह परियों का निवास-स्थान कहलाने वाला चांद, वह अपने लिए जाड़े की रात के लिए अपनी मां से एक कुर्ता सिलवा देने का अनुरोध करने वाली कविताओं का चांद, वह कवियों की कल्पनाओं और प्रेमियों की उपमाओं का चांद, वह 'चांद सा रोशन चेहरा' जैसे वाक्यांशों को जन्म देने वाला चांद, वह लोक-कथाओं में स्थान रखने वाला चांद, वह बच्चों की लोरियों में स्थान रखने वाला चांद - "चंदा मामा दूर के, पुए पकाएं पूर के, आप खाएं थाली में, मुन्ने को दें प्याली में", वह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके पृथ्वी पर चांदनी फैलाता हुआ चांद, अंतरिक्ष में हमारा सबसे पास का वह पड़ोसी और वस्तुतः हमारी पृथ्वी से ही जन्म लेने वाला पृथ्वी का पुत्र - जो हमारा मामा नहीं वरन् हमारा भाई कहा जा सकता है, ऊबड़-खाबड़ और गड्ढों से भरी चट्टानों से बना हुआ वह चांद - जिस पर मनुष्य अपना झंडा गाड़ चुका है और चल चुका है - हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगले कुछ वर्षों में वहां पर मानव की कॉलोनियां बस जाने का अनुमान भी है। उस चंदा मामा को देख कर अब मुझे ऐसा लगता है कि चंदा मामा अब दूर के नहीं हैं - अब वह 'टूर' के हैं - हम उन्हें हाथ बढ़ा कर छू सकते हैं, हम वहां 'टूर' पर जा सकते हैं। कोई आश्चर्य नहीं है कि चांद को देखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय निशा का आयोजन किया जाता है।
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