घृणा और जातीय पृथकता का ऐसा निम्न विवेचन सुनकर मुझे बड़ा क्षोभ हुआ।
जबकि वाल्मीकि रामायण के इस संदर्भ के श्लोक कुछ अलग ही अर्थ देते हैं।
"उत्तरेण तव क्षेत्रं द्रुमकुल्यं नाम विश्रुतम्।
तत्र त्वं बाणमेकं तु प्रहरेति मम संनिधौ॥"
"उग्रदर्शनकर्माणो बहवस्तत्र दस्यवः।
आभीरप्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम॥"
उत्तर क्षेत्र में द्रुमकुल्य नाम का एक विश्रुत राज्य है। (विश्रुत का अर्थ प्रसिद्ध होता है, पवित्र कहीं से नहीं होता) आप इस बाण का वहाँ प्रहार कीजिये। वहाँ बहुत सारे दस्यु हैं, कर्म से उग्रदर्शी अर्थात अपराधी हैं और ये पापी आभीर मेरा जल पीते हैं। आभीर का एक अर्थ होता है जिसे भय न हो, अर्थात वे निर्भय हैं, उन्हे किसी का डर नहीं है। आभीर का अर्थ अहीर से भी लिया जाता है, यह सत्य है।
लेकिन यदि वे अहीर ही हैं तो भी दस्यु और अपराधी तो हैं ही। क्या अपराधियों का वध करना अनुचित है?
कौन ऐसा स्वाभिमानी यादव होगा जो स्वयं को ऐसे लोगों का वंशज मानेगा जो अपराधी और डाकू हों?
हमें यदि कोई रावण से जोड़े तो हम उसके मुँह पर थूक दें।
किंतु जो हवा चलाई जा रही है, उसमे किसकी बुद्धि किस दिशा में बह जाय, कहा नहीं जा सकता। भगवान कृष्ण से स्वयं को संपृक्त करने वाले एक योद्धा समुदाय को जिस तरह से सनातन से काटा जा रहा है, यह बहुत दुखद है। आप लालू के पीछे चलिए, अखिलेश के पीछे चलिए लेकिन अपने धर्म का नाश तो मत कीजिये भाई। महान इतिहास वाले एक वर्ग में दलित और पतित भाव भरने वाले राजनेता कभी भी उनके हितैषी नहीं हो सकते।
पता नहीं लोग कब जागेंगे?
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