Tuesday, 14 October 2025

होम्योपैथी आयुर्वेद

*साइटिका का उपचार होम्योपैथी के द्वारा*


 होम्योपैथिक दवा जो साइटिका के मरीजों को दिया गया और एक साथ चार मरीजों को दिया गया और 72 घंटे के अंदर उसके ऐसे परीक्षित परिणाम मिले हैं जो अकल्पनीय है

मेरे पिताजी जिनकी उम्र 74 वर्ष 

मेरे एक मित्र जिनकी उम्र 50 वर्ष 

मेरे एक परिचित की पत्नी जिनकी उम्र 34 वर्ष 

इंदौर की एक मरीज जिनकी उम्र 46 वर्ष 

भाई जी चारों को साइटिका की समस्या थी और सभी काआयुर्वेदिक दवाएं होम्योपैथी की दवाई एवं एलोपैथ की दवाएं सभी की चल रही थी लेकिन साइटिका में दर्द में किसी को 20% किसी को 40% किसी को 30% आराम था 

फिर मैं होम्योपैथिक के दबा के बारे में पूछा तो उन्होंने 

ब्रायोनिया 200

अर्निका 200 

कोलोसिंथ 200

तीनों दावों को बराबर मात्रा में लेकर आपस में मिलाकर दो-दो बूंद प् प्रत्येक दो-दो घंटे पर जब पर लेने के लिए बताया

भाई जी आप लोग यकीन नहीं करेंगे आश्चर्यचकित होंगे 

तीन मरीजों को 72 घंटे के अंदर बिल्कुल दर्द नहीं हुआ 

एक मरीज को 72 घंटे में 80% का लाभ मिला 

शत शत प्रणाम है होम्योपैथिक आयुर्वेदिक रसोई चिकित्सा एक्यूप्रेशर जैसी विद्या का। तो अगर आपको भी यह समस्या है तो एक बार आप भी प्रयोग करेंगे।



*पेशाब का अचानक रुक जाने का कारण...*

जब किसी कारण से मूत्राशय में रुकावट होती है तो पेशाब आना बंद हो जाता है। ऐसे में रोगी को पेशाब करने का तो एहसास होता है परंतु पेशाब नहीं हो पता है। इस रोग को आयुर्वेद में मूत्रकृच्छ, मूत्ररोध या पेशाब का न आना कहते हैं।

इन दोनों रोगों में पेशाब आना बंद हो जाता है। तथा रोगी को अधिक कष्ट होता है। दोनों रोगों में फर्क सिर्फ का इतना है कि मूत्रनाश में मूत्राशय में पेशाब नहीं बनता। इसीलिए रोगी को पेशाब नहीं लगता जबकि मूत्ररोध में पेशाब बनने के बाद पेशाब तो लगता है परंतु पेशाब नहीं आता। 

पेशाब न होने के कारण...

खून के थक्के जमने के वजह से भी कई बार बूंद बूंद करके पेशाब आता है। 

पुरुषों में उम्र बढ़ाने के कारण कई बार प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाती है। जो यूरिन ना आने का कारण भी बन सकते हैं।

यूरिन इन्फेक्शन से भी कई बार पेशाब का आना बंद हो जाता है। 

पेशाब के रास्ते में पथरी फंसने से भी रुकावट उत्पन्न करती है। 

पाचन तंत्र में हुई बीमारियों के कारण भी पेशाब का आना बंद हो जाता है। 

पित्त वृद्धि के कारण होने वाले मूत्रकृच्छ, मूत्रदाह में..

*प्रवाल पिष्टी २ रत्ती*

*श्वेत parpati २ रत्ती,*

*मूत्रकृच्छांतक रस 1 रत्ति*,

यह एक मात्रा सुबह - शाम 

शरबत अनार या शहद के साथ दें।

*गोक्षुरादि गु. १ - १ गोली सुबह - शाम जल से दे।*

अगर मूत्राशय में पथरी है तो वृक हर क्वाथ के साथ देवें।

50 ml सुबह और 50 ml शाम को।

भोजन के बाद.. *चंदनासव तीन चम्मच बराबर जल

 के साथ।*दिन में दो बार देवें ।


पिपली कल्प


 छोटी पिपली 5 दाने आधा किलो दूध में डालकर इतना पकाएँ कि पिपली नर्म हो जाएँ। फिर पिपली को निकालकर खा लें और दूध में मिश्री मिलाकर पी लें। अगले दिन 3 पिपली बढ़ा दें और 8 दिन तक निरन्तर 3-3 पीपली बढ़ाते रहें,9वे दिन से 3-3 पिपली घटाते जाएँ, यहाँ तक कि 5 पीपली पर आ जाएँ ।


यह आयुर्वेद की एक अद्भुत और अनोखा योग है। इसके सेवन से पुराने-से-पुराना बुखार, खाँसी, श्वास, दमा, क्षय टी.बी., हिचकी, विषम ज्वर, आवाज़ बिगड़ना, बवासीर, पेट का वायुगोला, जुकाम आदि दूर हो जाते हैं। भूख खूब बढ़ती है। वर्धमान पपिपली का प्रयोग मोटा करता है, आवाज़ को सुरीली बनाता है, तिल्ली और दूसरे रोगों को दूर करता है, आयु और बुद्धि को बढ़ाता है। पाण्डु पीलिया रोग के लिए रामबाण दवा है।

औषध सेवन काल में दूध और भात के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं खानी चाहिए।


वृद्ध, कोमल प्रकृतिवाले यदि इतनी पीपली न खा सकें तो उन्हें केवल दूध ही पीना चाहिए , लेकिन पिपली इसी संख्या से बढ़ाते जाएँ।




No comments:

Post a Comment