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1. लेखनी ( कलम),
2. दवात ( स्याही, मसी पात्र ),
3. पोथी ( बही, पुस्तक, पत्रिका आदि)
वैसे तो दीपोत्सव पर ही बही पूजन होता है। आगे कुंकुम से स्वस्तिक, दो दो आंगल, पांच - पांच दिशा बिंदी जैसे लक्ष्म अंकित किए जाते हैं। पुरानी और नवीन दोनों तरह की बही, नोन्ध, खाता या चोपड़ी हो, ऐसा करने की परम्परा है। उस पर वस्त्र, तांबूल पत्र निवेदित किया जाता है। कलम में स्याही पूरी जाती है और तिलक सहित मौली बंधन किया जाता है। लेकिन, लेखन कार्य यम द्वितीया से शुरू किया जाता है। इस दिन फिर से धूप और दीपदान के साथ कलम और दवात पूजन होता है और स्वस्ति स्वरूप में देवी देवताओं के आशी सूचक राशिदायक, जयकारक वचन और शुभ संख्यक श्री श्री श्री श्री श्री आदि लिखे जाते हैं। ( लेखन पद्धति : भारतीय ज्ञान परंपरा : श्रीकृष्ण जुगनू)
यह सरस्वती विधि या सारस्वत विधान माना जाता है और कामना की जाती है कि किसी भी तरह के लेन - देन से पहले अक्षर स्वरूप बही का लेखन सदैव स्मरण रहे : पहले लिख, पीछे दे ; भूल पड़े कागज से ले। लेखनी देवी और अक्षर ब्रह्म का ध्यान किया जाता है। यह समय को जीतने का भी उपाय है। काल के देवता यमराज भी स्मरण के लिए लेखनी रखते हैं। उनके हाथ में लेखनी और पुस्तक होते हैं। यह बहुत सुविचारित सत्य है। ( यहां एक चित्र श्री हर्षद कुमार कड़ियां के संग्रह से दिया जा रहा है) उनके दरबार के लेखन विशारद श्री चित्रगुप्त की तो कथा प्रचलित है ही। कायस्थ समाज में यह भगवान् चित्रगुप्त की पूजा का पर्व है।
अधिक समय नहीं हुआ, जब दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के रूप में यह सारस्वत पूजन ही किया जाता है और शुभ कामनाओं के रूप में ऐसी का सूचना पत्र मित्र और परिचित तथा व्यवहारियों को भेजा जाता। आदि पोथी वाचकों के समुदाय में इस दिन पोथी को पाट पर रखकर पूजा करने और नवीन ओली देने की रीति देखने में आई है।
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