Monday, 2 February 2026
शबर शब्द शबरी
शबर शब्द जाति सूचक नहीं है। शिव के द्वारा उपदिष्ट तान्त्रिक मन्त्रों को शाबर मन्त्र कहते हैं। दक्षिण ओड़िशा तथा उसके निकट के छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश के क्षेत्रों को शबर क्षेत्र कहते हैं। मीमांसा दर्शन का शाबर भाष्य प्रसिद्ध है जो उस क्षेत्र के एक विद्वान् द्वारा प्रणीत था। यह वराह अवतार तथा वैखानस दर्शन से सम्बन्धित क्षेत्र है।
जाति और ब्राह्मण
ब्राह्मणों को जातिवाद के लपेटे में जबरन लिया जाता है। यदि जाति ब्राह्मण को पसंद होती तो स्वयं ब्राह्मणों के भीतर ही वैसी ही जातियाँ नहीं होतीं जैसी आरक्षितों में मिलती हैं?
ब्राह्मण जाति से नहीं गोत्र से चला। जाति और गोत्र में फर्क है। जाति सामाजिक ( social) है, गोत्र पैतृक( patrilineal)। भारद्वाज, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, वशिष्ठ , गौतम, जमदग्नि सबके गोत्र हैं। गोत्र व्यवस्था सगोत्र विवाह का निषेध करती थी। जाति व्यवस्था अपनी जाति में विवाह को प्रोत्साहित करती है।
ब्राह्मणों की श्रेणियाँ अवश्य हैं। पर वे स्थानिकता के आधार पर हैं। कोंकणस्थ हैं, देशस्थ हैं, कान्यकुब्ज हैं, सरयूपारीण हैं, गौड़ हैं, कश्मीरी हैं, सारस्वत हैं, मैथिल हैं, उत्कल हैं, द्रविड़ हैं। जाति जैसी चीज उनके यहाँ नहीं है। ये सब एक ही वर्ण — ब्राह्मण — के अलग-अलग भौगोलिक समूह हैं। पर इनमें से कोई भी एक दूसरे की जाति नहीं है। मतलब, कोंकणस्थ और कान्यकुब्ज के बीच वह दीवार नहीं है जो दो अलग जातियों के बीच होती है। ये स्थानिक भेद हैं, जैसे कि एक देश में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होते हैं।और सबसे ज़रूरी बात — इनमें से कोई भी दूसरे को "नीचा" नहीं मानता। जाति व्यवस्था में ऊँचा-नीचा होता है। पर ब्राह्मणों के इन स्थानिक समूहों में वह पदानुक्रम (hierarchy) नहीं है जो जाति व्यवस्था बनाती है। वहाँ फर्क था भी तो वेद पाठ के आधार पर था। द्विवेदी थे, त्रिवेदी थे, चतुर्वेदी थे। दो तीन चार - जितने वेद पढ़े हों। फर्क का आधार ज्ञान था।
यह समझिये कि तब ‘ब्राह्मणों’ की बात करनी कुछ लोगों की मजबूरी क्यों हो जाती है।इसलिए कि ब्राह्मण एक जाति है ही नहीं, वह वर्ण है।
यानी ब्राह्मण इस बात के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कि practice before you preach.
तब आरक्षित और अनुसूचित जातियां भी वैसी ही जातिमुक्तता क़ायम करें जैसी ब्राह्मण वर्ण ने करके दिखाई। खुद जाति के मोह में रहें, टोह में रहें और दूसरों पर दोषारोपण करते रहें- यह हमारा पाखंड है। पहले हम स्वयं खंड खंड में बँटे न रहें, फिर आगे बढ़ें।
कम ऑन, फ्रेंड्स लेट्’स डू इट। चैरिटी बिगिन्स एट होम।
Friday, 30 January 2026
ज्ञान के प्रति एक द्वेष रहता ही रहता है
ज्ञान के प्रति एक द्वेष रहता ही रहता है। लोग दूसरे के धन प्राचुर्य को सह लेते हैं पर ज्ञान प्राखर्य नहीं सहा जाता। किसी भी सभ्यता को नष्ट करना हो तो सबसे पहले उसके ज्ञान-ग्रिड पर आक्रमण करना होता है।
राक्षस क्यों ब्राह्मणों और यज्ञों पर आक्रमण करते थे? द्विजभोजन मख होम सराधा/ सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा। यज्ञ होम हवन में ही बाधा नहीं, श्रद्धा में भी बाधा। देखत जग्य निसाचर धावहिं/ करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं। यह अत्याचार जो ब्राह्मणों पर हुए, उनके विवरणों से हमारी पुस्तकें भरी हुई हैं। जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं/ नगर गाऊँ पुर आगि लगावहिं।
इसलिए ब्रह्महत्या के विरुद्ध इतने कड़े नियम बनाने पड़े थे। तपस्वियों, ऋषियों मुनियों की हिंसा राक्षसों का प्रिय शगल बन गया था। अरण्यकांड में राम को ज्ञात होता हैः "इस वन में रहने वाला वानप्रस्थ महात्माओं का यह महान समुदाय जिसमें ब्राह्मणों की ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है इस मुनि समुदाय का बहुत अधिक मात्रा में संहार हो रहा है। (श्लोक 15, सर्ग 6, अरण्यकांड)।' आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसों द्वारा बार- बार अनेक प्रकार से मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियों के शरीर शव-कंकाल दिखायी देते हैं। “(अगला श्लोक)" पंपा सरोवर और उसके निकट बहने वाली तुंगभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मंदाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट पर्वत के किनारे अपना निवास स्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियों का राक्षसों द्वारा महान संहार किया जा रहा है। " (अगला)" इन भयानक कर्म करने वाले राक्षसों ने इस वन में तपस्वी मुनियों का जो ऐसा भयंकर विनाशकांड मचा रखा है, वह हम लोगों से सहा नहीं जाता है। “(अगला)
तो जिन लोगों ने लगातार अत्याचार सहे, उन लोगों की गलती यह रही कि उन्होंने अपने विक्टिमहुड का नैरेटिव तैयार नहीं किया। बार बार उनका ईश्वर उनकी रक्षा के लिए अवतार लेता रहा पर बार बार उसका आना ही इस कारण होता रहा कि वे ही बार बार अतिचार के शिकार होते रहे। सिर्फ पौराणिक इतिहास ही नहीं बाद का इतिहास भी ब्राह्मणों के उत्पीड़न का साक्षी रहा।
जो विप्र परंपरा यह कहती थी कि 'यो हि यस्यान्न मश्नाति स तस्याश्नाति किल्विषम्" कि जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भी खाता है'; उस परंपरा को दूसरे के मुंह का निवाला छीन लेने का आरोपी बनाया गया।
जिस परंपरा में विप्र को अकिंचन होना सिखाया गया हो- 'अनन्तसुखमाप्नोति तद् विद्वान यस्त्वाकिंचनः' कि जो अकिंचन है, वह विद्वान अनन्त सुख पाता है- उस परंपरा को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया गया कि जो पददलित हैं, जो पीड़ित है, उनकी दुर्दशा का दायित्व इन्हीं लालची पेटू ब्राह्मणों का है।
ऐसे में भारत में एक दल का खुलेआम ( खुलेआम इसलिए कि यह उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है) यह दावाः-कि Brahmanism is an ideology of graded inequality and oppression. Its origins lie in the Vedic period, thousands of years ago. A class that has emerged and established its rule, "ब्राह्मणवाद श्रेणीकृत असमानता और दमन की विचारधारा है। इसकी उत्पत्ति वैदिक काल में हजारों साल पहले हुई। एक वर्ग उभरा और उसने अपनी सत्ता स्थापित की" :-हास्यास्पद और अनपढ़ लगता है।
ध्यान दीजिए कि स्वयं अंबेडकर भी बहुत परिश्रम के बावजूद वेदों में जाति व्यवस्था नहीं ढूँढ पाये थे पर इस दल को वैदिक काल को बदनाम करने में कोई संकोच नहीं है।
देखें कि इस एक बिन्दु पर साम्राज्यवादी और मार्क्सवादी, दलित चिंतक, मिशनरी और अल्पसंख्यकवादी सब एक हो जाते है।
गेल ओम्वेद मिल्ली गजट में 'हावी' ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मुस्लिम दलित एकता की वकालत इस आधार पर करते हैं कि बौद्ध धर्म की पराजय के बाद इस्लाम ने ही भारत में शताब्दियों तक समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (ब्रदरहुड) के मूल्यों को जिंदा रखा।
सैय्यद शहाबुद्ददीन भी मिल्ली गजट में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावनाओं की चर्चा करते हैं और इस बात पर दुःख जताते हैं कि 'शूद्र ब्राह्मनिकल व्यवस्था में ही एकोमोडेशन चाहते हैं।
समानता के मूल्य इन भले मानुसों के लिए उस वेद में नहीं है जो यह कहता हैः "असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उदवतः /ऊंचनीच की असमानता नहीं है। समता बहुत है।), प्रवतः समंबेहु.” (हमारी मातृभूमि में रहने वालों में उन्हें शंकराचार्य के उस उद्घोष में 'मूल्य' नहीं दिखता कि It has been established that every one has the right to the knowledge and that the supreme goal is achieved by that knowledge alone. कि "यह स्थापित सत्य है कि प्रत्येक को ज्ञान का अधिकार है और महत्तम लक्ष्य ज्ञान मात्र से ही प्राप्त किया जाता है।" (भाष्य, तैत्तिरीय उपनिषद् 2.2)। वह सर्वहाराओं के उन स्वनामधन्य शुभ 'चिंतको' में नहीं था जो व्यवस्था के उच्छिष्ट पर पलते हैं।
वह सच्चा ब्राह्मण था जो 'भिक्षां देहि' का जीवन किसी बाहरी निर्देश से नहीं जिया, बल्कि अपने हालात और हकीकतों के कारण जिया। जिस तरह से ये सभी 'बंधु' एक हुए हैं, उससे इतना तो स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद की बोगी से इनके जरूर कुछ हित सधते हैं। अन्यथा क्रूसेड, विच ट्रायल्स इनक्वीजीशन, जेनोसाइड, उपनिवेशवाद, एटम-बम, स्लेवरी, नव-साम्राज्यवाद, जजिया, ईजियन द्वीप में इस्लामी आक्रामकों द्वारा 27,000 ईसाइयों का नरसंहार, कांस्टिनटिनोपल से लेकर दिल्ली तक मध्यकालीन मुस्लिम आक्रामकों के सामूहिक हत्याकांड, 1840-1860 के बीच खलीफाओं के हत्याकांड , 1847 में 30,000 असीरियन क्रिश्चियनों को मार डालना, लेबनान, दैर- अल- कमार, जाजिन, हस्बैया, राशय्या, जाला दामस्कस के भयावह नरसंहार जहां पहले ईसाइयों को शस्त्र जमा करने को कहा गया और बाद में सामूहिक किलिंग में 'रस' लिया गया, 1870 के दशक के बाल्कन हत्याकांड (जहां कभी 12,000 ईसाई एक साथ मार डाले गए, तो कभी 9000), 1890 के दशक के नरसंहार (जहां कभी इंस्तंबूल में 6000 आर्मीनियन ईसाइयों को) 'बूचर' किया गया तो कभी 3 लाख असीरियन ईसाइयों का 24 अप्रैल 1915 से शुरू हत्याकांडों की श्रृंखला (जब आटोमन मुस्लिम शासकों द्वारा 15 लाख आर्मीनियनों और 2.50 लाख असीरियनों की हत्या की गई); हिरोशिमा, नागासाकी लेनिन-स्टालिन के रूस, माओ के चीन, कम्पूचिया में 'ड्राप इयर', नक्सली नरसंहार ये सब समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (brotherhood) के वाकई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें वैदिक समय से लेकर अभी तक ब्राह्मणवाद कभी जिंदा नहीं रख पाया लेकिन इन ‘बंधुओं’ ने कभी खत्म नहीं होने दिया।
इस परिप्रेक्ष्य में पुनः उस दल के कथन के अगले हिस्से को पढ़िए Its outlook of graded superiority and inferiority has infected, to a greater or lesser degree, each and every caste and religious community. कि 'इसके श्रेणीकृत श्रेष्ठता और हीनता के दृष्टिकोण ने ज्यादातर और कमतर रूप में मगर हर जाति और धार्मिक समुदाय को संक्रमित किया।' यहां "Its" का अर्थ ब्राह्मणवाद से है। लेकिन 'ईच' एवं 'एवरी' पर ध्यान दें और ध्यान दें 'रिलीजस कम्युनिटी' शब्द पर।
माने यह कि ऊपर गिनाए गए इन सारे शुभकामों के लिए भी ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार रहा होगा- यदि इनकी मानें तो। बुद्धि के ये जमींदार आगे कहते हैं: Marx has spoken about this advance as a process involving the elimination of all classes and class distinctions generally, all the relation of production on which they rest, all the social relations corresponding to them, and all the ideas that result from these social relations. This understanding was further deepend by Mao Tse Tung, especially through the Great Proletariat Cultural Revolution. In India, the task of continuing the revolution, all the way up till communism, is crucially dependent on advancing and deepening the struggle against Brahmanism and its concrete manifestations.
अर्थात, "मार्क्स ने इस प्रगति को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में बताया जो सभी वर्गों और वर्ग विशिष्टताओं को सामान्य तौर पर समाप्त करती है. सभी उत्पादन-संबंध जिन पर वे निर्भर हैं, उससे मिलते सभी सामाजिक रिश्ते, और सभी विचार जो इन सामाजिक रिश्तों का फल हैं। यह समझ आगे माओ-त्से-तुंग द्वारा गहरी की गई, खासकर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के जरिए। भारत में क्रांति को जारी रखने का काम- साम्यवाद के लक्ष्य तक- ब्राह्मणवाद और इसके ठोस स्वरूपों के विरुद्ध संघर्ष को बढ़ाने और गहरा करने पर अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से निर्भर है।"
तो यह स्पष्ट है कि ब्राह्मनिज्म रावण के समय से ही एक ऐसी सत्ता रहा है जिससे और जिसके मूर्त प्रतीकों से संघर्ष किए बिना न तो उनकी प्रगति (advancing) होती है, न 'खुदाई' (deepening)। उनकी यानी शेष सभी "समानता” और “भाईचारे” की विचारधाराओं की। उस सांस्कृतिक क्रांति की जिसमें करोड़ों लोग मारे गये, बुद्धिजीवी विशेष रूप से टारगेट किये गये - वह सांस्कृतिक क्रांति भारत में नहीं आ पा रही तो इस नामुराद ब्राह्मणवाद के कारण।
सोचिए तो कहां उनके पास स्टालिन, किम-इल-सुंग, माओत्सेतुंग, होचीमिन्ह, पोल पोट जैसे लोग हैं और ये 'ब्राह्मनिकल व्यवस्था’ जिसमें कभी वशिष्ठ, कभी विश्वामित्र, कभी शंकराचार्य, कभी कणाद, कभी कपिल, कभी जैमिनी, कभी चाणक्य हुए !
Thursday, 29 January 2026
ब्राह्मण अत्याचार
एक सज्जन टीवी चैनल पर चीख रहे थे - हमने शताब्दियों के अत्याचार सहे हैं। मैंने देखा कि कोई उन्हें चुनौती भी नहीं दे रहा था। अच्छे ज्ञानवान लोग भी इस विषय पर बात ही नहीं कर रहे थे। वे कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी नहीं दे रहे थे लेकिन अंग्रेजों के द्वारा बुने नैरेटिव के आत्मविश्वास से बोलते जा रहे थे।
मैंने सोचा यह भी ईकोसिस्टम की ही जीत है कि शताब्दियों से चले आ रहे ब्राह्मण नरसंहारों के ऐतिहासिक प्रमाण तक इन्हें याद नहीं आते। इस दुष्टता की कहीं कोई स्पर्धा है क्या? उन्हें इतिहास के प्रमाण नहीं चाहिए, उन्हें पुरातात्विक साक्ष्य नहीं चाहिए, उन्हें वर्तमान के अकाट्य और प्रत्यक्ष प्रमाणों से भी कोई मतलब नहीं। उनका कथन उनके गहरे ब्राह्मण -द्वेष की कंदरा से निकलता है। 'दलित व्हाइस' नामक एक पत्रिका तो ब्राह्मणों को यहूदियों की संतान बताते हुए उन पर fanaticism और arrogance का आरोप वैसे ही लगाती है जैसे यहूदियों पर लगाए गये थे। यदि शूद्रों ने कथित रूप से शताब्दियों अत्याचार सहे तो 1000 साल का विदेशी शासन क्या ब्राह्मणों पर कहर बन कर नहीं टूटा ? क्या किसी को ख्वाजा मसूद बिन सा' द बिन सल्मान द्वारा जालंधर के युद्ध का 'दीवान-ए-सलमान पुस्तक में किया गया वर्णन याद है: "Not one Brahmin remained unkilled or uncaptured, their heads were levelled with the ground." क्या फीरोजशाह बहमनी (1398-99) ने 2000 ब्राह्मण स्त्रियों का अपहरण नहीं किया था (तवारीख फरिश्ता)?
इतिहासकार हसन की "हिस्ट्री ऑफ काश्मीर" सिकंदर बादशाह के द्वारा ब्राह्मणों के नरसंहार का विस्तृत विवरण देती है। Brahmins were forced to convert to Islam, pay heavy jizya if they refused, or face death, exile, or suicide. Temples were systematically destroyed, Hindu practices banned, and sacred threads (zunnar) from killed Hindus were collected and burned (described as weighing several ass-loads or mounds). Many Brahmins fled, converted under duress, or died; some poisoned themselves to avoid forced conversion. Only a few Brahmin families reportedly remained in Kashmir.
क्या बाबर के गवर्नर लाहौर ने पुनियाल में दत्त ब्राह्मणों को चुन चुन कर खत्म नहीं किया था?
जिस तरह से मध्यकाल में ब्राह्मणों और भिक्खुओं को टारगेट करके तलवार के घाट उतारा गया था, वह किसी के ध्यान में है। 1456 ई. में कन्हाडे प्रबन्ध अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात आक्रमण के बारे में लिखता है : "आक्रमणकारी सेना ने गाँव-दर-गाँव जलाए, जमीन उजाड़ दी, लोगों का धन लूटा, ब्राह्मणों और बच्चों और औरतों को बंदी बनाया, उन्हें कोड़ों से पीटा और बंदियों को तुर्क सेवकों में बदल दिया।"
स्वयं विजेताओं की ओर से लिखा गया वर्णन देखिए। 1011 ई. में थानेसर पर सुल्तान महमूद का आक्रमण उसके मंत्री उत्बी के तारीख-ए-यामिनी के शब्दों में यों वर्णित हुआ: "The blood of the infidels flowed so copiously [at Thanesar] that the stream was discolored, notwithstanding its purity and people were unable to drink it. The Sultan returned with plunder which is impossible to count. Praise be to Allah for the honor he bestows on Islam and Muslims." यही उत्बी दिसंबर 1018 में मथुरा के महावन में महमूद की विजय का वर्णन यों देता है :
"The infidels deserted the fort and tried to cross the foaming river.... but many of them were slain, taken or drowned.... Nearly fifty thousand men were killed." यही उत्बी मथुरा की विजय के बारे में लिखता है: "The Sultan gave orders that all the temples should be burnt with naptha and fire, and levelled with the ground."
उत्बी कन्नौज के 10 हजार मंदिरों के विध्वंस के बारे में आनंदपूर्वक लिखता है और यह भी कि
“The Brahmins of munj which was attacked next, fought to the last man after throwing their wives and children into fire.
श्रावा के बारे में उत्बी ने कहा: "The Muslims paid no to the booty till they satisfied themselves with slaughters of the infidels and worshippers of sun and fire. The friends of Allah searched the bodies of the slain for 3 days in order to obtain booty..."
महमूद के लडके मसूद ने 1037 में जब हांसी किले पर आक्रमण किया तो तारीख-उस-सबक्तिगिन का विवरण यों है: "The Brahmins and other high ranking men were slain, and their women and children were held captive."
मुहम्मद गौरी के दौर में इब्न असीर के 'कामिल-उत्-तवारीख' में लिखा गया : "The slaughter of Hindus (at varanasi) was immense; none were spared except women and children, and the carnage of men went on until the earth was weary."
इसी वक्त सारनाथ के भिक्षुओं का भी नरसंहार हुआ था। गोरी के सिपहसालार कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1193 ई. में कोल (आधुनिक अलीगढ़) में ब्राह्मणों की वो हालत की थी कि उनके मुंडों की तीन मीनारें-तत्कालीन इतिहासकार हसन निज़ामी के शब्दों में, 'as high as heaven'- खड़ी कर दी गई थीं और उनके शव शिकारी गिद्धों का खाद्य बन गए थे। 1196 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तत्कालीन गुजरात की राजधानी पाटन में राजा करन से लड़ते हुए शहर में जो आतंक मचाया उसके बारे में यही इतिहासकार लिखता है: "fifty thousand infidels were dispatched to hell by the sword."
बल्बन और अलाउद्दीन खिलजी की तो कुख्यात हैं ही। फीरोजशाह तुगलक ने जाजनगर में अपने किए के बारे में कुछ लिखा है : "The swordsmen of Islam turned the island into abasin of blood by the massacre of the unbelievers." हिंदू औरतों के बारे में सिरात-ए- फिरूजशाह लिखता है : "Women with babies and pregnant ladies were haltered, manacled, fettered and enchained, and pressed as slaves into service in the house of every soldier."
फरिश्ता कांगड़ा में फिरोजशाह तुगलक की वीरता यों बखानता है : "ज्वालामुखी की मूर्तियों का सुल्तान ने विध्वंस किया, उसके टुकड़ों को गायों के मांस में मिलाकर ब्राह्मणों के गले में थैले की तरह बांध दिया।"
गुलबर्गा और बीदर के बहमनी सुल्तान हर साल एक लाख हिंदू आदमी-औरतों-बच्चों को मारना एक meritorious काम समझते थे। 1399 में तैमूर के अत्याचार इस तलवार-गाथा को शीर्ष पर पहुंचा देते हैं। तुज़्के-तिमूरी में लिखा है : "In a short span of time all the people in the fort were put to the sword, and in the course of one hour the heads of 10,000 infidels were cut off. The sword of Islam was washed in the blood of the infidels."
दिल्ली से पहले लोनी में तैमूर की सेना ने कुछ मुस्लिमों को भी बंदी बना लिया था। तैमूर ने आदेश दिया कि "The Musalman prisoners should be separated and saved, but the infidels should all be dispatched to hell with the proselytizing sword."
दिल्ली के आक्रमण में तलवार की इस तानाशाही को तुज़्के तिमूरी में स्वयं तैमूर ने यों लिखा : I proclaimed throughout the camp that every man who had infidel prisoners should put them to death.
पूरे मध्यकाल में जजिया ब्राह्मणों पर ही प्रथमतः और प्रमुखतः लगाया जाता था। और वसूलने का तरीका था मुँह खोलकर बैठने को विवश कर दिये गये ब्राह्मणों के मुँह में थूकना।
पुर्तगाली साम्राज्यवादियों ने गोआ में ब्राह्मणों का जो नरसंहार किया वह याद है? सेंट - ऐसे हत्यारों को सेंट कहने पर इनकी भाषा आत्महत्या क्यों नहीं कर लेती- फ़्रांसिस ज़ेवियर 1542 में गोआ पहुँचने पर क्या सिद्धान्त प्रतिपादित किये थे : without Brahmins, Hindus would convert more easily. 1560–1812 तक ब्राह्मणों का पोर्तुगाली क्षेत्रों से उन्मूलन किया गया। लगभग तीन शताब्दी तक। ब्राह्मण कोई कार्यालय नहीं जा सकते थे। उन्हें अपने बच्चों को जेसुइट्स के पास छोड़ना पड़ता था ताकि उन्हें कन्वर्ट किया जा सके। उनके मंदिर ध्वस्त कर दिये गये थे।
क्या पेरियार के वक्त ब्राह्मणों पर हिंसक आक्रमण नहीं हुए जिन्होंने उन्हें सामूहिक पलायन (मॉस माइग्रेशन) के लिए वैसे ही बाध्य कर दिया जैसे काश्मीरी पंडितों को कर दिया गया। गोआ के पुर्तगालियों ने ब्राह्मणों का ही नरसंहार किया था।
(क्रमशः)
Wednesday, 28 January 2026
इन एकलव्य का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ?
#एकलव्य_महाभारत को संदर्भित करके ऊंची नीची जाति तथा शोषण का प्रोपगंडा फैलाने वालों से अपेक्षा है कि वे मात्र कुछ सौ वर्ष पहले हमारे शिल्पकारों के अंगूठे काटे जाने के सत्य इतिहास से परिचित होंगे।
1772 के #एकलव्यों का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ?
आज एक उद्भट विद्वान की वाल पर गया, जो उच्च शिक्षा आयोग में निरन्तर कई वर्ष तक सदस्य रहे हैं।
#शम्बूक_कथा पर अपने पद के अनुरूप ही अति गर्वीली पोस्ट लिखी थी।
मैंने मात्र दो कमेंट लिखा और वे धराशायी हो गए।
सत्य एक ही होता है। असत्य के अनेकों स्वरूप और कलेवर होते हैं। एक बार आप जोर से दहाड़िये तो।
पेंट गीली होना निश्चित है।
#मिथक के एक #एकलव्य के #अंगूठा काटने को लेकर भारत मे 3000 या 5000 वर्षो के अत्याचार का #रंडी_रोना मचाए वामियों और दलित चिंतको , मात्र 250 साल पहले सिल्क के कपड़े बनाने वाले भारतीयों ने #अपने_अंगूठे_खुद काट लिए। वे कहां गए क्या हुवा उनका? 10,000 साल की कथा तुम्हे पता है और 200 साल की कथा तुम्हे नही याद है।
तुम निम्न किस्म के केंचुए हो। स्वार्थ घृणा और कुंठा से भरे हुए जोंक हो तुम।
क्योंकि तुमको देश का खून चूसने और झूंठ का ढिंढोरा पीटने में आनंद आने लगा है।
ब्रिटिश दस्युवो ने तुमको नष्ट किया बर्बाद किया और तुमको एकलव्य और शम्बूक का झुनझुना थमा दिया:
“18वी शताब्दी मे विश्व के अन्य देशों की तरह ही, भारत मे भी सड़क या नदी से होने वाले व्यापार पर ड्यूटी लगा करती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक सरकारी फरमान प्राप्त कर लिया था जिसके माध्यम से आयातित या निर्यात होने वाली वस्तुओं को टैक्स फ्री कर दिया था। अतः कंपनी द्वारा निर्यातित या आयातित किसी भी वस्तु पर टैक्स नहीं लगता था”।
(रिफ्रेन्स – रोमेश दुत्त इकनॉमिक हिसटरि ऑफ ब्रिटिश इंडिया, पेज -18)
"1757 मे मीर जफर को बंगाल का नवाब बनाया गया लेकिन मात्र 3 साल बाद 1760 मे उसके ऊपर असमर्थ बताकर मीर कासिम को नवाब बनाया , जिसने कंपनी को बर्धमान मिदनापुर और चित्तगोंग नामक तीन जिलों का रवेनुए तथा मीरजाफ़र पर द्वारा दक्षिण भारत मे हुये युद्ध मे कंपनी द्वारा खर्च किए गए, देय उधार धन 5 लाख रुपये कंपनी के खाते मे जमा करवाया"।
( रोमेश दुत्त – पेज -19 )
लेकिन उसके बाद सभ्य अंग्रेजों ने जो आम जनता के द्वारा निर्मित वस्तुओं की लूट मचाई, वो किसी भी सभ्य समाज द्वारा एक अकल्पनीय घटना है। उस दृश्य को आप बंगाल के नवाब द्वारा मई 1762 को ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे पत्र से समझा जा सकता है:
“ हर जिले, हर परगना , और हर फ़ैक्ट्री मे वे ( कंपनी के गुमाश्ते ) नमक, सुपाड़ी, घी , चावल, धान का पुवाल ( सूखा डंठल, जरा सोचिए क्या क्या खरीद कर ये दरिद्र समुद्री डकैत खरीद कर यूरोप ले जाते थे ) बांस ,मछली ,gunnies अदरक चीनी तंबाकू अफीम और अन्य ढेर सारी वस्तुयेँ,जिनको लिख पान संभव नहीं है , को खरीदते बेंचेते रहते हैं । वे रैयत और व्यापारियों की वस्तुए ज़ोर जबर्दस्ती हिंसा और दमन करके ,उनके मूल्य के एक चौथाई मूल्य पर ले लेते हैं , पाँच रुपये की वस्तु एक रुपए मे लेकर भी वे रैयत पर अहसान करते हैं।
प्रत्येक जिले के ओफिसर अपने कर्तव्यो का पालन नहीं करते और उनके दमानात्मक रवैये और मेरा टैक्स न चुकाने के कारण मुझे प्रत्येक वर्ष 25 लाख रुपयों का नुकसान हो रहा है। मैं उनके द्वारा किए गए किसी समझौते का न उल्लंघन करता हूँ न भविष्य मे करूंगा , तो फिर क्यूँ अंग्रेज़ो के उच्च अधिकारी मेरा अपमान कर रहे हैं, और मेरा निरंतर नुकसान कर रहे हैं ”।
( रोमेश दुत्त पेज – 23 )
सभ्य बनाने आए इयसाइयों के नैतिक ऊंचाई को आप इस एक उद्धरण से ही माप सकते हैं।
यही बात ढाका का कलेक्टर महोम्मद अली ने कलकत्ता के अंग्रेज़ गवर्नर 26 मई 1762 मे लिखा “पहली बात तो ये है कि व्यापारी फ़ैक्टरी मे रुचि दिखा रहे हैं और अपने नावों पर अंग्रेजों का झण्डा लगाकर अपने को अंग्रेजो का समान होने का दिखावा करते हैं , जिससे कि उनको duty न देना पड़े। दूसरी बात ढाका और लकीपुर की फ़क्टरियाँ व्यापारियों को तंबाकू सूती कपड़े , लोहा और अनेक विविध वस्तुओं को बाज़ार से ज्यादा दामों मे खरीदने का प्रलोभन देते हैं, लेकिन बाद मे जबर्दस्ती वो पैसा उनसे छीन लेते हैं; जो व्यापारियों को पैसा एडवांस मे दिया था ।
लेकिन फिर उनके ऊपर एग्रीमंट तोड़ने का बहाना बनाकर उनके ऊपर फ़ाइन लगाते हैं । तीसरी बात लकीपुर फैक्ट्री के गुमाश्ते तहसीलदार से ताल्लूकदारों से उनके ताल्लूक ( कृषि योग्य जमीन ) को निजी प्रयोग के लिए जबरन कब्जा कर लेते हैं , और उसका भाड़ा भी नहीं देते। कुछ लोगों के कहने पर ,कोई शिकायत होने पर वे यूरोपेयन लोगों को एक सरकारी आदेश का परवाना लेकर गावों मे जाकर उपद्रव करते हैं। वे टोल स्टेशन बनाते हैं और जो भी किसी गरीब के घर समान मिलता है उसको बैंचकर पैसा बनाते हैं। इन उपद्रवों के कारण पूरा देश नष्ट हो गया है और रैयत न अपने घरों मे रह सकते हैं और न ही मालगुजारी चुका सकते हैं। मिस्टर चवालीर ने कई स्तर पर झूँटे बाजार और झूंठे फक्ट्रिया बनाया हैं, और अपनी तरफ से झूंठे सिपाही बनाए हैं जो जिसको चाहे उसको पकड़कर उनसे जबरन अर्थदण्ड वसूलते हैं । उनके इस जबर्दस्ती के अत्याचारों के कारण कई हाट बाजार और परगना नष्ट हो गए हैं। ”
( रोमेश दुत्त पेज 24- 25 )
“इस तरह बंगाल के प्रत्येक महत्वपूर्ण जिले के व्यापार को कंपनी के नौकरों और अजेंटों ने नष्ट किया और इन वस्तुओं के निरमातों को निर्दयता के साथ अपना गुलाम बनाया । उसका वर्णन एक अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने आंखो देखी हाल खुद लिखा है :
“ अब इस बात को सत्यता के साथ बताया जा सकता है कि वर्तमान मे यह व्यापार जिस तरह इस देश मे हो रहा है , और जिस तरह कंपनी अपना इनवेस्टमेंट यूरोप मे कर रही है,वो एक दमनकारी प्रक्रिया है; जिसका अभिशाप इस देश का हर बुनकर और निर्माता भुगतने को मजबूर है, प्रत्येक उत्पाद को एकाधिकार मे बदला जा रहा है ; जिसमे अंग्रेज़ अपने बनियों और काले गुमाश्तों के मदद से, मनमाने तारीके से यह तय करते हैं कि कौन निर्माता किस वस्तु का कितनी मात्रा मे, और किस दर पर निर्मित करेगा ...गुमाश्ते औरंग या निर्माताओं के कस्बे मे पहुँचने के बाद वो एक दरबार लगाता है जिसको वह अपनी कचहरी कहता है।
जिसमे वो अपने चपरासी और हरकारों की मदद से वो दलाल और पयकार और बुनकरों को बुलाता है, और अपने मालिक द्वारा दिये गए धन मे से कुछ पैसा उनको एडवांस मे देता है और उनसे एक एग्रीमंट पर दस्तखत करवाता है जिसके तहत एक विशेष प्रॉडक्ट , एक विशेष मात्रा मे, एक विशेष समय के अंदर डेलीवर करना है। उस मजबूर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती है। और ये गुमाश्ते, जो कंपनी के वेतनभोगी थे , प्रायः इस तरह के एग्रीमंट उनसे अपने मन मुताबिक करवाते रहते थे; और यदि बुनकरों ने ये एडवांस रकम स्वीकार करने से इंकार किया तो उनको बांधकर शारीरिक यातना दी जाती है.... कंपनी के गुमाश्तों के रजिस्टर मे बहुत से बुनकरों के नाम दर्ज रहते थे, जो किसी दूसरे के लिए काम नहीं कर सकते थे, और वे प्रायः एक गुलाम की तरह एक गुमाश्ते से दूसरे गुमाश्ते के हाथों तब्दील किए जाते रहते हैं, जिनके ऊपर दुष्टता और अत्याचार हर नए गुमाश्ते के हाँथो बढ़ता ही जाता है ... इस विभाग मे जो अत्याचार होता है वो अकल्पनीय है ; लेकिन इसका अंत इन बेचारे बुनकरों को धोखा देने मे ही होता है; क्योंकि गुमाश्तों और जांचकारो ( कपड़े की क्वालिटी जाँचने वाला ) द्वारा जो दाम उनके प्रोडक्टस का तय किया जाता था वो कम से कम बाजार के दाम से 15 से 40 % कम होता है ...।
बंगाल के बुनकरों के साथ, कंपनी के अजेंटों द्वारा जबर्दस्ती किए गए इन अग्रीमेंट्स को पूरा न करने की स्थिति मे, उनके खिलाफ मुचलका जारी किया जाता था , उसके तहत उनके सारे सामान (कच्चा और पक्का माल ) उस एग्रीमंट की भरपाई के लिए कब्जा कर लिया जाता है और उसी स्थान पर उनको बेंच दिया जाता है ; कच्चे सिल्क को कपड़ों मे बुनने वाले लोगों के, जिनको Nagoads कहते हैं, उनके साथ भी इसी तरह का अन्याय होता है, और ऐसी घटनाए आम बात हैं जिसमे उन्होने जबर्दस्ती #सिल्क के #कपड़े #बनाने की #मजबूरी से बचने के लिए स्वयं ही अपने #अंगूठे #काट लिए ।
( and the winders of raw silk , called Nagoads, have been known of their cutting off their thumbs to prevent their being forced to wind silk )
(Ref: Consideration on India affairs (London 1772), p 191 to 194 : from Romesh Dutt ; Economic History of British India , page 25-27 )
इस सच्चाई तक तुम्हारी पहुंच नही है धूर्त और मक्कारों?
इसीलिये पुस्तक का नाम लिखा है। गूगल आर्काइव से डाउनलोड करो और पढो।
बाबा साहेब जैसे पढ़े लिखे लोग ही नहीं, तिलक और दिनकर जैसे लोग भी उस अफवाहबाजी का शिकार हुए जिसको इंडोलॉजी नामक #फेक_साइंस के नाम से उनको विश्वविद्यालय में पढ़ाया गया।
कोई लुटेरा तुमको निम्न प्रमाणित करके ही तो अपने को श्रेष्ठ प्रमाणित कर सकेगा?
उन्होंने तुम्हें उल्लू बनाया शिक्षा के माध्यम से।
और तुम उल्लू बनने को तैयार बैठे थे।
बने।
©त्रिभुवन सिंह
चंद्र शेखर रावण जैसे जाहिलों को पढ़ाओ।
Saturday, 24 January 2026
पूर्वजों (पितरों) की फोटो
हिंदू शास्त्रों और विशेष रूप से **वास्तु शास्त्र** के अनुसार, पूर्वजों (पितरों) की फोटो घर में दीवार पर लगाना **शुभ** माना जाता है, लेकिन यह **कुछ नियमों** और **सही दिशा** के साथ ही करना चाहिए। बिना नियमों के या गलत जगह पर लगाने से अशुभ प्रभाव पड़ सकता है, जैसे परिवार में कलह, आर्थिक परेशानी या पितृ दोष।
### मुख्य नियम (वास्तु शास्त्र के अनुसार):
- **शुभ दिशा** — सबसे अधिक सहमत राय यही है कि पूर्वजों की फोटो **दक्षिण** या **दक्षिण-पश्चिम** (South-West) दिशा की दीवार पर लगानी चाहिए।
कुछ स्रोत **पश्चिम** दिशा को भी ठीक बताते हैं।
इससे पितरों का आशीर्वाद बना रहता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
- **कुछ जगहों पर बिल्कुल न लगाएं** (ये अशुभ माने जाते हैं):
- उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में → इससे आर्थिक हानि, तनाव, कलह आ सकती है।
- बेडरूम, किचन, बाथरूम या बच्चों के कमरे में।
- पूजा घर/मंदिर में (भगवान की तस्वीरों के साथ कभी नहीं)।
- ऐसी जगह जहां हर कोई बार-बार देखे या मेहमानों की नजर पड़ती हो।
- **अन्य महत्वपूर्ण नियम**:
- फोटो आंखों की सीध में (न बहुत ऊंची, न बहुत नीची) लगाएं।
- एक से ज्यादा या बहुत सारी फोटो न लगाएं — आमतौर पर 1-2 ही पर्याप्त।
- जीवित लोगों की फोटो के साथ कभी न लगाएं (कुछ मान्यताओं में इससे आयु पर प्रभाव पड़ता है)।
- कुछ परंपरागत राय में फोटो को **दीवार पर लटकाने** की बजाय स्टैंड या शेल्फ पर रखना बेहतर माना जाता है, लेकिन अधिकांश आधुनिक वास्तु विशेषज्ञ दीवार पर सही दिशा में लगाने को शुभ मानते हैं।
संक्षेप में:
**हां, पूर्वजों की फोटो घर की दीवार पर लगाना शुभ है**, बशर्ते **दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा** में सही तरीके से लगाई जाए। गलत दिशा या जगह में लगाने से अशुभ हो सकता है।
Wednesday, 21 January 2026
शीघ्रपतन आयुर्वेद इलाज
शीघ्रपतन
अचूक रामबाण इलाज
मैथुन के समय वीर्य के शीघ्र स्खलित हो जाने को 'शीघ्रपतन' कहा जाता है। यह भी एक प्रकार की 'नपुंसकता' ही है।
कारण-'प्रमेह' के अनुसार।
लक्षण-वीर्य का पतलापन, सहवास के समय स्तंभन शक्ति का अभाव अथवा
शीघ्र स्खलित हो जाना।
चिकित्सा-यह भी 'प्रमेह' का ही एक रूप है। अतः इसमें प्रमेह नाशक औषधीय योग लाभ करते हैं। निम्नलिखित योग वीर्य को पुष्ट बनाने तथा स्तंभन शक्ति को बढ़ाने वाले हैं-
1. सूखी शकरकन्द को कूट-छान कर चूर्ण तैयार करें, फिर उससे घी तथा चीनी के साथ हलवा तैयार करें अथवा आग में भुनी हुई शकरकन्द को घी में भूनकर चीनी की चाशनी में डालकर हलवा तैयार करें। इस हलवे का सेवन करने से वीर्य गाढ़ा तथा पुष्ट होता है एवं स्तंभन शक्ति भी बढ़ती है।
2. कौंच के बीजों की गिरी का चूर्ण तथा खसखस के बीजों का चूर्ण-दोनों को 4-4 या 6-6 माशे (बलाबल के अनुसार) लेकर चूर्ण तैयार करें। इस चूर्ण को फाँक कर ऊपर से गाय का दूध पीने से वीर्य पुष्ट होता है तथा स्तंभन शक्ति में वृद्धि होती है। इसे 4 महीने तक सेवन करना चाहिए।
3. गोखुरू, तालमखाना, शतावर, कौंच के बीजों की गिरी, बड़ी खिरेंटी और गंगेरन-इन सब को 10-10 तोला लेकर कूट-पीस छानकर चूर्ण बना लें। नित्य रात के समय 6 माशा से 1 तोला तक चूर्ण फाँक कर ऊपर से गरम दूध पीने से बल वीर्य की अत्यधिक वृद्धि होती है तथा स्तंभन शक्ति बढ़ती है। इसे 60 दिनों तक सेवन करना चाहिए।
4. तरबूज के बीजों की मींगी 6 माशा तथा मिश्री 6 माशा-दोनों को मिलाकर दो-तीन महीने तक सेवन करने से बल-वीर्य खूब पुष्ट होते हैं तथा स्तंभन शक्ति बढ़ती है
5. इमली के साफ किए हुए अच्छे बीज 1 सेर लेकर उन्हें चार दिनों तक पानी भीगने दें। फिर पानी से निकाल कर उनके ऊपरी छिलके दूर कर दें तथा बीजों क सुखाकर कूट-पीस छान लें। फिर उसमें समभाग मिश्री मिलाकर रख लें। इच क 2 माशे की मात्रा में नित्य 40 दिनों तक सेवन करने तथा ऊपर से गाय का दूध पीने वीर्य बहुत गाढ़ा हो जाता है तथा स्तंभन शक्ति में वृद्धि होती है।
2 6. ढाक के वृक्ष की छाल, ढाक का गोंद, गूलर के वृक्ष की छाल, गूलर का गोंद सेमल का सूखा मूसला, सेमल का गोंद, मौलश्री की छाल, बबूल का गोंद तथा भुने हु चने-इन सबको 3-3 तोला लेकर कूट-पीस छाल लें। इस चूर्ण को 4 से 6 माशे तक क मात्रा में नित्य प्रातः-सायं खाकर ऊपर से गाय का दूध पीने से धातु पुष्टीत स्तंभन शक्ति में वृद्धि होती है। इसे 1 मास तक सेवन करना चाहिए
त्रिफला
आत्रेयजी कहते हैं-हरडे, आंवला, बहेडा इन्होंके फलको वैद्यजन त्रिफला कहते हैं अब इन्होंके भागका निर्णय करते हैं ॥ १ ॥
हरडै १ भाग, बहेडा २ भाग, आंवळा ३ तीन भाग इस प्रकार इन्होंको एक जगह मिलावे ॥ २ ॥ यह त्रिफला कफपित्तको नाशता है महाकुष्ठको नाशता है आयुमें हित है दीपन है नेत्रोंमें हित है व्रणको शोधन करनेवाला है ॥ ३ ॥ घिसकें लगानेसे व्रणको भरनेवाला है ज्वरको नाशता है दृष्टिको देनेवाला है खाज को हरता है वमन, गुल्म, बवासीर इन्होंको नाशता है ॥ ४ ॥ संपूर्ण रोगोंको शांत करता है और मेधा, स्मृति इन्होंको करनेवाला है
अब रोग २ में जुदी २ योगकी युक्तिको कहेंगे
॥ ५ ॥ वातमें घृत और गुडसे संयुक्त त्रिफला देना चाहिये पित्तमें शहद और खांडके संग कफमें सुंठ, मिरच, पीपल इन्होंके संग देना चाहिये प्रमेह रोगमें शहत और जळके संग देवै
॥ ६ ॥ कुष्ठ रोगमें घृतके संग मन्दाग्झिमें सेंधानमकके संग देना चाहिये और इसके काथसे नेत्रोंको धोनेसे नेत्रोंके रोगोंका नाश होता है
॥ ७ ॥ और घृतके संग सेवनेसे खाjका नाश होता है विनौराके रसकेसँग देनेसे बमनका नाश होता है
॥ ८ ॥ गुड और नमीकंदके संग देनेसे गुल्म, बवासीर इन्होंका नाश होता है दूधके संग देनेसे राजयक्ष्मारो-गका नाश होता है गुडके संग देनेसे पांडुरोगका नाश होता है ॥ ९ ॥ और भंगराके रस तया घृतके संग देनेसे वळीपलित अर्थात् बुढापेके सफेद बालआदिरोग इन्होंका नाश होता है और बुद्धि बढ़ती है ॥ १० ॥ और गुड मिला दूधका काय बना तिसके संग देनेसे विष-मञ्जरका नाश होता है और खांड तथा घृतके संग काथ बनाके देनेसे संपूर्ण जीर्णज्वरोका नाश होता है ॥ ११०॥ यह त्रिफला मनुष्योंको हित करनेवाली है और सब प्रयोगोंमेंअ० ३]
(४८९)
त्रिफला कहाता है तत्काळ सब रोगोंको शांत करनेवाला कहा है और तेज कांति सुंदर मूर्ति इन्होंको करनेवाला कड़ा है ॥ १२ ॥ और शोजा, कामला, पांडुरोग, उदररोग इन्होंमें गोमूत्रके संग त्रिफला देना हित है और अतिसार संग्रहणी इनरोगोंमें तक्रके संग त्रिफला देना हित है ॥ १३ ॥ और क्षीण इंद्रियवाला, जीर्णज्वर, राजयक्ष्मा, इन्होंमें दूध-के संग त्रिफला देना हित है और नेत्ररोग, शिरोरोग, कुष्ठ, खाजी, व्रणकी पीडा ॥ १४ ॥ सूत्रग्रह, कामला, मंदाग्नि इनरोगोंमें जळके संग त्रिफलाका कल्क बनाके देना हित है और ठंढककी समयमें गुड सूंठके संग और गरमीके समय खांड दूध इन्होंके संग देना हित है ॥ १५ ॥ और वर्षासमयमें सुंठके संग त्रिफला दीहुई हित है यह त्रिफला सबरोगोंको नाशनेवाली है ॥ १६ ॥ इति वेरीनिवासिबुध० हारीतसंहिताभाषाटीकायां पंचमें कल्पस्थाने त्रिफलाक्कायोनाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
Tuesday, 20 January 2026
मनुस्मृति
मनुस्मृति (४२)
सौ वर्ष की आयु निश्चित ही एक आदर्श रहा होगा। कभी अकालमृत्यु और दुर्घटनाएँ भी होती होंगी। युद्ध में भी लोग मारे जाते होंगे। कामना अवश्य ही यजुर्वेदीय ‘जीवेम शरद: शतं’ की रही होगी लेकिन कामना और यथार्थ के बीच फासला रहा होगा।
पर यह प्रार्थना स्त्री को छोड़कर करना आशयित नहीं रहा होगा। Generic masculine या masculine inclusive की जो अवधारणा तालमुद बाइबल आदि ग्रंथों में चलती है, वह वेदों और स्मृतियों में भी रही होगी। पर वेंडी डोनिगर रोमिला थापर यह छूट मनु को नहीं देना चाहते।
मनुस्मृति जब ब्रह्मचर्य की अवस्था की बात करती है क्या तब वह सिर्फ पुरुष के बारे में बात करती है कि स्त्री के बारे में भी?
मनु कभी वेद-विरुद्ध बात नहीं करते। इसलिए मनुस्मृति में वेद से असंगत कोई बात आये तो स्वयं वेद की ओर देखने की बात वे स्वयं कई जगह कह गये हैं। अथर्ववेद में स्पष्ट कहा गया है कि- ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्। (११.५.५) कि कन्या ब्रह्मचर्य के बाद किसी युवा को पति के रूप में प्राप्त करे।
लेकिन स्वयंवरण की छूट देते समय मनु फिर आयु में भी छूट दे देते हैं :
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्युतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देत सदृशं पतिम् ॥
जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे तब रजस्वला होने के दिन से तीन वर्ष छोड़ के चौथे वर्ष में अपने सदृश विवाह करे। यानी सत्रहवें वर्ष।
मुनि धन्वन्तरि ने भी सुश्रुत में कम आयु की कन्या और कम आयु के पुरुष के विवाह को निषेध किया है:
ऊनषोडशवर्षायाम प्राप्ताह पंचविंशतिम
यद्यदात्ते पुमान गर्भा कुच्चीस्थः स विपद्यते
अर्थात 16 से कम कन्या और 25 से कम आयु के पुरुष से जो गर्भ धारण होता है,वह विपत्ति को प्राप्त होता है यानि गर्भ में नहीं ठहरता, चिरकाल तक जीवित नहीं रहता और दुर्बलेन्द्रिय होता है।
सुश्रुत ‘पंचविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे’ के अनुसार पुरुष की विवाह आयु 25 वर्ष और स्त्री की सोलह वर्ष बताते हैं।
फिर एक ऐसा युग आया जिसमें उनके आदर्श पुरुष छह वर्ष की आयु वाली कन्या से भी शादी कर लेते थे। तब मनुस्मृति में यह वेद-विरुद्ध और स्वयं मनुस्मृति के विरुद्ध यह बात ठूँस दी गई कि:
त्रिंशद्वर्षोद्वहेत् कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् । त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥
तीस वर्ष का युवक बारह वर्ष की हृदय को प्रिय लगने नवाली कन्या से विवाह करे अथवा चौबीस वर्ष का युवक आठ वर्ष की सुन्दर कन्या से विवाह करे। इससे शीघ्र विवाह करने वाला गृहस्थ धर्म में कष्ट पाता है।
ठूँसी गई इसलिए लगती है कि जिस प्रसंग में इसे डाला गया है वहाँ कन्या के स्वयंवर की बात चल रही है और आठ वर्ष की लड़की क्या स्वयंवर करेगी?
मनु की विवाह चर्चा में बार बार ‘सदृश’ शब्द के प्रयोग पर ध्यान नहीं दिया गया है। अपने जैसे युवक से विवाह करे, अपने जैसी कन्या से विवाह करे- यह आग्रह मनु का रहा है। इसका अर्थ एक ही वेवलेंथ का होना है, एक ही वर्ण का होना नहीं जिसे स्वयं मनु ने ही कई जगह शिथिल किया है। मनु की विवाह चर्चा के इन प्रगतिशील पहलुओं को क्षेपकों ने आच्छादित कर दिया। मनुस्मृति में विवाह-संबंधी चर्चा (विशेष रूप से अध्याय 3 और 9 में) बार-बार ‘सदृश’ (sadṛśa) शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका मूल अर्थ ‘समान’, ‘सदृश’, ‘एक जैसा’ या ‘समान स्तर/गुण वाला’ है। इसे अक्सर केवल एक ही वर्ण तक सीमित करके देखा जाता है, लेकिन मनु स्वयं इसे केवल वर्ण तक नहीं बाँधते—यहाँ गुण, शील, कुल, शिक्षा, स्वभाव और एक ही वेवलेंथ (समान विचारधारा, संस्कार, जीवन-दृष्टि) का आशय अधिक प्रमुख है। मनु ने वर्ण को जन्म से अधिक गुण-कर्म पर आधारित माना है जिससे सदृश का अर्थ गुण-समानता अधिक मजबूत होता है।
मनुस्मृति 9.89-91 में स्पष्ट है कि कन्या को सदृश पति चुनने का अधिकार है, और यदि माता-पिता योग्य वर नहीं ढूँढ पाते, तो वह स्वयं चुन सकती है। यहाँ सदृश का अर्थ गुणवान, शीलवान और उपयुक्त है, न कि केवल वर्ण-आधारित। कई स्थानों पर सदृश से तात्पर्य समान कुल, समान शिक्षा, समान आचरण से है—जिससे वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बने, संतान अच्छी हो, और परिवार स्थिर रहे। यह ‘एक ही वेवलेंथ’ का विचार आधुनिक संदर्भ में compatibility (संगतता) जैसा है—जो आज के प्रेम-विवाह या arranged marriage में भी मूल्यवान है। सदृश’ को केवल एक ही वर्ण समझना अधूरा है—मनु का आग्रह compatibility का था, जो जन्म से परे गुण, शील और संस्कार पर आधारित था। यह पहलू वास्तव में प्रगतिशील हैं, और आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं—जैसे कि विवाह में समान विचारधारा और आध्यात्मिक/मानसिक तालमेल का महत्व। क्षेपकों ने इन सुंदर पक्षों को छिपाया, लेकिन मूल ग्रंथ पढ़ने पर ये स्पष्ट हो जाते हैं।
रोमिला थापर/ वेंडी डोनिगर का यह कहना कि यह आश्रम और विवाह चर्चा केवल द्विजों के बारे में है, शूद्रों के बारे में नहीं। यदि इस चीज को क्षेपकों के चलते मान भी लिया जाए तब इसकी नाराजगी क्यों होनी चाहिए। तब तो शूद्र को पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य के कठोर अनुशासन से आजादी मिली। यानी एक ही साँस में आश्रम व्यवस्था को दमनकारी बताना और उसी से शूद्रों को बाहर रखे जाने की दो अंतर्विरोधी शिकायतें दोनों साथ-साथ कैसे चल सकती हैं? ऐसे तो Bible के Equally yoked शब्द की कि ‘दोनों एक ही जुए में बाँधे गये’ की भी व्याख्या भी यह कहकर की जा सकती है कि उनकी विवाह-कल्पना में यह सम्बन्ध पशुओं जैसा है क्योंकि Yoke शब्द तो बैलों के लिए प्रयुक्त होता है। कि equally yoked शब्द का अर्थ एक बोझ को साथ साथ ढोना है। कई विवाह सम्बन्ध इतने ही बोझिल हो भी जाते हैं। कि वह अपने आप में forced pairing लगते हैं । समानता (equality)और सदृशता (compatibility) दो अलग-अलग बातें हैं। समानता का अर्थ बराबरी है पर उसमें वह हार्मनी और सह-अस्तित्व नहीं है। हमारे यहाँ सादृश्य भक्ति की ही एक अवस्था है - सान्निध्य, सायुज्य की तरह। वह गणितीय साम्य नहीं है बल्कि रिलेशनल है। बराबरी की बाइनरी है, या तो आप समान हो या असमान हो पर सदृशता gradient होती है। आप थोड़े सदृश हो, ज्यादा हो, बहुत ज्यादा हो।yoked शब्द स्वयं में oppressive burden लगता है।
फिर मनु के ‘द्विज’ से elitism की जो बू इन दोनों महाशयाओं को आती है तो बाइबिल के ऐसे ही प्रसंगों में born-again की चर्चा से क्यों नहीं आती?
Monday, 19 January 2026
हिंदू ब्राह्मण विरोध
भारत विनाश अभियान ७०० ई. से अभी तक चल रहा है। इसके लिए बहुसंख्यक हिन्दू समाज को आतंक तथा क्रूर अत्याचार द्वारा धर्म परिवर्तन कराना मुख्य पद्धति रही है। भारत के भीतर भी राज्यों के बीच युद्ध होते थे पर राजा विजित क्षेत्रों को भी अपना ही देश मानते थे और वहां के लोगों का भी विकास करते थे। सभी आक्रमण पश्चिम से असुरों के हुए जिनके नाम पैगम्बरों के अनुसार बदलते रहे। किन्तु केवल भारतीयों को आर्य आक्रमणकारी बनाया। इन्होंने देखा कि पूरे हिन्दू समाज को नष्ट करना सम्भव नहीं है तो एक एक वर्ग पर आक्रमण किया। जिन राजाओं ने पराजय के बाद समजौता नहीं किया उनको अपमानित करने के लिए भंगी बनाया (अमृतलाल नागर-नाच्यो बहुत गोपाल, या वृन्दावन लाल वर्मा-गढ़ कुण्डार, दुर्गावती आदि)। अल बरूनी तथा इसाई जेवियर ने ब्राह्मण विरोध आरम्भ किया तथा कहा कि जब तक ब्राह्मण जीवित हैं, हिन्दू एक बने रहेंगे। इस योजना से टीपू सुल्तान ने मेलकोट में ब्राह्मणों का संहार किया था। अंग्रेजों ने पराजित जातियों को अपराधी जाति घोषित किया, किन्तु उनको बिना अपराध जेल में नहीं डाला। अंग्रेजों ने अपने शासन को उचित सिद्ध करेने के लिए कहा कि भारतीय आर्य भी पश्चिम से आये थे। कहां से और क्यों आये इसका अभी तक पता नहीं चला, किन्तु इसका प्रचार होता रहा। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की शक्ति कम हो गयी और उनको प्रत्यक्ष शासन छोड़ना पड़ा और १९४६ में अपने विश्वस्त नेहरू को प्रधान मन्त्री बना कर उनके माध्यम से विभाजन कराया और ब्रिटेन तथा अमेरिका सदा पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध शक्तिशाली बनाते रहे। ब्रिटेन ने अपने शत्रु देशों को दुर्बल करने के लिए जर्मनी के उपद्रवी कार्ल मार्क्स को बुला कर उनको साम्यवादी साहित्य प्रकाशित करने की सुविधा दी। उस साहित्य का ब्रिटेन की राजनीति या पाठ्यक्रम में कभी स्थान नहीं रहा, केवल विदेशी प्रचार के लिए उसका प्रयोग हुआ। इसका मुख्य काम था उत्पादक वर्ग को शोषक और समाज का शत्रु सिद्ध कर देश की अर्थ व्यवस्था नष्ट करना। रूस में इसके द्वारा राजा को समाप्त कर लेनिन को लाया गया जो हरबार बचने के लिए ब्रिटेन जाता रहता था। रूस में कम्युनिस्ट शासन होने के मात्र ३ वर्ष बाद ताशकन्द में ब्रिटेन ने १९२० भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन करवाया। उसी ताशकन्द में लालबहादुर शास्त्री की भी १९६६ में हत्या हुई क्योंकि वह बिना नेहरू परिवार में जन्म लिए प्रधान मन्त्री बन गये थे। १९४७ तक कम्युनिस्ट सिद्धान्त था उत्पादक तथा मजदूर के बीच संघर्ष कराना। स्वाधीनता के बाद इस संघर्ष को जाति के नाम पर जोड़ा गया, तथा कुछ जातियों पर अन्य जातियों पर अत्याचार का आरोप लगाया। इनके अनुसार विदेशी लुटेरे केवल भारत की उन्नति कर रहे थे। उद्योग-व्यवसाय के बदले केवल जाति आधारित संघर्ष के लिए आरक्षण व्यवस्था की यद्यपि सभी वर्गों में गरीब थे। विप्र का अर्थ ही गरीब ब्राह्मण होता था। विश्व इतिहास में पहली बार जाति आधारित हिंसा काण्ड भारत में १९४७ के बाद कराये गये। गान्धी वध के २ घण्टे के भीतर बिना मोबाइल सम्पर्क के पुणे तथा निकट के नगरों में ब्राह्मण संहार आरम्भ हुआ। उसके बाद बिहार में लालू योजना में तिलक-तराजू तलवार को मारने का अभियान हुआ जिसमें प्रथम लक्ष्य भूमिहार थे। उनके संहार की प्रतिक्रिया में अन्य संहार भी हुए। इस प्रचार का लाभ हुआ कि बिना किसी बाधा के देश लूटते रहें। पहले छिपा कर घूस लेते थे, जाति-विद्वेष फैलाने पर जमीन रजिस्ट्री करा कर घूस लेना आरम्भ हुआ। उसके बाद राजस्थान, हरियाणा में जाट-गूजर या गूजर-मीणा संघर्ष आरम्भ हुआ। १९४७ के पूर्व भारत या विश्व इतिहास में कहीं भी जातिगत संघर्ष नहीं हुआ था, केवल मजहब के आधार पर संहार हुए थे। २०१२ में कांग्रेस सरकार में हिन्दुओं को आतंकवादी सिद्ध करने के लिए कुछ लोगों पर झूठे केस कर ८ वर्ष तक यातना दी गयी किन्तु कोई आरोप पत्र नहीं दे सके। एक कानून लाया गया कि हर दंगे में केवल हिन्दू ही दोषी माना जायेगा किन्तु उसका निर्णय करने का अधिकार भी किसी हिन्दू जज के पास नहीं होगा। सम्पूर्ण हिन्दू समाज के विरुद्ध कानून बनाने के कारण कांग्रेस का पतन हुआ। अतः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा उससे भी कठोर नियम बना-(१) केवल सवर्ण ही जन्मजात अपराधी हैं, (२) बिना हिंसा हुए ही अपराध भावना खोजने के लिए हर महाविद्यालय में गिरोह बनेंगे, (३) अपराधी जातियों को शिक्षा आरम्भ करते ही पकड़ा जायेगा, (४) झूठे केस के लिए कोई दण्ड नहीं होगा, (५) अपराधी खोजने या उसे दण्डित करने का अधिकार सवर्णों को नहीं होगा। यह प्रजातन्त्र के मूल सिद्धान्त के विरुद्ध है। वही शासन दण्ड दे सकता है, जो समाज द्वारा चुना गया है। विश्व में जितने भी कानून बने थे उसमें आरोपी को बचाव का अवसर मिलता था तथा झूठे केस का दण्ड मिलता था जो इस नियम में बन्द कर दिया गया है। यह नव उपनिवेशवाद है।
Friday, 16 January 2026
आर्या
आर्या
१. विदेशी आर्य प्रचार-अंग्रेजों ने भारत पर शासन का औचित्य सिद्ध करने के लिए भारत के मूल निवासियों को विदेशी आर्य कहा, तथा संयुक्त समुद्र-मन्थन के लिए अफ्रीका से आये इंजीनियरों को मूल निवासी घोषित किया। उनका चेहरा आज भी अफ्रीकी मूल निवासियों से मिलता है, पर उनके डी.एन.ए. की कभी जांच नहीं की गयी। काल्पनिक मेगास्थनीज के नाम से विभिन्न ग्रीक-रोमन लेखकों के वर्णनों में भारत को एकमात्र ऐसा देश कहा है जहां बाहर से कोई नहीं आया। वास्तविक उपलब्ध पुस्तकों के बदले मेगास्थनीज के नाम से संग्रह करने का उद्देश्य था कि समय-समय पर अपनी इच्छा अनुसार उसमें जालसाजी की जा सके, जो श्वानबेक, मैक्रिण्डल आदि ने किया है। भारतीय या पाश्चात्य साहित्यिक सन्दर्भ नहीं मिलने के कारण पश्चिमोत्तर भारत में खुदाई की गयी जिस मार्ग से आर्यों के आगमन का प्रचार करना था। वह महाभारत काल में नाग-राजा तक्षक का राज्य था। तक्षक ने अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित की उनका ६० वर्ष शासन के बाद ३०४२ ई.पू. में हत्या की थी। इसके २७ वर्ष बाद परीक्षित पुत्र जनमेजय ने सैन्य तैयारी कर नाग राज्य को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जिसके बाद २,००० वर्षों तक किसी को आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ। उसके बादपश्चिम से असीरिया के नबोनासर (लवणासुर) का आक्रमण ८२५ ईपू में हुआ जिसे मथुरा में खारावेल की गज सेना ने पराजित किया था (असीरिया इतिहास, खारावेल का अभिलेख)। २ नगरों को श्मशान बना दिया जिनके नाम मोइन-जो-दरो (मृतकों का स्थान) तथा हड़प्पा (हड्डियों का ढेर) प्रचलित हुए। उसके बाद आस्तीक नाग के अनुरोध पर जनमेजय ने युद्ध बन्द किया तथा नरसंहार के प्रायश्चित रूप में २७-११-३०१४ ई.पू. (परीक्षित अभिषेक से आरम्भ जयाभ्युदय शक ८९, दक्षिण भारत के पितामह मत से प्लवङ्ग वर्ष, पौष अमावास्या, सोमवार) सूर्य ग्रहण के समय ५ स्थानों पर भूमिदान किया जो मैसूर ऐण्टीकुअरी में जनवरी, १९०० में प्रकाशित हुए थे। इनमें से २ दान अभी तक चल रहे हैं-केदारनाथ शिव मन्दिर, शृङ्गेरी निकट तुङ्गा तट पर राम मन्दिर। सभी ५ दानपत्रों की तिथि, वार, ग्रहण आदि की जांच २००७ ई. में अमेरिका के डलास, टेक्सास में १२-१४ अक्टूबर सम्मेलन में की गयी थी (Astronomical Dating of Events & Select Vignettes from Indian History, Volume I, Edited and compiled by Kosla Vepa, Published by-Indic Studies Foundation, 948 Happy Valley Rd., Pleasanton, Ca 94566, USA-पृष्ठ ६२-६७).
२. आर्य शब्द के प्रयोग-वेद में कई सन्दर्भों में आर्य तथा आर्या शब्द के प्रयोग हैं।
विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवः (ऋक्, १/५१/८)
= आर्य (श्रेष्ठ) और दस्यु (लुटेरों, म्लेच्छ) को पहचानो (उसके अनुसार उनसे व्यवहार)।
विदत् स्वर्मनवे ज्योतिरार्यम् (ऋक्, १०/४३/४, अथर्व, २०/१७/४)
= इन्द्र मनुष्यों के लिए आर्य ज्योति का विस्तार करें। इसके पूर्व के मन्त्र में सप्त-सिन्धु का उल्लेख है जो सिन्धु से पश्चिम, मध्य तथा ब्रह्मपुत्र के पूर्व की ७-७ मुख्य नदियों के लिए है (ऋक्, १०/६४/८, १०/७५/१ आदि)। हुएनसांग के भारत यात्रा वर्णन के अध्याय २ में भी कहा है कि भारत विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है जैसे चन्द्र या इन्दु। इससे भारत को इन्दु कहते थे, जिसे ग्रीक इण्डे कहते थे। इसी मन्त्र की प्रथम पंक्ति में सोमास शब्द का प्रयोग है, जिसका अर्थ सोम या चन्द्र है। बाद की पंक्तियों में सौर मण्डल के तेज रूप में इन्द्र का उल्लेख है।
उरु-ज्योतिः चक्रथुः आर्याय (ऋक्, १/११७/२१)
इसके देवता अश्विनौ हैं, अतः उस सन्दर्भ में ही अर्थ करना उचित होगा। सौर मण्डल में २ अश्विन हैं-८ अग्नि के बाद ९म अहर्गण (पृथ्वी कक्षा के निकट), ११ रुद्र के बाद २१वां अहर्गण (यूरेनस कक्षा तक सौर वायु का प्रसार-विष्णु पुराण, २/८/३ में सूर्य के ईषादण्ड की परिधि १८,००० सौर व्यास-योजन कही है)। यहां सौर तेज के अग्नि और वायु रूप को उरु ज्योति कह सकते हैं, जो जीवन का स्रुत है। पृथ्वी पर उरु ज्योति का अर्थ सूर्य से आया प्रकाश है, जो ध्रुव प्रदेश में दीखता है। आध्यात्मिक रूप में इस ज्योति या तेज द्वारा मनुष्य स्वस्थ रहता है-वैद्य अश्विनी कुमार या नासिक्य (श्वास-सन्तुलन)।
३. आर्या - वेद में आर्या का प्रयोग इन्द्र की शक्ति, या मनुष्य इन्द्र की पत्नी शची के लिए हुआ है (ऋक्, ४/३०/१८, ६/३३/३, ६/६०/६, ९/६३/१४, १०/६५/११, १०/६९/६, सामवेद, २/२०५)। आर्ये (अथर्व,१९६२/१)।
मनुष्य आर्या शची के लिए-उत त्या तुर्वशायदू अस्नातारा शचीपतिः। इन्द्रो विद्वाँ अपारयत्॥१७॥
उत त्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः। अर्णाश्चित्ररथावधीः॥१८॥
४. त्रिष्टुप् तथा आर्या छन्द -इस सूक्त के अतिरिक्त वेद में इन्द्र-आर्या का उल्लेख सदा त्रिष्टुप् छन्द में किया गया है। सूर्य का तेज इन्द्र रूप में सौर मण्डल में फैला है। जहां तक सूर्य का प्रकाश अधिक है (ब्रह्माण्ड तुलना में) वहां तक सूर्य का क्षेत्र है और वह ३० धाम तक है।
त्रिं॒शद्धाम॒ वि रा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते । प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑ ॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
आकाश के धाम पृथ्वी से आरम्भ हो कर क्रमशः २-२ गुणा हैं।
...द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
३ धाम पृथ्वी के भीतर ही हैं-
पृथिव्यामिमे लोकाः (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ) प्रतिष्ठिताः(जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद्, १/१०/२)
३+३० = ३३ धाम सौर मण्डल के भीतर हैं, जो त्रिष्टुप् नक्षत्र के ३ पाद हैं, अतः इन्द्र तथा उनके वज्र को त्रिष्टुप् कहा है।
इन्द्रस्त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/७),
त्रिष्टुप् इन्द्रस्य वज्रः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/२),
त्रैष्टुभो वज्रः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/१८)
मनुष्य के मेरु-दण्ड में भी ३३ सन्धि हैं, अतः इन्द्र वज्र को दधीचि की हड्डी कहा गया है, यह अस्थि युग का वर्णन नहीं है (अस्थि युग का मेरा इतिहास-जयशंकर प्रसाद की कविता भारतवर्ष में)। अतः स्तुति के श्लोक प्रायः त्रिष्टुप् छन्द (इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा आदि) में हैं, जिनका कम्पन मेरुदण्ड को कम्पित करता है।
सौर मण्डल के ३३ धामों के प्राण ३३ देवता हैं-८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, २ अश्विन्। इनके चिह्न ’क’ से ’ह’ तक के ३३अक्षर हैं। चिह्न रूप में देवों का नगर होने के कारण संस्कृत लिपि को देवनागरी कहते हैं।
लौकिक छन्दों में त्रिष्टुप् जैसा आर्या छन्द है जिसके कई रूप हैं। पिङ्गल के छन्द सूत्र के चतुर्थ अध्याय में लौकिक छन्दों का वर्णन आर्या से ही आरम्भ हुआ है। यह मात्रा के अनुसार है, अतः इसे त्रिष्टुप् नहीं कह सकते, किन्तु प्रायः त्रिष्टुप् जैसा है।
५. कालिदास-कालिदास के श्रुतबोध में भी छन्दों का वर्णन आर्या छन्द से ही आरम्भ है। कालिदास के ओङ्कार पञ्जर स्तोत्र के आरम्भ में सरस्वती को आर्या कहा है, और यह आर्या छन्द में है-
ओङ्कार पञ्जर शुकीम्-उपनिषद्-उद्यान केलि कलकण्ठीम्।
आगम विपिन मयूरी-मार्यामन्तर्-विभावये गौरीम्॥१॥
अर्थ- ॐकार पिंजड़ा है जिसमें आर्या (सरस्वती) सुग्गी के समान हैं। उपनिषद् रूपी उद्यान की कोयल हैं तथा आगम (तन्त्र, वेद भी-परम्परा से प्राप्त साहित्य) रूपी विपिन (वन) की मयूरी हैं। उनका ध्यान भीतर में गौरी के रूप में करता हूँ।
टिप्पणी-वाणी के ४ पद हैं जिनमें ३ गुहा में हैं तथा चतुर्थ पद कथन या लेखन में निकलता है। भीतर के ३ पद गौरी (ग = तीसरा व्यञ्जन) हैं-परा, पश्यन्ती, मध्यमा। बाहर व्यक्त या वैखरी वाणी में कुछ लुप्त हो जाता है अतः उसे तम कहते हैं। गौ तथा तम का सम्बन्ध गौतम का न्याय दर्शन है।
Thursday, 15 January 2026
भीष्म पितामह उत्तरायण
क्या जीवन और मृत्यु की उस देहरी पर हमारे पास वह सामर्थ्य रहेगी जो आज के दिन भीष्म ने प्रदर्शित की थी? एक कांशस डेथ। एक सामर्थ्य इच्छा-मृत्यु की। वह कोई फैंटास्टिक सुपर-पॉवर नहीं है। उसमें अर्थ के अनेक स्तर हैं। अपने भौतिक अस्तित्व से विदा लेने का मुहूर्त स्वयं चुनना। मैंने सुना है कि आजकल सीजेरियन ऑपरेशन के चलते ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त पूछकर लोग अपने बच्चों का प्रसव करवा रहे हैं पर अस्तित्व के इस भौतिक तल से दूसरे तल पर जाने का पल चुनना प्राण और चेतना के ऊपर स्वामित्व का महत्तम प्रमाण है। पर वह उस अगले संसार को यह संदेश देना भी है कि उसमें कदम रखना भी बेहोशी में नहीं होगा। उसका सम्मान पूरी जागृति से उसमें प्रवेश करने पर होगा। लोग इन दिनों फ्री विल की बात करते हैं पर भीष्म इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। यह आत्म-निर्णय की स्वायत्तता का चरम था जो मकर संक्रांति के दिन प्रदर्शित हुआ था। मन और शरीर के बीच रिश्तों की जो परिभाषा भीष्म ने रची, वह अनुपम थी। देह के बंध कैसे स्वयं खोले जाते हैं, यह शर शय्या पर लेटे तीरों से बिंधे भीष्म ने बताया था। हाथ पाँव शरीर का अंग हो सकते हैं पर चेतना नहीं। सती के शरीर के अंग प्रत्यंग गिरे पर चेतना कहीं नहीं गिरी।
हीडेग्गर ने being-toward-death की एक अस्तित्ववादी अवधारणा दी थी। हालाँकि उसके फ्रेमवर्क में भी मृत्यु हम पर से गुजरती है पर वह हमारे द्वारा शासित नहीं होती। भीष्म इतने दिन मृत्यु की छाया में बिताते रहे थे। फिर भी उनकी आत्मशक्ति इतनी गहरी थी कि मृत्यु भी उनके लिए अंत का कोई आरोपित बिंदु नहीं थी, वह एक चयन की पात्र थी। बात मृत्यु के निषेध की नहीं थी, वह उसे मन के समस्त जागरण में चुनने की थी।
इसीलिए हमारी परंपरा में यम-पूजा का एक अंग भीष्मानुस्मरण भी है। इसलिए पितृ पूजा में भी वे हैं।
शरीर के अवसान के कुछ जैविक अपरिहार्यत्व हैं।हम यह तो चुन सकते हैं कि क्या खायें, क्या पियें। पर यह तो मौत के क्षण रोने वालों को सान्त्वना देने का हमारा स्टैंडर्ड दिलासा होता आया कि मौत पर हमारा बस नहीं है। लेकिन भीष्म के हिसाब से देखें तब मृत्यु के मुहाने पर हमारी असहायता हमारी अविकसित चेतना का ही परिपाक है।अन्यथा जीवन अपनी टर्म्स पर पूरा किया जा सकता है।
लोग संभ्रम में मरते हैं, पीड़ा में भी, भय में भी और अचेतावस्था में भी। भीष्म पूरी स्पष्टता और चेतना की ऊर्ध्वता में गये।उनकी मृत्यु उनके चयन के कारण संक्रांति नहीं हुई बल्कि उसके कारण एक पर्व, एक सेक्रेड समारोह में बदल गई।
भीष्म की कथा किसी कृतज्ञ पिता से इच्छा मृत्यु का वरदान मिलने की कथा नहीं है। वह भीष्म प्रतिज्ञा के संकल्पव्रती की संकल्प शक्ति की कथा है। अपने सबसे वल्नरेबल क्षण में उनकी स्पिरिट की संप्रभुता और स्वायत्तता की कथा है। उनकी शरशय्या किसी पराजित की भूमि नहीं है, वह तो जैसे एक सिंहासन है जिस पर से वह अपने सबसे profound प्राधिकार का उपयोग करते हैं। एक ऐसे संसार में रहते हुए कि जिस संसार में मौत मेडिसिन की असफलता के रूप में बाँची जाती है, हम लोग भीष्म के महाप्रयाण में महाप्राण होने का असली साक्ष्य ढूँढ सकते हैं। कि शक्ति का प्रमाण वे युद्ध नहीं थे कि जिसमें भीष्म ने अपने प्रतिद्वंदियों को पराजित किया था बल्कि खुद अपनी किताब का आखिरी अध्याय स्वयं लिखने की सचेतनता थी। क्या वह एक योग-योग्यता थी जिसमें अपनी जीवन-ऊर्जा पर अधिकार भी था और जागतिक लॉ से अपनी इतनी संपृक्ति (alignment) भी थी कि प्रभु की इच्छा अपनी इच्छा में फर्क ही न रह जाए?
भीष्म अपने अंतिम क्षण अनुताप में नहीं, अनुध्यान और अनुचिंतन में बिताते हैं। वहाँ विष्णु सहस्रनाम है। उनके ये पल उत्तरायण की प्रतीक्षा के पल कम हैं, उत्तर देने के पल अधिक हैं। सब उन्हें घेरकर बैठे हैं और वे सबका शंका-समाधान कर रहे हैं। पर यह पल है नश्वरता से अपने रिश्तों को परिभाषित करने का।
भीष्म भाग्यशाली हैं कि उन्होंने युद्ध में न्यस्त जितना होना था हुए पर उससे अधिक दिनों तक वे युद्ध के साक्षी रहे और दृष्टि की वह अनासक्ति अर्जित की कि जो किसी एक्टिव पार्टिसिपेंट को मिलना संभव नहीं था।
क्या मृत्यु के क्षण हममें यह mindfulness रहेगी? क्या हम ऐसे अपने जीवन का जायजा ले सकेंगे? और ऐसे ग्रेस के साथ इस फानी दुनिया को ‘अलविदा’ कर सकेंगे? भीष्म की तरह मौत को रोककर रखना शायद हमें न आये पर इतना ही हो कि हमारी मृत्यु कोई मेडिकल ईवेंट न बने, वह एक सम्मान योग्य मानवीय अनुभव होकर आये। जब हमारे भीतर अपने जीवन-मिशन की पूर्णता के बोध की प्रशान्ति और आस्तिक्य हो।
Tuesday, 13 January 2026
मकर संक्रान्ति का पुण्यकाल
मकर संक्रान्ति का पुण्यकाल
विश्व का एक भी पञ्चाङ्ग सही पद्धति द्वारा आजकल पुण्यकाल की गणना नहीं करता,जो कलियुग का प्रभाव है । मेरे सॉफ्टवेयर से बने पञ्चाङ्गों में भी प्रचलित पद्धति का पुण्यकाल ही सम्पादक दे देते हैं । विवाद करने वाले परम्परा की दुहाई देते हैं,यद्यपि पुण्यकाल की वर्तमान परम्परायें कलियुग की हैं । पुण्यकाल का शास्त्रीय मूल “सूर्यसिद्धान्त” है जिसमें पुण्यकाल का शुद्ध गणितीय सूत्र है (सूर्यसिद्धान्त — मानाध्याय श्लोक ११) जो क्लिष्ट तो नहीं है किन्तु गणित के शत्रु कलियुगी पण्डितों ने उसे त्याग दिया । सूर्यसिद्धान्तीय सूत्र का स्थूल स्वरूप यह है कि संक्रान्ति से १६ घटी पहले से लेकर १६ घटी पश्चात तक मध्यम पुण्यकाल होना चाहिये,कुल ३१⋅९८०६ घटी । शुद्ध सूत्र यह है कि ३१⋅९८०६ घटी को “स्पष्टगति ⁄ मध्यमगति” से विभाजित कर दें । शुद्ध सूत्र रविबिम्बमान पर आधारित है जो स्पष्टगति का अनुपाती होता है,अतः मैंने गति वाला सूत्र दिया है । इसको मध्यमशोधित−पुण्यकाल कहना चाहिये ।
सूर्यसिद्धान्त की आचार्य रङ्गनाथ की मध्ययुगीन टीका में विस्तृत उपपत्ति है जिसमें विस्तृत सूत्र तो नहीं है किन्तु सूत्र बनाने की सही पद्धति की विस्तृत व्याख्या है जो सूर्यसिद्धान्त के मूल श्लोक पर आधारित है । आचार्य रङ्गनाथ ने पुण्यकाल की सही परिभाषा दी है जिसपर आजकल कोई ध्यान नहीं देता जिस कारण पुण्यकाल की गलत गणना हो जाती है । पुण्यकाल की परिभाषा यह है कि रविकेन्द्र की गति के आधार पर राशि में परिवर्तन के समय की गणना होती है जिसे संक्रान्ति कहते हैं,परन्तु रविकेन्द्र से पहले ही रवि का पहला क्षितिज राशिसन्धि पर आ जाता है और परवर्ती क्षितिज रविकेन्द्र की अपेक्षा बाद में राशिसन्धि पर आता है । इसी काल को पुण्यकाल कहते हैं । उदाहरणार्थ,यदि किसी दिन रविकेन्द्र की संक्रान्ति से १६ घटी पहले रवि का पहला क्षितिज राशिसन्धि पर आता है तो वह पुण्यकाल का आरम्भ है और तब संक्रान्ति के १६ घटी उपरान्त रविबिम्ब का परवर्ती क्षितिज राशिसन्धि पर आयगा । अतः पुण्यकाल वह कालमान है जिस दौरान सूर्य का कोई न कोई भाग राशिसन्धि को स्पर्श करे । मूल श्लोक में पुण्यकाल को “पुण्यं” कहा गया जिसकी व्याख्या आचार्य रङ्गनाथ ने यह दी कि पूर्व पुण्यकाल एवं अपर पुण्यकाल में स्नानादि−धर्मकृत्य से पुण्यवृद्धि होती है । संक्रान्ति से पहले वाला पुण्यकाल “पूर्व पुण्यकाल” है और संक्रान्ति के पश्चात वाला “अपर पुण्यकाल” है ।
इसमें विशेषता यह है कि सूर्यास्त के पश्चात अगले सूर्योदय तक का काल रात्रि है जिसमें पुण्यकाल नहीं होता । अतः यदि रात्रि में गणितीय पुण्यकाल आ रहा है तो उसका जो हिस्सा दिन में होगा उसी दिन वाले खण्ड में पुण्यकाल माना जायगा । रविबिम्ब का मध्यममान ३१⋅९८०६ कला होता है । इसमें दैनिक स्पष्टागति से भाग करके मध्यमगति से गुणा करेंगे तो स्पष्ट रविबिम्ब का घट्यात्मक मान मिलेगा जो पुण्यकाल है ।
१४ जनवरी २०२२ ई⋅ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अक्षांश २८:०० तथा रेखांश ७८:०० पर सूर्यसिद्धान्तीय गणना द्वारा संक्रान्तिकाल रात्रि २०:३३:०४ बजे है । उस दिन दैनिक स्पष्टागति ३६८१ विकला है जबकि मध्यमगति सदैव ३५४८⋅१७ विकला होती है । दोनों का अनुपात है १⋅०३७४३६ जिसे मध्यम−पुण्यकाल ३१⋅९८०६ घटी में विभाजित करने पर मकर संक्रान्ति का मध्यमशोधित−पुण्यकाल है ३०⋅८२६६ घटी । अतः मध्यमशोधित−पुण्यकाल है संक्रान्ति से ६:०९:५५ घण्टा पहले से लेकर संक्रान्ति से इतने ही घण्टे पश्चात तक । अर्थात् १४ जनवरी को अपराह्न १४:२३:०९ बजे से लेकर २६:४२:५९ बजे अर्थात् मध्यरात्रि के उपरान्त २:४२:५९ बजे तक । रात्रि के पुण्यकाल का महत्व नहीं है,अतः वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल १४ जनवरी को अपराह्न १४:२३:०९ बजे से लेकर स्पष्ट सूर्यास्त तक है ।
कर्क और मकर,षडशीति एवं विषुव संक्रान्तियों के वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल की गणना के पृथक नियम हैं जो सूर्यास्त से पहले संक्रान्ति होने पर तीन कोटि के हैं — कर्क (४),विष्णुपदी एवं अन्य । विष्णुपदी में २,५,८ एवं ११ वीं संक्रान्तियाँ हैं । अन्य में षडशीति (३,६,९,१२),विषुव (१,७) एवं मकर संक्रान्तियाँ हैं ।
सभी संक्रान्तियाँ यदि सूर्यास्त के उपरान्त हों तो उन सबके नियम समान हैं । उनमें से जो संक्रान्ति मध्यरात्रि से पहले हो उसका वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल सूर्यास्त तक ही होता है और आरम्भ स्पष्ट मध्याह्न से माना जाता है । किन्तु गणितीय आरम्भ यदि मध्याह्न के उपरान्त हो तो गणितीय आरम्भ को ही वास्तविक आरम्भ मानना चाहिये जो आजकल नहीं किया जाता ।
सभी संक्रान्तियाँ यदि मध्यरात्रि के उपरान्त हो तो अगले सूर्योदय से वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल का आरम्भ होगा । आजकल उसका अन्त स्पष्ट मध्याह्न है । किन्तु गणितीय अन्त यदि मध्याह्न से पहले हो तो गणितीय अन्त को ही मानना चाहिये जो आजकल नहीं किया जाता ।
स्पष्ट सूर्यास्त के लिये मध्यम सूर्यास्त में वेलान्तर जोड़ना पड़ता है जो आज ९ मिनट ६ सेकण्ड है । अतः वास्तविक पुण्यकाल १४ जनवरी को अपराह्न १४:२३:०९ बजे से लेकर १७:१९:३९ तक है । परन्तु प्रचलित परम्परा के अनुसार ऐसी स्थिति में स्पष्ट मध्याह्न से वास्तविक पुण्यकाल का आरम्भ मान लिया जाता है जो अनुचित है । कई लोग अगले दिन पुण्यकाल मानते हैं जबकि पिछले सौरदिन में ही गणितागत पुण्यकाल समाप्त है । आपको मकर संक्रान्ति हेतु स्नान जप−तप आदि करना है तो १४:२३:०९ बजे से लेकर १७:१९:३९ तक पुण्यकाल मानें,१५ जनवरी को मत मानें क्योंकि सौर−गणितानुसार पिछले सौरदिन में ही गणितागत पुण्यकाल समाप्त है । अन्य स्थानों के लिए सूर्यास्त में जितना अन्तर हो उतना अन्तर पुण्यकाल में कर दें । सूर्यकेन्द्रोदय की शुद्धि हेतु उपरोक्त पुण्यकाल में साढ़े चार मिनट बढ़ा दें । उपरोक्त कुल पुण्यकाल का जो अंश दिन में,अर्थात् सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच पड़े उसे वास्तविक पुण्यकाल मानें । अगले दिन पुण्यकाल तभी पड़ेगा जब रात्रि में ही कुल पुण्यकाल हो । सूर्यास्त के पश्चात सूर्योदय तक रात्रि है जिसमें वास्तविक पुण्यकाल नहीं माना जा सकता । रात्रि में संक्रान्ति हो तो उसके दो ही भेद सम्भव हैं — मध्यरात्रि से पहले और पश्चात वाली संक्रान्ति । आज की मकर संक्रान्ति मध्यरात्रि से पहले है और इसका गणितीय पुण्यकाल अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त है परन्तु आरम्भ आज के सूर्यास्त से पहले है । अतः १४ जनवरी की सूर्यास्त से पहले गणितीय पुण्यकाल को त्यागकर १५ जनवरी को पुण्यकाल मानना अनुचित है क्योंकि १५ जनवरी का दिन आरम्भ होने से पहले ही रात में ही गणितीय पुण्यकाल समाप्त है । बहस की सम्भावना तब हो सकती है जब दोनों पक्षों में गणितीय पुण्यकाल का अभाव हो,अर्थात् गणितीय पुण्यकाल पूरी तरह रात में ही बीते जो कि सम्भव ही नहीं है क्योंकि वर्ष में कभी भी रात्रि का मान गणितीय पुण्यकाल के अधिक नहीं होता ।
सूर्यसिद्धान्त के अनुसार आज मकर संक्रान्ति का गणितीय पुण्यकाल १४ जनवरी १४:२३:०९ बजे से आरम्भ है और रात में समाप्त है,तो सूर्यास्त के पश्चात वाले अंश को त्यागकर इसके दिन वाले अंश को ही वास्तविक पुण्यकाल मानना उचित है । सूर्यसिद्धान्तीय गणित के विरोध में कलियुगी मान्यताओं को वरीयता नहीं दी जा सकती । वराहमिहिर ने भी सूर्यसिद्धान्त को गायत्री के देवता सविता द्वारा प्रदत्त सिद्धान्त कहा । अतः ज्योतिष के क्षेत्र में सूर्यसिद्धान्त वेदतुल्य है ।
पुण्यकाल में केवल रात्रिखण्ड को छाँटना है । किसी भी स्थिति में उस काल को पुण्यकाल नहीं माना जा सकता जब सूर्य का कोई न कोई खण्ड राशिसन्धि को स्पर्श न कर रहा हो । पुण्यकाल की इस मौलिक परिभाषा को कलियुगी पण्डितों ने भुला दिया जिस कारण पुण्यकाल को लेकर बखेड़ा खड़ा होता है । पुण्यकाल में धार्मिक कर्म का फल बहुत बढ़ जाता है ।
कभी किसी ने लिख दिया कि सूर्यास्त के उपरान्त संक्रान्ति हो तो अगले दिन पुण्यकाल मानें । बिचारे ने मध्यरात्रि के पश्चात वाले अंश को ध्यान में रखकर लिखा किन्तु श्लोक शुद्ध करने के चक्कर में पूरी बात नहीं लिख सके तो अब इसी को आधार मानकर कई लोग गलत पुण्यकाल बताते हैं,परन्तु पुण्यकाल की शास्त्रीय परिभाषा और सूत्र पर ध्यान नहीं देते । गणित में किसी का मत नहीं चलता । पुण्यकाल सूर्य के सम्पूर्ण बिम्ब का राशिसन्धि से स्पर्श को कहते हैं जो गणित द्वारा ही जाना जा सकता है । उस काल के कुछ अंश को रात्रि आदि के कारण त्यागते हैं,किन्तु उस पुण्यकाल से बाहर के काल को पुण्यकाल मानने से पुण्यकाल का फल नहीं मिलेगा ।
Sunday, 11 January 2026
जोधा अकबर
कभी आपने देखा कि विवेक अग्निहोत्री या सुदीप्तो सेन या आदित्य धर आदि निर्देशकों को जब फिल्में बनाना होता है तो उसके पूर्व उन्हें इतिहास का बहुत अध्ययन करना पड़ा है, बहुत सी बारीकियों में उतरना पड़ा है पर किसी मुगल-ए-आजम या किसी जोधा अकबर को बनाने के लिए कभी इन परिशुद्धताओं की आवश्यकता नहीं पड़ी।
विवेक या सुदीप्तो या आदित्य से उनसे हर छोटी-छोटी बात के लिए ऐतिहासिक प्रमाण, दस्तावेज, और साक्ष्य मांगे गये। इन फिल्मों की हर घटना, हर संवाद, और हर दृश्य को सूक्ष्मदर्शी यंत्र से परखा गया। विवादों का तूफान खड़ा किया गया, तथ्य-जांचकर्ताओं की पूरी फौज लग गई, और मीडिया में बहसें चलती रहीं।
अग्निहोत्री ने जब 'द कश्मीर फाइल्स' (2022) बनाई, तो उन्होंने लगभग चार वर्षों तक शोध किया। उन्होंने 700 से अधिक कश्मीरी पंडित परिवारों से साक्षात्कार किए, उनके दर्द को समझा, दस्तावेजों का अध्ययन किया, और पुरानी रिपोर्ट्स, समाचार पत्रों और सरकारी अभिलेखों को खंगाला। फिल्म में दिखाए गए अधिकांश दृश्य वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं - जैसे बीके गंजू की हत्या, गिरजा टिक्कू की हत्या, और अन्य भीषण अत्याचार।
इसके बावजूद, फिल्म रिलीज होते ही विवादों में घिर गई। तथाकथित बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों, और मीडिया के एक वर्ग ने फिल्म को "प्रोपेगेंडा" करार दिया। हर घटना को चुनौती दी गई, हर आंकड़े पर सवाल उठाए गए। यहां तक कि कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को भी "अतिरंजित" बताया गया। विवेक अग्निहोत्री को बार-बार अपनी फिल्म के हर दावे को सिद्ध करना पड़ा, साक्ष्य प्रस्तुत करने पड़े, और जनसुनवाई में खड़ा होना पड़ा।
द बेंगाल फाइल्स बंगाल विभाजन (1947) के दौरान हुए नोआखाली नरसंहार और हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को दिखाती है। जैसे ही फिल्म की घोषणा हुई या इसके निर्माण की बात आई, तुरंत विवाद शुरू हो गए। फिल्म निर्माताओं से हर घटना के लिए दस्तावेजी सबूत मांगे गए। फिल्म को "सांप्रदायिक एजेंडा" बताया गया। कहा गया कि यह इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है। विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूहों ने इसका विरोध किया। 7000 से अधिक शोध पृष्ठों और 1000 से अधिक अभिलेखों का अध्ययन किया गया। 20,000 से अधिक पृष्ठों के दस्तावेजों और बचे हुए लोगों और उनके परिवारों के साक्षात्कार लिये। 1946 के भारतीय, अंतर्राष्ट्रीय, अमेरिकी और ब्रिटिश समाचार पत्रों की गहन जांच की। महीनों विभिन्न शहरों और गांवों का दौरा किया गया। लोगों से साक्षात्कार लिये, स्थानीय संस्कृति और इतिहास का अध्ययन किया, और बंगाल के हिंसक इतिहास के मूल कारण को समझने की कोशिश की।
अग्निहोत्री ने बताया कि जब वे उस समय के समाचार पत्रों की जांच कर रहे थे, तो कुछ छवियों ने उन्हें बहुत बुरी तरह प्रभावित किया। उन्हें यह जानकर भी सदमा लगा कि डायरेक्ट एक्शन डे में लगभग 40,000 लोग केवल दो रातों में मारे गए, और कोलकाता की सड़कों पर एक महीने से अधिक समय तक मानव शव पड़े रहे क्योंकि उन्हें साफ करने के लिए कोई नहीं बचा था, अधिकांश सफाई कर्मचारी मारे जा चुके थे। उनकी टीम को बहुत सारी बाधाओं का सामना करना पड़ा, जिसमें कोलकाता में एक होटल में हिरासत में लिया जाना भी शामिल था।
सुदीप्तो सेन की ‘द केरल स्टोरी’ जो केरल में लव जिहाद और ISIS में भर्ती की कहानी बताती है, को तुरंत "झूठी" और "भ्रामक" करार दिया गया। आंकड़ों पर विवाद हुआ, और फिल्म निर्माताओं को संख्याओं में संशोधन करना पड़ा। आलोचनाओं से निपटने से कहीं अधिक कठिन था फिल्म बनाने में हुआ विरोध। सुदीप्तो ने शोध के लिए केरल में लगभग 10 वर्षों तक काम किया। यह एक असाधारण लंबी अवधि है जो उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। 2018 में सुदीप्तो ने एक विवादास्पद डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'इन द नेम ऑफ लव - मेलानकॉली ऑफ गॉड्स ओन कंट्री' बनाई थी जो धार्मिक रूपांतरण और लव जिहाद पर थी, जिसे लंदन इंडिपेंडेंट फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार मिला।उन्होंने केरल के हर जिले की यात्रा की, और एक बार उन्हें एक बचकर रहना पड़ा जब उन्हें पता चला कि उनके होटल पर हमला हो सकता है। वास्तविक युवा महिलाओं से मुलाकात की जो धार्मिक रूपांतरण से बच निकली थीं और आर्ष विद्या समाजम आश्रम द्वारा उनकी देखभाल की जा रही थी। सेन ने एक विशेष रूप से मार्मिक घटना साझा की जब उन्होंने पहली बार श्रुति से एक छोटे से गांव में मुलाकात की, तो उसके घर में बिजली नहीं थी क्योंकि कनेक्शन काट दिया गया था। जब भी वह सब्जियां खरीदने बाहर जाती, लोग उसका बैग छीन लेते। सेन को उनसे उनके घर के एक छोटे से window के माध्यम से साक्षात्कार करना पड़ा क्योंकि वे बाहर आने से डरती थीं।
17 मई को मुंबई के रंग शारदा ऑडिटोरियम में 26 साहसी लड़कियों को केरल से विशेष रूप से इस अवसर के लिए बुलाया गया। अभिनेत्री अदा शर्मा ने निर्देशक द्वारा दिखाए गए वीडियो की भयावहता का खुलासा किया जिसमें लड़कियों और उनके बच्चों को टैंकरों में 16 घंटे तक बिना खाने, पीने या खुद को राहत देने के तरीके के बिना कपड़ों के ढेर की तरह जमा किया जा रहा था। जब तक वे अपने गंतव्य पर पहुंचते, कुछ मर चुके होते थे और अधिकांश आधे-मरे हुए होते थे।
उधर मुगले आजम को ले लें। इतिहासकारों में आम सहमति है कि अनारकली नाम की कोई दरबारी नर्तकी का कोई विश्वसनीय ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। यह कहानी लोककथाओं और बाद के साहित्य से उत्पन्न हुई प्रतीत होती है। अकबर के समकालीन इतिहासकार अबुल फजल ने 'आइन-ए-अकबरी' में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं किया।
अकबर के शासनकाल में हुए बनी मुंडों की मीनारें, चित्तौड़ का नरसंहार, और अन्य क्रूर घटनाओं को मुगले आजम में सरासर नजरअंदाज किया गया और दरबारी संस्कृति का रूमानीकरण किया गया। मुगल दरबार को अत्यंत भव्य और सभ्य दिखाया गया, जबकि उस समय की हकीकत कहीं अधिक जटिल और कठोर थी। क्या 'मुगल-ए-आजम' के निर्माताओं से कभी यह पूछा गया कि अनारकली के अस्तित्व का प्रमाण क्या है? क्या उन्हें यह सिद्ध करना पड़ा कि दीवार में चुनवाने की घटना सत्य है? नहीं। फिल्म को "कलात्मक स्वतंत्रता" के नाम पर स्वीकार किया गया और इसे एक क्लासिक बना दिया गया।
जोधा अकबर तो ऐतिहासिक विरूपण का और भी बड़ा उदाहरण है। अकबर की पत्नी का नाम 'जोधा' था या नहीं, यह अत्यंत विवादास्पद है। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि अकबर की राजपूत पत्नी का नाम 'हरका बाई' या 'हीर कुंवरी' था, जो बाद में 'मरियम-उज़-ज़मानी' कहलाईं। 'जोधा' नाम का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। अकबर को एक अत्यंत उदार, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील शासक के रूप में दिखाया गया, जबकि उसके द्वारा किए गए नरसंहारों और क्रूरताओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
फिल्म रिलीज हुई, तो राजस्थान और अन्य राज्यों में राजपूत समुदाय ने इसका विरोध किया। उन्होंने फिल्म को ऐतिहासिक रूप से गलत बताया। लेकिन मीडिया और बुद्धिजीवियों ने इस विरोध को "असहिष्णुता" करार दिया। फिल्म निर्माताओं को अपने दावों को सिद्ध करने की जरूरत नहीं पड़ी। गोलकीपर नेगी को कबीर खान बना देना कलात्मक स्वतंत्रता है तो वह स्वतंत्रता सेलेक्टिव क्यों है?
कभी गौर कीजिए कि इन दिनों गैर-वाम बहुत अध्ययन के साथ काम कर रहा है और वाम अपने चालू जुमलों में अटका पड़ा है।बुद्धिजीविता की तराजू का संतुलन बदल रहा है।
कि वह कौन-सा मनोविज्ञान है, कौन सी बुद्धिजीविता जिसमें कुछ चीजें अनैतिहासिक होने पर भी स्वतःसिद्ध हैं और वह कौन-सा मनोविज्ञान है जिसमें कुछ चीजें ऐतिहासिक होने पर भी प्रोपेगंडा हैं?
Saturday, 10 January 2026
हनुमान चालीसा की रचना
हनुमान चालीसा की रचना 16वीं शताब्दी (लगभग 1580 के दशक) में तुलसीदास ने की थी, जबकि औरंगजेब (शासनकाल 1658-1707) का समय इसके लगभग 70-80 साल बाद का है, इसलिए चालीसा की रचना और औरंगजेब के शासनकाल के बीच लगभग एक शताब्दी (100 वर्ष) या उससे थोड़ा कम का अंतर है, जहाँ चालीसा का रचनाकाल औरंगजेब के काल से पहले का है और वह अकबर के समय में या उसके आसपास लिखी गई थी, जैसा कि कुछ कथाओं से पता चलता है।
मुख्य बिंदु:
रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास।
रचना काल: 16वीं शताब्दी (अवधी भाषा में)।
औरंगजेब का समय: 17वीं शताब्दी (1658-1707)।
निष्कर्ष:
हनुमान चालीसा की रचना औरंगजेब के शासनकाल से काफी पहले हुई थी। तुलसीदास जी ने अकबर के समय या उसके आसपास चालीसा लिखी, और औरंगजेब का शासनकाल उसके काफी बाद शुरू हुआ, जिससे दोनों के समय में लगभग एक सदी का अंतर आता है।
हनुमान चालीसा - विकिपीडिया
हनुमान चालीसा एक काव्यात्मक कृति है, जो भगवान हनुमान को समर्पित है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं,
Thursday, 8 January 2026
मनुस्मृति स्त्री
#मनुस्मृति स्त्री विरोधी है: अम्बेडकर और अन्य वामपंथी कीट पतंग।
जिस श्लोक को आधार बनाकर उन्होंने मनुस्मृति को स्त्री विरोधी बताया था, और आज भी बता रहे हैं, मैंने आज उसका पोस्टमार्टम किया।
"विषय: मनुस्मृति (श्लोक 9.3) - रक्षण और भरण-पोषण का विश्लेषण
1. मूल श्लोक:
"पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥"
2. तार्किक व्याख्या:
- इस श्लोक की पहली तीन पंक्तियाँ 'रक्षण' (Protection) की बात करती हैं।
- जब आधार रक्षण है, तो अंतिम पंक्ति का अर्थ 'बंधन' नहीं हो सकता।
- इसका वास्तविक अर्थ है: "स्त्री को किसी भी अवस्था में निराश्रित (Unprotected) नहीं छोड़ना चाहिए।"
3. निष्कर्ष:
यह श्लोक पुरुषों को स्त्रियों के प्रति उनके 'कर्तव्य' (Duty of Care) के लिए उत्तरदायी बनाता है।
इसे स्वतंत्रता छीनने के रूप में देखना भाषाई और तार्किक रूप से गलत है।"
AI पर मैंने मनुस्मृति के उस श्लोक की व्याख्या करने के लिए निवेदन किया। उसने पहले वैसे ही व्याख्या किया, जैसी व्याख्या संस्कृत से अज्ञान चु... यों ने किया है: कि स्त्री को जीवन में स्वतंत्र नहीं छोड़ा जा सकता।
उसने वही व्याख्या किया जो आज की तिथि में सर्व प्रचारित है।
फिर मैंने उससे पूंछा कि यदि ऊपर तीन पंक्तियों में उनकी रक्षा और रक्षण की बात हो रही है, तो यह कहना कि उनको किसी भी स्तिथि में स्वतंत्र छोड़ना मूर्खतापूर्ण, अप्रासंगिक और अनुचित प्रतीत हो रहा है।
उसके बाद उसने जो उसने संक्षेप में लिखा, वह यहां प्रेषित है।
मुझे पूरे संवाद को कॉपी पेस्ट करने की विधि समझ में नहीं आयी है, इसलिए आज इतना ही।
परन्तु एक बात समझ में आयी कि अर्टिफ़िसियल इंटेलीजेंस ( AI ) प्राकृतिक इंटेलीजेंस से पुरस्कृत चूतियों से अधिक संवेदनशील, विनम्र और बुद्धिमान है।
#मनुस्मृति
#नारी
#intellectual
#स्त्री
श्वेतार्क कल्प तंत्र
श्वेतार्क कल्प तंत्र
श्वेतार्क मूल तंत्र - श्वेत मदार की जड़ लाकर श्वेत चंदन के साथ मिलाकर उसका तिलक लगाने से मनुष्य संसार को मोहित कर लेता है। पुष्य नक्षत्र में श्वेतार्क की जड़ को खोदकर लायें। उस जड़ को दाहिने हाथ में बाँधने से साधक को सिंह की बाधा नहीं होती है।
पुष्य नक्षत्र में श्वेतार्क की जड़ खोदकर साफ स्वच्छ करके, पत्थर से पीसें, थोड़ी मात्रा में जल भी मिलायें। इसे किसी कपड़े से छानकर उसमें पंचगव्य तथा गोरोचन और चमेली में मिलाकर इसे दुकानादि व्यापार स्थल में रखें तो अद्भुत लाभ होता है। (परीक्षित है)।
आधि-व्याधिहर्ता श्वेतार्क- हर प्रकार की आधि-व्याधि और ऐसे
रोग जिनका निदान न मिल रहा हो अथवा कोई औषधि लाभ न कर रही हो तो आक (मदार) के फूल लाकर उन पर सिन्दूर लगायें। तदनन्तर अथर्ववेद काण्ड 9 सूक्त 8 शीर्षोत्क शीर्षामयं के प्रत्येक मंत्र के आदि में "ॐ श्री ह्रीं फट स्वाहा" बीज मंत्र लगाकर मंत्रों को पढ़ते हुए रोगीके सिर से पैर तक फूल उतारें और फिर उन फूलों को रोगीके घर के बाईं ओर गाड़ दें तो समस्त रोग दूर हो जाते हैं।
सौभाग्य प्राप्ति - श्वेत आक की जड़ पुष्य नक्षत्र में उखाड़कर दाहिनी भुजा में बाँधने से दुर्भगा स्त्री को भी स्वामी से सौभाग्य को प्राप्त होता है।
कामनासिद्धि - रविवार पुष्य नक्षत्र में श्वेतार्क की जड़ ग्रहण कर उसकी एक अंगुष्ठ के समान गणनाथ की प्रतिमा को बनाकर भक्तिभाव से लाल कनेर की कुसुम और गन्धादि उपचारों से पूजन कर हविष्य अन्न खायें, जितेन्द्रिय रहे। नाम मंत्र से पूजा करें और बीजादिके अन्त में नमः लगायें। इस प्रकार पूजन करें तो जिस वस्तु की इच्छा करें व्ह एक मास में पूर्ण होगी। प्रत्येक कामना की सिद्धि के निम्ति एक महीने भर पूजा करें।
गणेश मंत्र...................। पुष्य नक्षत्र में श्वेतार्क की जड़ ग्रहणकर उसे छाया में सुखाकर पूर्ण कर एक कर्ष या आधे पल प्रातः काल उठकर.................इस मन्त्र से अभिमंत्रण कर मट्ठे के साथ या घी के साथ खायें। यह औषधि पचने पर दूध भात खायें। ऐसा सात दिन खाने से बालक भी कवि हो जाता है। श्वेतार्क के वृक्ष का पीढ़ा बनाकर उसमें बैठकर धीरे-धीरे घी के साथ भोजन करें तो भीमसेन के समान भोजन करेगा।
पुष्य नक्षत्र में श्वेतार्क का पंचांग ग्रहणकर उसका चूर्ण बना लें उस चूर्ण को घी तथा मधु मिलाकर सेवन करें। एक मास तक इसका सेवन करना पुष्टिकारक तथा वीर्यवर्धक होता है।
सफेद आर्क (श्वेतार्क) के पौधे का पंचांग लेकर छाया में सुखाये और उसका चूर्ण बनाये। इस चूर्ण को गाय या भैंस के दूध में भिगो दें। इस प्रकार पाँच बार भक्ति करने की क्रिया से श्रेष्ठ औषधि तैयार हो जाती है।
औषधि के चूर्ण हो जाने पर इसे सौंठी के चावल और दूध से प्रयोग करें। इस प्रकार नियमित रूप से एक मास तक सेवन करें। औषधि सेवनकाल में तैलादि पदार्थों का ग्रहण करना वर्जित है।
इसके सेवन के फलस्वरूप शरीर में रक्त, मेद तथा माँस की वृद्धि होती है। यह बुद्धिवर्धक तथा वृद्धावस्था को भी दूर करता है। इस औषधि के सेवनादि से शरीर में सूर्य के समान दीप्ति आ जाती है।
श्वेतार्क की जड़ सुहागे के साथ घोटकर पिलाने से सर्पविष उतर जाता है। श्वेतार्क की जड़, नीम की पत्ती, काली मिर्च, पीसकर पानी के साथ पिलाने से सर्पविष नष्ट होता है। श्वेतार्क के कोमल पत्ते गुड़ में लपेटकर खिलाने से सर्पविष नष्ट होता है। श्वेतार्क का छिलका कूटपीसकर फिटकरी में मिलाकर विष स्थान पर लगायें इससे सर्पविष नष्ट होता है।
श्वेतार्क कल्प प्रयोग विधि शनिवार के दिन वृक्ष के पास निमंत्रण देने जायें तो सर्वप्रथम 'मम् कार्य सिद्धि कुरू कुरु स्वाहा'। यह मन्त्र वृक्ष के सामने हाथ जोड़कर बोलें और चन्दन चावल और पुष्प, नैवेद्य से पूजन करें धूपादि दें और मौली बाँधकर आ जायें। दूसरे दिन रवि पुष्य नक्षत्र को सुबह से पहले स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर जायें निम्न मंत्र बोलकर खोदे और जड़ ले आए। जड़ को उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके खोदकर प्राप्त करना चाहिए।
मन्त्र - ॐ नमो भगवते ............... ॐ संतु स्वाहा।
इस मन्त्र से मूल (जड़) को लाकर पंचामृत से धोकर ऊँचे और शुद्ध स्थान पर रख दें, तत्पश्चात् पुष्य नक्षत्र रहते उस जड़ से भगवान गणेश जी की मूर्ति बनायें।
मन्त्र - .................। से अभिमंत्रित करके किसी भी कार्यवश साथ में लेकर जायें तो अवश्य सफल होता है। सूर्यग्रह शांति के लिए श्वेतार्क की समिधा से होम करने का शास्त्रीय विधान है।
आक का वास्तु पर कुप्रभाव
चूंकि आक दूध वाला वृक्ष है अतः इसे घर पर नहीं लगाना चाहिए। अथवा घर के पीछे लगा सकते हैं।
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स्त्री
ये बस एक प्रचलित धारणा थी कि औरत "भावुक" होती है.. अब ये धारणा टूट रही है.. जैसे जैसे औरतें घरों से आज़ाद हो रही हैं, मनोवैज्ञानिकों और सबको अब ये समझ आ रहा है कि पहले की प्रचलित भावुकता का सीधा संबंध औरत की आज़ादी से जुड़ा हुआ था.. औरत अपनी स्थिति के प्रति भावुक थी न कि रिश्ते और संबंधों के प्रति.. रिश्तों में औरतें बिल्कुल भी भावुक नहीं होती हैं
इसके उलट रिश्ते को लेकर मर्द कहीं अधिक भावुक और मूर्ख होता है.. औरत अपनी और अपनी नस्ल की सुरक्षा के लिए भावुक होती है.. ये सुरक्षा उसे किसी भी रूप में मिले उसे इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.. इसीलिए वो तलाक भत्ता ले कर अपने जीवन में खुश रहती है जबकि मर्द सब दे कर आज़ाद होने के बाद भी विलाप किया करता है.. अगर कानून उल्टा हो जाए और मर्दों को गुज़ारा भत्ता मिलने लगे तो शायद एक भी मर्द अपनी औरत से भावुकता वश गुज़ारा भत्ता नहीं लेगा.. ये हक़ीक़त है
मर्द भावुक रूप से औरतों से कहीं अधिक कमज़ोर प्राणी होते हैं.. जितने भी कानून बूढ़े मर्दों ने अपनी बेटियों के प्रेम में भरकर मर्दों के खिलाफ़ बनाए हैं ये औरतें कभी नहीं कर सकती थीं.. अभी तक औरतों पर जितना भी ज़ुल्म मर्दों ने किया या उन्हें प्रताड़ित किया वो सब अपनी शारीरिक शक्ति अधिक होने के कारण किया.. वो चाहे उसने उन्हें पर्दे में रखा या फिर घरों के काम करवाए
ये सब कुछ शारीरिक शक्तियों के डर में हुआ.. भावुकता वश ये सब कभी नहीं हुआ.. औरत ने भावुक होकर खाना नहीं बनाया, औरत ने भावुक होकर बच्चे नहीं पैदा किए, औरत ने भावुक होकर कभी सेवा नहीं की.. ये सब मजबूरी और शक्ति के डर से हुआ.. जबकि मर्द ने सब कुछ, चाहे वो औरत के लिए कमाना और उसकी सुरक्षा करना, सारे परिवार को पालना और घर चलाना हो, ये सब कुछ उसने हमेशा "भावुकता" वश किया.. क्योंकि शक्ति के मामले में हमेशा औरत से अधिक मज़बूत प्राणी को आप शक्ति और बल के डर से ये सब काम कभी नहीं करवा सकते थे.. वो ये सब भावुकता वश करता था और आज भी करता है
इसलिए औरत अगर अपने पति को ये बोलती है कि "मैं तुमसे प्यार करती हूं" तो इसका अर्थ वो कभी नहीं होता है जो मर्द द्वारा "आई लव यू" कहने का होता है.. औरत के आई लव यू का अर्थ होता है कि "तुमने मुझे जो सुरक्षा दी उसके लिए मैं तुम्हें प्यार करती हूं, तुमने मुझे जितना आराम से रखा उसके लिए मैं तुम्हें प्यार करती हूं, तुमने मुझे इतने दिन जो मेरा ठीक से खर्चा उठाया उसके लिए मैं तुम्हें प्यार करती हूं".. औरत के आई लव यू कहने का ज़्यादातर समय यही "अर्थ" होता है जबकि मर्द अगर अपनी औरत को आई लव यू बोलता है तो वो पूरी तरह से "भावनात्मक" होता है.. वहां किसी सुरक्षा और किसी तरह के व्यापारिक संबंध का कोई जुड़ाव नहीं होता है
मर्द का प्रेम पूर्ण रूप से भावनात्मक होता है.. औरत का प्रेम "कैलकुलेशन" या "गुणा और गणित" होता है
महमूद ग़ज़नवी
1 )महमूद ग़ज़नवी ---वर्ष 997 से 1030 तक 2000000 , बीस लाख सिर्फ बीस लाख लोगों को महमूद ग़ज़नवी ने तो क़त्ल किया था और 750000 सात लाख पचास हज़ार लोगों को गुलाम बना कर भारत से ले गया था 17 बार के आक्रमण के दौरान (997 -1030). ---- जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया , वे शूद्र बना कर इस्लाम में शामिल कर लिए गए। इनमे ब्राह्मण भी थे क्षत्रिय भी वैश्य भी और शूद्र तो थे ही।.
2 ) दिल्ली सल्तनत --1206 से 1210 ---- कुतुबुद्दीन ऐबक --- सिर्फ 20000 गुलाम राजा भीम से लिए थे और 50000 गुलाम कालिंजर के राजा से लिए थे। जो नहीं माना उनकी बस्तियों की बस्तियां उजाड़ दीं। गुलामों की उस समय यह हालत हो गयी कि गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दू गुलाम हुआ करते थे ।
3) इल्ल्तुत्मिश ---1236-- जो भी मिलता उसे गुलाम बना कर, उस पर इस्लाम थोप देता था।
4) बलबन ---1250-60 -- ने एक राजाज्ञा निकल दी थी , 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उत्तर दो। महिलाओं और लड़कियों वो गुलाम बना लिया करता था। उसने भी शहर के शहर खाली कर दिए।
5) अलाउद्दीन ख़िलजी ---- 1296 1316 - अपने सोमनाथ की लूट के दौरान उसने कम उम्र की 20000 हज़ार लड़कियों को दासी बनाया, और अपने शासन में इतने लड़के और लड़कियों को गुलाम बनाया कि गिनती
कलम से लिखी नहीं जा सकती। उसने हज़ारों क़त्ल करे थे और उसके गुलमखाने में 50000 लड़के थे और 70000 गुलाम लगातार उसके लिए इमारतें बनाने का काम करते थे। इस समय का ज़िक्र आमिर खुसरो के लफ़्ज़ों में इस प्रकार है " तुर्क जहाँ चाहे से हिंदुओं को उठा लेते थे और जहाँचाहे बेच देते थे।.
6) मोहम्मद तुगलक ---1325 -1351 ---इसके समय पर तने कैदी हो गए थे की हज़ारों की संख्या मेंरोज़ कौड़ियों के दाम पर बेचे जाते थे।
7) फ़िरोज़ शाह तुगलक -- 1351 1388 - इसकेपास 180000 गुलाम थे जिसमे से 40000 इसके महल की सुरक्षा में लगे हुए थे। इसी समय "इब्न बतूता " लिखते हैं की क़त्ल करने और गुलाम बनाने की वज़ह से गांव के गांव खाली हो गए थे। गुलाम खरीदने और बेचने के लिए खुरासान ,गज़नी,कंधार,काबुल और समरकंद मुख्य मंडियां
हुआ करती थीं। वहां पर इस्तांबुल,इराक और चीन से से भी गुलाम ल कर बेचे जाते थे।
8) तैमूर लंग -1398/99 -- इसने दिल्ली पर हमले के दौरान 100000 गुलामों को मौत के घाट उतरने के पश्चात ,2 से ढ़ाई लाख कारीगर गुलाम बना कर समरकंद और मध्य एशिया ले गया।
9) सैय्यद वंश -1400-1451 - हिन्दुओं के लिए कुछ नहीं बदला, इसने कटिहार ,मालवा और अलवर को लूटा और जो पकड़ में आया उसे या तो मार दिया या गुलाम बना लिया। .
10) लोधी वंश-1451--1525 ---- इसके सुल्तान बहलूल ने नीमसार से हिन्दुओं का पूरी तरह से वंशनाश कर दिया और उसके बेटे सिकंदर लोधी ने यही हाल रीवां और ग्वालियर का किया।
11 ) मुग़ल राज्य -1525 -1707 --- बाबर - इतिहास में ,क़ुरान की कंठस्थ आयतों ,कत्लेआम और गुलाम बनाने के लिए ही जाना जाता है।
12 ) अकबर ---1556 -1605 ---- बहुत महान थे यह अकबर महाशय , चित्तोड़ ने जब इनकी सत्ता मानाने से इंकार कर दिया तो इन्होने 30000 काश्तकारों और 8000 राजपूतों को या तो मार दिया या गुलाम बना लिया और, एक दिन भरी दोपहर में 2000 कैदियों का सर कलम किया था। कहते हैं की इन्होने गुलाम प्रथा रोकने की बहुत कोशिश की फिर भी इसके हरम में 5000 महिलाएं थीं। इनके समय में ज्यादातर लड़कों को खासतौर पर बंगाल की तरफ अपहरण किया जाता था और उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था। इनके मुख्य सेनापति अब्दुल्लाह
खान उज़्बेग, की अगर मानी जाये तो उसने 500000 पुरुष और गुलाम बना कर मुसलमान बनाया था और उसके हिसाब से क़यामत के दिन तक वह लोग एक करोड़ हो जायेंगे।
13 ) जहांगीर 1605 --1627 --- इन साहब के हिसाब से इनके और इनके बाप के शासन काल में 5 से 600000 मूर्तिपूजकों का कत्ल किया गया था औरसिर्फ 1619-20 में ही इसने 200000 हिन्दू गुलामों को ईरान में बेचा
था। 14) शाहजहाँ 1628 --1658 ----इसके राज में इस्लाम बस ही कानून था, या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उत्तर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतरा था। जवान लड़कियां इसके हरम भेज दी जाती थीं। इसके हरम में सिर्फ 8000 औरतें थी।
15) औरंगज़ेब-1658-1707 - इसके बारे में तो बस इतना ही कहा जा सकता है की ,जब तक सवा मन जनेऊ नहीं तुलवा लेता था पानी नहीं पीता था। बाकि काशी मथुरा और अयोध्या इसी की देन हैं। मथुरा के मंदिर
200 सालों में बने थे इसने अपने 50 साल के शासन में मिट्टी में मिला दिए। गोलकुंडा में 1659 सिर्फ 22000 लड़कों को हिजड़ा बनाया था।
16)फर्रुख्सियार -- 1713 -1719 ,यही शख्स है जो नेहरू परिवार को कश्मीर से दिल्ली ले कर आया था, और गुरदासपुर में हजारों सिखों को मार और गुलाम बनाया था।
17) नादिर शाह --1738 भारत आया सिर्फ 200000 लोगों को मौत के घाट उत्तर कर हज़ारों सुन्दर लड़कियों को और बेशुमार दौलत ले कर चला गया।
18) अहमद शाह अब्दाली - 1757-1760 -1761 ----पानीपत की लड़ाई में मराठों युद्ध के दौरान हज़ारों लोग मरे ,और एक बार में यह 22000 लोगों को गुलाम बना कर ले गया था।
19) टीपू सुल्तान --1750 - 1799 --- त्रावणकोर के युद्ध में इसने 10000 हिन्दू और ईसाईयों को मारा था एक मुस्लिम किताब के हिसाब से कुर्ग में रहने वाले 70000 हिन्दुओं को इसने मुसलमान बनाया था।
Tuesday, 6 January 2026
दलित शूद्र
1757 मे #प्लासी के युद्ध मे अपने हाथी और घोड़ो की #लिद साफ करने और अपनी तोपे खींचने अंग्रेज अपने साथ युगांडा, माली, केन्या,नाइजर जैसे देशो से अपने साथ कई मजदूर लाए थे, जिन मजदूरों की औलादो ने समय समय पर अंग्रेजो की #सेवा की और भारतवर्ष के रजवाड़ो के खिलाफ लडाईओ मे अंग्रेजो का साथ देकर देश को गुलाम बनाए रखने मे मदद की..
जिसका उल्लेख बड़े दलित इतिहासकार #VT_Rajshekhar ने अपनी किताब #the_black_Untouchable_of_india मे किया है,
और यही भीमते अपने आप को यहाँ का #मूलनिवासी बताते है,
जो आप उनके शारीरिक ढांचे, खानपान, बर्ताव और मानसिक #बुद्धि स्तर से भी समझ सकते है
बुक AMAZON और Flipcart पर उपलब्ध है
निर्दोष संवैधानिक अछूत
महाशिवरात्रि नव संवत्सर
महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही होती है। अन्य मास की कृष्ण चतुर्दशी मास-शिवरात्रि है। संवत्सर भी महाकाल रूप शिव का एक चक्र है। संवत्सर के अन्त में उसकी रात्रि होगी। फल्गु का अर्थ है खाली, उसके दहन के बाद पुनः नये संवत्सर की सृष्टि होती है। फल्ग्व्या च कलयाकृताः (गजेन्द्र मोक्ष)।
पुराण तथा धर्म शास्त्रों का वर्तमान संस्करण विक्रमादित्य काल का है, अतः विक्रम संवत के अनुसार ही निर्णय होना चाहिए।
Sunday, 4 January 2026
1947 में घोसी मुसलमानों के अवैध कब्जे मे थी कृष्ण जन्मभूमि
*1947 में घोसी मुसलमानों के अवैध कब्जे मे थी कृष्ण जन्मभूमि*
*फिर उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने कैसे बनवाया मंदिर ?*
-1670 में औरंगजेब ने मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़ दिया था... उसके बाद 281 सालों तक कृष्ण जन्मभूमि पर कोई मंदिर नहीं था... सिर्फ एक बहुत छोटा सा अस्थाई मंदिर बनाकर घंटा लगा दिया गया था जहां स्थानीय पंडे और पुजारी दर्शन करवाते थे... वो प्रतीक रूप में ही था... कि यहां पर भगवान कृष्ण का जन्म हुआ है
-आज जिस मंदिर को हम कृष्ण जन्मभूमि पर देखते हैं वो बहुत पुराना नहीं है... इस मंदिर का निर्माण कार्य 1984 में पूरा हुआ था... इस वर्तमान मंदिर का निर्माण कैसे हुआ ? आपको समझाते हैं...
-आजादी के पहले करीब साल 1940 में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने मथुरा का दौरा किया था.. तब उन्होंने देखा था कि कृष्णजन्मभूमि की जमीन पर घोसी मुसलमानों ने अवैध कब्जा जमा रखा था
-इसके अलावा बहुत लंबे समय से यहां पर पुराने तोड़े गए मंदिरों का मलबा भी पड़ा हुआ था...
- जुगल किशोर बिड़ला ने जब कृष्ण जन्मभूमि का बुरा हाल देखा तो वो काफी दुखी हुए । 1940 में जुगल किशोर बिड़ला ने मदन मोहन मालवीय को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि वो पैसा लगाने को तैयार हैं आप यहां पर एक भव्य केशवदेव मंदिर का निर्माण करवाइए ।
- लेकिन केशव देव का मंदिर बनाने के लिए पहले कृष्ण जन्मभूमि की जमीन को खरीदना जरूरी था ।
-1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई और 1803 में मराठों ने मुगलों को गोवर्धन के युद्ध में हरा दिया और उन्होंने कृष्ण जन्मभूमि को सरकारी जमीन घोषित कर दिया
-1803 में अंग्रेजों ने मराठा सूबेदार दौलतराव सिंधिया को हराकर मथुरा पर कंट्रोल कर लिया । अंग्रेजों ने भी मराठों की पॉलिसी को जारी रखते हुए कृष्ण जन्मभूमि को सरकारी जमीन ही दर्ज रहने दिया
- 1815 तक कृष्ण जन्मभूमि सरकारी जमीन के तौर पर दर्ज थी... लेकिन साल 1815 में अंग्रेजों ने कृष्ण जन्मभूमि की नीलामी की
- बनारस के राजा पटनीमल ने साल 1815 में 13.37 एकड़ का पूरा कृष्ण जन्मभूमि परिसर खरीद लिया । जहां मस्जिद खड़ी थी वो जमीन भी राजा पटनीमल के नाम पर लिख दी गई
- साल 1832 में शाही ईदगाह के मुअज्जिन ने ब्रिटिश कोर्ट में केस दायर किया लेकिन अंग्रेज जजों ने ईदगाह के मुअज्जिन का केस खारिज कर दिया
- 1947 के पहले पूरी कृष्ण जन्मभूमि बनारस के राजा पटनीमल के वंशज राय किशन दास के नाम पर थी।
- 8 फरवरी 1944 को मदन मोहन मालवीय की मदद से जुगल किशोर बिड़ला ने 13.37 एकड़ की ये पूरी जमीन राय किशन दास से 13 हजार रुपए में खरीद ली
- साल 1951 में कृष्ण जन्मभूमि से यथा संभव अवैध कब्जे हटवाए गए । फिर जुगल किशोर बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की... तब मदन मोहन मालवीय की मृत्यु हो चुकी थी लेकिन जुगल किशोर बिड़ला ने मदन मोहन मालवीय के सपने को साकार करने के लिए जन्मभूमि पर निर्माण कार्य शुरू करवाया था।
-उद्योगपति विष्णु हरि डालमिया और रामनाथ गोयकना ने भी कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण के लिए काफी धन खर्च किया... और इस तरह औरंगजेब के द्वारा मंदिर का विध्वंस किए जाने के 281 साल बाद दोबारा कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर बनकर तैयार हुआ
Thursday, 1 January 2026
ऋग्वेद
ऋग्वेद को बार-बार पढ़ने पर मुझे लगा कि इसको समझने में दो सबसे बड़ी बाधाएँ हैं।
प्रथम, ऋग्वेद के ऋषियों ने यह ज्ञान का भण्डार एक-दो वर्षों में न देकर सैकड़ों वर्षों में दिया है। हम आज तक ऋग्वेद के चार सौ दो ऋषियों को उनके काल के अनुसार व्यवस्थित नहीं कर पाए हैं जिससे एक विषय पर विचारों का विकास कैसे हुआ है यह समझने में कठिनाई होती है। ऐसा न होने पर जो कभी-कभी ऋषियों के विचारों में विरोधाभास प्रतीत होता है उसकी गुत्थी सुलझाना भी कठिन हो जाता है।
दूसरे, ऋग्वेद के प्रमाणिक इण्डैक्सों का अभाव हैं। जो इण्डैक्स हैं भी वे अपने में पूर्ण नहीं है।
उदाहरण के लिये विदेशी विद्वान् ए.ए.मैकडोनेल एवं ए. वी. कीथ का वैदिक इन्डैक्स ले लें। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इन विद्वानों ने बहुत परिश्रम से बहुत बड़ा काम किया है। इस ग्रन्थ में कुछ कमियाँ होना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिये इसमें बहुत सारे शब्द और विषय हैं ही नहीं। फिर इन विद्वानों ने अपने को एक या दो ग्रन्थों तक सीमित न रखकर अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को ले लिया है। इससे विचारों की क्रमबद्धता तथा स्पष्टता में कमी आई है। फिर मुद्रण की भी काफी कृपा हुई है।
इसी तरह ऋग्वेद संहिता, जो वैदिक संशोधन संस्थान मण्डल पूना के दो विद्वानों द्वारा सम्पादित की गयी हैं, के अन्त में जो ऋषियों, देवताओं तथा मन्त्रों की तालिकाएँ दी गयी हैं वे महत्त्वपूर्ण हैं, पर उन्हें वैदिक इण्डैक्स नहीं कहा जा सकता है। इसमें भी संकट का अपना योगदान तो है ही।
ऋग्वेद के अध्ययन की अनेक विधियाँ हो सकती हैं। एक विधि तो विदेशी विद्वानों, विशेषकर मैक्समूलर (max muller, 1875), आर.टी.एच ग्रिफिथ (R.T.H. Griffith, 1982) एच, ओल्डेनवर्ग (H. Oldenberg, 1912) आदि की हैं या फिर विशिष्ट अंशों का आलोचनात्मक अध्ययन करने वाले विद्वानों जैसे रूडोल्फ रौथ (Rudolph Rotlh ), कर्ल गेल्डनर (Karl Geldener), ए. कैगी (Adolf Kaegi), रोअर (Roer), एहिलीब्रेण्ड (Ahillibrandt), ए. ए. मैकडोनेल (A.A. Mecdinell), ए.बी.कीथ (A.B. Keith) आदि ने अपनाई है।
इन विदेशी विद्वानों द्वारा रचित ग्रन्थ उत्तम हैं पर उनमें कुछ कमियाँ भी हैं। उदाहरण के लिये ए.ए. मैकडोनेल का मत है कि कोई ‘‘कोई भी विषय ऐसा नहीं है जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से निरूपण किया जा सके’’ (पृष्ठ 8)। ‘‘वैदिक पुराकथा शास्त्र एक ऐसे देश और काल तथा सामाजिक और भौगोलिक स्थिति की कृतियाँ हैं जो हम (बिटिश) लोगों से अत्यन्त दूरस्थ और अत्यधिक भिन्न हैं’’ (पृष्ठ 8)। स्पष्ट है कि पाश्चात्य सभ्यता में पले, बढ़े और रंगे लोगों को भारतीय संस्कृति, जो अपने में अनूठी है, को समझने में गलतियाँ हो जाना स्वाभाविक है।
भारतीय विद्वानों जैसे सायण, वेंकटमाधव का भाष्य जो डॉ. लक्ष्मण स्वरूप द्वारा सम्पादित है, स्वामी दयानन्द, सातवलेकर आदि ने ऋग्वेद पर लिखा है पर उनमें आपस में ही मतभेद है, वे विज्ञान की सहायता नहीं लेते हैं, वे किसी आधुनिक शोध विधि को भी नहीं अपनाते हैं। तथा संस्कृत शब्दों के विभिन्न अर्थों के आधार पर अपने-अपने अनुसार व्याख्या करते हैं। उन्होंने भी ऋषियों को कालानुसार व्यवस्थित नहीं किया है।
फलतः ये विद्वान् भी विदेशी विद्वानों की तरह ऋग्वेद के देवताओं को न तो चिह्नित कर पाए हैं। और न उनके पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट कर पाए हैं और भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं। वे इन देवताओं की पूजा-अर्चना की बात करते हैं पर उसके पीछे छिपे अर्थों को स्पष्ट नहीं करते हैं।
भारतीय धर्मग्रन्थों में पंच तत्त्वों-आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जल की बड़ी महिमा है। कहा तो यहाँ तक गया है कि सभी भौतिक पदार्थ और यहां तक सभी प्राणी उन्हीं की देन हैं। आधुनिक विज्ञान इस बात से सहमत है यद्यपि उसने इन पाँचों तत्वों के ही लगभग 128 उप-तत्त्व मालूम कर लिये हैं तथा उसका मत है कि इन्हीं के संचय (Combination_ तथा क्रमचय (Permution) से सभी भौतिक पदार्थों और जन्म का विकास होता है।
ऋग्वेद के अधिकांश देवता प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जो अजर-अमर और सर्वव्यापी हैं तथा अपने-अपने नियमों से बँधी हुई हैं। यदि, मनुष्य उन्हें पूजे, अर्थात उनके सहयोग में चलते हुए उनके नियमों का पालन करे, तो निश्चित ही वह स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होगा तथा सुखी और सन्तुष्ट रहेगा। पर जब वह प्रकृति को जीतना चाहता है और उनके नियमों का पालन नहीं करता है तो वह स्वयं तो दुखी रहता ही है पर प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़कर अपने तथा समाज के लिए विष के बीज बो देता है। वर्तमान इस बात को चीख-चीखकर स्वीकार कर रहा है।
ऋषियों ने शनैः शनैः आत्मा का भी पता लगा लिया था तथा यह भी मालूम कर लिया था कि आत्मा अजर और अमर है तथा यह बार-बार किसी न किसी शरीर में प्रविष्ट होकर उसे जीवित कर देती है। ये ऋषि परमात्मा, विष्णु शिव या रुद्र आदि के बारे में भी अधिक-अधिक जानने का प्रयास करने लगे थे और ऋषि भौतिक देवताओं से आध्यात्मिक देवताओं की तरफ जा रहे थे। ऋषिगण केवल काल्पनिक बातें नहीं कर रहे थे, वे वास्तव में वैज्ञानिक खोजें कर रहे थे। यह बात दूसरी है कि उनकी खोज करने के तरीके भिन्न थे।
लेकिन आत्मा भी मरती है। इस विषय पर किसी ने नहीं बात की।
अगर आत्मा मारेगी ही नहीं तो फिर मोक्ष किसका और कैसे........?
गंवार : हम सभी गंवार हैं।
#गंवार : हम सभी गंवार हैं।
बहुत दिन से इस शब्द पर विचार कर रहा था।इस शब्द को हीन भाव से देखा जाता है। कुछ लोग इसे गांव से जोड़ते हैं। कुछ लोग अशिक्षा से।
लेकिन ऐसा नहीं है।
गंवार शब्द का न तो गांव से सम्बन्ध है न अशिक्षा से।
इसका संबंध है हमारे जीवन जीने के तरीके से। जीवन जिया या उसे ऐसे ही गवां दिया।
एक महात्मा ने कहा - अबहूँ न चेत गंवार। अभी भी नहीं चेते तो यह जीवन भी गवां बैठोगे।
कबीर कहते हैं :
रात गवायीं सोय के दिवस गवाए खाय।
हीरा जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाय।।
कृष्ण कहते हैं : अनेक जन्म संसिद्धो सः याति पराम गति। अनेको जन्म की साधना करने से परम गति की प्राप्ति होगी।
यह जिंदगी न मिलेगी दोबारा। जैसी फिल्में बनती हैं जो हमारे मानस में यह भ्रांति भर देती हैं कि जीवन एक बार ही मिलता है। यह ईसा-ई और क_साई दर्शन है। इसीलिए उनके यहां किसी के मरने पर कहते हैं - RIP. अर्थात कब्र में शांति से पड़े रहना डे ऑफ जजमेंट तक।उपद्रव न करना।
लेकिन जिन्होंने जीवन को जाना है वे कहते हैं जीवन सतत प्रवाह है जन्म और मृत्यु के बीच।
हो सकता है कि आप कहें कि पुनर्जन्म नहीं होता। लेकिन यह आप मानते हैं या जानते हैं? मानते हैं। जानते नहीं।
बात दूसरी तरफ चली गयी।
तो जिस तरह का हम जीवन जीते हैं हम सब गवांर ही हैं।
अजहू न चेत गवांर।
चेतना का क्या अर्थ है - होश जागरण ध्यान Counciosness आदि आदि ।
हम पूरा जीवन बेहोशी में गुजार देते हैं।
आपको अंतिम पंक्ति समझने में शायद कठिनाई हो कि हम और बेहोश? लेकिन सत्य तो यही है कि हम पूरा जीवन बेहोशी में जीते हैं। सत्य से अनभिज्ञ।
ॐ
©Tribhuwan Singh
परिक्रमा कितनी करनी चाहिए
परिक्रमा कितनी करनी चाहिए
भैरव जी की तीन परिक्रमा की जाती है।
. शनि देव जी की सात परिक्रमा की जाती है।
हनुमान जी की तीन परिक्रमा की जाती है।
श्री गणेश जी की तीन परिक्रमा की जाती है।
पीपल के वृक्ष की सात परिक्रमा की जाती है।
भगवान कृष्ण की चार परिक्रमा की जाती है।
भगवान विष्णु की चार परिक्रमा की जाती है।
भगवान श्री राम की चार परिक्रमा की जाती है
माँ दुर्गा की एक परिक्रमा की जाती है।
. शिव जी की आधी परिक्रमा की जाती है।
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