Thursday, 1 January 2026

गंवार : हम सभी गंवार हैं।

#गंवार : हम सभी गंवार हैं।

बहुत दिन से इस शब्द पर विचार कर रहा था।इस शब्द को हीन भाव से देखा जाता है। कुछ लोग इसे गांव से जोड़ते हैं। कुछ लोग अशिक्षा से।

लेकिन ऐसा नहीं है। 
गंवार शब्द का न तो गांव से सम्बन्ध है न अशिक्षा से। 

इसका संबंध है हमारे जीवन जीने के तरीके से। जीवन जिया या उसे ऐसे ही गवां दिया।

एक महात्मा ने कहा - अबहूँ न चेत गंवार। अभी भी नहीं चेते तो यह जीवन भी गवां बैठोगे। 

कबीर कहते हैं :
रात गवायीं सोय के दिवस गवाए खाय।
हीरा जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाय।।

कृष्ण कहते हैं : अनेक जन्म संसिद्धो सः याति पराम गति। अनेको जन्म की साधना करने से परम गति की प्राप्ति होगी। 

यह जिंदगी न मिलेगी दोबारा। जैसी फिल्में बनती हैं जो हमारे मानस में यह भ्रांति भर देती हैं कि जीवन एक बार ही मिलता है। यह ईसा-ई और क_साई दर्शन है। इसीलिए उनके यहां किसी के मरने पर कहते हैं - RIP. अर्थात कब्र में शांति से पड़े रहना डे ऑफ जजमेंट तक।उपद्रव न करना। 
लेकिन जिन्होंने जीवन को जाना है वे कहते हैं जीवन सतत प्रवाह है जन्म और मृत्यु के बीच। 

 हो सकता है कि आप कहें कि पुनर्जन्म नहीं होता। लेकिन यह आप मानते हैं या जानते हैं? मानते हैं। जानते नहीं। 

बात दूसरी तरफ चली गयी। 

तो जिस तरह का हम जीवन जीते हैं हम सब गवांर ही हैं। 
अजहू न चेत गवांर। 

चेतना का क्या अर्थ है - होश जागरण ध्यान Counciosness आदि आदि ।
हम पूरा जीवन बेहोशी में गुजार देते हैं।

आपको अंतिम पंक्ति समझने में शायद कठिनाई हो कि हम और बेहोश? लेकिन सत्य तो यही है कि हम पूरा जीवन बेहोशी में जीते हैं। सत्य से अनभिज्ञ। 

©Tribhuwan Singh

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