Thursday, 15 January 2026

भीष्म पितामह उत्तरायण

क्या जीवन और मृत्यु की उस देहरी पर हमारे पास वह सामर्थ्य रहेगी जो आज के दिन भीष्म ने प्रदर्शित की थी? एक कांशस डेथ। एक सामर्थ्य इच्छा-मृत्यु की। वह कोई फैंटास्टिक सुपर-पॉवर नहीं है। उसमें अर्थ के अनेक स्तर हैं। अपने भौतिक अस्तित्व से विदा लेने का मुहूर्त स्वयं चुनना। मैंने सुना है कि आजकल सीजेरियन ऑपरेशन के चलते ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त पूछकर लोग अपने बच्चों का प्रसव करवा रहे हैं पर अस्तित्व के इस भौतिक तल से दूसरे तल पर जाने का पल चुनना प्राण और चेतना के ऊपर स्वामित्व का महत्तम प्रमाण है। पर वह उस अगले संसार को यह संदेश देना भी है कि उसमें कदम रखना भी बेहोशी में नहीं होगा। उसका सम्मान पूरी जागृति से उसमें प्रवेश करने पर होगा। लोग इन दिनों फ्री विल की बात करते हैं पर भीष्म इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। यह आत्म-निर्णय की स्वायत्तता का चरम था जो मकर संक्रांति के दिन प्रदर्शित हुआ था। मन और शरीर के बीच रिश्तों की जो परिभाषा भीष्म ने रची, वह अनुपम थी। देह के बंध कैसे स्वयं खोले जाते हैं, यह शर शय्या पर लेटे तीरों से बिंधे भीष्म ने बताया था। हाथ पाँव शरीर का अंग हो सकते हैं पर चेतना नहीं। सती के शरीर के अंग प्रत्यंग गिरे पर चेतना कहीं नहीं गिरी। 

हीडेग्गर ने being-toward-death की एक अस्तित्ववादी अवधारणा दी थी। हालाँकि उसके फ्रेमवर्क में भी मृत्यु हम पर से गुजरती है पर वह हमारे द्वारा शासित नहीं होती। भीष्म इतने दिन मृत्यु की छाया में बिताते रहे थे। फिर भी उनकी आत्मशक्ति इतनी गहरी थी कि मृत्यु भी उनके लिए अंत का कोई आरोपित बिंदु नहीं थी, वह एक चयन की पात्र थी। बात मृत्यु के निषेध की नहीं थी, वह उसे मन के समस्त जागरण में चुनने की थी।

इसीलिए हमारी परंपरा में यम-पूजा का एक अंग भीष्मानुस्मरण भी है। इसलिए पितृ पूजा में भी वे हैं। 

शरीर के अवसान के कुछ जैविक अपरिहार्यत्व हैं।हम यह तो चुन सकते हैं कि क्या खायें, क्या पियें। पर यह तो मौत के क्षण रोने वालों को सान्त्वना देने का हमारा स्टैंडर्ड दिलासा होता आया कि मौत पर हमारा बस नहीं है। लेकिन भीष्म के हिसाब से देखें तब मृत्यु के मुहाने पर हमारी असहायता हमारी अविकसित चेतना का ही परिपाक है।अन्यथा जीवन अपनी टर्म्स पर पूरा किया जा सकता है। 

लोग संभ्रम में मरते हैं, पीड़ा में भी, भय में भी और अचेतावस्था में भी। भीष्म पूरी स्पष्टता और चेतना की ऊर्ध्वता में गये।उनकी मृत्यु उनके चयन के कारण संक्रांति नहीं हुई बल्कि उसके कारण एक पर्व, एक सेक्रेड समारोह में बदल गई।

भीष्म की कथा किसी कृतज्ञ पिता से इच्छा मृत्यु का वरदान मिलने की कथा नहीं है। वह भीष्म प्रतिज्ञा के संकल्पव्रती की संकल्प शक्ति  की कथा है। अपने सबसे वल्नरेबल क्षण में उनकी स्पिरिट की संप्रभुता और स्वायत्तता की कथा है। उनकी शरशय्या किसी पराजित की भूमि नहीं है, वह तो जैसे एक सिंहासन है जिस पर से वह अपने सबसे profound प्राधिकार का उपयोग करते हैं। एक ऐसे संसार में रहते हुए कि जिस संसार में मौत मेडिसिन की असफलता के रूप में बाँची जाती है, हम लोग भीष्म के महाप्रयाण में महाप्राण होने का असली साक्ष्य ढूँढ सकते हैं। कि शक्ति का प्रमाण वे युद्ध नहीं थे कि जिसमें भीष्म ने अपने प्रतिद्वंदियों को पराजित किया था बल्कि खुद अपनी किताब का आखिरी अध्याय स्वयं लिखने की सचेतनता थी। क्या वह एक योग-योग्यता थी जिसमें अपनी जीवन-ऊर्जा पर अधिकार भी था और जागतिक लॉ से अपनी इतनी संपृक्ति (alignment) भी थी कि प्रभु की इच्छा अपनी इच्छा में फर्क ही न रह जाए? 

भीष्म अपने अंतिम क्षण अनुताप में नहीं, अनुध्यान और अनुचिंतन में बिताते हैं। वहाँ विष्णु सहस्रनाम है। उनके ये पल उत्तरायण की प्रतीक्षा के पल कम हैं, उत्तर देने के पल अधिक हैं। सब उन्हें घेरकर बैठे हैं और वे सबका शंका-समाधान कर रहे हैं। पर यह पल है नश्वरता से अपने रिश्तों को परिभाषित करने का।

भीष्म भाग्यशाली हैं कि उन्होंने युद्ध में न्यस्त जितना होना था हुए पर उससे अधिक दिनों तक वे युद्ध के साक्षी रहे और दृष्टि की वह अनासक्ति अर्जित की कि जो किसी एक्टिव पार्टिसिपेंट को मिलना संभव नहीं था। 

क्या मृत्यु के क्षण हममें यह mindfulness रहेगी? क्या हम ऐसे अपने जीवन का जायजा ले सकेंगे? और ऐसे ग्रेस के साथ इस फानी दुनिया को ‘अलविदा’ कर सकेंगे? भीष्म की तरह मौत को रोककर रखना शायद हमें न आये पर इतना ही हो कि हमारी मृत्यु कोई मेडिकल ईवेंट न बने, वह एक सम्मान योग्य मानवीय अनुभव होकर आये। जब हमारे भीतर अपने जीवन-मिशन की पूर्णता के बोध की प्रशान्ति और आस्तिक्य हो।

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