विश्व का एक भी पञ्चाङ्ग सही पद्धति द्वारा आजकल पुण्यकाल की गणना नहीं करता,जो कलियुग का प्रभाव है । मेरे सॉफ्टवेयर से बने पञ्चाङ्गों में भी प्रचलित पद्धति का पुण्यकाल ही सम्पादक दे देते हैं । विवाद करने वाले परम्परा की दुहाई देते हैं,यद्यपि पुण्यकाल की वर्तमान परम्परायें कलियुग की हैं । पुण्यकाल का शास्त्रीय मूल “सूर्यसिद्धान्त” है जिसमें पुण्यकाल का शुद्ध गणितीय सूत्र है (सूर्यसिद्धान्त — मानाध्याय श्लोक ११) जो क्लिष्ट तो नहीं है किन्तु गणित के शत्रु कलियुगी पण्डितों ने उसे त्याग दिया । सूर्यसिद्धान्तीय सूत्र का स्थूल स्वरूप यह है कि संक्रान्ति से १६ घटी पहले से लेकर १६ घटी पश्चात तक मध्यम पुण्यकाल होना चाहिये,कुल ३१⋅९८०६ घटी । शुद्ध सूत्र यह है कि ३१⋅९८०६ घटी को “स्पष्टगति ⁄ मध्यमगति” से विभाजित कर दें । शुद्ध सूत्र रविबिम्बमान पर आधारित है जो स्पष्टगति का अनुपाती होता है,अतः मैंने गति वाला सूत्र दिया है । इसको मध्यमशोधित−पुण्यकाल कहना चाहिये ।
सूर्यसिद्धान्त की आचार्य रङ्गनाथ की मध्ययुगीन टीका में विस्तृत उपपत्ति है जिसमें विस्तृत सूत्र तो नहीं है किन्तु सूत्र बनाने की सही पद्धति की विस्तृत व्याख्या है जो सूर्यसिद्धान्त के मूल श्लोक पर आधारित है । आचार्य रङ्गनाथ ने पुण्यकाल की सही परिभाषा दी है जिसपर आजकल कोई ध्यान नहीं देता जिस कारण पुण्यकाल की गलत गणना हो जाती है । पुण्यकाल की परिभाषा यह है कि रविकेन्द्र की गति के आधार पर राशि में परिवर्तन के समय की गणना होती है जिसे संक्रान्ति कहते हैं,परन्तु रविकेन्द्र से पहले ही रवि का पहला क्षितिज राशिसन्धि पर आ जाता है और परवर्ती क्षितिज रविकेन्द्र की अपेक्षा बाद में राशिसन्धि पर आता है । इसी काल को पुण्यकाल कहते हैं । उदाहरणार्थ,यदि किसी दिन रविकेन्द्र की संक्रान्ति से १६ घटी पहले रवि का पहला क्षितिज राशिसन्धि पर आता है तो वह पुण्यकाल का आरम्भ है और तब संक्रान्ति के १६ घटी उपरान्त रविबिम्ब का परवर्ती क्षितिज राशिसन्धि पर आयगा । अतः पुण्यकाल वह कालमान है जिस दौरान सूर्य का कोई न कोई भाग राशिसन्धि को स्पर्श करे । मूल श्लोक में पुण्यकाल को “पुण्यं” कहा गया जिसकी व्याख्या आचार्य रङ्गनाथ ने यह दी कि पूर्व पुण्यकाल एवं अपर पुण्यकाल में स्नानादि−धर्मकृत्य से पुण्यवृद्धि होती है । संक्रान्ति से पहले वाला पुण्यकाल “पूर्व पुण्यकाल” है और संक्रान्ति के पश्चात वाला “अपर पुण्यकाल” है ।
इसमें विशेषता यह है कि सूर्यास्त के पश्चात अगले सूर्योदय तक का काल रात्रि है जिसमें पुण्यकाल नहीं होता । अतः यदि रात्रि में गणितीय पुण्यकाल आ रहा है तो उसका जो हिस्सा दिन में होगा उसी दिन वाले खण्ड में पुण्यकाल माना जायगा । रविबिम्ब का मध्यममान ३१⋅९८०६ कला होता है । इसमें दैनिक स्पष्टागति से भाग करके मध्यमगति से गुणा करेंगे तो स्पष्ट रविबिम्ब का घट्यात्मक मान मिलेगा जो पुण्यकाल है ।
१४ जनवरी २०२२ ई⋅ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अक्षांश २८:०० तथा रेखांश ७८:०० पर सूर्यसिद्धान्तीय गणना द्वारा संक्रान्तिकाल रात्रि २०:३३:०४ बजे है । उस दिन दैनिक स्पष्टागति ३६८१ विकला है जबकि मध्यमगति सदैव ३५४८⋅१७ विकला होती है । दोनों का अनुपात है १⋅०३७४३६ जिसे मध्यम−पुण्यकाल ३१⋅९८०६ घटी में विभाजित करने पर मकर संक्रान्ति का मध्यमशोधित−पुण्यकाल है ३०⋅८२६६ घटी । अतः मध्यमशोधित−पुण्यकाल है संक्रान्ति से ६:०९:५५ घण्टा पहले से लेकर संक्रान्ति से इतने ही घण्टे पश्चात तक । अर्थात् १४ जनवरी को अपराह्न १४:२३:०९ बजे से लेकर २६:४२:५९ बजे अर्थात् मध्यरात्रि के उपरान्त २:४२:५९ बजे तक । रात्रि के पुण्यकाल का महत्व नहीं है,अतः वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल १४ जनवरी को अपराह्न १४:२३:०९ बजे से लेकर स्पष्ट सूर्यास्त तक है ।
कर्क और मकर,षडशीति एवं विषुव संक्रान्तियों के वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल की गणना के पृथक नियम हैं जो सूर्यास्त से पहले संक्रान्ति होने पर तीन कोटि के हैं — कर्क (४),विष्णुपदी एवं अन्य । विष्णुपदी में २,५,८ एवं ११ वीं संक्रान्तियाँ हैं । अन्य में षडशीति (३,६,९,१२),विषुव (१,७) एवं मकर संक्रान्तियाँ हैं ।
सभी संक्रान्तियाँ यदि सूर्यास्त के उपरान्त हों तो उन सबके नियम समान हैं । उनमें से जो संक्रान्ति मध्यरात्रि से पहले हो उसका वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल सूर्यास्त तक ही होता है और आरम्भ स्पष्ट मध्याह्न से माना जाता है । किन्तु गणितीय आरम्भ यदि मध्याह्न के उपरान्त हो तो गणितीय आरम्भ को ही वास्तविक आरम्भ मानना चाहिये जो आजकल नहीं किया जाता ।
सभी संक्रान्तियाँ यदि मध्यरात्रि के उपरान्त हो तो अगले सूर्योदय से वास्तविक स्पष्ट−पुण्यकाल का आरम्भ होगा । आजकल उसका अन्त स्पष्ट मध्याह्न है । किन्तु गणितीय अन्त यदि मध्याह्न से पहले हो तो गणितीय अन्त को ही मानना चाहिये जो आजकल नहीं किया जाता ।
स्पष्ट सूर्यास्त के लिये मध्यम सूर्यास्त में वेलान्तर जोड़ना पड़ता है जो आज ९ मिनट ६ सेकण्ड है । अतः वास्तविक पुण्यकाल १४ जनवरी को अपराह्न १४:२३:०९ बजे से लेकर १७:१९:३९ तक है । परन्तु प्रचलित परम्परा के अनुसार ऐसी स्थिति में स्पष्ट मध्याह्न से वास्तविक पुण्यकाल का आरम्भ मान लिया जाता है जो अनुचित है । कई लोग अगले दिन पुण्यकाल मानते हैं जबकि पिछले सौरदिन में ही गणितागत पुण्यकाल समाप्त है । आपको मकर संक्रान्ति हेतु स्नान जप−तप आदि करना है तो १४:२३:०९ बजे से लेकर १७:१९:३९ तक पुण्यकाल मानें,१५ जनवरी को मत मानें क्योंकि सौर−गणितानुसार पिछले सौरदिन में ही गणितागत पुण्यकाल समाप्त है । अन्य स्थानों के लिए सूर्यास्त में जितना अन्तर हो उतना अन्तर पुण्यकाल में कर दें । सूर्यकेन्द्रोदय की शुद्धि हेतु उपरोक्त पुण्यकाल में साढ़े चार मिनट बढ़ा दें । उपरोक्त कुल पुण्यकाल का जो अंश दिन में,अर्थात् सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच पड़े उसे वास्तविक पुण्यकाल मानें । अगले दिन पुण्यकाल तभी पड़ेगा जब रात्रि में ही कुल पुण्यकाल हो । सूर्यास्त के पश्चात सूर्योदय तक रात्रि है जिसमें वास्तविक पुण्यकाल नहीं माना जा सकता । रात्रि में संक्रान्ति हो तो उसके दो ही भेद सम्भव हैं — मध्यरात्रि से पहले और पश्चात वाली संक्रान्ति । आज की मकर संक्रान्ति मध्यरात्रि से पहले है और इसका गणितीय पुण्यकाल अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त है परन्तु आरम्भ आज के सूर्यास्त से पहले है । अतः १४ जनवरी की सूर्यास्त से पहले गणितीय पुण्यकाल को त्यागकर १५ जनवरी को पुण्यकाल मानना अनुचित है क्योंकि १५ जनवरी का दिन आरम्भ होने से पहले ही रात में ही गणितीय पुण्यकाल समाप्त है । बहस की सम्भावना तब हो सकती है जब दोनों पक्षों में गणितीय पुण्यकाल का अभाव हो,अर्थात् गणितीय पुण्यकाल पूरी तरह रात में ही बीते जो कि सम्भव ही नहीं है क्योंकि वर्ष में कभी भी रात्रि का मान गणितीय पुण्यकाल के अधिक नहीं होता ।
सूर्यसिद्धान्त के अनुसार आज मकर संक्रान्ति का गणितीय पुण्यकाल १४ जनवरी १४:२३:०९ बजे से आरम्भ है और रात में समाप्त है,तो सूर्यास्त के पश्चात वाले अंश को त्यागकर इसके दिन वाले अंश को ही वास्तविक पुण्यकाल मानना उचित है । सूर्यसिद्धान्तीय गणित के विरोध में कलियुगी मान्यताओं को वरीयता नहीं दी जा सकती । वराहमिहिर ने भी सूर्यसिद्धान्त को गायत्री के देवता सविता द्वारा प्रदत्त सिद्धान्त कहा । अतः ज्योतिष के क्षेत्र में सूर्यसिद्धान्त वेदतुल्य है ।
पुण्यकाल में केवल रात्रिखण्ड को छाँटना है । किसी भी स्थिति में उस काल को पुण्यकाल नहीं माना जा सकता जब सूर्य का कोई न कोई खण्ड राशिसन्धि को स्पर्श न कर रहा हो । पुण्यकाल की इस मौलिक परिभाषा को कलियुगी पण्डितों ने भुला दिया जिस कारण पुण्यकाल को लेकर बखेड़ा खड़ा होता है । पुण्यकाल में धार्मिक कर्म का फल बहुत बढ़ जाता है ।
कभी किसी ने लिख दिया कि सूर्यास्त के उपरान्त संक्रान्ति हो तो अगले दिन पुण्यकाल मानें । बिचारे ने मध्यरात्रि के पश्चात वाले अंश को ध्यान में रखकर लिखा किन्तु श्लोक शुद्ध करने के चक्कर में पूरी बात नहीं लिख सके तो अब इसी को आधार मानकर कई लोग गलत पुण्यकाल बताते हैं,परन्तु पुण्यकाल की शास्त्रीय परिभाषा और सूत्र पर ध्यान नहीं देते । गणित में किसी का मत नहीं चलता । पुण्यकाल सूर्य के सम्पूर्ण बिम्ब का राशिसन्धि से स्पर्श को कहते हैं जो गणित द्वारा ही जाना जा सकता है । उस काल के कुछ अंश को रात्रि आदि के कारण त्यागते हैं,किन्तु उस पुण्यकाल से बाहर के काल को पुण्यकाल मानने से पुण्यकाल का फल नहीं मिलेगा ।
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