Monday, 19 January 2026

हिंदू ब्राह्मण विरोध

भारत विनाश अभियान ७०० ई. से अभी तक चल रहा है। इसके लिए बहुसंख्यक हिन्दू समाज को आतंक तथा क्रूर अत्याचार द्वारा धर्म परिवर्तन कराना मुख्य पद्धति रही है। भारत के भीतर भी राज्यों के बीच युद्ध होते थे पर राजा विजित क्षेत्रों को भी अपना ही देश मानते थे और वहां के लोगों का भी विकास करते थे। सभी आक्रमण पश्चिम से असुरों के हुए जिनके नाम पैगम्बरों के अनुसार बदलते रहे। किन्तु केवल भारतीयों को आर्य आक्रमणकारी बनाया। इन्होंने देखा कि पूरे हिन्दू समाज को नष्ट करना सम्भव नहीं है तो एक एक वर्ग पर आक्रमण किया। जिन राजाओं ने पराजय के बाद समजौता नहीं किया उनको अपमानित करने के लिए भंगी बनाया (अमृतलाल नागर-नाच्यो बहुत गोपाल, या वृन्दावन लाल वर्मा-गढ़ कुण्डार, दुर्गावती आदि)। अल बरूनी तथा इसाई जेवियर ने ब्राह्मण विरोध आरम्भ किया तथा कहा कि जब तक ब्राह्मण जीवित हैं, हिन्दू एक बने रहेंगे। इस योजना से टीपू सुल्तान ने मेलकोट में ब्राह्मणों का संहार किया था। अंग्रेजों ने पराजित जातियों को अपराधी जाति घोषित किया, किन्तु उनको बिना अपराध जेल में नहीं डाला। अंग्रेजों ने अपने शासन को उचित सिद्ध करेने के लिए कहा कि भारतीय आर्य भी पश्चिम से आये थे। कहां से और क्यों आये इसका अभी तक पता नहीं चला, किन्तु इसका प्रचार होता रहा। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की शक्ति कम हो गयी और उनको प्रत्यक्ष शासन छोड़ना पड़ा और १९४६ में अपने विश्वस्त नेहरू को प्रधान मन्त्री बना कर उनके माध्यम से विभाजन कराया और ब्रिटेन तथा अमेरिका सदा पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध शक्तिशाली बनाते रहे। ब्रिटेन ने अपने शत्रु देशों को दुर्बल करने के लिए जर्मनी के उपद्रवी कार्ल मार्क्स को बुला कर उनको साम्यवादी साहित्य प्रकाशित करने की सुविधा दी। उस साहित्य का ब्रिटेन की राजनीति या पाठ्यक्रम में कभी स्थान नहीं रहा, केवल विदेशी प्रचार के लिए उसका प्रयोग हुआ। इसका मुख्य काम था उत्पादक वर्ग को शोषक और समाज का शत्रु सिद्ध कर देश की अर्थ व्यवस्था नष्ट करना। रूस में इसके द्वारा राजा को समाप्त कर लेनिन को लाया गया जो हरबार बचने के लिए ब्रिटेन जाता रहता था। रूस में कम्युनिस्ट शासन होने के मात्र ३ वर्ष बाद ताशकन्द में ब्रिटेन ने १९२० भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन करवाया। उसी ताशकन्द में लालबहादुर शास्त्री की भी १९६६ में हत्या हुई क्योंकि वह बिना नेहरू परिवार में जन्म लिए प्रधान मन्त्री बन गये थे। १९४७ तक कम्युनिस्ट सिद्धान्त था उत्पादक तथा मजदूर के बीच संघर्ष कराना। स्वाधीनता के बाद इस संघर्ष को जाति के नाम पर जोड़ा गया, तथा कुछ जातियों पर अन्य जातियों पर अत्याचार का आरोप लगाया। इनके अनुसार विदेशी लुटेरे केवल भारत की उन्नति कर रहे थे। उद्योग-व्यवसाय के बदले केवल जाति आधारित संघर्ष के लिए आरक्षण व्यवस्था की यद्यपि सभी वर्गों में गरीब थे। विप्र का अर्थ ही गरीब ब्राह्मण होता था। विश्व इतिहास में पहली बार जाति आधारित हिंसा काण्ड भारत में १९४७ के बाद कराये गये। गान्धी वध के २ घण्टे के भीतर बिना मोबाइल सम्पर्क के पुणे तथा निकट के नगरों में ब्राह्मण संहार आरम्भ हुआ। उसके बाद बिहार में लालू योजना में तिलक-तराजू तलवार को मारने का अभियान हुआ जिसमें प्रथम लक्ष्य भूमिहार थे। उनके संहार की प्रतिक्रिया में अन्य संहार भी हुए। इस प्रचार का लाभ हुआ कि बिना किसी बाधा के देश लूटते रहें। पहले छिपा कर घूस लेते थे, जाति-विद्वेष फैलाने पर जमीन रजिस्ट्री करा कर घूस लेना आरम्भ हुआ। उसके बाद राजस्थान, हरियाणा में जाट-गूजर या गूजर-मीणा संघर्ष आरम्भ हुआ। १९४७ के पूर्व भारत या विश्व इतिहास में कहीं भी जातिगत संघर्ष नहीं हुआ था, केवल मजहब के आधार पर संहार हुए थे। २०१२ में कांग्रेस सरकार में हिन्दुओं को आतंकवादी सिद्ध करने के लिए कुछ लोगों पर झूठे केस कर ८ वर्ष तक यातना दी गयी किन्तु कोई आरोप पत्र नहीं दे सके। एक कानून लाया गया कि हर दंगे में केवल हिन्दू ही दोषी माना जायेगा किन्तु उसका निर्णय करने का अधिकार भी किसी हिन्दू जज के पास नहीं होगा। सम्पूर्ण हिन्दू समाज के विरुद्ध कानून बनाने के कारण कांग्रेस का पतन हुआ। अतः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा उससे भी कठोर नियम बना-(१) केवल सवर्ण ही जन्मजात अपराधी हैं, (२) बिना हिंसा हुए ही अपराध भावना खोजने के लिए हर महाविद्यालय में गिरोह बनेंगे, (३) अपराधी जातियों को शिक्षा आरम्भ करते ही पकड़ा जायेगा, (४) झूठे केस के लिए कोई दण्ड नहीं होगा, (५) अपराधी खोजने या उसे दण्डित करने का अधिकार सवर्णों को नहीं होगा। यह प्रजातन्त्र के मूल सिद्धान्त के विरुद्ध है। वही शासन दण्ड दे सकता है, जो समाज द्वारा चुना गया है। विश्व में जितने भी कानून बने थे उसमें आरोपी को बचाव का अवसर मिलता था तथा झूठे केस का दण्ड मिलता था जो इस नियम में बन्द कर दिया गया है। यह नव उपनिवेशवाद है।

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