Tuesday, 20 January 2026

मनुस्मृति

मनुस्मृति (४२)

सौ वर्ष की आयु निश्चित ही एक आदर्श रहा होगा। कभी अकालमृत्यु और दुर्घटनाएँ भी होती होंगी। युद्ध में भी लोग मारे जाते होंगे। कामना अवश्य ही यजुर्वेदीय ‘जीवेम शरद: शतं’ की रही होगी लेकिन कामना और यथार्थ के बीच फासला रहा होगा।

पर यह प्रार्थना स्त्री को छोड़कर करना आशयित नहीं रहा होगा। Generic masculine या masculine inclusive की जो अवधारणा तालमुद बाइबल आदि ग्रंथों में चलती है, वह वेदों और स्मृतियों में भी रही होगी। पर वेंडी डोनिगर रोमिला थापर यह छूट मनु को नहीं देना चाहते।

मनुस्मृति जब ब्रह्मचर्य की अवस्था की बात करती है क्या तब वह सिर्फ पुरुष के बारे में बात करती है कि स्त्री के बारे में भी? 

मनु कभी वेद-विरुद्ध बात नहीं करते। इसलिए मनुस्मृति में वेद से असंगत कोई बात आये तो स्वयं वेद की ओर देखने की बात वे स्वयं कई जगह कह गये हैं। अथर्ववेद में स्पष्ट कहा गया है कि- ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्। (११.५.५) कि कन्या ब्रह्मचर्य के बाद किसी युवा को पति के रूप में प्राप्त करे।

लेकिन स्वयंवरण की छूट देते समय मनु फिर आयु में भी छूट दे देते हैं : 

त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्युतुमती सती। 
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देत सदृशं पतिम् ॥ 

जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे तब रजस्वला होने के दिन से तीन वर्ष छोड़ के चौथे वर्ष में अपने सदृश विवाह करे। यानी सत्रहवें वर्ष। 

मुनि धन्वन्तरि ने भी सुश्रुत में कम आयु की कन्या और कम आयु के पुरुष के विवाह को निषेध किया है:

ऊनषोडशवर्षायाम प्राप्ताह पंचविंशतिम
यद्यदात्ते पुमान गर्भा कुच्चीस्थः स विपद्यते

अर्थात 16 से कम कन्या और 25 से कम आयु के पुरुष से जो गर्भ धारण होता है,वह विपत्ति को प्राप्त होता है यानि गर्भ में नहीं ठहरता, चिरकाल तक जीवित नहीं रहता और दुर्बलेन्द्रिय होता है।

सुश्रुत ‘पंचविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे’ के अनुसार पुरुष की विवाह आयु 25 वर्ष और स्त्री की सोलह वर्ष बताते हैं। 

फिर एक ऐसा युग आया जिसमें उनके आदर्श पुरुष छह वर्ष की आयु वाली कन्या से भी शादी कर लेते थे। तब मनुस्मृति में यह वेद-विरुद्ध और स्वयं मनुस्मृति के विरुद्ध यह बात ठूँस दी गई कि: 

त्रिंशद्वर्षोद्वहेत् कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् । त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ 

तीस वर्ष का युवक बारह वर्ष की हृदय को प्रिय लगने नवाली कन्या से विवाह करे अथवा चौबीस वर्ष का युवक आठ वर्ष की सुन्दर कन्या से विवाह करे। इससे शीघ्र विवाह करने वाला गृहस्थ धर्म में कष्ट पाता है। 

ठूँसी गई इसलिए लगती है कि जिस प्रसंग में इसे डाला गया है वहाँ कन्या के स्वयंवर की बात चल रही है और आठ वर्ष की लड़की क्या स्वयंवर करेगी? 

मनु की विवाह चर्चा में बार बार ‘सदृश’ शब्द के प्रयोग पर ध्यान नहीं दिया गया है। अपने जैसे युवक से विवाह करे, अपने जैसी कन्या से विवाह करे- यह आग्रह मनु का रहा है। इसका अर्थ एक ही वेवलेंथ का होना है, एक ही वर्ण का होना नहीं जिसे स्वयं मनु ने ही कई जगह शिथिल किया है। मनु की विवाह चर्चा के इन प्रगतिशील पहलुओं को क्षेपकों ने आच्छादित कर दिया। मनुस्मृति में विवाह-संबंधी चर्चा (विशेष रूप से अध्याय 3 और 9 में) बार-बार ‘सदृश’ (sadṛśa) शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका मूल अर्थ ‘समान’, ‘सदृश’, ‘एक जैसा’ या ‘समान स्तर/गुण वाला’ है। इसे अक्सर केवल एक ही वर्ण तक सीमित करके देखा जाता है, लेकिन मनु स्वयं इसे केवल वर्ण तक नहीं बाँधते—यहाँ गुण, शील, कुल, शिक्षा, स्वभाव और एक ही वेवलेंथ (समान विचारधारा, संस्कार, जीवन-दृष्टि) का आशय अधिक प्रमुख है। मनु ने वर्ण को जन्म से अधिक गुण-कर्म पर आधारित माना है जिससे सदृश का अर्थ गुण-समानता अधिक मजबूत होता है।

मनुस्मृति 9.89-91 में स्पष्ट है कि कन्या को सदृश पति चुनने का अधिकार है, और यदि माता-पिता योग्य वर नहीं ढूँढ पाते, तो वह स्वयं चुन सकती है। यहाँ सदृश का अर्थ गुणवान, शीलवान और उपयुक्त है, न कि केवल वर्ण-आधारित। कई स्थानों पर सदृश से तात्पर्य समान कुल, समान शिक्षा, समान आचरण से है—जिससे वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बने, संतान अच्छी हो, और परिवार स्थिर रहे। यह ‘एक ही वेवलेंथ’ का विचार आधुनिक संदर्भ में compatibility (संगतता) जैसा है—जो आज के प्रेम-विवाह या arranged marriage में भी मूल्यवान है। सदृश’ को केवल एक ही वर्ण समझना अधूरा है—मनु का आग्रह compatibility का था, जो जन्म से परे गुण, शील और संस्कार पर आधारित था। यह पहलू वास्तव में प्रगतिशील हैं, और आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं—जैसे कि विवाह में समान विचारधारा और आध्यात्मिक/मानसिक तालमेल का महत्व। क्षेपकों ने इन सुंदर पक्षों को छिपाया, लेकिन मूल ग्रंथ पढ़ने पर ये स्पष्ट हो जाते हैं।

रोमिला थापर/ वेंडी डोनिगर का यह कहना कि यह आश्रम और विवाह चर्चा केवल द्विजों के बारे में है, शूद्रों के बारे में नहीं। यदि इस चीज को क्षेपकों के चलते मान भी लिया जाए तब इसकी नाराजगी क्यों होनी चाहिए। तब तो शूद्र को पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य के कठोर अनुशासन से आजादी मिली। यानी एक ही साँस में आश्रम व्यवस्था को दमनकारी बताना और उसी से शूद्रों को बाहर रखे जाने की दो अंतर्विरोधी शिकायतें दोनों साथ-साथ कैसे चल सकती हैं? ऐसे तो Bible के Equally yoked शब्द की कि ‘दोनों एक ही जुए में बाँधे गये’ की भी व्याख्या भी यह कहकर की जा सकती है कि उनकी विवाह-कल्पना में यह सम्बन्ध पशुओं जैसा है क्योंकि Yoke शब्द तो बैलों के लिए प्रयुक्त होता है। कि equally  yoked शब्द का अर्थ एक बोझ को साथ साथ ढोना है। कई विवाह सम्बन्ध इतने ही बोझिल हो भी जाते हैं। कि वह अपने आप में forced pairing लगते हैं । समानता (equality)और सदृशता (compatibility) दो अलग-अलग बातें हैं। समानता का अर्थ बराबरी है पर उसमें वह हार्मनी और सह-अस्तित्व नहीं है। हमारे यहाँ सादृश्य भक्ति की ही एक अवस्था है - सान्निध्य, सायुज्य की तरह। वह गणितीय साम्य नहीं है बल्कि रिलेशनल है। बराबरी की बाइनरी है, या तो आप समान हो या असमान हो पर सदृशता gradient होती है। आप थोड़े सदृश हो, ज्यादा हो, बहुत ज्यादा हो।yoked शब्द स्वयं में oppressive burden लगता है। 

फिर मनु के ‘द्विज’ से elitism की जो बू इन दोनों महाशयाओं को आती है तो बाइबिल के ऐसे ही प्रसंगों में born-again की चर्चा से क्यों नहीं आती?

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