Friday, 16 January 2026

आर्या

आर्या
१. विदेशी आर्य प्रचार-अंग्रेजों ने भारत पर शासन का औचित्य सिद्ध करने के लिए भारत के मूल निवासियों को विदेशी आर्य कहा, तथा संयुक्त समुद्र-मन्थन के लिए अफ्रीका से आये इंजीनियरों को मूल निवासी घोषित किया। उनका चेहरा आज भी अफ्रीकी मूल निवासियों से मिलता है, पर उनके डी.एन.ए. की कभी जांच नहीं की गयी। काल्पनिक मेगास्थनीज के नाम से विभिन्न ग्रीक-रोमन लेखकों के वर्णनों में भारत को एकमात्र ऐसा देश कहा है जहां बाहर से कोई नहीं आया। वास्तविक उपलब्ध पुस्तकों के बदले मेगास्थनीज के नाम से संग्रह करने का उद्देश्य था कि समय-समय पर अपनी इच्छा अनुसार उसमें जालसाजी की जा सके, जो श्वानबेक, मैक्रिण्डल आदि ने किया है। भारतीय या पाश्चात्य साहित्यिक सन्दर्भ नहीं मिलने के कारण पश्चिमोत्तर भारत में खुदाई की गयी जिस मार्ग से आर्यों के आगमन का प्रचार करना था। वह महाभारत काल में नाग-राजा तक्षक का राज्य था। तक्षक ने अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित की उनका ६० वर्ष शासन के बाद ३०४२ ई.पू. में हत्या की थी। इसके २७ वर्ष बाद परीक्षित पुत्र जनमेजय ने सैन्य तैयारी कर नाग राज्य को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जिसके बाद २,००० वर्षों तक किसी को आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ। उसके बादपश्चिम से असीरिया के नबोनासर (लवणासुर) का आक्रमण ८२५ ईपू में हुआ जिसे मथुरा में खारावेल की गज सेना ने पराजित किया था (असीरिया इतिहास, खारावेल का अभिलेख)। २ नगरों को श्मशान बना दिया जिनके नाम मोइन-जो-दरो (मृतकों का स्थान) तथा हड़प्पा (हड्डियों का ढेर) प्रचलित हुए। उसके बाद आस्तीक नाग के अनुरोध पर जनमेजय ने युद्ध बन्द किया तथा नरसंहार के प्रायश्चित रूप में २७-११-३०१४ ई.पू. (परीक्षित अभिषेक से आरम्भ जयाभ्युदय शक ८९, दक्षिण भारत के पितामह मत से प्लवङ्ग वर्ष, पौष अमावास्या, सोमवार) सूर्य ग्रहण के समय ५ स्थानों पर भूमिदान किया जो मैसूर ऐण्टीकुअरी में जनवरी, १९०० में प्रकाशित हुए थे। इनमें से २ दान अभी तक चल रहे हैं-केदारनाथ शिव मन्दिर, शृङ्गेरी निकट तुङ्गा तट पर राम मन्दिर। सभी ५ दानपत्रों की तिथि, वार, ग्रहण आदि की जांच २००७ ई. में अमेरिका के डलास, टेक्सास में १२-१४ अक्टूबर सम्मेलन में की गयी थी (Astronomical Dating of Events & Select Vignettes from Indian History,  Volume I, Edited and compiled by Kosla Vepa, Published by-Indic Studies Foundation, 948 Happy Valley Rd., Pleasanton, Ca 94566, USA-पृष्ठ ६२-६७).
२. आर्य शब्द के प्रयोग-वेद में कई सन्दर्भों में आर्य तथा आर्या शब्द के प्रयोग हैं। 
विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवः (ऋक्, १/५१/८)
= आर्य (श्रेष्ठ) और दस्यु (लुटेरों, म्लेच्छ) को पहचानो (उसके अनुसार उनसे व्यवहार)।
विदत् स्वर्मनवे ज्योतिरार्यम् (ऋक्, १०/४३/४, अथर्व, २०/१७/४)
= इन्द्र मनुष्यों के लिए आर्य ज्योति का विस्तार करें। इसके पूर्व के मन्त्र में सप्त-सिन्धु का उल्लेख है जो सिन्धु से पश्चिम, मध्य तथा ब्रह्मपुत्र के पूर्व की ७-७ मुख्य नदियों के लिए है (ऋक्, १०/६४/८, १०/७५/१ आदि)। हुएनसांग के भारत यात्रा वर्णन के अध्याय २ में भी कहा है कि भारत विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है जैसे चन्द्र या इन्दु। इससे भारत को इन्दु कहते थे, जिसे ग्रीक इण्डे कहते थे। इसी मन्त्र की प्रथम पंक्ति में सोमास शब्द का प्रयोग है, जिसका अर्थ सोम या चन्द्र है। बाद की पंक्तियों में सौर मण्डल के तेज रूप में इन्द्र का उल्लेख है।
उरु-ज्योतिः चक्रथुः आर्याय (ऋक्, १/११७/२१)
इसके देवता अश्विनौ हैं, अतः उस सन्दर्भ में ही अर्थ करना उचित होगा। सौर मण्डल में २ अश्विन हैं-८ अग्नि के बाद ९म अहर्गण (पृथ्वी कक्षा के निकट), ११ रुद्र के बाद २१वां अहर्गण (यूरेनस कक्षा तक सौर वायु का प्रसार-विष्णु पुराण, २/८/३ में सूर्य के ईषादण्ड की परिधि १८,००० सौर व्यास-योजन कही है)। यहां सौर तेज के अग्नि और वायु रूप को उरु ज्योति कह सकते हैं, जो जीवन का स्रुत है। पृथ्वी पर उरु ज्योति का अर्थ सूर्य से आया प्रकाश है, जो ध्रुव प्रदेश में दीखता है। आध्यात्मिक रूप में इस ज्योति या तेज द्वारा मनुष्य स्वस्थ रहता है-वैद्य अश्विनी कुमार या नासिक्य (श्वास-सन्तुलन)।   
३. आर्या - वेद में आर्या का प्रयोग इन्द्र की शक्ति, या मनुष्य इन्द्र की पत्नी शची के लिए हुआ है (ऋक्, ४/३०/१८, ६/३३/३, ६/६०/६, ९/६३/१४, १०/६५/११, १०/६९/६, सामवेद, २/२०५)। आर्ये (अथर्व,१९६२/१)।
मनुष्य आर्या शची के लिए-उत त्या तुर्वशायदू अस्नातारा शचीपतिः। इन्द्रो विद्वाँ अपारयत्॥१७॥
उत त्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः। अर्णाश्चित्ररथावधीः॥१८॥
४. त्रिष्टुप् तथा आर्या छन्द -इस सूक्त के अतिरिक्त वेद में इन्द्र-आर्या का उल्लेख सदा त्रिष्टुप् छन्द में किया गया है। सूर्य का तेज इन्द्र रूप में सौर मण्डल में फैला है। जहां तक सूर्य का प्रकाश अधिक है (ब्रह्माण्ड तुलना में) वहां तक सूर्य का क्षेत्र है और वह ३० धाम तक है। 
त्रिं॒शद्धाम॒ वि रा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते । प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑ ॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
आकाश के धाम पृथ्वी से आरम्भ हो कर क्रमशः २-२ गुणा हैं।  
...द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
३ धाम पृथ्वी के भीतर ही हैं-
पृथिव्यामिमे लोकाः (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ) प्रतिष्ठिताः(जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद्, १/१०/२)
३+३० = ३३ धाम सौर मण्डल के भीतर हैं, जो त्रिष्टुप् नक्षत्र के ३ पाद हैं, अतः इन्द्र तथा उनके वज्र को त्रिष्टुप् कहा है। 
इन्द्रस्त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/७), 
त्रिष्टुप् इन्द्रस्य वज्रः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/२), 
त्रैष्टुभो वज्रः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/१८) 
मनुष्य के मेरु-दण्ड में भी ३३ सन्धि हैं, अतः इन्द्र वज्र को दधीचि की हड्डी कहा गया है, यह अस्थि युग का वर्णन नहीं है (अस्थि युग का मेरा इतिहास-जयशंकर प्रसाद की कविता भारतवर्ष में)। अतः स्तुति के श्लोक प्रायः त्रिष्टुप् छन्द (इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा आदि) में हैं, जिनका कम्पन मेरुदण्ड को कम्पित करता है। 
सौर मण्डल के ३३ धामों के प्राण ३३ देवता हैं-८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, २ अश्विन्। इनके चिह्न ’क’ से ’ह’ तक के ३३अक्षर हैं। चिह्न रूप में देवों का नगर होने के कारण संस्कृत लिपि को देवनागरी कहते हैं।
लौकिक छन्दों में त्रिष्टुप् जैसा आर्या छन्द है जिसके कई रूप हैं। पिङ्गल के छन्द सूत्र के चतुर्थ अध्याय में लौकिक छन्दों का वर्णन आर्या से ही आरम्भ हुआ है। यह मात्रा के अनुसार है, अतः इसे त्रिष्टुप् नहीं कह सकते, किन्तु प्रायः त्रिष्टुप् जैसा है।
५. कालिदास-कालिदास के श्रुतबोध में भी छन्दों का वर्णन आर्या छन्द से ही आरम्भ है। कालिदास के ओङ्कार पञ्जर स्तोत्र के आरम्भ में सरस्वती को आर्या कहा है, और यह आर्या छन्द में है-
ओङ्कार पञ्जर शुकीम्-उपनिषद्-उद्यान केलि कलकण्ठीम्।
आगम विपिन मयूरी-मार्यामन्तर्-विभावये गौरीम्॥१॥ 
अर्थ- ॐकार पिंजड़ा है जिसमें आर्या (सरस्वती) सुग्गी के समान हैं। उपनिषद् रूपी उद्यान की कोयल हैं तथा आगम (तन्त्र, वेद भी-परम्परा से प्राप्त साहित्य) रूपी विपिन (वन) की मयूरी हैं। उनका ध्यान भीतर में गौरी के रूप में करता हूँ। 
टिप्पणी-वाणी के ४ पद हैं जिनमें ३ गुहा में हैं तथा चतुर्थ पद कथन या लेखन में निकलता है। भीतर के ३ पद गौरी (ग = तीसरा व्यञ्जन) हैं-परा, पश्यन्ती, मध्यमा। बाहर व्यक्त या वैखरी वाणी में कुछ लुप्त हो जाता है अतः उसे तम कहते हैं। गौ तथा तम का सम्बन्ध गौतम का न्याय दर्शन है।

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