Thursday, 29 January 2026

ब्राह्मण अत्याचार

एक सज्जन टीवी चैनल पर चीख रहे थे - हमने शताब्दियों के अत्याचार सहे हैं। मैंने देखा कि कोई उन्हें चुनौती भी नहीं दे रहा था। अच्छे ज्ञानवान लोग भी इस विषय पर बात ही नहीं कर रहे थे। वे कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी नहीं दे रहे थे लेकिन अंग्रेजों के द्वारा बुने नैरेटिव के आत्मविश्वास से बोलते जा रहे थे। 

मैंने सोचा यह भी ईकोसिस्टम की ही जीत है कि शताब्दियों से चले आ रहे ब्राह्मण नरसंहारों के ऐतिहासिक प्रमाण तक इन्हें याद नहीं आते। इस दुष्टता की कहीं कोई स्पर्धा है क्या? उन्हें इतिहास के प्रमाण नहीं चाहिए, उन्हें पुरातात्विक साक्ष्य नहीं चाहिए, उन्हें वर्तमान के अकाट्य और प्रत्यक्ष प्रमाणों से भी कोई मतलब नहीं। उनका कथन उनके गहरे ब्राह्मण -द्वेष की कंदरा से निकलता है। 'दलित व्हाइस' नामक एक पत्रिका तो ब्राह्मणों को यहूदियों की संतान बताते हुए उन पर fanaticism और arrogance का आरोप वैसे ही लगाती है जैसे यहूदियों पर लगाए गये थे। यदि शूद्रों ने कथित रूप से शताब्दियों अत्याचार सहे तो 1000 साल का विदेशी शासन क्या ब्राह्मणों पर कहर बन कर नहीं टूटा ? क्या किसी को ख्वाजा मसूद बिन सा' द बिन सल्मान द्वारा जालंधर के युद्ध का 'दीवान-ए-सलमान पुस्तक में किया गया वर्णन याद है: "Not one Brahmin remained unkilled or uncaptured, their heads were levelled with the ground." क्या फीरोजशाह बहमनी (1398-99) ने 2000 ब्राह्मण स्त्रियों का अपहरण नहीं किया था (तवारीख फरिश्ता)?

इतिहासकार हसन की "हिस्ट्री ऑफ काश्मीर" सिकंदर बादशाह के द्वारा ब्राह्मणों के नरसंहार का विस्तृत विवरण देती है। Brahmins were forced to convert to Islam, pay heavy jizya if they refused, or face death, exile, or suicide. Temples were systematically destroyed, Hindu practices banned, and sacred threads (zunnar) from killed Hindus were collected and burned (described as weighing several ass-loads or mounds). Many Brahmins fled, converted under duress, or died; some poisoned themselves to avoid forced conversion. Only a few Brahmin families reportedly remained in Kashmir. 

क्या बाबर के गवर्नर लाहौर ने पुनियाल में दत्त ब्राह्मणों को चुन चुन कर खत्म नहीं किया था? 

जिस तरह से मध्यकाल में ब्राह्मणों और भिक्खुओं को टारगेट करके तलवार के घाट उतारा गया था, वह किसी के ध्यान में है। 1456 ई. में कन्हाडे प्रबन्ध अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात आक्रमण के बारे में लिखता है : "आक्रमणकारी सेना ने गाँव-दर-गाँव जलाए, जमीन उजाड़ दी, लोगों का धन लूटा, ब्राह्मणों और बच्चों और औरतों को बंदी बनाया, उन्हें कोड़ों से पीटा और बंदियों को तुर्क सेवकों में बदल दिया।" 

स्वयं विजेताओं की ओर से लिखा गया वर्णन देखिए। 1011 ई. में थानेसर पर सुल्तान महमूद का आक्रमण उसके मंत्री उत्बी के तारीख-ए-यामिनी के शब्दों में यों वर्णित हुआ: "The blood of the infidels flowed so copiously [at Thanesar] that the stream was discolored, notwithstanding its purity and people were unable to drink it. The Sultan returned with plunder which is impossible to count. Praise be to Allah for the honor he bestows on Islam and Muslims." यही उत्बी दिसंबर 1018 में मथुरा के महावन में महमूद की विजय का वर्णन यों देता है :

"The infidels deserted the fort and tried to cross the foaming river.... but many of them were slain, taken or drowned.... Nearly fifty thousand men were killed." यही उत्बी मथुरा की विजय के बारे में लिखता है: "The Sultan gave orders that all the temples should be burnt with naptha and fire, and levelled with the ground." 

उत्बी कन्नौज के 10 हजार मंदिरों के विध्वंस के बारे में आनंदपूर्वक लिखता है और यह भी कि
“The Brahmins of munj which was attacked next, fought to the last man after throwing their wives and children into fire. 

श्रावा के बारे में उत्बी ने कहा: "The Muslims paid no to the booty till they satisfied themselves with slaughters of the infidels and worshippers of sun and fire. The friends of Allah searched the bodies of the slain for 3 days in order to obtain booty..."

महमूद के लडके मसूद ने 1037 में जब हांसी किले पर आक्रमण किया तो तारीख-उस-सबक्तिगिन का विवरण यों है: "The Brahmins and other high ranking men were slain, and their women and children were held captive." 

मुहम्मद गौरी के दौर में इब्न असीर के 'कामिल-उत्-तवारीख' में लिखा गया : "The slaughter of Hindus (at varanasi) was immense; none were spared except women and children, and the carnage of men went on until the earth was weary." 

इसी वक्त सारनाथ के भिक्षुओं का भी नरसंहार हुआ था। गोरी के सिपहसालार कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1193 ई. में कोल (आधुनिक अलीगढ़) में ब्राह्मणों की वो हालत की थी कि उनके मुंडों की तीन मीनारें-तत्कालीन इतिहासकार हसन निज़ामी के शब्दों में, 'as high as heaven'- खड़ी कर दी गई थीं और उनके शव शिकारी गिद्धों का खाद्य बन गए थे। 1196 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तत्कालीन गुजरात की राजधानी पाटन में राजा करन से लड़ते हुए शहर में जो आतंक मचाया उसके बारे में यही इतिहासकार लिखता है: "fifty thousand infidels were dispatched to hell by the sword." 

बल्बन और अलाउद्दीन खिलजी की तो कुख्यात हैं ही। फीरोजशाह तुगलक ने जाजनगर में अपने किए के बारे में कुछ लिखा है : "The swordsmen of Islam turned the island into abasin of blood by the massacre of the unbelievers." हिंदू औरतों के बारे में सिरात-ए- फिरूजशाह लिखता है : "Women with babies and pregnant ladies were haltered, manacled, fettered and enchained, and pressed as slaves into service in the house of every soldier." 

फरिश्ता कांगड़ा में फिरोजशाह तुगलक की वीरता यों बखानता है : "ज्वालामुखी की मूर्तियों का सुल्तान ने विध्वंस किया, उसके टुकड़ों को गायों के मांस में मिलाकर ब्राह्मणों के गले में थैले की तरह बांध दिया।" 

गुलबर्गा और बीदर के बहमनी सुल्तान हर साल एक लाख हिंदू आदमी-औरतों-बच्चों को मारना एक meritorious काम समझते थे। 1399 में तैमूर के अत्याचार इस तलवार-गाथा को शीर्ष पर पहुंचा देते हैं। तुज़्के-तिमूरी में लिखा है : "In a short span of time all the people in the fort were put to the sword, and in the course of one hour the heads of 10,000 infidels were cut off. The sword of Islam was washed in the blood of the infidels." 

दिल्ली से पहले लोनी में तैमूर की सेना ने कुछ मुस्लिमों को भी बंदी बना लिया था। तैमूर ने आदेश दिया कि "The Musalman prisoners should be separated and saved, but the infidels should all be dispatched to hell with the proselytizing sword." 

दिल्ली के आक्रमण में तलवार की इस तानाशाही को तुज़्के तिमूरी में स्वयं तैमूर ने यों लिखा : I proclaimed throughout the camp that every man who had infidel prisoners should put them to death.

पूरे मध्यकाल में जजिया ब्राह्मणों पर ही प्रथमतः और प्रमुखतः लगाया जाता था। और वसूलने का तरीका था मुँह खोलकर बैठने को विवश कर दिये गये ब्राह्मणों के मुँह में थूकना। 

पुर्तगाली साम्राज्यवादियों ने गोआ में ब्राह्मणों का जो नरसंहार किया वह याद है? सेंट - ऐसे हत्यारों को सेंट कहने पर इनकी भाषा आत्महत्या क्यों नहीं कर लेती- फ़्रांसिस ज़ेवियर 1542 में गोआ पहुँचने पर क्या सिद्धान्त प्रतिपादित किये थे : without Brahmins, Hindus would convert more easily. 1560–1812 तक ब्राह्मणों का पोर्तुगाली क्षेत्रों से उन्मूलन किया गया। लगभग तीन शताब्दी तक। ब्राह्मण कोई कार्यालय नहीं जा सकते थे। उन्हें अपने बच्चों को जेसुइट्स के पास छोड़ना पड़ता था ताकि उन्हें कन्वर्ट किया जा सके। उनके मंदिर ध्वस्त कर दिये गये थे।

क्या पेरियार के वक्त ब्राह्मणों पर हिंसक आक्रमण नहीं हुए जिन्होंने उन्हें सामूहिक पलायन (मॉस माइग्रेशन) के लिए वैसे ही बाध्य कर दिया जैसे काश्मीरी पंडितों को कर दिया गया। गोआ के पुर्तगालियों ने ब्राह्मणों का ही नरसंहार किया था। 

(क्रमशः)

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