Thursday, 1 January 2026

ऋग्वेद

ऋग्वेद को बार-बार पढ़ने पर मुझे लगा कि इसको समझने में दो सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। 

प्रथम, ऋग्वेद के ऋषियों ने यह ज्ञान का भण्डार एक-दो वर्षों में न देकर सैकड़ों वर्षों में दिया है। हम आज तक ऋग्वेद के चार सौ दो ऋषियों को उनके काल के अनुसार व्यवस्थित नहीं कर पाए हैं जिससे एक विषय पर विचारों का विकास कैसे हुआ है यह समझने में कठिनाई होती है। ऐसा न होने पर जो कभी-कभी ऋषियों के विचारों में विरोधाभास प्रतीत होता है उसकी गुत्थी सुलझाना भी कठिन हो जाता है। 

दूसरे, ऋग्वेद के प्रमाणिक इण्डैक्सों का अभाव हैं। जो इण्डैक्स हैं भी वे अपने में पूर्ण नहीं है। 

उदाहरण के लिये विदेशी विद्वान् ए.ए.मैकडोनेल एवं ए. वी. कीथ का वैदिक इन्डैक्स ले लें। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इन विद्वानों ने बहुत परिश्रम से बहुत बड़ा काम किया है। इस ग्रन्थ में कुछ कमियाँ होना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिये इसमें बहुत सारे शब्द और विषय हैं ही नहीं। फिर इन विद्वानों ने अपने को एक या दो ग्रन्थों तक सीमित न रखकर अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को ले लिया है। इससे विचारों की क्रमबद्धता तथा स्पष्टता में कमी आई है। फिर मुद्रण की भी काफी कृपा हुई है। 

इसी तरह ऋग्वेद संहिता, जो वैदिक संशोधन संस्थान मण्डल पूना के दो विद्वानों द्वारा सम्पादित की गयी हैं, के अन्त में जो ऋषियों, देवताओं तथा मन्त्रों की तालिकाएँ दी गयी हैं वे महत्त्वपूर्ण हैं, पर उन्हें वैदिक इण्डैक्स नहीं कहा जा सकता है। इसमें भी संकट का अपना योगदान तो है ही। 

ऋग्वेद के अध्ययन की अनेक विधियाँ हो सकती हैं। एक विधि तो विदेशी विद्वानों, विशेषकर मैक्समूलर (max muller, 1875), आर.टी.एच ग्रिफिथ (R.T.H. Griffith, 1982) एच, ओल्डेनवर्ग (H. Oldenberg, 1912) आदि की हैं या फिर विशिष्ट अंशों का आलोचनात्मक अध्ययन करने वाले विद्वानों जैसे रूडोल्फ रौथ (Rudolph Rotlh ), कर्ल गेल्डनर (Karl Geldener), ए. कैगी (Adolf Kaegi), रोअर (Roer), एहिलीब्रेण्ड (Ahillibrandt), ए. ए. मैकडोनेल (A.A. Mecdinell), ए.बी.कीथ (A.B. Keith) आदि ने अपनाई है।

इन विदेशी विद्वानों द्वारा रचित ग्रन्थ उत्तम हैं पर उनमें कुछ कमियाँ भी हैं। उदाहरण के लिये ए.ए. मैकडोनेल का मत है कि कोई ‘‘कोई भी विषय ऐसा नहीं है जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से निरूपण किया जा सके’’ (पृष्ठ 8)। ‘‘वैदिक पुराकथा शास्त्र एक ऐसे देश और काल तथा सामाजिक और भौगोलिक स्थिति की कृतियाँ हैं जो हम (बिटिश) लोगों से अत्यन्त दूरस्थ और अत्यधिक भिन्न हैं’’ (पृष्ठ 8)। स्पष्ट है कि पाश्चात्य सभ्यता में पले, बढ़े और रंगे लोगों को भारतीय संस्कृति, जो अपने में अनूठी है, को समझने में गलतियाँ हो जाना स्वाभाविक है। 

भारतीय विद्वानों जैसे सायण, वेंकटमाधव का भाष्य जो डॉ. लक्ष्मण स्वरूप द्वारा सम्पादित है, स्वामी दयानन्द, सातवलेकर आदि ने ऋग्वेद पर लिखा है पर उनमें आपस में ही मतभेद है, वे विज्ञान की सहायता नहीं लेते हैं, वे किसी आधुनिक शोध विधि को भी नहीं अपनाते हैं। तथा संस्कृत शब्दों के विभिन्न अर्थों के आधार पर अपने-अपने अनुसार व्याख्या करते हैं। उन्होंने भी ऋषियों को कालानुसार व्यवस्थित नहीं किया है। 

फलतः ये विद्वान् भी विदेशी विद्वानों की तरह ऋग्वेद के देवताओं को न तो चिह्नित कर पाए हैं। और न उनके पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट कर पाए हैं और भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं। वे इन देवताओं की पूजा-अर्चना की बात करते हैं पर उसके पीछे छिपे अर्थों को स्पष्ट नहीं करते हैं। 

भारतीय धर्मग्रन्थों में पंच तत्त्वों-आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जल की बड़ी महिमा है। कहा तो यहाँ तक गया है कि सभी भौतिक पदार्थ और यहां तक सभी प्राणी उन्हीं की देन हैं। आधुनिक विज्ञान इस बात से सहमत है यद्यपि उसने इन पाँचों तत्वों के ही लगभग 128 उप-तत्त्व मालूम कर लिये हैं तथा उसका मत है कि इन्हीं के संचय (Combination_ तथा क्रमचय (Permution) से सभी भौतिक पदार्थों और जन्म का विकास होता है।

ऋग्वेद के अधिकांश देवता प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जो अजर-अमर और सर्वव्यापी हैं तथा अपने-अपने नियमों से बँधी हुई हैं। यदि, मनुष्य उन्हें पूजे, अर्थात उनके सहयोग में चलते हुए उनके नियमों का पालन करे, तो निश्चित ही वह स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होगा तथा सुखी और सन्तुष्ट रहेगा। पर जब वह प्रकृति को जीतना चाहता है और उनके नियमों का पालन नहीं करता है तो वह स्वयं तो दुखी रहता ही है पर प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़कर अपने तथा समाज के लिए विष के बीज बो देता है। वर्तमान इस बात को चीख-चीखकर स्वीकार कर रहा है।

ऋषियों ने शनैः शनैः आत्मा का भी पता लगा लिया था तथा यह भी मालूम कर लिया था कि आत्मा अजर और अमर है तथा यह बार-बार किसी न किसी शरीर में प्रविष्ट होकर उसे जीवित कर देती है। ये ऋषि परमात्मा, विष्णु शिव या रुद्र आदि के बारे में भी अधिक-अधिक जानने का प्रयास करने लगे थे और ऋषि भौतिक देवताओं से आध्यात्मिक देवताओं की तरफ जा रहे थे। ऋषिगण केवल काल्पनिक बातें नहीं कर रहे थे, वे वास्तव में वैज्ञानिक खोजें कर रहे थे। यह बात दूसरी है कि उनकी खोज करने के तरीके भिन्न थे।

लेकिन आत्मा भी मरती है। इस विषय पर किसी ने नहीं बात की।

अगर आत्मा मारेगी ही नहीं तो फिर मोक्ष किसका और कैसे........?

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