Tuesday, 14 July 2026

अद्वैत वेदान्त में, ब्रह्म

कभी कभी मैं सोचता हूँ कि उस विष-विद्यालय में इतने सतही तरह से पढ़ाया जाता है क्या? 

वो मादाम फैज़ की नज़्म के ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ को समझा रहीं थीं कि वह highest Vedant है, अल्लाह का मतलब वो शक्ति जो हम सबमें है। 

मादाम को वेदान्त की समझ छोड़ो इस्लाम के अल्लाह की ख़बर भी नहीं है। 

वेदान्त, विशेषकर अद्वैत वेदान्त में, ब्रह्म सर्वव्यापक ही नहीं, सर्वान्तर्यामी भी है। उपनिषद् कहते हैं— "सर्वं खल्विदं ब्रह्म", "ईशावास्यमिदं सर्वम्", "अहं ब्रह्मास्मि", "तत्त्वमसि"। यहाँ ईश्वर केवल सृष्टिकर्ता नहीं है; वही समस्त अस्तित्व का आधार है। जीव और ब्रह्म का भेद अन्ततः अविद्या से उत्पन्न माना जाता है। आत्मा का परम लक्ष्य उसी ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार है।

इस्लामी तौहीद में अल्लाह सृष्टि का रचयिता, पालक और स्वामी है, पर वह स्वयं सृष्टि नहीं है और न ही सृष्टि उसका स्वरूप है। अल्लाह अपनी रचना से गुणात्मक रूप से भिन्न (transcendent) है। वह मनुष्य के निकट अवश्य है, किन्तु यह निकटता सर्वात्मभाव या तादात्म्य का कथन नहीं है। इस्लाम में यह कहना कि मनुष्य स्वयं अल्लाह है, या समस्त जगत अल्लाह ही है, मूल तौहीदी सिद्धान्त के विरुद्ध माना जाएगा।

वास्तव में, वेदान्त का ईश्वर अन्तर्यामी भी है और सर्वव्यापी भी; वह जगत का निमित्त कारण ही नहीं, उपादान कारण भी है। इस्लाम का अल्लाह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है, किन्तु वह जगत का उपादान कारण नहीं माना जाता। वेदान्त में ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं; इस्लाम में अल्लाह और उसकी मख़लूक़ के बीच सृष्टिकर्ता–सृष्टि का भेद बना रहता है। इसलिए "बस नाम रहेगा अल्लाह का" को "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" का पर्याय बताना दो भिन्न दार्शनिक परम्पराओं के बीच वास्तविक भेदों को मिटा देना होगा।

फ़ैज़ की पंक्ति को "highest Vedanta" कहना न वेदान्त की अवधारणात्मक सूक्ष्मता के साथ न्याय करता है, न इस्लामी तौहीद की विशिष्टता के साथ।

और ये प्रोफ़ेसर हैं। 

कैसे कैसे रत्न पैदा किये हैं वामपंथ ने।

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