Tuesday, 14 July 2026

मैक्समूलर एक_लुच्चा

#मैक्समूलर_एक_लुच्चा था। 
"Maxmuller was a Swindler".
: Prodosh Aich 
(गूगल कीजिए) 

पहले एक ट्रेसिंग पेपर आता था, यदि आपको स्मरण हो तो। उसको चित्र के ऊपर रखकर, पहले पेंसिल से चित्र की कॉपी की जाती थी। यह है कॉपी करना। 

फिर उसकी सहायता से एक प्लेन पेपर पर ट्रेसिंग बनाई थी, चित्र की। यह है collate करना। 

तदोपरांत उस चित्र में रंग भरे जाते थे। 

याद है आपको?
पता नहीं आजकल ऐसा होता है या नहीं। 

जो लोग मैक्समूलर को संस्कृत का विद्वान मानते हों, उन्होंने कभी यह नहीं पढ़ा होगा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिवर्ष 200 पाउंड की नौकरी पर रखा हुवा मैक्समूलर ऋग्वेद को किस तरह लिखा था। उसे एक पेज को लिखने का 8 पाउंड मिलता था, और प्रत्येक वर्ष में 25 पेज लिख पाता था। इतना बड़ा संस्कृतज्ञ और एक वर्ष में मात्र 25 पेज लिख सकता था? इसका आखिर रहस्य क्या है? 
रहस्य छुपा है उसकी लिखाई की विधि में। उसको संस्कृत का स भी नहीं आता था। 

तो फिर कैसे लिखता था वह? 
उसने स्वयं लिखा है, और उस पर रिसर्च करने वालों ने लिखा है कि वह copy और collate करता था। 

इसका अर्थ क्या होता है?

 
उसे फ्रांस की लाइब्रेरी में एक संस्कृत ग्रंथ की प्रति हांथ लग गई। उसको उसने वहां से झटक लिया। और उन पांडुलिपियों को लेकर घूमने लगा और उनकी ऊल जलूल व्याख्या करने लगा। क्योंकि अन्य यूरोपीय विद्वान भी नहीं जानते थे कि उन ग्रंथो में क्या था, इसलिए वे भी मूर्ख बनते गए। उसने फारसी भाषा पढ़ रखा था। और हम जानते हैं कि दारा शिकोह और अन्य लोगों द्वारा संस्कृत ग्रंथों के किए गए अनुवाद फारसी में उपलब्ध थे, यूरोप में भी। उससे उसने जो भी पढ़ा हो भारत के बारे में। 

इस copy और collate का अर्थ क्या होता है?
वही जो तकनीक ऊपर वर्णित है, ट्रेसिंग पेपर वाली। 
पहले ट्रेसिंग पेपर से उन शब्दों की ट्रेसिंग बनाता था जिसे कहते हैं कॉपी करना। फिर उस ट्रेसिंग को वह सादे पेपर पर उतारता था। जिसे कहते हैं collate करना। और उस collate किए गए पन्नों को वह बोलता था manuscript अर्थात पांडुलिपि। 

बहुत दिनों से इन दो शब्दों की व्याख्या करना चाहता था। आज कर पाया। 

और हम इतने बड़े टूचिए हैं कि हमने जर्मनी के दूतावास का नाम आज भी मैक्समूलर भवन रख रखा है, जिसने पहली बात तो, प्रथम अवसर पाते ही जर्मनी की नागरिकता छोड़कर उसने इंग्लैंड की नागरिकता ग्रहण कर ली थी। 

दूसरी बात उसकी कुल प्रमाणिक शिक्षा मैट्रिक पास करने भर की थी। तीसरी बात उसने संस्कृत का कोई भी शब्द अपने कानों से नहीं सुना था। चौथी बात उसने इस कॉपी कोलेट विधि के द्वारा जो भी लिखा हो संस्कृत, लिखा हो, स्वतंत्र लेखन के नाम पर उसने संस्कृत का एक वाक्य भी नहीं लिखा था। लिखा हो तो कोई मुझे दिखावे यहां।

®Tribhuwan Singh
रिपोस्ट

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