Wednesday, 21 October 2026

रावण सुपर्णखा

 इन दुर्जन की स्थापना है कि रावण ने शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए सीता का हरण किया, न कि सीता को पाने की इच्छा से।
वाल्मीकि के अरण्यकाण्ड में 3.49.16 में रावण को सीता को पकड़ते हुए इस प्रकार वर्णित किया गया है:
अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः।
जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव॥
अर्थात् दुष्टात्मा राक्षस रावण काम से मोहित होकर सीता को पकड़ता है। अगले श्लोक में उसके द्वारा सीता को बालों और जाँघों से पकड़ने का वर्णन है।
शूर्पणखा का अपमान कथा की घटनाओं की शृंखला में महत्त्वपूर्ण है। लेकिन वाल्मीकि स्पष्ट रूप से रावण की कामना और सीता को बलपूर्वक पकड़ने का वर्णन करते हैं। इसलिए यह कहना कि हरण का उद्देश्य बिल्कुल भी सीता को पाने की इच्छा नहीं था, मूल पाठ से मेल नहीं खाता। शूर्पणखा तो रावण को अपने अपमान का नहीं सीता के सौंदर्य के बारे में बताती है।

ये महोदय कहते हैं कि रावण ने सीता का हरण किया, लेकिन उसका उद्देश्य दूसरे पुरुष की पत्नी को प्राप्त करना नहीं था।अरण्यकाण्ड 3.49 में रावण सीता के सामने अपनी शक्ति और वैभव का बखान करता है। सीता उसे अस्वीकार करती हैं। इसके बाद वह उन्हें पकड़कर ले जाता है। अरण्यकाण्ड 3.49.22 में सीता के लिए स्पष्ट शब्द है:
तामकामाम् …अर्थात् वह सीता को, जो इच्छुक नहीं हैं, अपने साथ ले जाता है।रावण की मंशा को केवल प्रतिशोध बताना मूल पाठ में उपस्थित कामना और सीता की असहमति को अनदेखा करना है। इसे निश्चित तथ्य की तरह पेश करना अनुचित है।

महोदय सुन्दरकाण्ड, सर्ग 9 का हवाला देकर लिखते हैं कि रावण के महल की सभी स्त्रियाँ स्वेच्छा से उसकी पत्नियाँ बनी थीं और उसने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं छुआ।
वाल्मीकि के सुन्दरकाण्ड 5.9.68 में कहा गया है:
राजर्षिपितृदैत्यनाम् गन्धर्वाणां च योषितः।
रक्षसां चाभवन् कन्यास्तस्य कामवशं गताः॥
इसका आशय है कि राजर्षियों, पितरों, दैत्यों, गन्धर्वों और राक्षसों की कन्याएँ रावण के काम के वश में थीं।यहाँ कामवशं गताः का अर्थ अपने-आप यह नहीं हो जाता कि हर स्त्री स्वतंत्र इच्छा से, बिना किसी दबाव के, रावण की पत्नी बनी थी।जनाब का “सभी स्त्रियाँ स्वेच्छा से पत्नी बनीं” वाला निष्कर्ष मूल श्लोक के शब्दों से अधिक व्यापक है। श्लोक में न तो सभी स्त्रियों की स्वतंत्र सहमति का स्पष्ट विवरण है, न ही सभी को पत्नी घोषित किया गया है।

महोदय कहते हैं रावण ने कभी किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं छुआ।यह दावा केवल सीता के प्रसंग तक सीमित नहीं है। वे इसे रावण के पूरे चरित्र की विशेषता बनाते हैं। महोदय कहते हैं कि रावण ने सीता को इसलिए नहीं छुआ क्योंकि वह स्त्रियों की सहमति का आदर्श समर्थक था।सीता पर बल प्रयोग न करने को वे रावण के श्रेष्ठ चरित्र का प्रमाण बनाते हैं। वेदवती की कहानी महोदय नहीं बताते। उत्तरकाण्ड में रम्भा का प्रसंग आता है। रावण रम्भा के साथ बलपूर्वक व्यवहार करता है, जबकि वह उसे रोकती है और अपने संबंध का हवाला देती है। इसके बाद नलकूबर रावण को शाप देता है कि वह किसी अनिच्छुक स्त्री पर बल प्रयोग करेगा तो उसका सिर फट जाएगा।इस प्रसंग का उल्लेख वाल्मीकि रामायण की उत्तरकाण्ड-परंपरा में है; सीता के प्रसंग पर IIT कानपुर के वाल्मीकि रामायण पोर्टल की टीका भी रम्भा-प्रसंग के शाप को रावण द्वारा सीता पर बल प्रयोग न करने का कारण बताती है।यह दावा कि रावण ने कभी किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं छुआ, उत्तरकाण्ड के रम्भा-प्रसंग से टकराता है। रावण द्वारा सीता के साथ बलात्कार न करना और रावण का सभी स्त्रियों के प्रति सदैव सहमति का सम्मान करना एक ही दावा नहीं है।सीता पर बल प्रयोग न करने का तथ्य स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन उसे सार्वभौमिक नैतिक आदर्श का प्रमाण बना देना अलग निष्कर्ष है। शाप के कारण उत्पन्न भय और स्वेच्छा से स्वीकार किए गए नैतिक सिद्धांत में अंतर है।

उत्तरकाण्ड 24.1–2 में वाल्मीकि बताते हैं कि 
निवर्तमानः संहृष्टो रावणस्सुदुरात्मवान्।
जह्रे पथि नरेन्द्रर्षिदेवगन्धर्वकन्यकाः॥ ७.२४.१॥
अर्थ: लौटते समय दुष्टात्मा रावण मार्ग में राजाओं, ऋषियों, देवताओं और गन्धर्वों की कन्याओं का हरण करता गया।
अगला श्लोक और भी स्पष्ट है:
दर्शनीयां हि रक्षः स कन्यां स्त्रीं वापि पश्यति।
हत्वा बन्धुजनं तस्या विमानं तां रुरोध ह॥ ७.२४.२॥
अर्थ: वह राक्षस जब भी किसी सुंदर कन्या अथवा स्त्री को देखता, उसके बंधु-बांधवों को मारकर उसे अपने विमान में बंदी बना लेता था।
विभीषण की गवाही: उत्तरकाण्ड 25.19
विभीषण रावण को उसके आचरण पर फटकारते हुए कहता है:
ज्ञातींस्तान्धर्षयित्वेमास्त्वयाऽऽनीता वराङ्गनाः।
त्वामतिक्रम्य मधुना राजन्कुम्भीनसी हृता॥ ७.२५.१९॥
अर्थ: अपने संबंधियों का उत्पीड़न करके तुम इन सुंदर स्त्रियों को यहाँ ले आए हो। और हे राजन्, तुम्हारी अवहेलना करके मधु कुम्भीनसी को हर ले गया।यहाँ धर्षयित्वा और आनीताः को उनके प्रसंग में समझना चाहिए। विभीषण रावण द्वारा दूसरी स्त्रियों को लाने की निंदा कर रहा है और उसी के परिवार की स्त्री के हरण को उसके कर्मों के प्रतिफल से जोड़ रहा है।

यदि उत्तर कांड की प्रामाणिकता पर सवाल है तो सुंदरकांड में ही रावण स्वयं सीता से कहता है कि सुंदर स्त्रियों को बलपूर्वक उठा लाना राक्षस धर्म रहा है।

महोदय कहते हैं रावण ने सीता को बलपूर्वक नहीं उठाया।वे इस प्रसंग में रावण की निर्दोषता के समर्थन में तर्क देते हैं कि सीता को उठाकर ले जाने की कथा के पीछे दूसरे संस्करणों में शाप और छाया-सीता जैसी व्याख्याएँ हैं। फिर वे स्वयं वाल्मीकि के पाठ का उल्लेख करते हैं।

वाल्मीकि का पाठ अरण्यकाण्ड 3.49.17 में है:
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना॥
अर्थात् रावण ने बाएँ हाथ से सीता के बाल पकड़े और दाएँ हाथ से उनकी जाँघों को पकड़ा। इसके बाद सीता को बलपूर्वक ले जाने और उनके चिल्लाने का वर्णन है।
वाल्मीकि के मूल पाठ में सीता का बलपूर्वक हरण स्पष्ट है। इसलिए यह कहना कि सीता का हरण बलपूर्वक नहीं हुआ, वाल्मीकि के वर्णन के विपरीत है।यहाँ शारीरिक स्पर्श और सहमति अलग प्रश्न हैं। किसी को हाथ लगाना मात्र सहमति का प्रमाण नहीं होता।

महोदय का कथन है कि सीता स्वयं चाहती थीं कि रावण उन्हें उठा ले जाए-। वे लिखते हैं कि सीता को पहले से रावण द्वारा उठाए जाने की अपेक्षा थी और वे उसी के अनुसार तैयारी कर रही थीं।जबकि अरण्यकाण्ड 3.49.22 में सीता को अकामाम् कहा गया है—अर्थात् वे इसके लिए इच्छुक नहीं थीं। 3.49.21 में रावण द्वारा पकड़े जाने पर सीता के दुःख में चिल्लाने का वर्णन है।सीता की पूर्व-सहमति का दावा इन श्लोकों से सिद्ध नहीं होता। इसके विपरीत, मूल वर्णन उनकी अनिच्छा और प्रतिरोध को स्पष्ट करता है।सीता रावण को क्या क्या नहीं कह सुनातीं । वाल्मीकि रामायण में सीता केवल रावण द्वारा अपहृत और असहाय स्त्री नहीं हैं। वह रावण के सामने अपने विवेक, धर्मबुद्धि, नैतिक साहस और वाणी की पूरी शक्ति के साथ खड़ी होती हैं। अरण्यकाण्ड में अपहरण के समय उनका प्रतिरोध है; लंका में सुन्दरकाण्ड के अनेक प्रसंगों में वह रावण के आचरण, चरित्र, राजधर्म और उसकी बुद्धि पर कठोर प्रहार करती हैं।इसलिए सीता को केवल एक पीड़िता के रूप में प्रस्तुत करना भी मूल पाठ के साथ न्याय नहीं है। उनके साथ जो हुआ, वह एक तथ्य है; उसके सामने उन्होंने जिस दृढ़ता से रावण का सामना किया, वह उतना ही महत्त्वपूर्ण तथ्य है। सीता अपहरण के समय ही रावण को लताड़ती हैं—
न व्यपत्रपसे नीचकर्मणाऽनेन रावण।
ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे॥
अर्थात्—रावण! इस नीच कर्म पर तुझे लज्जा नहीं आती? मुझे अकेली पाकर मेरा अपहरण करके भाग रहा है! यहाँ सीता केवल अपने अपहरण का दुःख नहीं व्यक्त कर रही हैं। वह रावण के आचरण की नैतिक प्रकृति पहचानकर उसे कठघरे में खड़ा करती हैं।
अरण्यकाण्ड 3.53 में सीता रावण के सामने उसके छल को उजागर करती हैं। वह मारीच के स्वर्णमृग-वेश और राम को आश्रम से दूर करने की योजना का संदर्भ देती हैं। फिर रावण के इस तथाकथित पराक्रम की तुलना उसके वास्तविक आचरण से करती हैं।उनकी आपत्ति का सार स्पष्ट है: यदि रावण इतना ही वीर है, तो राम से सामने आकर युद्ध क्यों नहीं करता?
वह राम की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर सीता का अपहरण करता है। इस प्रकार सीता रावण की शक्ति का नहीं, उसके शक्ति-प्रदर्शन के तरीके का प्रश्न उठाती हैं। शारीरिक बल होना और वीर होना एक ही बात नहीं है।

रावण के प्रलोभनों और अपनी शक्ति के प्रदर्शन के उत्तर में सीता कहती हैं—
राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचलः।
सत्यसन्धः परिज्ञातो यस्य पुत्रः स राघवः॥
अर्थात् दशरथ नाम के राजा धर्म की अचल मर्यादा के समान थे। सत्यप्रतिज्ञ राघव उनके पुत्र हैं।यहाँ सीता राम का परिचय मात्र नहीं दे रहीं। वह रावण के सामने दो नैतिक व्यवस्थाओं का अंतर रख रही हैं—एक ओर धर्म और सत्य पर प्रतिष्ठित राम का वंश, दूसरी ओर छलपूर्वक स्त्री का अपहरण करने वाला रावण।

सीता का सबसे तीखा वाक्य यह है—
शूरेण धनदभ्रात्रा बलैः समुदितेन च।
अपोह्य रामं कस्माच्चिद् दारचौर्यं त्वया कृतम्॥
अर्थात्—कुबेर के भाई! वीर और सेनाओं से सम्पन्न होते हुए भी तूने राम को किसी प्रकार दूर करके यह दारचौर्य किया है।सुंदरकांड का यह वाक्य है।’दारचौर्य’ शब्द पर ध्यान दीजिए। सीता रावण के कृत्य को वीरतापूर्ण विजय नहीं, दूसरे पुरुष की पत्नी की चोरी कहती हैं। रावण की शक्ति, उसका राजपद और उसका वंश—इनमें से कोई भी उसे इस अपराध से मुक्त नहीं करता।

महोदय कहते हैं कि रावण ने केवल यज्ञों में पशुहत्या रोकने के लिए ऋषियों और देवताओं का विरोध किया। वे रावण के देवताओं और ऋषियों के विरोध को यज्ञों में पशुबलि के विरोध से जोड़ते हैं। वे इसे रावण के नैतिक गुण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जबकि वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है जिसमें किसी यज्ञ में पशुहिंसा का प्रत्यक्ष वर्णन करके उसे रावण के विरोध का कारण बताया गया होअरण्यकाण्ड 3.32.19–21 में शूर्पणखा रावण के बारे में यज्ञों में बाधा डालने और सोम-आहुति के प्रसंग का उल्लेख करती है। वहाँ रावण को यज्ञों में बाधा डालने वाला और लोगों के अहित में प्रवृत्त बताया गया है।
इस वर्णन में ऐसा स्पष्ट कथन नहीं है कि रावण का उद्देश्य करुणा के कारण पशुहत्या रोकना था। उपलब्ध पाठ में यज्ञ-विरोध को रावण के अपने राजनीतिक और धार्मिक वर्चस्व के संदर्भ में भी पढ़ा जा सकता है।

वे कहते हैं कि रावण ने सीता के साथ वही नहीं किया जो राम और लक्ष्मण ने शूर्पणखा के साथ किया था, इसलिए वह नैतिक रूप से श्रेष्ठ था। कि रावण ने शूर्पणखा के साथ हुए व्यवहार का बदला लेने के लिए सीता के नाक-कान या शरीर के अन्य अंग नहीं काटे।
वाल्मीकि के यहां शूर्पणखा और सीता की घटनाएँ अलग परिस्थितियों में घटती हैं। वाल्मीकि रामायण में शूर्पणखा सीता पर आक्रमण करने के लिए झपटी थी; सीता ने शूर्पणखा पर आक्रमण नहीं किया था।
अरण्यकाण्ड, सर्ग 18 में शूर्पणखा राम और लक्ष्मण के सामने सीता को मारकर खाने की बात करती है। लक्ष्मण द्वारा उसका विरूपण किए जाने का तत्काल प्रसंग भी यही है कि वह सीता को हानि पहुँचाने के लिए उद्यत हुई थी।
अरण्यकाण्ड 3.18.17 में शूर्पणखा कहती है—
इमां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्।
सीतेत्युक्त्वा तु वैदेहीं अङ्केनादाय मैथिलीम्॥

महोदय विभीषण को लालची और विश्वासघाती बताते हैं और कहते हैं कि उसका वास्तविक उद्देश्य लंका का राजा बनना था।
जबकि युद्धकाण्ड 6.10 में विभीषण रावण को सीता लौटाने की सलाह देता है। वह अशुभ संकेतों और युद्ध के विनाशकारी परिणामों का उल्लेख करता है। रावण उसकी सलाह अस्वीकार करता है।युद्धकाण्ड 6.17.14–16 में विभीषण कहता है कि उसने बार-बार रावण को सीता लौटाने की सलाह दी, लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और उसे अपमानित किया। इसके बाद विभीषण राम की शरण में जाता है।

महोदय का कहना रहा कि विभीषण ने रावण के प्रति कोई न्यायपूर्ण सलाह नहीं दी; उसने केवल भाई से विश्वासघात किया।यह दावा पिछले बिंदु का दूसरा पक्ष है।
वाल्मीकि का पाठ बताता है कि विभीषण की सलाह स्पष्ट रूप से सीता को लौटाने और युद्ध टालने की है। वह रावण को बताता है कि उसके निर्णय से लंका और उसके लोगों पर संकट आएगा। रावण सलाह सुनकर क्रोधित होता है और विभीषण को अपमानित करता है।

महोदय के अनुसार रावण प्रजा का दयालु और आदर्श रक्षक था। रावण के दस गुणों की उनकी सूची में वे उसे प्रजा और संबंधियों का दयालु रक्षक बताते हैं। जबकि रण्यकाण्ड 3.41.14–15 में मारीच रावण से कहता है कि अत्याचारी और दुर्बुद्धि राजा के संरक्षण में प्रजा का विकास नहीं होता। वह रावण को कठोर, दुर्बुद्धि और इन्द्रियों को वश में न रखने वाला राजा कहता है।वाल्मीकि के पाठ में रावण की शासन-शैली की आलोचना भी मौजूद है। कुंभकर्ण तक रावण की आलोचना करता है ।
रावण की मृत्यु पर विभीषण के विलाप के रूप में वेलिखते हैं: “You never failed to do justice: You respected the greatmen.” युद्धकाण्ड 6.109 में विभीषण रावण के शव पर विलाप करते हुए उसके पराक्रम और सामर्थ्य का वर्णन करता है। उसी प्रसंग में वह कहता है कि रावण ने उसकी और दूसरे शुभचिंतकों की सलाह नहीं मानी तथा काम और मोह से अभिभूत होकर विनाश की ओर बढ़ा।
महोदय का कथन है कि रावण और उसके अनुयायियों को क्रूर राक्षस इसलिए कहा गया क्योंकि वे ब्राह्मणों के शत्रु थे। जबकि वाल्मीकि का पाठ रावण की कथा में उसका वंश, तपस्या, वरदान, सामर्थ्य और विद्वत्ता वर्णित करता है। रावण स्वयं ब्राह्मण था लेकिन साथ ही सीता-हरण, ऋषियों के यज्ञों में बाधा और विभीषण की सलाह अस्वीकार करने जैसी घटनाएँ भी हैं।अरण्यकाण्ड में मारीच रावण के शासन और उसके निर्णयों की आलोचना करता है। युद्धकाण्ड में विभीषण भी सीता लौटाने की सलाह देता है, जिसे रावण अस्वीकार करता है।

ऐसे झूठे लोग सच्ची रामायण लिखने का दावा करते थे।

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