मराठा काल
मराठा काल में नागपुर एक साधारण क्षेत्र से बदलकर एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य की संप्रभु राजधानी बना।
सत्रह सौ तैंतालीस से अठारह सौ तिरपन तक यहाँ मराठा साम्राज्य के भोंसले राजवंश का शासन रहा।
जिसने नागपुर का राजनीतिक आर्थिक और सांस्कृतिक कायाकल्प कर दिया।
नागपुर नाम नाग नदी की वजह से हुआ।
भोंसले वंश का आगमन।
गोंड राजा चंद सुल्तान की मृत्यु के बाद राजपरिवार के गृहयुद्ध को सुलझाने के लिए राघोजी प्रथम भोंसले को बुलाया गया था ।
संप्रभु राजधानी स्थिति को संभालने के बाद राघोजी प्रथम
ने सत्रह सौ तैंतालीस में नागपुर पर सीधा अधिकार स्थापित किया ।
और इसे अपने भोंसले मराठा साम्राज्य की आधिकारिक राजधानी घोषित किया ।
साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार
भोंसले शासकों के काल में नागपुर केवल एक शहर नहीं बल्कि एक विशाल मध्य पूर्वी भारतीय साम्राज्य का केंद्र बन गया ।
नागपुर के नियंत्रण में आज का पूरा विदर्भ महाराष्ट्र छत्तीसगढ़ ओडिशा और मध्य प्रदेश व झारखंड के कुछ हिस्से शामिल
थे।
ओडिशा का प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर भी इसी काल में नागपुर साम्राज्य के अधीन आया था।
वास्तुकला और नागरिक बुनियादी ढांचा
मराठा शासकों ने नागपुर को एक सुनियोजित और समृद्ध शहर बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य करवाए।
किलेबंदी और प्रवेश द्वार सुरक्षा के लिए पूरे नागपुर शहर के चारों ओर एक विशाल सुरक्षा दीवार बनाई गई ।
जिसमें शहर में प्रवेश के लिए कई ऐतिहासिक द्वार थे।
वाडा संस्कृति और महल नागपुर का प्रसिद्ध महल क्षेत्र इसी काल की देन है।
राजाओं और सरदारों के रहने के लिए विशाल पारंपरिक वाडा मराठा शैली के महलनुमा घर बनाए गए ।
तालाबों का निर्माण पानी की सुचारू व्यवस्था के लिए गांधी सागर तालाब जुम्मा तालाब और शुक्रवारी तालाब जैसे जल निकायों का सुंदरीकरण और निर्माण कराया गया ।
धार्मिक स्थल इस काल में मराठा स्थापत्य शैली के कई भव्य मंदिरों और घाटों का निर्माण हुआ।
पांचगांव का ऐतिहासिक गृहयुद्ध सत्रह सौ चौहत्तर
राघोजी प्रथम के बेटों मुधोजी और साबाजी के बीच नागपुर की गद्दी हासिल करने के लिए छब्बीस जनवरी सत्रह सौ चौहत्तर को पांचगांव के मैदान में भीषण युद्ध हुआ।
इस युद्ध में तोपों और हाथियों का इस्तेमाल हुआ था।
जिसमें साबाजी मारे गए और मुधोजी ने नागपुर की सत्ता संभाली।
व्यापार और प्रशासनिक विकास
भोंसले राजाओं ने नागपुर को मध्य भारत का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बनाया कपड़ा और कृषि व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई नए बाजारों बुधवारी बाजार इतवारी बाजार की नींव रखी गई ।
इस दौरान राजकाज और दरबार की मुख्य भाषा मराठी
बनी।
मराठा काल का अंत सत्रह सौ सत्रह से अठारह सौ तिरपन
सीताबर्डी का युद्ध।
अठारह सौ सत्रह तीसरे एंग्लो मराठा युद्ध के दौरान अप्पा साहेब भोंसले अंग्रेजों से हार गए ।
जिसके बाद नागपुर पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का परोक्ष नियंत्रण हो गया ।
ब्रिटिश विलय अठारह सौ तिरपन वर्ष अठारह सौ तिरपन में अंतिम भोंसले शासक राघोजी तृतीय की बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु हो गई।
इसके बाद अंग्रेजों ने हड़प नीति के तहत नागपुर के मराठा साम्राज्य को हमेशा के लिए ब्रिटिश भारत में मिला लिया।
मुधोजी और साबाजी भोंसले के बीच हुआ संघर्ष
नागपुर के मराठा इतिहास का एक अत्यंत नाटकीय और रक्तपात से भरा अध्याय है।
इस गृहयुद्ध का अंतिम और सबसे बड़ा मुकाबला छब्बीस जनवरी सत्रह सौ पचहत्तर को पांचगांव के मैदान में हुआ जो नागपुर से लगभग छह मील दक्षिण में स्थित है।
नागपुर के तत्कालीन मराठा शासक जानोजी भोंसले की सत्रह सौ बहत्तर में बिना किसी संतान के मृत्यु हो गई।
उन्होंने मरने से पहले अपने भाई मुधोजी के छोटे बेटे राघोजी द्वितीय को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित
किया था।
लेकिन जानोजी के दूसरे भाई साबाजी भोंसले ने इस फैसले को नहीं माना।
और नागपुर की गद्दी पर अपना दावा ठोक दिया इस वजह से दोनों भाइयों मुधोजी और साबाजी के बीच सत्ता के लिए तीन साल तक लगातार सैन्य टकराव चलता रहा ।
पांचगांव के युद्ध का घटनाक्रम
छब्बीस जनवरी सत्रह सौ पचहत्तर को दोनों भाई अपनी अपनी सेनाओं के साथ पांचगांव के मैदान में आमने सामने आए ।
साबाजी की बढ़त युद्ध की शुरुआत में साबाजी भोंसले का पलड़ा बेहद भारी रहा।
उनकी कुशल सेना ने मुधोजी की सेना को पीछे धकेल
दिया ।
मुधोजी का घिरना युद्ध के एक मोड़ पर मुधोजी पूरी तरह से साबाजी के सैनिकों द्वारा घेर लिए गए मुधोजी की हार
लगभग तय दिख रही थी।
तीन युद्ध का नाटकीय अंत
जीत के उत्साह में चूर साबाजी भोंसले ने अपने हाथी को सीधे मुधोजी के हाथी की तरफ बढ़ा दिया।
साबाजी ने मुधोजी के करीब पहुंचकर चिल्लाकर उन्हें आत्मसमर्पण करने को कहा ।
लेकिन मुधोजी ने हार मानने के बजाय अचानक अपनी पिस्तौल निकाली।
और सीधे साबाजी पर गोली चला दी गोली लगते ही
साबाजी भोंसले की युद्ध के मैदान में ही तड़पकर मृत्यु
हो गई।
अपने सेनापति और राजा को मरा देख साबाजी की सेना में भगदड़ मच गई और जीती जा रही बाजी अचानक मुधोजी के पक्ष में पलट गई ।
युद्ध का परिणाम
एकछत्र राज अपने सगे भाई साबाजी की हत्या करने के बाद नागपुर की राजगद्दी के लिए मुधोजी का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।
संरक्षक का पद
मुधोजी ने अपने छोटे बेटे राघोजी द्वितीय को नागपुर का आधिकारिक राजा बनाया ।
और खुद उसके मुख्य संरक्षक के रूप में सत्ता की कमान संभाली ।
इस शानदार और अप्रत्याशित जीत के बाद मुधोजी भोंसले को सेना धुरंधर की उपाधि दी गई।
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