Saturday, 26 September 2026

सोमनाथ मंदिर और इतिहास

सोमनाथ, अरबों की देवी अल मनात और महमूद...
क्या गजनवी ने लूट के लिए सोमनाथ पर हमला किया था❓ 

क्या कहते हैं उसके समकालीन मुस्लिम इतिहासकार❓

👀👉 सर्दियों का मौसम था।

ग़ज़नी का सुल्तान महमूद बिन सुबुक्तगीन, जिसे इतिहास महमूद ग़ज़नवी के नाम से जानता है, भारत की ओर एक और अभियान की तैयारी कर रहा था।

लेकिन इस बार उसकी दिशा पहले के अभियानों से अलग थी।

लक्ष्य था समुद्र के किनारे स्थित एक ऐसा प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ, जिसकी ख्याति गजनी में महमूद तक पहुँच चुकी थी।

नाम था सोमनाथ (द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम)।

साल था हिजरी (इस्लामी कैलेंडर) 416, अर्थात 1025–26 ईस्वी।

इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विवरण हमें  उन्हीं मुस्लिम लेखकों से मिलता है जो महमूद के समय में ही लिख रहे थे।

उनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम हैं : अबू रेहान अल-बिरूनी, अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी और महमूद के दरबार से जुड़े कवि फर्रुख़ी सिस्तानी।

👉  सबसे पहले सोमनाथ मंदिर को देखें।

अल-बिरूनी ने अपनी प्रसिद्ध कृति " तहकीक मा लिल हिन्द मिन माकूलात माकूलात फी अलीअकबाल आम माजुला", या "किताबुल हिंद" में सोमनाथ विध्वंस का उल्लेख किया है।

वे उसके नाम की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि सोम का अर्थ चंद्रमा और नाथ का अर्थ स्वामी है अर्थात चंद्रमा का स्वामी।

उनके अनुसार सोमनाथ समुद्र के किनारे स्थित था और सरस्वती नदी के मुहाने से लगभग तीन मील की दूरी पर था।

वे वहाँ के धार्मिक विश्वास का वर्णन करते हुए बताते हैं कि समुद्र का ज्वार बढ़ने पर उसका पानी मंदिर में स्थित शिवलिंग तक पहुँचता था। इस प्रकार समुद्र स्वयं शिवलिंग का जलाभिषेक करता था। 

अल-बिरूनी केवल भौगोलिक स्थिति नहीं बताते।

वे उस पौराणिक कथा को भी दर्ज करते हैं जिसके अनुसार सोम अर्थात चंद्रमा ने प्रजापति की पुत्रियों से विवाह किया था, लेकिन रोहिणी के प्रति विशेष प्रेम के कारण उसे शाप मिला। प्रायश्चित के लिए उसने शिव लिंग की स्थापना की और वही शिवलिंग सोमनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस प्रकार अल-बिरूनी ने सोमनाथ के नाम और उसकी पौराणिक प्रतिष्ठा दोनों को दर्ज किया। 

📜 अल-बिरूनी ने सोमनाथ के विनाश के बारे में क्या लिखा?

सोमनाथ की भौगोलिक स्थिति, प्रसिद्धि और उसकी धार्मिक कथा बताने के बाद अल-बिरूनी एक ऐसी सूचना देते हैं जिसे इस घटना के इतिहास में विशेष महत्व प्राप्त है।

वे लिखते हैं कि हिजरी 416 (1025–26 ईस्वी) में अमीर महमूद ने सोमनाथ के विग्रह को नष्ट कर दिया। महमूद ने उसके ऊपरी भाग को तोड़ने का आदेश दिया और शेष भाग को उसके सोने, रत्नों तथा कढ़ाईदार वस्त्रों सहित ग़ज़नी ले जाने का आदेश दिया।

अल-बिरूनी के अनुसार, ग़ज़नी पहुँचने के बाद उस विग्रह का एक भाग नगर के हिप्पोड्रोम(मैदान-ए-गज़नी) में थानेसर से लाई गई कांस्य मूर्ति चक्रस्वामिन् के साथ डाल दिया गया। दूसरा भाग ग़ज़नी की मस्जिद के दरवाजे के सामने रखा गया, जहाँ लोग उस पर अपने पैर रगड़कर मिट्टी और गंदगी साफ करते हुए मस्जिद में प्रवेश करते थे।

अर्थात अल-बिरूनी के वृत्तांत में केवल यह नहीं है कि “मंदिर पर हमला हुआ” या “मूर्ति तोड़ी गई”; वे यह भी बताते हैं कि विग्रह (मूर्ति) के साथ विजय के बाद क्या किया गया और उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में किस प्रकार प्रदर्शित किया गया।

यही कारण है कि सोमनाथ पर महमूद के हमले के लिए अल-बिरूनी का विवरण विशेष महत्व रखता है। यह घटना के कुछ दशकों के भीतर लिखा गया एक ऐसे मुस्लिम विद्वान का स्पष्ट विवरण है जिसने महमूद को और इन चीजों को बहुत ही नजदीक से देखा था।

👉  अब गारदीज़ी का दिया विवरण देखते हैं।

अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी ने अपनी फ़ारसी इतिहास-कृति "ज़ैन-अल-अख़बार (Zayn al-Akhbar)" में महमूद के जीवन और ग़ज़नवी अभियानों का वर्णन किया है।

यह पुस्तक महमूद की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद की ही है और गारदीज़ी ग़ज़नवी दरबार तथा प्रशासन से निकट रूप से जुड़े हुए थे। उनकी पुस्तक में महमूद के शासन का विवरण 999 ईस्वी के बाद अधिक विस्तृत हो जाता है। 

गारदीज़ी बताते हैं कि महमूद को एक ऐसी जगह के बारे में समाचार मिला जो महासागर के किनारे स्थित एक महान नगर थी।

नाम था सोमनाथ।

वे लिखते हैं कि भारतीय उस स्थान को उसी प्रकार पूजते थे जिस प्रकार मुसलमान मक्का को पवित्र मानते हैं।

वहाँ सोने और चाँदी की अनेक मूर्तियाँ थीं।

उनमें एक मूर्ति के बारे में गारदीज़ी मनात (Manāt) जो इस्लाम पूर्व के अरब की प्रमुख देवी थी, का नाम लेते हैं और लिखते हैं कि वह सोने से अलंकृत तथा रत्नों से जड़ी हुई थी।

📜 मनात कौन थी और सोमनाथ से उसका क्या संबंध  था ?

मनात (Manāt) इस्लाम-पूर्व अरब की प्रमुख देवियों में से एक थी। उसका नाम अल-लात और अल-उज़्ज़ा के साथ आता है। पश्चिमी अरब में उसका एक प्रमुख तीर्थ था और उसे भाग्य अथवा नियति की देवी माना जाता था। इस्लाम के उदय से पहले अरब के धार्मिक जीवन में इन देवियों की पूजा महत्वपूर्ण थी।

लेकिन ग़ज़नवी इतिहासकार अबू सईद गारदीज़ी ज़ैन-अल-अख़बार में सोमनाथ के संबंध में एक अलग और अत्यंत रोचक कथा दर्ज करते हैं।

स्वयं गारदीज़ी के  शब्दों में 
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—बल्ख से ग़ज़नी आया और गर्मी का मौसम वहीं बिताया। और जब सर्दी आई, तो अपनी प्रथा और आदत के अनुसार युद्ध के लिए हिंदुस्तान की ओर गया।
और उसके सामने यह बात कही गई कि समुद्र-ए-मुहीत के किनारे एक बड़ा नगर है, जिसे सोमनात कहते हैं। और वह नगर हिंदुओं के लिए वैसा ही है जैसा मुसलमानों के लिए मक्का।
और उसमें सोने और चाँदी की बहुत-सी मूर्तियाँ हैं।
और मनात, जिसे सैय्यद (अर्थात इस्लाम के पैग़ंबर) के समय काबा से अदन के रास्ते वहाँ से निकालकर ले जाया गया था, वहीं है। और उन्होंने उसे सोने से मढ़ रखा है तथा उसमें रत्न जड़े हुए हैं। और उस मूर्तिगृह के खज़ानों में बहुत बड़ी संपत्ति रखी हुई है।
लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बहुत ख़तरनाक, भयावह और अत्यन्त कष्टपूर्ण है।"

गारदीजी आगे लिखता है:
"और जब अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने यह समाचार सुना, तो उसके मन में उस नगर तक जाने, उन मूर्तियों को नष्ट करने और एक ग़ज़ा/धार्मिक सैन्य अभियान करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
और वह हिंदुस्तान से सोमनाथ की ओर, नहरवाला के रास्ते, चला।
जब वह नहरवाला नगर पहुँचा, तो वह खाली किया जा चुका था और उसके सभी लोग भाग गए थे। उसने सेना को वहाँ से चारे की व्यवस्था करने का आदेश दिया और वहाँ से सोमनाथ की ओर चला।"

"और जब वह नगर के निकट पहुँचा और श्रमणों तथा ब्राह्मणों ने उसे देखा, तो वे सभी मूर्तियों की पूजा में लग गए।
और उस नगर का सरदार नगर से बाहर निकला और अपने परिवार तथा सामान के साथ नाव में बैठा और समुद्र में चला गया।
और एक द्वीप पर उतर गया। वे वहीं तब तक रहे जब तक इस्लामी सेना उस प्रदेश से चली नहीं गई; वे उस द्वीप से बाहर नहीं आए।"

"और जब इस्लामी सेना नगर के निकट पहुँची, तो नगर के लोगों ने स्वयं को किलेबंदी के भीतर कर लिया और युद्ध में लग गए।
बहुत समय नहीं बीता कि किलेबंदी टूट गई और अमीर महमूद की सेना उसमें प्रवेश कर गई।
और उन्होंने बहुत भयंकर युद्ध किया, और बहुत से “काफ़िर” मारे गए।"

आगे गारदीजी लिखता है :
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने आदेश दिया कि मुअज्ज़िन मंदिर की छत/ऊपरी भाग पर जाए और नमाज़ की पुकार (अज़ान) दे।
और उन सभी मूर्तियों को तोड़ दिया गया, जला दिया गया और नष्ट कर दिया गया।
और मनात के पत्थर को जड़ से उखाड़ दिया गया, उसके टुकड़े-टुकड़े किए गए और उसके कुछ टुकड़े खच्चरों/अस्तरों पर रखकर ग़ज़नी लाए गए।"

"और मूर्तियों के नीचे एक खज़ाना था।
उसने वह खज़ाना ले लिया और वहाँ से बहुत बड़ी संपत्ति प्राप्त की।
अर्थात चाँदी की मूर्तियाँ, रत्नों से जड़ी मूर्तियाँ और दूसरे खज़ानों की लूट—इन सबको ऊँटों पर लादा गया और ग़ज़नी लाया गया।"

"और वहाँ से वह वापस लौट गया।
भीमदेव, हिंदुओं का राजा, रास्ते में था।
अमीर महमूद ने कहा कि ऐसा न हो कि इस महान विजय को कोई क्षति पहुँच जाए। इसलिए वह सीधे रास्ते से नहीं गया और मुल्तान की ओर मुड़ गया।
उस रास्ते में सेना को बहुत कठिनाई हुई और इस यात्रा में इस्लामी सेना के बहुत से लोग मारे गए। यहाँ तक कि मुल्तान पहुँचने से पहले मनुष्यों से अधिक पशु मारे गए।
और वहाँ से वे ग़ज़नी की ओर चले गए।"

👉  अब एक तीसरा विवरण देखते हैं। 

महमूद के दरबार के कवि फर्रुख़ी सिस्तानी ने महमूद ग़ज़नवी के सोमनाथ अभियान पर एक विस्तृत क़सीदा लिखा।  ध्यान रहे कि सिस्तानी इतिहासकार नहीं, एक शायर था।

उसी के शब्द  हिंदी में अनुदित:
"तालाब के चारों ओर एक हजार छोटे-छोटे मंदिर थे। उनके आगे एक विशाल मंदिर था और उसके बीच एक मूर्ति थी—सुंदरता में चंद्रमा जैसी, लेकिन कद में सरू के वृक्ष जैसी। एक दूसरी विशाल आकृति थी, जो सफेद दैत्य जैसी, रास्ते के बीच सिर उठाए दिखाई देती थी। वहाँ नारियल और पोपल के वृक्ष थे, जिनमें हर वृक्ष वर्ष में बार-बार फल देता था। शहर की सीमा पर एक मजबूत किला था और उसमें मूर्तिपूजकों का एक बड़ा समुदाय इकट्ठा था।"

"उसने लोगों को मारा और मंदिरों को तोड़ा तथा जला दिया, जैसे उसने दारनी और थानेसर के मंदिरों के साथ किया था। रास्ते में उससे केवल वही बच पाया जो किसी तिनके या झाड़ी के नीचे छिपा रहा, जैसे कोई दुर्भाग्यशाली पशु। उसने उन छिपे हुए लोगों को खोजे बिना छोड़ दिया, क्योंकि उस राजा का उद्देश्य कुछ और था। जो सोमनाथ के मंदिर को नष्ट करने जा रहा हो, वह छिपे हुए लोगों को खोजने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता।"

"बादशाह मनात को नष्ट करने के लिए ही तेजी से आगे बढ़ रहा था; शायद उसकी यही जल्दी इसी कारण थी। मनात, लात और उज़्ज़ा मक्का में तीन मूर्तियाँ थीं—उस समय के मूर्तिकार आज़र के हाथों से बनी हुई। पूरी दुनिया उन तीनों मूर्तियों की पूजा करती थी, सिवाय उस व्यक्ति के जिस पर खुदा की दृष्टि थी। उनमें से दो को पैग़ंबर ने तोड़ दिया और उस दिन दोनों को काबा के सामने डाल दिया गया। मनात को काफ़िरों के बीच से चुरा लिया गया और उस देश से निकालकर किसी दूसरे देश में ले जाया गया। उसे ऐसी जगह ले जाया गया जहाँ आदम के समय से उस भूमि पर किसी काफ़िर के अतिरिक्त कोई बैठा या गया नहीं था।"

"उस मूर्ति के लिए एक मंदिर बनाया गया, जिसमें एक लाख प्रतिमाएँ और एक लाख आकृतियाँ थीं। उस मंदिर पर चारों ओर से श्रद्धा के लिए सोने की पट्टियाँ इस तरह लगाईं गई थीं कि वे पत्थर की पट्टियों जैसी दिखाई देती थीं। मंदिर के भीतर उस मूर्ति के लिए एक ख़ज़ाना बनाया गया था और उस ख़ज़ाने में बड़े-बड़े संदूकों में रत्न रखे थे। उसके लिए नगर-नगर से इतने रत्न खरीदे गए कि रत्न खरीदने वाला रत्न-विक्रेताओं से ही तृप्त हो गया।"

"मूर्ति के सिर के ऊपर एक मुकुट या शिरोभूषण लटकाया गया था, जिस पर माणिकों का काम था और मोतियों की बुनावट थी। उसके लिए शुद्ध सोने का एक शिरस्त्राण बनाया गया था, जो अग्नि के पर्वत जैसा था और उस पर जड़ा रत्न चिंगारी जैसा था। उसका मुकुट और शिरोभूषण किसी पूरे राज्य के कर के बराबर मूल्य का था; और उसकी सबसे कम मूल्यवान वस्तुओं में भी वही मुकुट और शिरोभूषण थे।"

"फिर उन्होंने उसे सोमनात नाम दिया। ऐसा कौन-सा नाम देखा गया है जिसके भीतर उसका दूसरा नाम छिपा हुआ हो? " (यहाँ फर्रुख़ी “सोमनात” के भीतर “मनात” नाम छिपा होने की ओर संकेत करता है।)

"उन्होंने संसार में यह बात फैलाई कि समुद्र से ऐसी आकृति वाली एक मूर्ति निकली है। वह सारे लोगों का नियंता और संसार का कर्ता है; वह सूर्य को प्रकाश देने वाला और चंद्रमा को प्रकाश देने वाला है। उसके ज्ञान से संसार की भलाई और बुराई निर्धारित होती है और उसके आदेश से संसार में भाग्य और नियति चलती है। दूसरे समूह ने कहा—नहीं, इस मूर्ति का स्थान उच्च आकाश में था। किसी मनुष्य ने इसे यहाँ नहीं लाया; यह स्वयं आकाश से यहाँ आई है। यह इसे दिन कहती है और उसे रात; इसे समुद्र कहती है और उसे स्थल। जब यह समुद्र से सिर उठाकर भूमि पर आई, तो सभी वनस्पतियों और वृक्षों ने इसके सामने सजदा किया।"

"गाय ने अपने दूध से इसे धोया और इसी कारण वे गाय को माता कहकर इसकी पूजा या निकटता का साधन मानते हैं। सिर्फ एक पत्थर के कारण ईश्वर की इतनी हजारों प्रजा शैतान की बात पर भरोसा करके संकट में पड़ गई। हर दिन उस पत्थर को धोना उनका कर्तव्य था—गंगा के जल, दूध, केसर और चीनी से। उस मूर्ति को गंगा के जल से धोने के लिए हर दिन दस बड़े प्यालों से भी अधिक जल पहुँचता था। गंगा के जल की क्या बात करूँ—वह सोमनाथ से कई फ़रसख़ ( दूरी मापने की फारसी इकाई) दूर है, उस स्थान से जहाँ यह पतन और अधर्म का स्थान है।"

"जब सूर्य ग्रहण लगता, तो एक लाख बच्चे और पुरुष उसके पास सहायता माँगने और क्षमा माँगने जाते। उन काफ़िरों में जो सोमनाथ हज के लिए जाते थे, उनकी भीड़ रास्ते में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से अलग नहीं होती थी। शमन उस पत्थर को ईश्वर कहते हैं—क्या ही व्यर्थ बात है; उनके सिर पर धूल पड़े!"

"खुदाई हुक्म ऐसा था कि वह दीन परवर शहरयार (बादशाह) उस मूर्ति को उसके स्थान से उखाड़ दे। इस उद्देश्य से कि वह उसे मक्का वापस ले जाए, उसने उसे उखाड़ दिया—और अब उसे हमारे साथ-साथ ले जा रहा है।"

"जब उसने उस मूर्ति को वहाँ से उखाड़ लिया और धन तथा सोना ले लिया, तो उसने अपने हाथ से मंदिर के भीतर आग डाल दी। जब सोमनाथ को जलाने का काम पूरा कर लिया, तो उसने लौटने वाले दूसरे लोगों के मार्ग पर प्रस्थान किया।"

महमूद की कशीदगी (प्रशंसा) में सिस्तानी उसे संबोधित करते हुए लिखता है, "तू बहमन के महीने में सोमनाथ जला रहा था, जबकि दूसरे बादशाह ऊद, सुगंधित पदार्थ और अंबर का आनंद ले रहे थे।"

⭐ इस विवरण में सबसे महत्वपूर्ण बात
फर्रुख़ी के वर्णन में मनात और सोमनाथ का संबंध आकस्मिक नहीं है। वह बाकायदा नाम के भीतर “मनात” को छिपा हुआ बताता है और फिर कहता है कि महमूद ने उस मूर्ति को मक्का वापस ले जाने के उद्देश्य से उखाड़ा।

इस प्रकार गारदीज़ी और फर्रुख़ी में एक उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है:

- गारदीज़ी: मनात को पैग़ंबर मुहम्मद के समय काबा से अदन के रास्ते सोमनाथ लाए जाने की कथा देता है और उसे “मनात का पत्थर” कहता है।
- फर्रुख़ी: सोमनाथ/सोमनात नाम में “मनात” छिपा होने की व्याख्या करता है और महमूद द्वारा मूर्ति को मक्का वापस ले जाने की बात कहता है।

अर्थात दोनों महमूद के समकालीन स्रोतों में सोमनाथ की मूर्ति को मनात से जोड़ने वाली एक ही व्यापक परंपरा दिखाई देती है, यद्यपि दोनों का विवरण और भाषा अलग है।

👉 वामपंथी और हाल के मुस्लिम इतिहासकार यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि गजनवी बस एक लुटेरा था।

लेकिन, प्रथमदर्शी रचनाकारों के अनुसार यह केवल सोने की लूट की कहानी नहीं थी।

यदि उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना होता, तो मंदिर से सोना, चाँदी, रत्न और अन्य संपत्ति लेकर वापस लौटना पर्याप्त था।

लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम स्रोतों में जो चित्र दिखाई देता है, उसमें मूर्तिभंजन स्वयं विजय का हिस्सा था।

गारदीज़ी लिखते हैं कि महमूद सोमनाथ की मूर्तियों को नष्ट करने की इच्छा से वहाँ पहुँचा। 

अल-बिरूनी बताते हैं कि मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया।

इसलिए प्रारंभिक मुस्लिम सामग्री में धार्मिक उद्देश्य को हटाकर केवल आर्थिक लूट की कहानी बनाना  स्रोतों के साथ न्याय नहीं होगा।

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स्रोत:
1. अल-बिरूनी — किताब अल-हिंद (Kitāb al-Hind)
अंग्रेज़ी अनुवाद: Edward C. Sachau, Alberuni’s India: An Account of the Religion, Philosophy, Literature, Geography, Chronology, Astronomy, Customs, Laws and Astrology of India about A.D. 1030, 2 volumes, Trübner’s Oriental Series, 1887–1888. 
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2. अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी — ज़ैन अल-अख़बार (Zayn al-Akhbār)
अंग्रेज़ी अनुवाद: C. Edmund Bosworth, The Ornament of Histories: A History of the Eastern Islamic Lands AD 650–1041, I.B. Tauris, 2011. यह गारदीज़ी के Zayn al-Akhbār का अंग्रेज़ी अनुवाद और टिप्पणी सहित संस्करण है। �

3. फर्रुख़ी सिस्तानी — दीवान-ए-फर्रुख़ी सिस्तानी (Dīvān of Farrukhī Sīstānī)
मूल पाठ का प्रमुख आलोचनात्मक संस्करण: मुहम्मद जाबिर दबीर-सियाक़ी (Muhammad Jabir Dabir-Siyāqi), Dīvān-i Farrukhī Sīstānī

सोमनाथ संबंधी अंश का अंग्रेज़ी अनुवाद और विश्लेषण: Th. Emil Homerin, “Saʿdi’s Somnatiyah,” Iranian Studies, जिसमें फर्रुख़ी के दीवान के pp. 69–71, lines 1338ff. का अनुवाद दिया गया है।

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