अरे गुरु! संकल्प केवल आपका नाम और पता नहीं है। यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति से लेकर, 14 लोकों के निर्माण, ग्रहों की सूक्ष्म दशाओं और विश्व-कल्याण तक की एक 'कॉस्मिक उद्घोषणा' है।
मेरे उच्च कोटि के विद्वान आचार्य जन और प्रबुद्ध पाठक अक्सर मुझसे एक ऐसे 'विशुद्ध संकल्प' की मांग करते थे, जिसमें कुछ भी अछूता न रहे। जिसमें सृष्टि का दर्शन भी हो और यजमान की सूक्ष्मतम कामनाएं भी।
आज मैं आपके समक्ष वही अद्भुत, गूढ़ और परिपूर्ण संकल्प प्रस्तुत कर रहा हूँ।
यह कोई साधारण संकल्प नहीं है।
जब कोई विद्वान आचार्य यज्ञ मंडप में इसे नाद स्वर में पढ़ेगा, तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएंगे और उन्हें लगेगा— "हाँ, इसे कहते हैं संकल्प!"
जहाँ-जहाँ संस्कृत अत्यंत क्लिष्ट है, वहाँ मैंने कोष्ठक में उसका सरल अर्थ लिख दिया है, ताकि भाव पूरी तरह स्पष्ट हो।
इसे ध्यान से पढ़ें, कंठस्थ करें और अपने पास सहेज कर रख लें:
॥ बृहद अनुष्ठान एवं यज्ञ हेतु सम्पूर्ण विशुद्ध सङ्कल्पः ॥
🛑परब्रह्म और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का दार्शनिक स्मरण👇
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः स्वस्ति श्री मन्मुकुन्द सच्चिदानन्द-रूपस्य परब्रह्मणो निर्वाच्य मायया यथाशक्ति विजृम्भिता विद्यायोगात् कालकर्मस्वभावाविर्भूत महत्तोदिताहंकार त्रयोदभूतस्य वियदादि पञ्च केन्द्रिय देवता निर्मिताण्डकटाहे चतुर्दश लोकात्मके लीलयातन्तमध्यवर्ति भगवतः श्रीनारायणस्य
(अर्थात: सच्चिदानंद परब्रह्म की अनिर्वचनीय माया, महत तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राओं और पंचमहाभूतों से निर्मित इस ब्रह्माण्ड रूपी अण्डकटाह (कड़ाहे) और चौदह लोकों के मध्य लीला करने वाले भगवान श्रीनारायण...)
🛑सृष्टि, देश और काल का विशुद्ध वर्णन
नाभिकमलोद्भूतस्य सकललोकस्य पितामहस्य ब्रह्मणः सृष्टि कुर्वतस्तदुद्धारणाय प्रजापति प्रार्थितस्य महापुरुषस्य श्री श्वेतवाराहावतारेण ध्रियमाणायामस्यां धरित्र्यां भूर्लोकसंज्ञितायां सप्तद्वीप मण्डितायां क्षीरोदादि समुद्रतद्वीज वलयीकृत लक्षयोजनविस्तीर्णेजम्बुद्वीपे स्वर्गादि सरिद्भिः पाविते निखिल जनपावन कर्तृभिः शौनकादि महामुनि निवास भूते नैमिष्यारण्यादि मोक्षसाधनभूते श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोह्नि द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवश्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे भूर्लोके भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गते ब्रह्मावर्त्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे
👉(यहाँ यदि काशी में हों तो यह पढ़ें: काश्यां-अविमुक्त वाराणसी क्षेत्रे महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टक विराजिते भागीरथ्याः उत्तरवाहिन्याः गङ्गायाः वामे दिग्भागे)
(अब अपना वर्तमान स्थान और काल बोलें)
(अमुक) प्रान्ते (अमुक) मण्डलान्तर्गत (अमुक) पुण्यपवित्र ग्रामे (अमुक अयने) (अमुक) ऋतौ (अमुक) संवत्सरे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अमुक) राशिस्थिते श्रीसूर्ये (अमुक) राशिस्थिते श्रीचन्द्रे (अमुक) राशिस्थिते श्रीदेवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथा यथा राशिस्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगण विशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यकाले...
🛑 यजमान का परिचय एवं कामनाओं का महासागर
... (अमुक) गोत्रः (अमुक) शर्मा, वर्मा, गुप्तोऽहं वा सपत्नीकोऽहं (अत्रागत्यानां सर्वेषां जनानां प्रतिनिधि भूतोऽहं अस्मिन् (अमुक) यज्ञे श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त शास्त्रोक्त वेदोक्त तन्त्रोक्त पुण्यफल प्राप्त्यर्थं मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य तथा च अन्येषां जनानां विशेषतः एतत् प्रान्तीयानां सर्वेषां स्त्री पुंसां च नित्य कल्याण प्राप्त्यर्थं...
...कायिक वाचिक मानसिक सांसर्गिक चतुर्विध पापक्षय पूर्वकं आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, त्रिविध तापोपशान्तिसकल दुःख शेष निवृत्ति पूर्वकं व्याधादि जरा मृत्यु रोगभय शोकाद्युपसर्ग निवृत्ति-पुरस्सरं...
(अर्थात: काया, वाणी, मन और संसर्ग से हुए चारों प्रकार के पापों का क्षय हो, तथा दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों एवं बुढ़ापा, रोग, मृत्युभय आदि शांत हों।)
मम जन्म कुण्डल्यां प्रश्नकुण्डल्यां लग्न कुण्डल्यां गोचरे च तन्महादशायां अन्तर्दशायां प्रत्यन्तर्दशायां प्रतिप्रत्यन्तर्दशायां सूक्ष्मान्तर्दशायां केचिद्विरुद्ध चतुर्थाष्टम द्वादश स्थान स्थित क्रूर ग्रहास्तैः संसूचितं संसूचयिष्यमाणं पुत्रपौत्रादिसन्तते-रविच्छिन्नाभिवृद्ध्यर्थं...
(अर्थात: जन्मकुंडली, गोचर, या किसी भी सूक्ष्म दशा में यदि ४, ८ या १२वें भाव में क्रूर ग्रह बैठे हों, तो उनका दोष शांत हो।)
...आदित्यादिनवग्रहानुकुलता सिद्ध्यर्थं इन्द्रादिदशदिक्पालप्रसन्नता सिद्ध्यर्थं धर्मार्थकाममोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थं अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थं प्राप्तलक्ष्म्याश्चिरकालसंरक्षणार्थं सकलमनेप्सितकामना सिद्ध्यर्थं लोके वा राजद्वारे, सभायां, न्यायालये, उद्योगे, कृषिकार्ये, व्यापारे, समाजेऽपि तद्वारे वा सर्वत्र यशोविजय कीर्तिलाभादि प्राप्त्यर्थं शत्रुप्रराजय सद्धिष्ट सकल्पोक्त कामना सिद्ध्यर्थं च...
(अर्थात: राजदरबार (सरकार), न्यायालय , व्यापार और कृषि हर जगह विजय हो और शत्रुओं का पराभव हो।)
...इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुरितोपशमनार्थं गृहे विपुल धन-धान्य ऐश्वर्यादि-अभिवृद्धिपूर्बकं गृहे सर्वेषां जनानां शरीरे उत्पन्न एवं उत्पत्स्यमाण समस्त रोग व्याधि कष्ट पीडा निवारणपूर्बकं शरीरे दीर्घायुष्यनैरोग्य कीर्तिलाभक्षेमस्थैर्य सद्धर्म सद्बुद्धि सद्विद्या सद्विवेक सदाचारादि प्राप्त्यर्थं सनातन धर्मेस्मिन् अतिशयश्रद्धाभक्तिसंवृद्ध्यर्थं, धार्मिकग्रन्थानां पुराणानां सर्वासामं विद्यानां संवृद्ध्यर्थं विशेषतः स्वधर्मे सनातनधर्मे प्रीतिविवर्द्धनार्थम-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।
🛑 प्राकृतिक आपदा निवारण एवं अनुष्ठान का अंतिम संकल्प
इति सदुद्देश्यसिद्धिद्वारा विश्वस्मिन् जगति सर्वविधशान्त्यर्थं धर्मग्लान्यधर्मधर्माभ्युत्थान निवृत्तिपूर्वकं धर्मसंस्थापनार्थं च पुण्यकालेऽस्मिन् सकलदुरितोपशमनार्थं दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, विप्लव भूकम्प पशुरोग कृषिकार्ये च उत्पन्न समस्त बाधा निवारणार्थं निर्विघ्नतापूर्वक प्रचुर अन्न उत्पादनार्थं राजभय चौरभय सर्पभय शत्रुभय अग्निभय रोगभय यानपातानादिभय दुस्संगजन्याकस्मिकभय तथा नानागतभयनिवारणार्थं...
(अर्थात: अकाल, अतिवृष्टि, भूकंप, पशुओं के रोग, दुर्घटना, सर्प भय, अग्नि भय आदि सभी ज्ञात-अज्ञात भयों का निवारण हो।)
...नवग्रह-जन्यपीडा शान्त्यर्थं उपस्थितानां समेषां जनानां कल्याणार्थं तथा डाकिनी-शाकिनी-भूत-प्रेत-पिशाच-वेतालादिभय निवारणार्थं विशेषतः जगन्नियन्ता अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकस्य भगवतः सूर्यमण्डलावर्ति जगद्वीज पुरुषोत्तम वैकुण्ठाधिपतेः श्रीसीतारामयोः वा साम्बसदाशिवस्य वा लक्ष्मीनारायणयोः वा जगदम्बिकयोः अनुग्रह प्राप्त्यर्थं सग्रहमखं (शिवशक्ति या अपने हिसाब से यज्ञादि का नाम)
यागकर्म एभिर्द्विजकुलावंतसैः शम-दमादि-निखिल-गुणगण-भरितैः विद्वद्भिः सह अद्यरभ्य पूर्णाहुति पर्यन्तं करिष्ये।
तदङ्गत्वेन स्वस्तिपुण्याहवाचनं मातृकापूजनं, वसोर्धारा-पूजनमायुष्य मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि वरणञ्च करिष्ये।
तथा च मण्डपप्रवेशपूर्वकं वास्तुपूजनं, मण्डपपूजनं, चतुःषष्टियोगिनीपूजनं क्षेत्रपालनवग्रहपूजनं असंख्यात् सर्वतोभद्रपूजनं च करिष्ये।
तत्रादौ निर्विघ्नतासंसिद्ध्यर्थं गणैशाम्बिकयोः पूजन महं करिष्ये।
(इतना बोलकर हाथ का जल, अक्षत और द्रव्य सामने पात्र में छोड़ दे
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