१. शेषशायी-
अनन्त को शेष या शेषनाग भी कहा गया है, जिनके १००० सिरों में १ पर विन्दुमात्र पृथ्वी स्थित है। स्पष्टतः यह कोई सर्प नहीं है, वरन् सूर्य से भी बहुत बड़ी रचना है। शेषनाग क्षीर समुद्र में फैके हुए हैं, जिन पर विष्णु भगवान् सोये हुए है। विष्णु की नाभि से कमल निकलता है जिस पर पद्मनाभ ब्रह्मा स्थित हैं। आकाश के विभिन्न स्तरों एवं पृथ्वी पर इसके अनेक अर्थ हैं।
शयानं नाभिकमले ब्रह्माणं स महाप्रभुः। संस्थाप्य त्रीनिमाँल्लोकान् दग्ध्बा सर्वश्रिया सह॥१०॥
शेते स भोगिशय्यायां ब्रह्मा नारायणात्मकः। योगनिद्रावशं जातस्त्रैलोक्यग्रासबृंहितः॥११॥
(कालिका पुराण, २७/१०-११)
=ब्रह्मा को अपने नाभिकमल में शयन कराये हुए, तीनों लोकों को जला कर अपने जठर में स्थापित कर नारायण रूपधारी ब्रह्म, जगत् प्रभु विष्णु, लक्ष्मी के साथ तीनों लोकों को ग्रसित करते हुए शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं।
पृथ्वी को पहले कूर्म ने धारण किया, उसके बाद क्षीर सागर में फणों को फैला कर लक्ष्मी सहित सोये विष्णु को धारण किया।
ब्रह्माण्ड खण्ड संयोगात् चूर्णिता पृथ्विवी भवेत्। इति तं तां परिजग्राह कूर्मरूपी जनार्दनः॥१५॥
चलज्जलौघ संसर्गाच्चलन्त्या धरया तदा। कूर्मपृष्ठं बहुरवैर्वरदण्डैर्विततीकृतम्॥१६॥
अनन्तस्तत्र गत्वा तु यत्र क्षीरोदसागरः। तत्र स्वतं श्रिया युक्तं सुषुप्सन्तं जनार्दनम्॥१७॥
फणया मध्यया दध्रे त्रैलोक्यग्रासबृंहितम्। पूरणं फणाः वितत्योर्धं पद्मं कृत्वा महाबलः।
विष्णुमाच्छादयामास शेषाक्यः परमेश्वरम्॥१८॥ (कालिका पुराण, २७/१५-१८)
विश्व का चेतन तत्त्व पुरुष था, जिसे क्रिया या विस्तार रूप में नर कहा गया (लम्बाई की एक माप है नर = ९६ अंगुल)। रस रूपी विरल पदार्थ अप् है, जो नर से उत्पन्न होने के कारण नार कहा गया। उस नार में निवास करने के कारण ब्रह्म रूप विष्णु ल्प् नारायण कहा गया।
आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः॥
(मनु स्मृति, १/१०, विष्णु पुराण, १/४/६, मार्कण्डेय पुराण, ४/४३, वराह पुराण, २/२४)
२. शेष या अनन्त-
(१) अनन्त आकाश-यह न स्त्री है, न पुरुष, अतः नपुंसक लिंग है। सृष्टि के वास स्थान रूप में वासुदेव है। इसमें परस्पर आकर्षण या संकर्षण से ब्रह्माड, उनमें तारा, ग्रह आदि पिण्ड बने। संकर्षण द्वारा निर्माण के बाद मूल तत्त्व पूरुष का ३ पाद बचा रह गया, वह शेष है, जिसके भीतर १ पाद पुरुष रूपी विश्व स्थित है।
एतावान् अस्य महिमा, अतो ज्यायाँश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि। (पुरुष सूक्त, ३)
पाञ्चरात्र भाषा में मूल स्थान वासुदेव, परस्पर आकर्षण निर्मित पिण्ड संकर्षण, प्रकाश उत्सर्जन करने वाले तारा प्रद्युम्न तथा उसके बाद विविध सृष्टि अनिरुद्ध है।
एका भगवतो मूर्तिः ज्ञानरूपा शिवामला। वासुदेवाभिधाना सा गुणातीता सुनिष्कला॥३९॥
द्वितीया कालसंज्ञान्या तामसीशेषसंज्ञिता। निहन्ति सकलं चान्ते वैष्णवी परमा तनुः॥४०॥
सत्त्वोद्रिक्ता तथैवान्या प्रद्युम्नेति च संज्ञिता। जगत् स्थापयते सर्वं स विष्णुः प्रकृतिर्ध्रुवा॥४१॥
चतुर्थी वासुदेवस्य मूर्तिर्ब्राह्मीति संज्ञिता। राजसीचानिरुद्धाख्या प्रद्युम्नः सृष्टिकारिका॥४२॥
(कूर्म पुराण, ४९/३९-४२)
ब्राह्मी मूर्तियां अनन्त प्रकार की हैं, अतः उनको अनिरुद्ध या असीमित कहा गया है। प्रद्युम्न रूप ताराओं से भूत सर्गों की सृष्टि होती है, अतः यह रजो-गुण वाली राजसी है।
(२) ब्रह्माण्ड के शेषशायी- सूर्य-अनन्त विष्णु अव्यक्त है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व समाहित है-वेवेष्टि व्याप्नोति विश्वं यः-विष्लृ व्याप्तौ। उनकी कल्पना सम्भव नहीं है। विष्णु का दृश्य रूप सूर्य है, जिससे हमारा जीवन चल रहा है।
ब्रह्माण्ड का केन्द्रीय चक्र आकाशगंगा है, जिसकी वेद में ७ धारा कही गयी हैं। इसे वेद में अहिर्बुध्न्य तथा पुराण में शेषनाग कहा गया है। इसमें जहां सूर्य स्थित है, उस केन्द्र से भुजा की मोटाई (१४०० प्रकाश वर्ष) के बराबर गोल को महर्लोक कहा गया है जिसकी माप ४३ अहर्गण (पृथ्वी व्यास x २ घात ४०, ३ धाम पृथ्वी के भीतर)। सौर मण्डल के ३ क्षेत्र त्रिष्टुप् छन्द के ३ पाद हैं, चतुर्थ पाद तक महर्लोक है। माहेश्वर सूत्र के ४३ अक्षरों के अनुसार ४४ के स्थान पर ४३ अहर्गण हैं। इसमें प्रायः १,००० तारा हैं, जिनको शेषनाग के १,००० सिर कहा गया है।
त्रिष्टुप् इन्द्रस्य वज्रः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/२, १६; शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/७, कौषीतकि ब्राह्मण, ३/२, २२/७)।
गायत्रेण प्रतिमिमीते अर्कम्, अर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्।
वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाऽक्षरेण मिमते सप्तवाणीः॥ (ऋक्, १/१६४/२४, अथर्व, ९/१०/२)
आकाशगंगा की ७ धारा-सप्त प्रवत आ दिवम् (ऋक्, ९/५४/२)
इस शेष में सौर-मण्डल विष्णु है। उसका केन्द्र सूर्य पिण्ड उसकी नाभि है। उस नाभि के आकर्षण या कमल-नाल से पृथ्वी बन्धी है, जो मर्त्य ब्रह्मा है।
जिस क्षेत्र में जल बन्धाहै, वह बुध्न है। बुध्न का अहि (सर्प) अहिर्बुध्न्य है।
नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषाम्। (ऋक्, १/२४/७)
अब्जां उक्थैः अहिं गृणीषे, बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन्॥१६॥
मा नो अहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्हो अस्य स्रिधदृतायोः॥१७॥
(ऋक्, ७/३४/१६, १७, निरुक्त, १०/४१, ४४)
अहिर्बुध्न्य में सूर्य को शिशु कहा है-
उत नो अहिर्बुध्न्यो मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः।
येन नपातं अपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति। (ऋक्, १/१८६/५)
तन्नो अहिर्बुध्न्यो अद्भिः अर्कैः तत् पर्वतः तत् सबिता च नो धात् (ऋक्, ६/४९/१४)
३. सूर्य रूप विष्णु-
सूर्य के आकर्षण में पृथ्वी अपनी कक्षा में स्थिर है, यह सुप्त रूप है। उनसे इन्द्र रूपी विकिरण से जीवन चल रहा है, यह जाग्रत रूप जगन्नाथ है।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
(दुर्गा सप्तशती, अध्याय, १)
इन्द्र तेज निकलने से सूर्य का क्षरण होता है, विष्णु रूप के आकर्षण से बाह्य ब्रह्माण्ड का पदार्थ मिलता है। मनुष्य जीवन भी वैसा ही है, बाल्यकाल में क्षरण से पुष्टि अधिक होती है, शरीर बढ़ता है, वृद्धावस्था में क्षरण अधिक होता है। इसे इन्द्र-विष्णु की प्रतिस्पर्धा कहा है-
उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे, न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः।
इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्॥ (ऋक्, ६/६९/८)
किं तत् सहस्रमिति? इमे लोकाः, इमे वेदाः, अथो वागिति ब्रूयात्। (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/१४)
मनुष्य गर्भ में माता-पिता के रज-वीर्य से सृष्टि होती है, उसी प्रकार चान्द्र मण्डल के केन्द्र में स्थित पृथ्वी (अत्र या अत्रि) पर सृष्टि होती है, सूर्य रूपी नयन से तेज निकलता है, आकाशगंगा का तेज आकर्षित होता है-
अथ नयन समुत्थं ज्योतिरत्रेरिवद्यौः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम्।
नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः॥ (रघुवंश, २/७५)
सूर्य या उसके प्रभाव क्षेत्र को कई प्रकार से देखते हैं-(क) वामन-सूर्य का पिण्ड सबसे छोटा या वामन है।
(ख) दधिवामन-मंगल तक ठोस ग्रह हैं, उसके बाद बृहस्पति से आरम्भ कर गैसीय ग्रह हैं। पुराणों में सौर मण्डल के दधि समुद्र का आकार मंगल ग्रह की कक्षा है। पृथ्वी से मंगल कक्षा १,२५,५०,००० योजन का वलय दीखता है जिसकी चौड़ाई ३२,००,००० योजन है (यहां योजन = पृथ्वी के विषुव व्यास का १००० भाग)-भागवत पुराण, स्कन्ध ५, विष्णु पुराण, अध्याय २/४।
(ग) त्रिविक्रम-सौर मण्डल में ३ मुख्य क्षेत्र कहे गये हैं-ताप क्षेत्र पृथ्वी कक्षा तक, वायु (कणों का प्रवाह) यूरेनस कक्षा तक, तेज या प्रकाश क्षेत्र सौरमण्डल की सीमा तक।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥ (ऋक् ,१/२२/१७)
शतयोजने ह वा एष (आदित्यः) इतस्तपति। (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३)
स एष (आदित्यः) एकशतविधस्तस्य रश्मयः शतं विधा एष एवैकशततमो य एष तपति। (शतपथ ब्राह्मण, १०/२/४/३)
सूर्य का ईषादण्ड ३००० योजन त्रिज्या का है (सौर मण्डल में सूर्य व्यास = १ योजन)-
योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव। ईषादण्डस्तथैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम॥ (विष्णु पुराण, २/८/२)
वायवस्थ ऊर्जा को इषा कहा गया है-इषे त्वा, ऊर्ज्जे त्वा वायवस्थः (वाज. यजु, १/१)
जहां तक सूर्य प्रकाश अधिक (ब्रह्माण्ड तुलना में) है, वहां तक सूर्य की वाक् (क्षेत्र) कहते हैं, जिसकी माप अहः गणना में ३० है-
त्रिंशद् धाम वि राजति वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तो रहद्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
आकाश में हर धाम पिछले धाम का २ गुणा है, जिनकी माप अहः में है। पृथ्वी के भीतर ३ तथा बाहर ३० धाम हैं।
द्वात्रिशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
(घ) परम पद-जहां तक सूर्य विन्दुमात्र दीखता है, वह ब्रह्माण्ड की सीमा या विष्णु का परम पद है। इसे पुराण में महाविष्णु, विराट् बालक कहा गया है।
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०)
सूर्य सिद्धान्त (१२/८१/९०) के अनुसार यहां तक सूर्य किरणों का प्रसार है।
३. ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी)-
सूर्य रूपी विष्णु के २ रूप हैं-सौर मण्डल के ताप, बायु तथा प्रकाश क्षेत्र विष्णु के ३ पद या विक्रम हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा तक वह विन्दु रूप में दीखता है (सूर्य सिद्धान्त, १२/९०)। इस सूर्यों के समूह को विष्णु का परम पद या महाविष्णु कहते हैं।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्॥१७॥
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः॥२०॥ (ऋक्, १/२२/१७, २०)
ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी ईंट है, अतः इसे परमेष्ठी कहा गया है। इसका निर्माण स्थल कूर्म है, जो ब्रह्माण्ड का १० गुणा है। अतः पुराण में इसे गोलोक और ब्रह्माण्ड को महाविष्णु रूप विराट् बालक कहा गया है।
अथाण्डं तु जलेऽतिष्टद्यावद्वै ब्रह्मणो वयः॥१॥
तन्मध्ये शिशुरेकश्च शतकोटिरविप्रभः॥२॥ स्थूलात्स्थूलतमः सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट्॥४॥
तत ऊर्ध्वे च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद् बहिरेव सः॥९॥
तदूर्ध्वे गोलकश्चैव पञ्चाशत् कोटियोजनात्॥१०॥नित्यौ गोलोक वैकुण्ठौसत्यौ शश्वदकृत्रिमौ॥१६॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड, अध्याय ३)
स यत् कूर्मो नाम-एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत-अकरोत्-तत् । यदकरोत्-तस्मात् कूर्मः। कश्यपो वै कूर्मः । तस्मादाहुः-सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः-इति । (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/५)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः ।
शङ्कोः शत सहस्राणि (१ पर १८ शून्य) योजनानि वपुः स्थितम् ॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्मचक्र)
ब्रह्माण्ड का आकार परार्द्ध (१ पर १७ शून्य) योजन कहा है-ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद्, १/३/१) = कूर्म का आकार १०० हजार शङ्कु (१० घात १३) योजन है। यहां पृथ्वी व्यास का १००० भाग योजन है। उससे कोटि x कोटि = १० घात १४ गुणा बड़ा अर्थात् १० घात १७ योजन का ब्रह्माण्ड है। उसका १० गुणा बड़ा कूर्म है। इसी कूर्म में ब्रह्माण्ड रूपी महा-पृथ्वी घूम रही है।
महाविष्णु (ब्रह्माण्ड) गोलोक रूपी समुद्र में हैं, वह ब्रह्माण्डों के परस्पर आकर्षण या अनन्त शेष पर स्थित है। उनकी नाभि या केन्द्र की सूर्य परिक्रमा कर रहा है। केन्द्र से सूर्य की दूरी ३०,००० प्रकाश वर्ष कही गयी है।
अस्य मूलदेशे त्रिंशयोजन (यहां योजन = प्रकाश वर्ष) सहस्रान्तर आस्ते या वैकला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृर्दृश्ययोः सङ्कर्षणमित्याचक्षते। यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतो अनन्त मूर्तेः सहस्र शिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१, २)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो, निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋग्वेद, १/३५/२, वाज यजु, ३३/४३, तैत्तिरीय सं, ३/४/११/२)
यहां सूर्य के २ रूप हैं- वह अपने प्रकाशित मार्ग (हिरण्यय) पर ब्रह्माण्ड केन्द्र के आकर्षण से उसकी परिक्रमा कर रहा है। यह केन्द्र कृष्ण (कृष्ण विवर) है।
४. भौगोलिक पद्मनाभ-
गोल पृथ्वी सतह का चित्र समतल कागज पर नहीं हो सकता। अतः उत्तरी गोलार्ध के ४ पादों को भूपद्म का ४ दल कहा गया है। नक्शा बनाने के लिये इन दलों को खोल कर उनका प्रतिरूप काल्पनिक चौकोर मेरु सतह पर बनाते हैं, जो वर्ग आधार पर पिरामिड है। इसके वर्ग आधार की रेखायें विषुव वृत्त को बाहर से स्पर्श करती हैं। इस काल्पनिक मेरु की ऊंचाई १ लाख योजन है।
जम्बूद्वीपो द्वीपमध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः। चतुरशीतिसाहस्रो भूयिष्ठः षोडशाद्रिराट्॥३॥
द्वात्रिंशन् मूर्ध्नि विस्तारात् षोडशाधः सहस्रवान्। भूयस्तस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकाकार संस्थितः॥४॥
(अग्नि पुराण, अध्याय १०८)
ध्रुव के निकट गोल भूखण्ड का आकार बढ़ता जाता है, जैसे ग्रीनलैण्ड भारत से छोटा है, पर नक्शे में बड़ा दीखता है। उत्तर ध्रुव जल में है (स्थल से घिरा है), अतः वहां कोई समस्या नहीं है। दक्षिणी ध्रुव स्थल भाग में है, अतः इसका आकार अनन्त हो जायेगा, अतः इसे अनन्त द्वीप कहते थे। इसका नक्शा अलग से बनता था। इसके २ भूखण्ड प्रायः जुड़े हुए थे। अतः इसे यम (यमल = जुड़वां) द्वीप भी कहते थे, तथा यम दक्षिण का स्वामी है।
दक्षिण दिशा को नक्शे में नीचा दिखाते हैं, अतः अनन्त को पातालों के भी नीचे कहा है जिसके ऊपर पृथ्वी है।
पातालानामधस्श्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः।
शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्य दानवाः॥ (विष्णु पुराण, २/५/१३)
इसके सबसे निकट के द्वीप को पुष्कर (दक्षिण अमेरिका) कहा है, जो ब्रह्मा का निवास था।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥
तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्।
तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९)
५. भारत का पद्मनाभ-
पृथ्वी का दक्षिणी छोर अनन्त द्वीप है। अतः भारत के दक्षिणी नहर को तिरु (श्री)-अनन्तपुरम् (अंग्रेजी में त्रिवेन्द्रम्) कहा गया है। यहां पद्मनाभ मन्दिर है। पृथ्वी के पुष्कर द्वीप में अपर-मेरु (अमेरु) था। इससे उसका नाम अमेरिका हुआ। इसकी विपरीत दिशा में पुष्कर उज्जैन से १२ अंश पश्चिम था (विष्णु पुराण, २/८/२८, मत्स्य पुराण, १२४/४०)। अभी इसे बुखारा कहते हैं (उजबेकिस्तान में)। तृतीय पुष्कर इन्द्रप्रस्थ का पुष्कर है, जो राजस्थान में है।
स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-
ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।
मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।
कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।
३ पुष्कर के अन्य उल्लेख हैं-(पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि)
विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में भारत को अजनाभ वर्ष कहते थे। इसके शासक को जम्बूद्वीप के राजा अग्नीध्र (स्वयम्भू मनु पुत्र प्रियव्रत की सन्तान) का पुत्र नाभि कहा गया है।
विष्णु पुराण, खण्ड २, अध्याय १-जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम॥१५॥
पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्॥१८॥
इसका नाभि कमल पूर्वोत्तर भाग का मणिपुर है, जिसके बाद ब्रह्मा का ब्रह्म देश (बर्मा, या अब म्याम्मार) है।
६. आध्यात्मिक गर्भनाल-
(१) मनुष्य के स्थूल शरीर का जन्म के समय कमल नाल से माता गर्भ में पोषण होता है।
(२) आध्यात्मिक सूक्ष्म नाल-जन्म के बाद भी नाभि के सूक्ष्म चक्र में अष्टदल कमल द्वारा अष्टविध सिद्धियां मिलती हैं।
अग्नि पुराण, अध्याय ३७४-आध्यात्मिक नाभिकमल
द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णं शुद्धं विकसितं सितम्। नालमष्टाङ्गुलं तस्य नाभिकन्दसमुद्भवम्॥२०॥
पद्मपत्राष्टकं ज्ञेयमणिमादिगुणाष्टकम्। कर्णिका केशरं नालं ज्ञानवैराग्यमुत्तमम्॥२१॥
विष्णुधर्मश्च तत्कन्दमिति पद्मं विचिन्तयेत्। तद्धर्मज्ञान वैराग्यं शिवैश्वर्यमयं परम्॥२२॥
ज्ञात्वा पद्मासनं सर्वं सर्वदुःखान्तमाप्नुयात्। तत्पद्मकर्णिकामध्ये शुद्धदीपशिखाकृतिम्॥२३॥
अङ्गुष्ठमात्रममलं ध्यायेदोङ्कारमीश्वरम्। कदम्ब गोलकाकारं तारं रूपमिवस्थितम्॥२४॥
ध्यायेद् वा रश्मिजालेन दीप्यमानं समन्ततः। प्रधानं पुरुषातीतं स्थितं पद्मस्थमीश्वरम्॥२५॥
ध्यायेज्जपेच्च सततमोङ्कारं परमक्षरम्। मनःस्थित्यर्थमिच्छन्ति स्थूलध्यानमनुक्रमात्॥२६॥
तद्भूतं निश्चलीभूतं लभेत् सूक्ष्मेऽपि संस्थितम्। नाभिकन्दे स्थितं नालं दशाङ्गुलसमायतम्॥२७॥
(द्रष्टव्य-पुरुष सूक्त-स भूमिं विश्वतो वृत्त्वात्यत्तिष्ठद्दशाङ्गुलम्।)
नालेनाष्टदलं पद्म द्वादशाङ्गुलविस्तृतम्। सकर्णिके केसराले सूर्य्यसोमाग्निमण्डलम्॥२८॥
अग्निमण्डलमध्यस्थः शङ्खचक्रगदाधरः। पद्मी चतुर्भुजो विष्णुरथ वाष्टभुजो हरिः॥२९॥
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