#रश्मिरथी : #दिनकर की झूठी तथ्यहीन रचना
#कर्ण का नाम सुनते ही, मुझे बचपन के डीडी नेशनल पर कर्ण पर दिखाए गए धरावाहिक की स्मृतियां मस्तिष्क में घूमने लगती हैं।। और लगता है कि अहो! देखो उसके साथ कितना अत्याचार हुआ है। वह कितना महान था, कितना बड़ा दानी था, लेकिन पाण्डवों ने उसके साथ कितना अनुचित व्यवहार किया। ऐसा ही कुछ #B_R_Chopra के माहाभारत से प्रकट होता है। कैसे उस निहत्थे कर्ण को अर्जुन ने मार दिया। गुरु #द्रोणाचार्य ने उसको शिक्षा नहीं दी। कर्ण शोषित, वंचित है। ऐसा लगता है मानो उसका जन्म ही इसलिए हुआ था ताकि सब लोग मिलकर उसका शोषण कर सकें।
जबकि तथ्य यह है कि उस जैसा अधमी दुराचारी षड्यन्त्रकारी खोजने पर भी नहीं मिलता है। कर्ण के प्रति मन में जो सहानुभूति उत्तपन्न होती है। कर्ण को पीड़ित के रूप स्थापित करना एवम उसको इसाईयों के दलित शब्द से जोड़कर प्रस्तुत करना, एक सुनियोजित षडयंत्र है। इसमें भारत के हिंदी के राष्ट्रवादी कवि कहे जाने वाले दिनकर सुविख्यात हैं। इनके साथ साथ #शिवाजी_सावंत द्वारा लिखित मृत्युञ्ज भी कर्ण के गुणगाण के लिए जाना जाता है।
इसके पहले की कर्ण पर दिनकर की रश्मिरथी की तथ्यात्मक विवेचना की जाए, आप यह प्रश्न आवश्य विचार कीजिएगा की जब कोई कवि, जिसकी प्रस्तावना देश के प्रधानमंत्री #नेहरू करते हो, यदि वह तथ्यहीन मनगढ़ंत बातें प्रचारित करता हो, तो उसका कुछ न कुछ तो उद्देश्य होगा ही। अब क्या होगा आप सब विचार कीजिएगा।
प्रस्तुत है हिन्दी लेखक प्रताप नारायण सिंह द्वारा संयोजित, समाजिक झूठी समरसता पर लिखी रश्मिरथी की तथ्यात्मक विवेचना:
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◆रश्मिरथी -प्रथम सर्ग
ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास। निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर, वन्यकुसुम-सा खिला कर्ण, जग की आँखों से दूर।
खंडकाव्य का आरम्भ ही महाझूठ से होता है, इन पंक्तियों को पढ़कर यही लगता है कि बेचारा कर्ण स्वयं ही शस्त्राभ्यास करके धनुर्विद्या में पारंगत हुआ। कविवर आगे लिखते हैं कि द्रौणाचार्य कर्ण को अपना शिष्य न बनाने का ठानते हैं -
सोच रहा हूँ क्या उपाय, मैं इसके साथ करूँगा, इस प्रचंडतम धूमकेतु का कैसे तेज हरूँगा? शिष्य बनाऊँगा न कर्ण को, यह निश्चित है बात; रखना ध्यान विकट प्रतिभट का, पर तू भी हे तात!'
किन्तु तथ्य क्या है वह #वेदव्यास के महाभारत में देखिए:
#आदिपर्व - एकत्रिंशदधिकशततमोध्याय- श्लोक संख्या- ११&१२ - वृष्णिवंशी तथा अंधकवंशी क्षत्रिय, नाना देशों के राजकुमार तथा राधानंदन कर्ण -ये सभी आचार्य द्रोण के पास शिक्षा प्राप्त करने आये। कर्ण सदा अर्जुन से लाग-डाँट रखता और अत्यंत अमर्ष में भरकर दुर्योधन का सहारा ले पाण्डवों का अपमान करता था। ( यह आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते समय का उल्लेख है। )
#वन_पर्व - अध्याय ३०९-श्लोक १६-१८- - अधिरथ सूत ने अपने पुत्र को बड़ा होते देखकर उसे हस्तिनापुर भेज दिया। वहाँ उसने धनुर्वेद की शिक्षा लेने के लिए आचार्य द्रोण की शिष्यता स्वीकार की। वह द्रोणाचार्य, #कृपाचार्य और #परशुराम से चारों प्रकार की अस्त्र विद्या सीखकर एक बड़ा धनुर्धर बना।
इतने बड़े झूठ के आधार पर इस खंडकाव्य को लिखा गया है। इसे मूल रचना का चीरहरण नहीं तो और क्या कहेंगे? दिनकर ने वेदव्यास की बात ही पलट दी। पात्रों के चरित्र ही बदल दिए। कर्ण के अतिरिक्त सभी को कुटिल दिखा दिया। और यही बात आज पूरे जन मानस में फैली है कि द्रोण ने कर्ण को शिक्षा नहीं दी।
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◆ रश्मिरथी -प्रथम सर्ग -
द्वन्द्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा, #अर्जुन को चुप ही रहने का गुरु ने किया इशारा। इसे कहते हैं सफेद झूठ। 'अर्जुन बङ़ा वीर क्षत्रिय है, तो आगे वह आवे, क्षत्रियत्व का तेज जरा मुझको भी तो दिखलावे।
वेदव्यास क्या लिखते हैं - आदि पर्व -संभवपर्व-श्लोक २१ -
"ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः। भ्रातृभिस्त्वरया $$श्लिष्टो रणायोपाजगाम तम ।" तदनन्तर, शत्रुओं के नगर को जीतने वाले कुंतीनंदन अर्जुन आचार्य द्रोणाचार्य की आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयों से गले मिलकर युद्ध के लिए कर्ण की ओर बढ़े।
यही योद्धा जो रश्मिरथी के प्रथम सर्ग में हुंकार भरता है और जिसके शौर्य का महिमामंडन दिनकर जी रश्मिरथी के सात सर्गों में भूरि -भूरि करते हैं। वह अगली बार जब अर्जुन के सम्मुख आता है तो क्या होता है?
स्वयंवर पर्व- श्लोक ३० - अर्जुन से कर्ण के डर जाने पर सभी राजा युद्ध का विचार छोड़कर भीम के चारों और खड़े हो जाते हैं।
इतना ही नहीं दिनकर जी का यह गरजने वाला महारथी वेदव्यास के #महाभारत में १४ बार पराजित होता है :
द्रुपद से एक बार - (आदि पर्व /१३७ )- द्रुपद को बंदी बनाने गया था। अर्जुन से पाँच बार - क ) द्रौपदी स्वयंवर (आदि पर्व /१८९ ), ख ) विराट युद्ध (विराट पर्व / ६० ) , ग) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व / १५९ ) , घ) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व/145) ङ ) कुरुक्षेत्र (कर्ण पर्व / ९१ )। गंधर्व चित्रसेन से एक बार- (वन पर्व /२४१)। भीमसेन से चार बार (द्रोण पर्व /१२९, १३१, १३४,१३६, कर्ण पर्व / ५०)। युधिष्ठिर से एक बार ( (कर्ण पर्व /४९ )। अभिमन्यु से एक बार (द्रोण पर्व /४० )। अर्जुन के शिष्य सात्यकि से एक बार (द्रोण पर्व /१४७ )किन्तु दिनकर ने इस तरह से अपने खंडकाव्य में दिखाया है जैसे कि वह एक अजेय योद्धा था।
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◆ रश्मिरथी -सर्ग ३
कर्ण के द्वारा #दुर्योधन का साथ देने की बात पर दिनकर ने भगवान से भी प्रशंसा करवा दिया ( यहाँ भी महाभारत का चीरहरण कर डाला ) --
"वीर शत बार धन्य,तुझसा न मित्र कोई अनन्य, तू कुरूपति का ही नही प्राण,नरता का है भूषण महान." हरि के सम्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी, धन्य धन्य राधेय! बंधुता के अद्भुत अभिमानी।
जबकि कर्ण के हठ पर वेदव्यास लिखते हैं - द्विचत्वारिंशदधिकशततमोघ्याय- श्लोक १- ७ --
"कर्ण की बात सुनकर भगवान ठठाकर हँस पड़े और बोले- कर्ण ! मैं जो राज्य प्राप्ति का उपाय बता रहा हूँ, लगता है वह तुम्हे ग्राह्य नहीं है। पाण्डवों की विजय अवश्यम्भावी है। इस विषय में कोई संशय नहीं है| कर्ण ! युद्ध में जब मुझको सारथी बनाकर आए हुए अर्जुन को तुम ऐन्द्र, आग्नेय तथा वायव्य अस्त्र प्रकट करते देखोगे और जब गांडीव की वज्र-गर्जना के समान भयंकर टंकार तुम्हारे कानों में पड़ेगी, उस समय तुम्हें सतयुग, त्रेता और द्वापर की प्रतीति नहीं होगी बल्कि मात्र भयंकर कलि ही दृष्टिगोचर होगा।
दिनकर ने कर्ण के महिमामंडन में लिखा - "नरता का है भूषण महान" - किसी की पत्नी को बलपूर्वक छीनने का प्रयत्न करना, किसी स्त्री को सभा में निर्वस्त्र करना, किसी को छल से विष देकर मारना, किसी को छल से जलाकर मारने का प्रयत्न करना - क्या यह सब मनुजता और उच्च चरित्र की परिभाषा है?
वेदव्यास ने क्या लिखा है - विदुरागमनराज्यलंभपर्व-श्लोक-२९- दुर्योधन, कर्ण, शकुनि -ये अधर्मपरायण, खोटी बुद्धि वाले और मूर्ख हैं।
जहाँ तक मित्रता निभाने की बात है तो, देखिये जब जब #दुर्योधन को आवश्यकता पड़ी है तब तब कर्ण ने क्या किया है - आदि पर्व में -दुर्योधन जब द्रुपद के ऊपर आक्रमण करता है तब कर्ण बाणों से बिद्ध होकर भाग आता है|
वन पर्व में - जब दुर्योधन को गंधर्व बाँधकर ले जाते हैं तब कर्ण जान बचाकर भाग जाता है|
विराट पर्व - जब दुर्योधन विराटनगर पर आक्रमण करता है , तब कर्ण व्यूह का मुहाना छोड़कर भाग जाता है|
भीष्म पर्व - जब कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होता है तब अपने अहंकार के कारण पहले दस दिनों तक युद्ध भूमि में नहीं उतरता है।
यह कौन सी मित्रता थी? किस मित्रता की दुहाई दी जाती है। हाँ, अंत में सेनापति बनता है और मारा जाता है। उससे तो बच भी नहीं सकता था।
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◆ रश्मिरथी - सर्ग ४ -
कवि दिनकर ने कर्ण से कवच कुण्डल दान में दिलवा दिया और खूब महिमा मंडन किया:
'भुज को छोड़ न मुझे सहारा किसी और सम्बल का, बड़ा भरोसा था, लेकिन, इस कवच और कुण्डल का, पर, उनसे भी आज दूर सम्बन्ध किये लेता हूँ, देवराज! लीजिए खुशी से महादान देता हूँ."
लेकिन वेदव्यास ने महाभारत में क्या यह लिखा है --(वनपर्व - अध्याय ३१० - श्लोक संख्या १७ से २६ )- कर्ण ने सूर्य की आज्ञा को याद करके कहा- शक्र! आप कुछ बदला देकर इच्छानुसार मेरे कुण्डल और उत्तम कवच ले जाइये; अन्यथा मैं इन्हे नहीं दे सकता’। #इन्द्र बोले- कर्ण जब मैं तुम्हारे पास आ रहा था, उसके पहले ही सूर्यदेव को यह बात मालूम हो गयी थी। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने ही तुमसे सारी बातें बता दी हैं। तात कर्ण! तुम्हारी रुचि के अनुसार इन वस्तुओं का परिवर्तन ही हो जाये। मेरे वज्र को छोड़कर तुम जो चाहो, वही आयुध मुझसे माँग लो। वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! तब कर्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र के पास गया और सफल मनोरथ होकर उसने उनकी अमोघ शक्ति माँगी। कर्ण बोला- 'वासव! मेरे कवच और कुण्डल लेकर आप मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये, जो सेना के अग्रभाग में शत्रुसमुदाय का संहार करने वाली है।'राजन तब इन्द्र ने शक्ति के विषय में दो घड़ी तक मन-ही-मन विचार करके कर्ण से इस प्रकार कहा- ‘कर्ण! तुम मुझे अपने दोनों कुण्डल और सहज कवच दे दो और मेरी यह शक्ति ग्रहण कर लो। इसी शर्त के अनुसार हम लोगों में इन वस्तुओं का विनिमय (बदला) हो जाये। कर्ण बोला- देवेन्द्र! मैं महासमर में अपने एक ही शत्रु को मारना चाहता हूँ, जो बहुत गर्जना करने वाला और प्रतापी है तथा जिससे मुझे हमेशा भय बना रहता है।
इस तरह यह एक शुद्ध विनिमय था, दान नहीं।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कवच-कुण्डल पूरे महाभारत में अप्रासंगिक रहता है। मात्र कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले प्रासंगिक हो जाता है। जब कर्ण #द्रुपद से हारता है तब वह कवच कुण्डल धारण किये रहता है, जब अर्जुन से द्रौपदी स्वयंवर के समय हारता है तब भी कवच कुण्डल धारण किये हुआ था। जब गंधर्वों से जान बचाकर भागता है तब भी कवच कुण्डल धारन किए हुए था। प्रश्न यह है कि उस समय कवच कुण्डल ने काम क्यों नहीं किया?
कर्ण के दान के विषय में वन पर्व में वेदव्यास ने लिखा है - जब गन्धर्व कर्ण को हराकर दुर्योधन को बाँध ले जाते हैं और फिर अर्जुन उसे छुड़ाते हैं तो दुर्योधन का विश्वास कर्ण पर से उठ जाता है। दुर्योधन को दुबारा विश्वास दिलाने के लिए कर्ण प्रतिज्ञा करता है- जब तक मैं अर्जुन को मार नहीं लेता तब तक न तो मैं किसी से पैर धुलवाऊँगा और न ही किसी के कुछ माँगने पर मना करूँगा। --तो यह था कर्ण के दान के पीछे का सत्य। रश्मिरथी में जिस तरह से दानवीर दिखाया गया है वैसा महाभारत में कहीं नहीं है।
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◆ रश्मिरथी-सर्ग-६ -
इन पंक्तियों में तो दिनकर की पांडवों के प्रति घृणा चरमोत्कर्ष पर है -
अर्जुन-कुमार की कथा, किन्तु, अब तक भी हृदय हिलाती है, सभ्यता नाम लेकर उसका अब भी रोती, पछताती है।
पर, हाय, युद्ध अन्तक-स्वरूप, अन्तक-सा ही दारूण कठोर देखता नहीं ज्यायान्-युवा, देखता नहीं बालक-किशोर।
यहाँ भी तथ्य को किस तरह से कर्ण के पक्ष में मोड़ा है ! दिनकर बाबा ! #अभिमन्यु के नाम पर सभ्यता इसलिए नहीं रोती है कि वह बालक था। वह बालक था ही नहीं। सत्रह-अठारह वर्ष का क्षत्रिय बालक नहीं होत है वह एक महायोद्धा था। सभ्यता रोती इसलिए है कि सात महारथियों ने मिलकर युद्ध के सारे नियमों को ताक पर रखकर मारा था। उसमें आपके काव्य का महानायक भी था। जिसमें अकेले उस योद्धा का सामना करने की शक्ति नहीं थी। एक बार सामने आया तो परास्त होकर भाग गया था।
‘‘है कहाँ पार्थ ? है कहाँ पार्थ ?’’ राधेय गरजता था क्षण-क्षण।
‘‘करता क्यों नही प्रकट होकर, अपने कराल प्रतिभट से रण ?
क्या इन्हीं मूलियों से मेरी रणकला निबट रह जायेगी ?
या किसी वीर पर भी अपना, वह चमत्कार दिखलायेगी ?
इन पंक्तियों को पढ़कर हँसी आती है | चमत्कार दिखाने के चक्कर में सब से तो हार चुका था। हालाँकि एक अध्याय में महाभारत में लिखा है कि कर्ण लोगों से पार्थ का पता पूछता है। लेकिन यह नहीं समझ में आता कि पार्थ कहीं छुपे तो थे नहीं, उसी युद्ध भूमि में शत्रुओं का संहार कर रहे थे। फिर ऐसा क्योंं लिखा है, यह समझ से परे है।
बहरहाल, पार्थ के अतिरिक्त अन्य लोगोंंसे भी कर्ण कुरुक्षेत्र में कई बार परिजित हुआ और अपनी जान बचाकर भागा। जैसे अर्जुन से तीन बार हार - कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व / १५९ ), घ) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व/145) ङ ) कुरुक्षेत्र (कर्ण पर्व / ९१ )। भीमसेन से चार बार हार (द्रोण पर्व /१२९, १३१, १३४,१३६, कर्ण पर्व / ५० )। युधिष्ठिर से एक बार हार ( (कर्ण पर्व /४९ )। अभिमन्यु से एक बार हार (द्रोण पर्व /४० )। अर्जुन के शिष्य सात्यकि से एक बार हार (द्रोण पर्व /१४७ )
दिनकर ने यह नहीं लिखा कि कितनी बार कर्ण भयाक्रांत हुआ था जैसे:
★#द्रौपदी स्वयंवर के बाद अर्जुन-कर्ण का पहला युद्ध आदि पर्व /१८९ -कर्ण थककर अर्जुन से कहता है - "आप मूर्तिमान् धनुर्वेद हैं? या परशुराम! अथवा आप स्वयं इन्द्र या अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले साक्षात् भगवान् विष्णु हैं? मैं समझता हूं, आप इन्हीं में से कोई हैं और अपने स्वरुप को छिपाने के लिये यह ब्राह्मणवेष धारण करके बाहुबल का आश्रय ले मेरे साथ युद्ध कर रहे हैं।" यह कहकर वह युद्ध से हट जाता है।
★ विराट युद्ध (विराट पर्व / ६०)तत्पश्चात् पराक्रमी कुन्ती कुमार ने महान् तेजस्वी तथा अग्नि के समान प्रज्वलित दूसरे बाण द्वारा कर्ण की छाती में आघात किया। वह बाण कर्ण का कवच काटकर उसके वक्षःस्थल के भीतर घुस गया। इससे कर्ण को मूर्च्छा आ गयी और उसे किसी भी बात की सुध न रही। कर्ण को उस चोट से बड़ी भारी वेदना हुई और वह युद्ध भूमि को छोड़कर उत्तर दिशा की ओर भागा।
★ कुरुक्षेत्र - (कर्ण पर्व /५० -भीमसेन ने धनुष को जोर-जोर से कान तक खींचकर कर्ण को मार डालने की इच्छा से उस बाण को क्रोध पूर्वक छोड़ दिया। बलवान भीमसेन के हाथ से छूटकर वज्र और विद्युत के समान शब्द करने वाले उस बाण ने रणभूमि में कर्ण को चीर डाला, मानो वज्र के वेग ने पर्वत को विदीर्ण कर दिया हो। कुरुश्रेष्ठ! भीमसेन की गहरी चोट खाकर सेनापति सूतपुत्र कर्ण अचेत हो रथ की बैठक में धम्म से बैठ गया। उसका सारा शरीर रक्त से सिंच गया। शत्रुओं का दमन करने वाला वह वीर प्राणहीन सा हो गया था। इसी समय भीमसेन को कर्ण की जीभ काटने के लिये आते देख मद्रराज शल्य ने उन्हें सान्वना देते हुए इस प्रकार कहा- शल्य बोले- महाबाहु भीमसेन! मैं तुमसे जो युक्ति युक्त वचन कह रहा हूं, उसे सुनो और सुनकर उसका पालन करो। अर्जुन ने पराक्रमी कर्ण के वध की प्रतिज्ञा की है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सव्यसाची अर्जुन के उस प्रतिज्ञा को सफल करो।
★ कुरुक्षेत्र - (कर्ण पर्व /८४ ) -महाराज! जैसे प्रजावर्ग पर यमराज का बल काम करता है, उसी प्रकार भीमसेन का वह पराक्रम देखकर कर्ण के मन में महान भय समा गया। युद्ध में शोभा पाने वाले शल्य कर्ण की आकृति देखकर ही उसके मन का भाव समझ गये; अतः शत्रुदमन कर्ण से यह समयोचित वचन बोले- राधानन्दन! तुम खेद न करो तुम्हें यह शोभा नहीं देता है।
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◆ रश्मिरथी -सर्ग ७ -
राधेय जरा हंसकर बोला, ''रे कुटिल! बात क्या कहता है ? जय का समस्त साधन नर की अपनी बांहों में रहता है| जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता , मैं किसी हेतु भी यह कलंक अपने पर नहीं लगा सकता।
अश्वसेन को कर्ण भगा देता है। इस बात के लिए खूब महिमा मंडन किया है। किन्तु दिनकर इस बात को छिपा जाते हैं कि वह अश्वसेन को दूसरी बार भगाता है। एक बार तो अश्वसेन, कर्ण की बाण पर बैठकर चला ही जाता है।
वेदव्यास ने क्या लिखा है - कर्ण पर्व -नवतितमोघ्याय-श्लोक-४३-४८ -
कर्ण के हाथों से छूटा वह अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी, बहुमूल्य बाण, जो वास्तव में अर्जुन के साथ वैर रखने वाला महानाग था, उनके किरीट पर आघात करके पुनः कर्ण के तरकस में घुसना ही चाहता था कि कर्ण की दृष्टि उस पर पड़ गयी। तब उसने कर्ण से कहा- कर्ण! तुमने अच्छी तरह सोच-विचारकर मुझे नहीं छोड़ा था; इसीलिये मैं अर्जुन के मस्तक का अपहरण न कर सका। अब पुनः सोच-समझकर, ठीक से निशाना साधकर रणभूमि में शीघ्र ही मुझे छोड़ो, तब मैं अपने और तुम्हारे उस शत्रु का वध कर डालूँगा। युद्धस्थल में उस नाग के ऐसा कहने पर सूतपुत्र कर्ण ने उससे पूछा- पहले यह तो बताओ कि ऐसा भयानक रूप धारण करने वाले तुम हो कौन? तब नाग ने कहा- अर्जुन ने मेरा अपराध किया है। मेरी माता का उनके द्वारा वध होने के कारण मेरा उनसे वैर हो गया है। तुम मुझे नाग समझो। यदि साक्षात वज्रधारी इन्द्र भी अर्जुन की रक्षा के लिये आ जाय तो भी आज अर्जुन को यमलोक में जाना ही पड़ेगा। इतना कहकर सूर्य के श्रेष्ठ पुत्र कर्ण ने युद्धस्थल में उस नाग से फिर इस प्रकार कहा-मेरे पास सर्पमुख बाण है। मैं उत्तम यत्न कर रहा हूँ और मेरे मन में अर्जुन के प्रति पर्याप्त रोष भी है; अतः मैं स्वयं ही पार्थ को मार डालूँगा। तुम सुख पूर्वक यहाँ से पधारो।
एक बार नाग विफल हो चुका था तो आवश्यक तो था नहीं कि दूसरी बार सफल ही हो जाता। जब कर्ण उसे मना कर देता है तो वह स्वतः अर्जुन पर आक्रमण कर देता है और अर्जुन उसे मार डालते हैं। खैर, फिर भी कर्ण अश्वसेन को भगाता तो है। इस्का श्रेय दे सकते हैं, हालाँकि युद्ध पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था।
इसके अतिरक्त भी पूरा खंडकाव्य महाभारत के विरोधी बातों से भरा पड़ा है। दिनकर ने अर्जुन को "मदांध" तक लिखा है। जबकि अर्जुन पर चाहे जो भी आरोप लगें, किन्तु मदांध नहीं कहा जा सकता। वे महाभारत मे सदैव विनीत दिखाए गए हैं। वेद व्यास ने उन्हें धर्मात्मा लिखा है और अवतार बताया है ।
रश्मिरथी पढ़कर ऐसा लगता है कि दिनकर पांडवों को घृणा की हद तक नापसंद करते थे।
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◆ सप्तम सर्ग में कर्ण को दलित तारक कह सम्बोधित किया।
माने एक राजा को दलित बतला दिया। 🤦
दलित जैसी कोई पहचान आज भी न है। यदि शोषित वंचित कहना चाहते तो, यदि कोई था तो वह पाण्डव ही थे।
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हद की बात तो यह है कि जिस कर्ण को पूरे खंडकाव्य में धर्म की धुरी बनाकर दिनकर ने प्रस्तुत किया है, उसके अधर्म और पापों को सातवें सर्ग में स्वयं ही गिनवाते हैं, लेकिन मात्र चार पदों में इस तरह समेट देते हैं जैसे कि वह कोई बात ही न हो। फलस्वरूप ७ सर्गों से झूठी महिमामंडन पढता आया पाठक उन पदों का संज्ञान ही नहीं लेता है। जबकि कर्ण का मूल चरित्र इन्हींं चार-पाँच पदों में है-
'
'रुको तब तक, चलाना बाण फिर तुम ;
हरण करना, सको तो, प्राण फिर तुम .
नहीं अर्जुन ! शरण मैं मागंता हूं ,
समर्थित धर्म से रण मागंता हूं .''
उपस्थित देख यों न्यायार्थ अरि को ,
निहारा पार्थ ने हो खिन्न हरि को .
मगर, भगवान् किञ्चित भी न डोले ,
कुपित हो वज्र-सी यह वात बोले _
''प्रलापी ! ओ उजागर धर्म वाले !
बड़ी निष्ठा, बड़े सत्कर्म वाले !
मरा, अन्याय से अभिमन्यु जिस दिन ,
कहां पर सो रहा था धर्म उस दिन ?''
''हलाहल भीम को जिस दिन पड़ा था ,
कहां पर धर्म यह उस दिन धरा था ?
लगी थी आग जब लाक्षा-भवन में,
हंसा था धर्म ही तब क्या भुवन में ?''
''सभा में द्रौपदी को खींच लाके ,
सुयोधन की उसे दासी बता के ,
सुवामा-जाति को आदर दिया जो ,
बहुत सत्कार तुम सबने किया जो ,''
''नहीं वह और कुछ, सत्कर्म ही था ,
उजागर, शीलभूषित धर्म ही था .
जुए में हारकर धन-धाम जिस दिन ,
हुए पाण्डव यती निष्काम जिस दिन ,''
इतने दुर्गुणों के बाद भी उस पात्र का महिमामंडन करना और उसे धर्म की धुरी दिखाना महाभारत की अवहेलना करना नहीं है तो और क्या है?
इस पूरे खंडकाव्य में कोई चीज अच्छी है तो वह है भगवान् श्रीकृष्ण का संवाद।
जब उन्हें पता चलता है कि दुर्योधन उन्हें बांधना चाहता है, उस समय जो उन्होंने कहा है वह दिनकर ने महाभारत से लिया है। उसमें कोई नकारात्मक परिवर्तन नहीं किया गया है।
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यह तो वैचारिक हाल है राष्ट्रवादी राष्ट्रकवि का, तो सोचिए कि राष्ट्रद्रोहियों की क्या बात करना। अभी समझता है कि हिन्दू इतना मूलविहीन क्यों है?
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