65 साल में जीवन किताब जैसा नहीं, ग्रंथ जैसा लगने लगता है — हर पन्ने पर कुछ नया अर्थ निकलता है।
65 बसंत देख लिए। बहुत कुछ पाया, बहुत कुछ खोया भी।
जवानी में लगता था — और मिल जाए, थोड़ा और बड़ा घर, थोड़ा और नाम।
दौड़ते-दौड़ते एक दिन समझ आया, दौड़ का कोई अंत ही नहीं है।
जवानी में लगता है पैसा, पद, मकान सब कुछ है। इस उम्र में समझ आता है कि बिना घुटनों में जान और नींद पूरी हुए, कुछ भी काम का नहीं। रोज़ 30 मिनट टहलना, हल्का खाना और समय पर सोना - यही सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट है।
रिश्ते निभाने से चलते हैं, जताने से नहीं
खून के रिश्ते हों या दोस्ती, जोर से नहीं, रोज़ की छोटी-छोटी परवाह से टिकते हैं। एक फोन कर लेना, हाल पूछ लेना, माफ कर देना - यही रिश्तों को बचाता है। इस उम्र में भीड़ नहीं, दो-चार सच्चे लोग चाहिए।
अहंकार सबसे भारी बोझ है
हमने बहुत साल "मैं सही हूँ" साबित करने में लगा दिए। अब लगता है - झुक जाने में, "कोई बात नहीं" कह देने में ज्यादा शांति है। जीतने से ज्यादा जरूरी है मन का शांत रहना।
समय किसी के लिए नहीं रुकता
जो काम कल पर टाला, वो अक्सर छूट ही गया। इसलिए जो अच्छा लगे - बच्चों से बात करना, कहीं घूम आना, कोई पुरानी इच्छा पूरी करना - आज ही कर लेना चाहिए।
फिर एक दिन नदी के घाट पर बैठा था, नदी बह रही थी। कोई शोर नहीं, कोई होड़ नहीं। बस बह रही थी, अपने में मस्त। तभी मन ने कहा — सुख बाहर नहीं, भीतर है।
आज समझ में आता है:
तुलना ही दुख की जड़ है। दूसरे के पास क्या है देखने लगो तो अपना सब कुछ छोटा लगने लगता है। और अपने पास जो है उसे देखो तो लगता है, ईश्वर ने कितना दिया है।
हमारे पास ललितपुर की मिट्टी की सौंधी खुशबू है, काशी के घाट की शांति है, परिवार का साथ है, दो रोटी इज्जत की है — इससे बड़ा धन क्या होगा?
तुलना करना दुख की जड़ है। दूसरे के पास क्या है, इससे नहीं - अपने पास जो है, उसमें मन लगाने से ही आनंद आता है। ललितपुर की मिट्टी हो या काशी का घाट, जहाँ मन संतुष्ट है, वहीं स्वर्ग है।
मेरा अपना निचोड़: कम चाहो, ज्यादा निभाओ, और हर दिन को प्रसाद समझ कर जियो।
इसलिए अब मेरा मंत्र बहुत सीधा है:
कम चाहो, ज्यादा निभाओ, और हर दिन को प्रसाद समझ कर जियो।
जो मिला है, उसी में आनंद ढूंढो। वही स्वर्ग है।
— शत्रुघ्न सिँह बुंदेला
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