Wednesday, 19 August 2026
आरक्षण पाने के लिए
आरक्षण पाने के लिए ८०% भारतीय अपने को नीच तथा हीन स्तर का मान चुके हैं तथा वेसे ही बने रहना चाहते हैं। विद्या अब ज्ञान के लिए नहीं, केवल डिग्री तथा नौकरी पाने के लिए है। यह प्रवृत्ति भ्रष्टाचार को बढ़ा रही है। जो वर्ग अपना ज्ञान तथा कौशल बढ़ाकर सम्मानित बनना चाहता था, उस वर्ग के नेता भी नपुंसक की तरह अपने वर्ग के विरुद्ध कह रहे हैं। केवल व्यक्तिगत रूप से अपनी सन्तान को पढ़ने के लिए तथा व्यवसाय के लिए विदेश भेजते हैं। १९६५ तक प्रतिभा पलायन की चिन्ता होती थी, जब तक मूल संविधान के अनुसार २५% आरक्षण था। उसके बाद लूट मार तथा वोट खरीदने के लिए आरक्षण तथा सवर्ण दमन बढ़ता गया। अब विपरीत चिन्ता है कि शिक्षित भारतीयों को कैसे भारत से भगाया जाय। अमेरिका ने जब भारतीयों के प्रवेश को सीमित किया तब पूरे विश्व में खोज होने लगी कि शिक्षित भारतीय कहां भाग कर जायें-पारम्परिक शत्रु देश भी भारतीयों के लिए स्वर्ग जैसा दीखने लगा है। उसके अतिरिक्त आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इजराइल, कनाडा, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, हंगरी, रूस, नार्वे आदि भी शिक्षित भारतीयों के लिए स्वर्ग समान हैं। ८०% की मुफ्त शिक्षा का भार २०% सवर्ण उठा रहे हैं। अतः आने जाने का खर्च मिलाकर भी चीन, रूस, आस्ट्रेलिया आदि में मेडिकल या इंजीनियरिंग पढ़ना सस्ता पड़ता है। भारत में एकमात्र योग्यता जाति प्रमाणपत्र है, अतः उज्बेकिस्तान, यूक्रेन आदि का भी स्तर भारत से अच्छा है। विश्वगुरु के मिथ्या अहंकार का देश अभी शिष्य बनने योग्य भी नहीं है। नेताओ को देश नष्ट होने की कोई चिन्ता नहीं है। वे भारत से धन लूट कर विदेश में जमा कर रहे हैं तथा वहीं उनकी सन्तान बस रही है।
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