सोमनाथ के दरवाजे, एलेनबरो और वह झूठ कि पुजारी भजन करते रहे और महमूद गजनवी सोमनाथ लूटकर चला गया।
आज अमिताभ अग्निहोत्री जी की एक टिप्पणी सोमनाथ पर गजनवी के हमले और उस असत्य के बारे में थी जिसमें यह कहा गया कि वहां पुजारी भजन करते रहे और सोमनाथ मंदिर का विध्वंस गजनवी ने कर दिया। यह असत्य पिछले सत्तर सालों से पढ़ाया जा रहा है। अमिताभ जी ने इस असत्य का खंडन किया लेकिन मुझे लगा कि पूरी बात हिंदुओं को जानना चाहिए।
जब महमूद गजनवी 1026 में सोमनाथ पहुंचा, तो वहां पुजारी माला जपते हुए नहीं बैठे थे।
खुद आक्रांताओं के इतिहासकार लिखते हैं - अल-उत्बी, इब्न-अल-अथीर, फरिश्ता - कि मंदिर के परकोटे पर भीषण युद्ध हुआ। राजपूत सैनिक, चावड़ा और परमार के योद्धा, और मंदिर के नागर ब्राह्मण पुजारी, व्यापारी और सामान्य भक्त सबने मिलकर तलवार उठाई।
तीन दिन तक लगातार लड़ाई चली। 50,000 से ज्यादा पुजारी और भक्त लड़ते हुए, मंदिर की सीढ़ियों पर, गर्भगृह के द्वार पर बलिदान हो गए। उन्हें मारकर, उनकी लाशों को रौंदकर ही गजनवी अंदर घुस पाया।
ये कोई कर्मकांडी भीड़ नहीं थी जो चमत्कार का इंतजार कर रही थी, ये अपने देवता के लिए प्राण देने वाली लड़ाकू पंक्ति थी।
इसी बलिदान को झुठलाने के लिए 1843 का नाटक रचा गया।
1842 में अंग्रेज अफगानिस्तान में बुरी तरह हारे। अपनी बेइज्जती छुपाने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड एडवर्ड एलेनबरो ने एक भावनात्मक चाल चली।
उसने गजनी में महमूद के मकबरे से दो लकड़ी के दरवाजे उखाड़वाए और ऐलान किया कि ये वही चंदन के दरवाजे हैं जो महमूद सोमनाथ से लूट ले गया था। अब अंग्रेज इसे हिंदुओं को लौटा रहे हैं।
16 नवंबर 1842 को उसने सभी राजाओं को घोषणा पत्र भेजा कि सोमनाथ के गेट वापस लाए जा रहे हैं, हिंदुओं का काम अंग्रेजों ने किया। 800 साल के अपमान का बदला ले लिया गया। यह अपमान पुजारियों की अक्षमता का था कि जब आक्रमण हुआ तो वे भजन करते रह गए।
इन दरवाजों को एक पूरी रेजीमेंट - छठी जाट लाइट इन्फैंट्री कंधे पर उठाकर भारत लाई।
भारत आते ही पोल खुल गई - दरवाजे चंदन के नहीं देवदार के थे, और गजनी में ही बने थे, सोमनाथ के थे ही नहीं। आज भी वो आगरा किले के गोदाम में पड़े हैं।
9 मार्च 1843 - ब्रिटिश संसद में पक्ष विपक्ष में बहस हुई। बहस का लब्बोलुआब जो भी था इस एक नाटक ने यह झूठ पक्का कर दिया कि हिंदू कायर हैं, अपने मंदिर की रक्षा नहीं कर सकते, पुजारी भजन करते रह गए।
बाद में यही झूठ कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकार पीढ़ियों को पढ़ाते रहे। आज भी यही झूठ हिंदुओं के दिमाग में भर कर उन्हें गिल्ट में डाला जा रहा है।
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