Thursday, 16 July 2026

अमोघ शिवकवच

अमोघशिवकवच (१८)

नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी - यह बात कि भगनेत्रहारी नेत्रों की रक्षा करें, बिना दक्षयज्ञ को समझे समझ न आएगी।अपनी पुस्तक ‘देवाधिदेव’ में मैं दक्षयज्ञ और सती प्रसंग की व्याख्या कर चुका हूँ, अत: उसे यहाँ दोहराऊँगा नहीं।

प्रश्न तो यही है—जो आँखें निकाल सकता है, वही आँखों का रक्षक कैसे हो सकता है?ऋषि को यदि केवल शिव की स्तुति करनी होती, तो "त्रिलोचन", "विश्वनाथ", "शम्भु", "महेश" जैसे असंख्य नाम थे। पर उसने जान-बूझकर एक ऐसा नाम चुना जो साधक को झकझोर दे। तो आइए, पहले कथा को समझें।

भग" वैदिक देवताओं में से एक हैं।ऋग्वेद में भग आदित्यों में गिने जाते हैं। उनका सम्बन्ध भाग, सौभाग्य, समृद्धि, ऐश्वर्य, भाग्य-वितरण और भोग के न्यायपूर्ण वितरण से है। संस्कृत का "भग" शब्द केवल धन नहीं है; वह उन सभी ऐश्वर्यों का द्योतक है जिनके कारण जीवन सम्पन्न बनता है।इसी मूल से "भगवान्" शब्द भी बना है। विष्णु पुराण के अनुसार जिसके पास ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये छह "भग" हों, वही भगवान् है।अर्थात् वैदिक भग कोई तुच्छ देवता नहीं हैं। वे समृद्धि और सौभाग्य के अधिष्ठाता हैं।फिर उनकी आँखें क्यों निकाली गईं?यह प्रसंग दक्षयज्ञ से जुड़ा है।जब दक्ष ने शिव का अपमान करते हुए यज्ञ किया, तब अनेक देवता उस यज्ञ में उपस्थित रहे। उन्होंने शिव के अपमान का विरोध नहीं किया।जब वीरभद्र प्रकट हुए और यज्ञ का विध्वंस हुआ, तब प्रत्येक देवता को उसके अपराध के अनुरूप दण्ड मिला।इसी क्रम में—
भग की आँखें निकाल दी गईं।कुछ पुराणों में कारण यह बताया गया है कि भग प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ-भाग ग्रहण कर रहे थे, मानो अन्याय हुआ ही न हो। कहीं कहा गया है कि वे दक्ष के पक्ष में बैठे रहे। कहीं यह भी संकेत है कि उन्होंने अधर्म को देखते हुए भी आँखें मूँद लीं।यहाँ कथा से अधिक उसका प्रतीक महत्त्वपूर्ण है।

ध्यान दीजिए।उनकी सम्पत्ति नहीं छीनी गई।उनका पद नहीं छीना गया।आँखें छीनी गईं।
क्योंकि उनका अपराध दृष्टि का था।उन्होंने देखा,पर सत्य नहीं देखा।उन्होंने अन्याय देखा,
पर उसके प्रति जागे नहीं।उन्होंने यज्ञ देखा,
पर धर्म नहीं देखा।अर्थात् दोष नेत्रों का नहीं था,दृष्टि का था।और शिव ने उसी दोष पर प्रहार किया। यदि शिव ने भग की आँखें इसलिए निकालीं कि वे अधर्म के प्रति अन्धी हो गई थीं,तो वही शिव मेरी आँखों की रक्षा क्यों करें? उत्तर है—क्योंकि वे आँखों की रक्षा नहीं,दृष्टि की रक्षा करते हैं।वे ऐसी आँखें नहीं बचाते जो केवल भोग देखें। वे ऐसी आँखें बचाते हैं जो धर्म देखें।

यहाँ एक अत्यन्त रोचक व्युत्पत्तिगत संकेत भी है।”भग" का सम्बन्ध भोग से भी है।भोग स्वयं बुरा नहीं है।पर जब सम्पूर्ण दृष्टि केवल भोग तक सीमित हो जाए,तब वही अन्धता है।आज के समाज को देखिए।हम किसी वस्तु को सबसे पहले किस रूप में देखते हैं?उसकी उपयोगिता।उसकी कीमत।उसकी बाज़ार-क्षमता।उसका उपभोग।क्या यह "भग-दृष्टि" का विकृत रूप नहीं है? शिव उसी दृष्टि को तोड़ते हैं।

मुझे लगता है कि यहाँ एक अत्यन्त समकालीन शिक्षा छिपी है।आज हमारी आँखें स्वस्थ हैं पर क्या हमारी दृष्टि स्वस्थ है?हम जंगल देखते हैं।लकड़ी दिखाई देती है।हम नदी देखते हैं।जल-संसाधन दिखाई देता है।हम विद्यार्थी देखते हैं।मानव-संसाधन दिखाई देता है।हम वृद्ध देखते हैं।आर्थिक बोझ दिखाई देता है।हम संस्कृति देखते हैं।पर्यटन दिखाई देता है।यानी आँखें हैं,दृष्टि नहीं।ऐसी स्थिति में शिव क्या करेंगे?वे आँखें नहीं बचाएँगे।वे पहले उस अन्धी दृष्टि को नष्ट करेंगे। भगनेत्रहारी" का अर्थ "आँखें निकालने वाला" नहीं है।वह है—“झूठी दृष्टि का हरण करने वाला।"
भारतीय साहित्य में "नेत्र" केवल जैविक अंग नहीं है।नेत्र का अर्थ है—दृष्टिकोण।परिप्रेक्ष्य।
चेतना।इसलिए "भगनेत्रहारी" का अर्थ होगा—
वह जो भोग-केंद्रित, स्वार्थ-केंद्रित, अधर्म-अनुकूल दृष्टि का अपहरण कर ले।

हम सामान्यतः यह मान लेते हैं कि आँखें सत्य का सबसे विश्वसनीय साधन हैं। आधुनिक विज्ञान भी लंबे समय तक "Observation" को ज्ञान का पहला आधार मानता रहा। किन्तु भारतीय दर्शन इतना सरल नहीं है। न्याय दर्शन प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है, पर साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि प्रत्यक्ष भ्रमित हो सकता है। अद्वैत वेदान्त तो और भी आगे जाकर कहता है कि समस्त दृश्य-जगत् ही अविद्या का विषय बन सकता है। योगसूत्र "विपर्यय" की बात करता है—वह ज्ञान जो वस्तु के अनुरूप नहीं है। अर्थात् भारतीय परम्परा का आग्रह केवल देखने पर नहीं, यथार्थ देखने पर है।

यही कारण है कि "भगनेत्रहारी" का चयन अत्यन्त सूक्ष्म है। भग ने देखा, पर यथार्थ नहीं देखा। उन्होंने यज्ञ देखा, पर यज्ञ का धर्म नहीं देखा। उन्होंने वेद-मन्त्र सुने, पर उनके भीतर से करुणा के लुप्त हो जाने को नहीं सुना। उन्होंने देवताओं की सभा देखी, पर यह नहीं देखा कि जहाँ शिव का अपमान हो रहा हो, वहाँ देवसभा भी अधूरी है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी आँखें दृश्य की दासी बन गई थीं; वे सत्य की सेविका नहीं रहीं। शिव उसी दासता को तोड़ते हैं।

मुझे यहाँ एक अत्यन्त मौलिक बात दिखाई देती है। हम प्रायः कहते हैं कि "Seeing is believing." भारतीय परम्परा शायद इसके विपरीत कहती है—"Being determines seeing." अर्थात् तुम जैसे हो, वैसे ही संसार को देखोगे। यदि भीतर लोभ है तो संसार अवसरों का बाज़ार दिखाई देगा। यदि भीतर भय है तो हर अपरिचित व्यक्ति शत्रु लगेगा। यदि भीतर करुणा है तो वही संसार पीड़ित प्राणियों का परिवार बन जाएगा। आँखें बाहर नहीं बदलतीं; देखने वाला बदलता है। इस दृष्टि से भग की आँखें इसलिए नहीं गईं कि वे देखने में असमर्थ थीं; वे इसलिए गईं कि उनका अन्तःकरण देखने योग्य नहीं रहा था।

यहीं से इस मन्त्र का साधना-पक्ष खुलता है। हम प्रायः प्रार्थना करते हैं—"हे प्रभु! मुझे सही वस्तुएँ दिखाइए।" पर यह मन्त्र उससे भी बड़ी प्रार्थना करता है—"हे प्रभु! मुझे ऐसा मन दीजिए कि मैं जो भी देखूँ, उसे सही प्रकार से देख सकूँ।" यह अन्तर अत्यन्त गहरा है। पहली प्रार्थना संसार बदलने की है। दूसरी स्वयं को बदलने की।

अब इसे आधुनिक जीवन पर रखकर देखिए। दो लोग एक ही समाचार पढ़ते हैं। एक उसमें केवल राजनीतिक लाभ-हानि देखता है। दूसरा उसमें समाज की पीड़ा देखता है। दो लोग एक ही जंगल में प्रवेश करते हैं। एक को लकड़ी दिखाई देती है, दूसरे को एक जीवित पारिस्थितिकी तन्त्र। दो अर्थशास्त्री एक ही आँकड़ा पढ़ते हैं। एक GDP की वृद्धि देखता है, दूसरा उस वृद्धि के साथ बढ़ती असमानता, पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक तनाव को भी देखता है। तथ्य एक ही हैं; दृष्टि भिन्न है। इसलिए भारतीय परम्परा की समस्या कभी केवल सूचना (information) की नहीं रही; उसकी समस्या सदैव दृष्टि (vision) की रही है।

मुझे तो यहाँ एक और भी सूक्ष्म संकेत दिखाई देता है। दक्षयज्ञ में भग की आँखें निकलती हैं, पर कथा वहीं समाप्त नहीं होती। बाद के पुराणों में देवताओं का पुनर्संस्कार होता है; व्यवस्था पुनः स्थापित होती है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह हो सकता है कि शिव का दण्ड अन्तिम विनाश नहीं है; वह दृष्टि के पुनर्जन्म की तैयारी है। शिव पहले पुरानी आँखें छीनते हैं, फिर नयी दृष्टि की सम्भावना खोलते हैं। यह वही प्रक्रिया है जिसे उपनिषद् "अविद्या से विद्या" की यात्रा कहते हैं। पहले मिथ्या-दर्शन टूटता है, तभी सत्य-दर्शन सम्भव होता है।

इसलिए मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" का अर्थ यह नहीं है कि शिव ने एक देवता की आँखें निकाल दीं। उसका अर्थ यह है कि शिव किसी भी ऐसी दृष्टि को स्वीकार नहीं करते जो धर्म से रिक्त होकर केवल दृश्य की दासी बन जाए। और जब साधक प्रार्थना करता है—"नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी"—तो वह वस्तुतः यह कह रहा होता है:

"हे शिव! मेरी आँखों को सुरक्षित रखने से पहले मेरी दृष्टि को सत्य के योग्य बनाइए। यदि मेरी दृष्टि भी कभी भग की तरह वैभव, सुविधा और मौन की कैदी बन जाए, तो पहले उसे तोड़ दीजिए। क्योंकि मिथ्या दृष्टि के साथ जीवित रहना, अन्धा होने से भी अधिक खतरनाक है।"

यहाँ नेत्रों की रक्षा का अर्थ नेत्रों का संरक्षण नहीं, दृष्टि का रूपान्तरण है। तभी शिव "भगनेत्रहारी" होकर भी "नेत्ररक्षक" बन सकते हैं।

एक आयाम 'दृष्टि की हिंसा' (Violence of Vision) का है।हम सामान्यतः हिंसा को हाथों से जोड़ते हैं, वाणी से जोड़ते हैं, अस्त्रों से जोड़ते हैं। परन्तु भारतीय साहित्य बार-बार बताता है कि आँखें भी हिंसा कर सकती हैं।

संस्कृत साहित्य में "दृष्टिदोष", "कुदृष्टि", "लोचन-लालसा", "कामदृष्टि", "मत्सर-दृष्टि" जैसे शब्द संयोग से नहीं बने। वे बताते हैं कि देखना भी नैतिक कर्म है। कोई व्यक्ति किसी को वस्तु की तरह देखता है, कोई प्रतियोगी की तरह, कोई शत्रु की तरह, कोई उपभोग की वस्तु की तरह। वस्तु वही रहती है, पर दृष्टि उसे बदल देती है। इसलिए भारतीय संस्कृति में "दृष्टि" कभी निष्पक्ष जैविक क्रिया नहीं रही; वह चरित्र का विस्तार मानी गई।

दक्षयज्ञ में भग की आँखों का नष्ट होना इसी कारण एक गहरा रूपक बन जाता है। उन्होंने केवल अन्याय देखा ही नहीं; उनकी दृष्टि उस अन्याय के साथ सहज हो गई। यह बहुत बड़ा अन्तर है। मनुष्य किसी बुराई को पहली बार देखकर विचलित होता है, दूसरी बार कम विचलित होता है, और तीसरी-चौथी बार वही बुराई सामान्य लगने लगती है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे desensitization कहता है—संवेदनशून्यता। मुझे लगता है कि भग उसी संवेदनशून्य दृष्टि के प्रतीक हैं। उनकी आँखें इसलिए नहीं निकाली गईं कि वे देख रही थीं; वे इसलिए निकाली गईं कि वे देख-देखकर भी विचलित होना भूल चुकी थीं।

यदि इस विचार को आज के समाज पर रखें तो उसका अर्थ और भी स्पष्ट हो जाता है।प्रतिदिन समाचारों में हिंसा देखते-देखते हम हिंसा के प्रति अभ्यस्त हो जाते हैं। प्रतिदिन भ्रष्टाचार देखते-देखते वह हमें असामान्य नहीं लगता। प्रतिदिन प्रकृति का विनाश देखते-देखते वह विकास का दूसरा नाम प्रतीत होने लगता है। प्रतिदिन असत्य सुनते-सुनते सत्य असुविधाजनक लगने लगता है। यह केवल सामाजिक समस्या नहीं है; यह दृष्टि की थकान है। आँखें खुली रहती हैं, पर संवेदना सो जाती है।

मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" इसी निद्रा को तोड़ने वाले शिव हैं। वे आँखें इसलिए नहीं लेते कि मनुष्य देखना बन्द कर दे; वे इसलिए लेते हैं कि वह फिर से देखना सीख सके। जैसे कभी-कभी खेत को कुछ समय के लिए परती छोड़ना पड़ता है ताकि उसकी उर्वरता लौट आए, वैसे ही कभी-कभी पुरानी दृष्टि का विघटन आवश्यक होता है ताकि नई दृष्टि जन्म ले सके। इस अर्थ में शिव विनाशक नहीं, दृष्टि के पुनर्जन्म के देवता हैं।

भग वैदिक देवता हैं—समृद्धि और भाग्य के अधिष्ठाता। यह अत्यन्त अर्थपूर्ण है कि समृद्धि के देवता की आँखें जाती हैं। मानो ऋषि चेतावनी दे रहा हो कि ऐश्वर्य का सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक अन्धता है। जब समृद्धि मनुष्य को इतना संतुष्ट कर दे कि वह अन्याय के प्रति मौन हो जाए, तब सबसे पहले उसकी दृष्टि भ्रष्ट होती है। इसलिए शिव धन नहीं छीनते; पहले आँखें छीनते हैं। यह प्रतीक कहता है कि नैतिक दृष्टि के बिना समृद्धि स्वयं विनाश का कारण बन सकती है।

और अन्त में, इस मन्त्र का एक अत्यन्त निजी अर्थ भी है। साधक जब कहता है—"नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी"—तो वह वस्तुतः यह नहीं कह रहा कि "मेरी आँखें सुरक्षित रहें।" वह कह रहा है—"हे शिव! मुझे उस दिन से बचाइए जब मैं अधर्म देखकर भी उसके साथ जीना सीख लूँ। मुझे उस दिन से बचाइए जब मेरी आँखें पीड़ा की अभ्यस्त हो जाएँ। मुझे उस दिन से बचाइए जब वैभव मेरे विवेक को ढँक दे। यदि कभी मेरी दृष्टि भी भग की तरह संवेदनशून्य हो जाए, तो उसे तोड़ दीजिए, क्योंकि ऐसी आँखों का सुरक्षित रहना मेरे लिए वरदान नहीं, अभिशाप होगा।"

मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर "भगनेत्रहारी" केवल एक पुराण-कथा का स्मरण नहीं रह जाता। वह आधुनिक मनुष्य के लिए एक गम्भीर आध्यात्मिक प्रार्थना बन जाता है—"मेरी आँखें खुली रहें ही नहीं; मेरी संवेदना भी जागती रहे।" यही इस पद का ऐसा अर्थ है जो आज के समय में अत्यन्त प्रासंगिक और जीवित प्रतीत होता है।

हमें "भगनेत्रहारी" का एक और स्तर देखना चाहिए, जो भारतीय दर्शन के एक अत्यन्त गहरे प्रश्न से जुड़ता है—क्या आँखें केवल बाहर देखने के लिए हैं, या भीतर भी? मुझे बार-बार उपनिषदों की एक धारा याद आती है। कठोपनिषद् कहता है—
"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः..."

स्वयम्भू ने इन्द्रियों को बाहर की ओर प्रवृत्त बनाया, इसलिए मनुष्य बाहर देखता है; विरले धीर पुरुष ही दृष्टि को भीतर मोड़कर आत्मा का दर्शन करते हैं। अब इस मन्त्र को "भगनेत्रहारी" के साथ रखकर देखिए।भग की आँखें बाहर देख रही थीं।यज्ञ बाहर था।वैभव बाहर था।समारोह बाहर था। किन्तु धर्म भीतर अनुपस्थित था।उनकी दृष्टि बहिर्मुख थी।शिव उसी बहिर्मुखता को तोड़ते हैं।इस अर्थ में भग की आँखें निकालना बाहर की दृष्टि का अन्त नहीं, अन्तर्दृष्टि का प्रारम्भ है।

भारतीय योग परम्परा में जब साधक ध्यान करता है, तो वह आँखें बन्द करता है। यह संसार से घृणा नहीं है। यह बाहर के दृश्य को थोड़ी देर के लिए विराम देकर भीतर के दृश्य को देखने का अभ्यास है।ध्यान दीजिए—शिव ने भग की आँखें नष्ट कीं।योगी अपनी आँखें स्वयं बन्द करता है।दोनों घटनाओं का लक्ष्य एक हो सकता है—बाह्य-दृष्टि के निरंकुश अधिकार को समाप्त करना।जब तक बाहर का आकर्षण इतना प्रबल है कि भीतर की आवाज़ सुनाई ही नहीं देती, तब तक धर्म की दृष्टि उत्पन्न नहीं होती।भग की आँखें निकालना वास्तव में इन्द्रियों की सत्ता पर प्रहार है।भारतीय दर्शन बार-बार कहता है कि इन्द्रियाँ राजा नहीं हैं।वे सेवक हैं।राजा है-बुद्धि।और बुद्धि से भी ऊपर—आत्मा।

जब आँखें स्वयं निर्णय लेने लगती हैं—जो अच्छा लगे वही सत्य है, जो सुन्दर लगे वही मूल्यवान है, जो चमके वही श्रेष्ठ है—तब व्यवस्था उलट जाती है।शिव उसी उलटी व्यवस्था को सीधा करते हैं।

आज हमारी सभ्यता ने देखने की शक्ति को अभूतपूर्व बना दिया है।स्क्रीन।विज्ञापन।रील।वीडियो।चित्र।हर क्षण आँखों पर आक्रमण हो रहा है।इतिहास में शायद पहली बार मनुष्य की आँखें इतनी अधिक व्यस्त हैं।

पर एक प्रश्न है—क्या वे उतनी ही अधिक जागरूक भी हैं?या वे केवल उत्तेजित (stimulated) हैं?यह अन्तर बहुत बड़ा है।

उत्तेजना और जागरूकता एक नहीं हैं।मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" इसी अन्तर की रक्षा करते हैं।वे आँखों को उत्तेजना का दास नहीं बनने देते।हमने पहले कहा था कि तीसरा नेत्र सम्बन्ध देखता है।पर दो आँखों की भी एक समस्या है।वे सदैव आकर्षण के नियम से चलती हैं।जो चमकदार है, उसकी ओर चली जाती हैं।जो चलता हुआ है, उसकी ओर चली जाती हैं।जो असाधारण है, उसकी ओर चली जाती हैं।मनोविज्ञान इसे attentional capture कहता है।अर्थात् हमारी दृष्टि पर हमारा पूरा नियन्त्रण नहीं होता; बाहरी वस्तुएँ उसे खींच लेती हैं।

शिव का अर्थ है—दृष्टि की स्वाधीनता।यानी मैं क्या देखूँगा, यह वस्तु तय नहीं करेगी।मेरी चेतना तय करेगी।यह विचार आज के डिजिटल युग में कितना बड़ा आध्यात्मिक सिद्धान्त बन जाता है!

कवच का प्रत्येक देव-नाम किसी अंग की रक्षा नहीं कर रहा।वह उस अंग के प्रलोभन से रक्षा कर रहा है।चन्द्रमौलि सिर को उसकी उग्रता से बचाते हैं।भालनेत्र ललाट को उसकी दिशाहीनता से बचाते हैं।भगनेत्रहारी आँखों को उनके आकर्षण-बंधन से बचाते हैं।विश्वनाथ नासिका को केवल गन्ध से नहीं, प्राण की विश्वव्यापकता से जोड़ेंगे।

अर्थात् यह कवच शरीर की रक्षा का नहीं, इन्द्रियों के आध्यात्मिक संस्कार का ग्रन्थ है।

और यदि यह सूत्र सही है, तो आगे आने वाले प्रत्येक अंग-रक्षण के श्लोक को भी इसी दृष्टि से पढ़ा जा सकता है। तब यह केवल "शिव मेरे शरीर की रक्षा करें" नहीं रह जाता; यह "शिव मेरी प्रत्येक इन्द्रिय को उसके सर्वोच्च धर्म तक पहुँचा दें"—ऐसी क्रमिक साधना का मानचित्र बन जाता है। यही मुझे इस कवच की सबसे विलक्षण विशेषता प्रतीत होती है।

हम प्रायः मान लेते हैं कि आँखों का कार्य केवल दृश्य ग्रहण करना है। किन्तु भारतीय चिन्तन में आँखें चरित्र का भी विस्तार हैं। मनुष्य जैसा होता है, वैसा ही संसार उसे दिखाई देता है। लोभी को अवसर दिखाई देते हैं, भयभीत को शत्रु, करुणामय को पीड़ित, कलाकार को सौन्दर्य, वैज्ञानिक को नियम और ऋषि को ब्रह्म। वस्तु वही रहती है; बदलता देखने वाला है। इसीलिए भारतीय परम्परा में शुद्धि बाहर की वस्तुओं की अपेक्षा पहले अन्तःकरण की की जाती है। भग की कथा इस सत्य को नाटकीय रूप देती है। उनकी आँखों में दोष नहीं था; दोष उस चेतना में था जो उन आँखों से संसार को देख रही थी। इसलिए शिव बाहरी नेत्रों पर नहीं, भीतर की दृष्टि पर प्रहार करते हैं। यह प्रहार दण्ड भी है और अनुग्रह भी। क्योंकि मिथ्या दृष्टि का नाश ही सत्य-दृष्टि का प्रारम्भ है।

हम प्रतिदिन असंख्य दृश्य देखते हैं, पर उनमें से बहुत कम हमारे भीतर उतरते हैं। धीरे-धीरे हमारी आँखें संवेदनशून्य होने लगती हैं। युद्ध के चित्र सामान्य लगने लगते हैं, पर्यावरण का विनाश विकास जैसा प्रतीत होने लगता है, गरीबी आँकड़ों में बदल जाती है, और मनुष्य "मानव संसाधन" बन जाता है। यह केवल भाषा का परिवर्तन नहीं है; यह दृष्टि का पतन है। "भगनेत्रहारी" उसी पतन से बचाने वाले शिव हैं। वे हमारी आँखों को यह वरदान नहीं देते कि वे अधिक देखें; वे उन्हें यह वरदान देते हैं कि वे सही देखें, और सही देखकर भीतर से विचलित होने की क्षमता कभी न खोएँ। क्योंकि जिस दिन अन्याय देखकर भी हमारी दृष्टि निर्विकार रह जाए, उसी दिन हमारी आँखें भग की आँखों की तरह अपना आध्यात्मिक अधिकार खो चुकी होंगी।

यही कारण है कि मुझे इस मन्त्र का वास्तविक अर्थ अब यह प्रतीत होता है कि साधक शिव से अपनी दृष्टि की सुरक्षा नहीं, बल्कि उसकी पुनर्जन्म-प्रक्रिया की याचना कर रहा है। वह मानो कह रहा है—"हे भगनेत्रहारी! यदि मेरी आँखें भी कभी केवल आकर्षण, उपभोग, सुविधा और वैभव की ओर देखने लगें; यदि वे धर्म और करुणा के प्रति उदासीन हो जाएँ; यदि वे बाहरी चमक में सत्य को खो दें, तो उन्हें वैसा ही झकझोर दीजिए जैसा आपने भग की दृष्टि को झकझोरा था। क्योंकि झूठी दृष्टि के साथ जीवित रहना, आँखें बन्द हो जाने से भी बड़ा अन्धकार है।"

मुझे लगता है कि इस प्रकार पढ़ने पर "भगनेत्रहारी" केवल पुराण की स्मृति नहीं रहते; वे मनुष्य की दृष्टि को पुनः धर्म, सत्य और संवेदना की ओर लौटाने वाले दृष्टि-गुरु बन जाते हैं।

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