Thursday, 22 October 2026

अलाउद्दीन खिलजी की मौत

कल मैं अलाउद्दीन खिलजी के बारे में पढ़ रहा था। मैंने जो विवरण पढ़ा, उसके मुताबिक उसकी मौत बहुत दर्दनाक तरीके से हुई थी। उसके पेट में पानी भर गया था और बताया जाता है कि जीवन के आखिरी दो सालों में वह कुष्ठ रोग से भी पीड़ित था। उसके शरीर के कुछ हिस्से सड़ने लगे थे।

बेशक, ऐसी बीमारियाँ अच्छे और सभ्य लोगों को भी हो सकती हैं। लेकिन जब किसी अत्याचारी, बर्बर या क्रूर शासक के साथ ऐसा होता है, तो यह विश्वास और मजबूत होता है कि इंसान को अपने बुरे कर्मों का फल इसी जीवन में भुगतना पड़ता है। ऐसा ही होना चाहिए। ऐसा ही होना भी चाहिए।

और खिलजी अकेला ऐसा शासक नहीं था। इतिहास को इस नजरिए से देखने पर पता चलता है कि मध्यकाल के लगभग हर अत्याचारी शासक की मौत बेहद दर्दनाक रही। मुगलों में तो मानो यह परंपरा ही बन गई थी कि बादशाहों को अपने जीवन के आखिरी सालों में अपने ही बेटों को तख्त के लिए लड़ते और एक-दूसरे की जान लेते देखना पड़ता था।

अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब—इन सभी को बुढ़ापे में अपनी ही संतानों के बीच होने वाले संघर्षों का दर्द झेलना पड़ा।

अकबर अपने दो बेटों मुराद और दानियाल की मौतों से पहले ही टूट चुका था। शाही परिवार में चल रही उथल-पुथल ने उसकी परेशानियाँ और बढ़ा दी थीं। उसने जहाँगीर से गुहार लगाई, लेकिन जहाँगीर ने अकबर के करीबियों को मरवाना जारी रखा। अबुल फ़ज़ल समेत अकबर के कई करीबी लोगों की हत्या कर दी गई। उधर, बूढ़ा अकबर बेबस और परेशान होकर सब कुछ देखता रहा। आखिरकार इन त्रासदियों का बोझ लिए ही उसकी मौत हो गई। जहाँगीर को भी इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा।

दुनिया शाहजहाँ को ताजमहल की वजह से एक महान प्रेमी के रूप में याद करती है, लेकिन वह भी दूसरे मुगल शासकों की तरह कम निर्दयी नहीं था। हिंदुओं के साथ व्यवहार के मामले में तो वह अपने कई पूर्ववर्ती शासकों से भी ज्यादा कट्टर था।

उसका अंत तो और भी दुखद रहा। बताया जाता है कि उसके प्यारे बेटे दारा शिकोह का कटा हुआ सिर खंजर की नोक पर रखकर आगरा में घुमाया गया। बाद में उस सिर को एक थाली में रखकर शाहजहाँ के सामने पेश किया गया। उस समय शाहजहाँ कैद में था।

और यह सब करने वाला कोई दुश्मन नहीं, बल्कि उसका अपना बेटा था।

अपने दूसरे बेटों को भी उनके भाई के हाथों मरते देख चुके शाहजहाँ ने कैद में अपने जीवन के आखिरी दिन किस पीड़ा में बिताए होंगे, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

ऐसा सिर्फ इन शासकों के साथ नहीं हुआ। कई अत्याचारी शासकों के जीवन के आखिरी साल दुख, विश्वासघात और त्रासदियों से भरे रहे। सबसे बड़ी बात यह थी कि उनमें से कोई भी सत्ता की बागडोर अगली पीढ़ी को शांतिपूर्वक नहीं सौंप सका। आखिरकार, सभी को किसी न किसी तरह सत्ता से बेदखल होना पड़ा।

मेरा मानना है कि इतिहास की किताबों में बादशाहों और राजाओं की मौतों के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए। लोगों को यह जानना चाहिए कि देर-सबेर हर इंसान को अपने कर्मों का हिसाब इसी जीवन में देना पड़ता है।

एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि लोग उन शासकों के दुखद अंत को याद रखें, जिन्होंने क्रूरता और बर्बरता के सहारे शासन किया था।

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