Thursday, 22 October 2026

सूतक, यज्ञ, अनुष्ठान आदि के बीच में क्षौर कर्म

किसी सूतक, यज्ञ, अनुष्ठान आदि के बीच में क्षौर कर्म (दाढ़ी, बाल कटवाना) करना चाहिये या नहीं ? 
    कतिपय विद्वानों का मत है कि सूतक, अनुष्ठान, यज्ञ, श्रीमद्भागवत कथा आदि के बीच में यजमान, यज्ञाचार्य और कथा व्यास को क्षौर (दाढ़ी या बाल कटवाना) नहीं करना चाहिये; परन्तु मदन पारिजात, अत्रि स्मृति, निर्णय सिन्धु आदि ग्रन्थों का इस विषय में महत्वपूर्ण निर्देश ध्यान देने योग्य है। यथा -

नित्यं क्षौरी च यः पुमान् तस्य दोषो न मन्तव्यो व्रते च जनने तथा।
यात्रायामनुष्ठानके च नित्यक्षौरी न दुष्यति॥
           (अत्रि स्मृति) 

अर्थ: जो पुरुष नित्य (प्रतिदिन) क्षौर कर्म करता है, उसे किसी व्रत, सूतक (जननाशौच), यात्रा अथवा धार्मिक अनुष्ठान के मध्य भी क्षौर करने पर कोई दोष या पाप नहीं लगता। उसका यह कृत्य 'नित्य कर्म' की श्रेणी में आता है, जिससे नैमित्तिक निषेध का बाध हो जाता है।

मदनपारिजात एवं निर्णयसिंधु के अनुसार -

नित्यक्षौरी न दुष्येत क्षौरे निषिद्धेऽहनि।
राज्ञामपि च सर्वत्र नित्यक्षौरं विधीयते॥

अर्थ: प्रतिदिन क्षौर कर्म करने वाला व्यक्ति शास्त्रों द्वारा वर्जित तिथियों या वर्जित दिनों (जैसे अनुष्ठान काल) में भी दोष का भागी नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, राजाओं के लिये भी राजसभा की शालीनता बनाये रखने हेतु नित्य क्षौर का नियम मान्य है। कथाव्यास भी व्यासपीठ पर 'राजा' या 'गुरु' के समान प्रतिष्ठित होते हैं, अतः उन पर भी यह नियम पूर्णतः घटित होता है।
      ऋषियों ने श्रमसाध्य अनुसंधान एवम् अपने अनुभवों के आधार पर विभिन्न ग्रन्थों के माध्यम से जीवन में अपनाने योग्य विधि निषेधों का उल्लेख किया है। यद्यपि सनातन धर्म समुद्र के समान वेदोपनिषद, पुराण, शास्त्र, ग्रन्थों से परिपूर्ण है; संभवतः इस विषय में अन्यत्र किसी ग्रंथ का पृथक् मत हो सकता है।
     

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