Friday, 5 December 2025

वर्षगांठ

दाम्पत्यम् अनुकूलम् चेत् 
किम् स्वर्गस्य प्रयोजनम्?
दाम्पत्यं प्रतिकूलम् चेत् 
नरकं किम्? गृहमेव तत्॥

दाम्पत्य यदि अनुकूल है तो फिर स्वर्ग की आवश्यकता ही क्या है? तथा दाम्पत्य यदि प्रतिकूल है तो नरक और क्या है जब घर ही नरक है?

आज हमारी विवाह वर्षगांठ है। मेरे गृहस्थ जीवन को उत्सव स्वरूप देने वाली आरती जी को हृदय से ढेरों बधाई, शुभकामनायें, अनेक धन्यवाद कि इस भवाटवी में सबसे पवित्र सम्बन्ध, दाम्पत्य सम्बन्ध निर्वहन के लिये हमारे माता पिता ने इष्ट कुलदैवत की प्रेरणा से आपका चयन मेरे लिये किया। मैं बार बार ये कहता रहा हूँ कि, सांसारिक सम्बन्धों में सबसे पवित्र सम्बन्ध है दाम्पत्य सम्बन्ध। दाम्पत्य मधुर हो तो भक्ति, ज्ञान, सत्कर्म, श्रद्धा, विश्वास, समर्पण, आध्यात्म के पुष्प खिलते हैं। तब समर्पण और शरणागति का गौरीशंकर शिखर बनता है गृहस्थ जीवन। 

~मनस्य एकं, ~चित्तस्य एकं,~ हृदयस्य एकं से लेकर ~सुमंत्रिते, ~सुविचारिते, ~सुचिन्त्यते भाव ही गृहस्थी को पवित्र करता है। तब जीवन में अपनी पूर्णता को लेकर शिवत्व उतरता है।

गुरुदेव एवं श्रीलक्ष्मीनृसिंह की कृपा बनी रहे हम पर। 

"द्यौरहं पृथिवीत्वम्, रेतोऽहं रेतोभृत्त्वम्, मनोऽहमस्मि वाक्त्वम्, सामाहमस्मि ऋकृत्वम्, सा मां अनुव्रता भव"।।  

मैं आकाश हूँ और तुम पृथ्वी हों। मैं ऊर्जा देता हूँ और तुम ऊर्जा लो। मैं मन हूँ और तुम शब्द हो। मैं संगीत हूँ और तुम गीत हो। तुम और मैं एक दूसरे का पालन करें। 

"ॐ गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथाऽऽसः । भगोऽअर्य्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वा दुर्गार्हपत्याय देवाः । अमोऽह- मस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽअहम् । सामाहमस्मि ऋक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम् । तावेहि विवाहवहै सह रेतो दधावहै । प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विन्द्यावहै बहून् । ते सन्तु जरदष्टयः सम्प्रियौ रोचिष्णू सुमन- स्यमानौ । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् शृणुयाम शरदः शतमिति"।

पुनः वर्षगांठ की अनन्ताशेष मंगलकामनाएं प्रिय❤️❤️❤️

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Thursday, 4 December 2025

सूर्पनखा

ज्ञानियों ने सदैव स्त्री को दो वर्गों में बाँटा है। देवी और अदेवी के रूप में। देवी जो केवल एक विवाह करती है और अदेवी जो अनेक बार विवाह करती है, या बिना विवाह के भी सम्बंध बनाती है। 

शूर्पणखा रावण की बहन थी लेकिन वह व्याह करके भी वह मायके में थी और स्वेच्छाचारी थी। क्या रावण उसे टोक नहीं सकता था? लेकिन रोका नहीं, टोका नहीं।

रावण का कुलवंश समाप्त हो गया।

स्त्री तो प्रकृति है, वह स्वतंत्र है।
वह नियंत्रित होती है सत्य से, किसी और से नहीं।

अपने युग के सर्वश्रेष्ठ योद्धा रहे अपने पति के शव को अपनी गोद मे लेकर विलाप कर रही मंदोदरी के सामने ही शीश झुकाए खड़े थे महात्मा विभीषण, उनकी आंखों से भी लगातार अश्रु बहे जा रहे थे। पाप-पुण्य, सत्य-अस्त के तमाम प्रश्न अब समाप्त हो चुके थे, रावण के शव और विभीषण के मध्य अब केवल भाई का सम्बंध बचा था। बचपन की खेलकूद से लेकर साम्राज्य निर्माण के दिनों की यादें कलेजा तोड़ रही थीं। रोते विभीषण के मुख से निकला- मुझे क्षमा करना भाभी, मैं ही अपराधी हूँ... अपने कुल का कलंक...
      मंदोदरी ने कोई उत्तर नहीं दिया पर पीछे खड़ी सूर्पनखा बोल पड़ी, "तुम क्षमा के योग्य नहीं हो विभीषण! तूम्हारे समस्त कुल का नाश कर दिया। राज्य के लोभ में तुम इतने अंधे हो जावोगे, यह हमने सोचा भी नहीं था..."
     विभीषण सचमुच पीड़ा में थे, उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। लेकिन मंदोदरी से सहन नहीं हुआ। वह गरज कर बोली- लंका का नाश विभीषण ने नहीं, तुमने किया है सूर्पनखा! व्यक्ति यदि अपनी उच्छऋंखलता को ही स्वतंत्रता मान ले तो वह अपने साथ साथ पूरे समाज का नाश कर देता है। तुमने वही किया। यदि तुमने सीता के सुन्दर आंगन में अपनी नाक न फँसाई होती, तो आज तुम्हारा जगतविजेता भाई भूमि पर नहीं लेटा होता।
      अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति अपने कुकर्मों की चर्चा पर अत्यंत तीव्र प्रतिक्रिया देता है। सूर्पनखा ने बिदकते हुए कहा- मैंने क्या गलत किया महारानी? क्या एक स्वतंत्र जीवन की मांग करना गलत है? क्या अपने स्वाभिमान, अपने अधिकारों के लिए लड़ना गलत है? मैंने कुछ गलत नहीं किया।
      "स्वतंत्रता? व्यक्ति की स्वतंत्रता जब समाज की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करने लगे तो वह अपराध हो जाती है सूर्पनखा। तुम्हारा स्वाभिमान यदि दूसरों के लिए दुख का कारण है तो धिक्कार है तुम्हारे स्वाभिमान को। उसे कुछ और नाम दो। हम इस धरती के इकलौते नागरिक नहीं हैं, यहाँ अन्य करोड़ों लोग निवास करते हैं। अपने लिए सुख तलाश करते समय यदि हम दूसरों के सुख दुख का ध्यान नहीं रखेंगे तो हमारा एक दिन समूल नाश अवश्य ही होगा। तुम्हे सत्ता का संरक्षण प्राप्त था तो तुमने अपने असभ्य आचरण को अधिकारों की सीमा में शामिल कर लिया, पर यह गलत ही था। इतिहास तुम्हे सदैव एक उदण्ड और चरित्रहीन स्त्री के रूप में ही याद रखेगा जिसने अपने उत्पात के कारण अपने भरे पूरे वंश का सत्यानाश कर दिया।"मंदोदरी के स्वर में कठोरता नहीं थी, दुख था। 
      सूर्पनखा ने अपने चरित्र के अनुरूप ही उदण्ड स्वर में कहा, " जो मैंने किया वही तो तुम्हारे पति और पुत्र भी करते रहे थे महारानी! पर तुम उनकी चर्चा क्यों नहीं कर रही? क्या केवल स्त्री होने के कारण ही मैं अपराधी ठहरा दी गयी हूँ?"
      "वे पुरुष थे, इसीलिए रणभूमि की धूल में लोट गए। तुम स्त्री थी, इसलिए बच गयी हो। वे अपने कुकर्मों का दंड पा चुके हैं, तुम अभी अनन्त कुकर्मों के लिए स्वतंत्र हो। सो स्त्री होने का रोना न रोवो सूर्पनखा! इसी परिवार में मेरी पुत्रवधु सुलोचना जैसी स्त्रियां भी हैं जिनके आगे शत्रुदल भी श्रद्धा से नतमस्तक है।" कहते कहते एक बार फिर मंदोदरी पीड़ा से फफक पड़ी थीं। अपने समस्त पुत्रों को खोने की आग उस साध्वी का हृदय जला रही थी। सूर्पनखा को न मानना था, न मानी। वह पैर पटकते हुए वहाँ से चली गयी। 

भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है?

यह पोस्ट किसी जाति के लिए नहीं वरन ब्राह्मणों के विरुद्ध समाज में फैलाई जा रही नकारात्मकता के बारे में है कृपया धैर्य से पूरा पढ़ें तभी प्रतिक्रिया दें।

जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोडा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ के नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं। जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों को विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है।

किंतु वे ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में "काल्पनिक" पुराने पापों के लिए दोषी हैं।

आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं।

ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।

वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया।

बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें...

किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है।

आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्षपात के न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचे, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें।

क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहियें, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से।

खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं। आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं। यह जानने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेताओं के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी,ताकि वे भारत के समाज के टुकड़े टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें।

सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली। ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं है। वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वह मृग है। आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी। क्या यह स्थिति स्वीकार्य है? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक दल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं;सब ने हम ब्राह्मणों के साथ सिर्फ छलावा ही किया है।

ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं!

क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हैं जब ब्राह्मणों ने पूरे भारत पर शासन किया हो? शुंग,कण्व ,सातवाहन आदि द्वारा किया गया शासन सभी विजातियों और विधर्मियों को क्यूं कचोटता है?

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्यकी सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में। भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त ,चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बनकर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा। चाणक्य का उत्तर था: ‘मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना।

क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं?

श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है।

संयोगवश, श्रीकृष्ण जो कि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादव-वंश के थे, जो कि आजकल ओबीसी के अंतर्गत आरक्षित जाति मानी गयी है।

यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसे कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी?(उस सन्दर्भ में यदि ईश्वर ब्राह्मण की कृति हैं जैसा की कुछ मूर्ख कहते हैं)

देवों के देव महादेव शिव को पुराणों के अनुसार किराट जाति का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में सत की श्रेणी में पाए जाते हैं

दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है। जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और या एक वेतनहीन गुरु(अध्यापक) का। उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन। क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं?

एक और शब्द जो हर कथा कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है - ‘निर्धन ब्राह्मण' जो कि उनका एक गुण माना गया है। समाज में सबसे माननीय स्थान संन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवनयापन का साधन भिक्षा ही थी। (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं।)

ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें। इस बारे में एक अमरीकी लेखक आलविन टाफलर ने भी कहा है कि ‘हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील माना गया है।’

सत्य तो यह है कि शोषण वही कर सकता है जो समृद्ध हो और जिसके पास अधिकार हों

अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका। श्रीकृष्ण यदुवंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ठ के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई। बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना। हां यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए,और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी।

इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि जी रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते?

और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना की वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे। इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया।

जिनकी शिक्षायें हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाति यदि देखी जाए, तो वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर, कबीरदास, विवेकानंद आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं। तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे।

जिन दो पुस्तकों में वर्ण(जाति नहीं) व्यवस्था का वर्णन आता है उनमें पहली तो है मनुस्मृति जिसके रचियता थे मनु जो कि एक क्षत्रिय थे, और दूसरी है श्रीमदभगवदगीता जिसके रचियता थे व्यास जो कि निम्न वर्ग की मछुआरन के पुत्र थे। यदि इन दोनों ने ब्राह्मण को उच्च स्थान दिया तो केवल उसके ज्ञान एवं शील के कारण, किसी स्वार्थ के कारण नहीं।

ब्राह्मण तो अहिंसा के लिए प्रसिद्ध हैं।

पुरातन काल में जब कभी भी उन पर कोई विपदा आई, उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी।

बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने क्रॉस पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज मिशनरी लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड उछल रहे हैं। इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया?

औरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की ह्त्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची मीनार खडी की जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके। किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया। यह सब उसके इतिहास में दर्ज़ है।

क्या ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाया? फिर भी ओरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन?

यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?

कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया। क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ! यह कैसा सत्य है?

(जब पुर्तगाली भारत आये, तब सत. ज़ेवियर ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।” यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े। जिन्होंने ने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा। सत. ज़ेवियर को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वे उसके रास्ते का काँटा थे,

हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर। क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया? फिर भी सत. ज़ेवियर के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज है और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं

इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण काश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए। आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं,

और वहां एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है। क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की? हत्या की छोडिये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया?

और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने काश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया।

५००,००० काश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं। आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया। क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की ह्त्या की?

फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं। यह कैसा तर्क है?

माननीय भीमराव अंबेडकर जो कि भारत के संविधान के तथाकथित रचियता (प्रारूप समिति के अध्यक्ष) थे, उन्होंने एक मुसलमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिया मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना। “किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी को मौत के घाट उतार दिया।” मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन

में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए। क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो?

१९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम आयंगर थे। वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं

मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया।

ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे। उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया। फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है। उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं। और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए।

अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शा वाले ब्राह्मण हैं? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर आपको ब्राह्मण कुली का काम करते हुए मिलेंगे?

दिल्ली में पटेलनगर के क्षेत्र में 50 % रिक्शा वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं। आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियां ब्राह्मण हैं। इसी प्रकार देश के दुसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं। गरीबी-रेखा से

नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है। हजारों की संख्या में ब्राह्मण युवक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहां सॉफ्टवेर इंजीनियर या साइंटिस्ट का काम मिल जाता है। सदियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं। फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे?

कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आंकड़ों के अनुसार वहां के वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय

१५६२ रू/ वोक्कालिग जन - ९१४ रू/ मुसलमान - ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन - ६८० रू/ पिछड़ी

जनजातियों के जन - ५७७ रू/ और ब्राह्मण - ५३७ रू।

तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धारणा है कि पुजारी‘धनवान’ और ‘शोषणकर्ता’ है, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है।

क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं
किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद आज भारत पिछड़ा हुआ थर्ड वर्ल्ड कंट्री कहलाता है।

इनके दोष भूलना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को किस बात का दोष लगते हो

कब तक उन्हें दोष देते जाओगे?

क्या हम भूल गए कि वे ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि मुनि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था?

भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से सामाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी। सदा से विश्व भर में जिन जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरी रहा

है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि। यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो यह सब अपने था अपने कुल के लिए ही रखते

दुनिया में मुफ्त बांटने की बजाए इन की कीमत वसूलते। वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दोष देने में लगे है।

जिस ब्राह्मण ने हमें मन्त्र दिया ‘वसुधैव कुटुंबकं’ वह ब्राह्मण विभाजनवादी कैसे हो सकता है? जिस ब्राह्मण ने कहा ‘लोको सकलो सुखिनो भवन्तु' वह किसी को दुःख कैसे पहुंचा सकता है? जो केवल अपनी नहीं , केवल परिवार, जाति, प्रांत या देश की नहीं बल्कि सकल जगत की मंगलकामना करने का उपदेश देता है, वह ब्राह्मण स्वार्थी कैसे हो सकता है?

इन सब प्रश्नों को साफ़ मन से, बिना पक्षपात के विचारने की आवश्यकता है, तभी हम सही उत्तर जान पायेंगे।

आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल मिल रहा है।

यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके तो सभी हमेशा से ऊंची पदवी पर बैठे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता? अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढने का मौका सबको मिल जाता है। कोई श्रीकांत दीक्षित भूख से मर जाता है तो कहते हैं कि बीमारी से मरा।

ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन सुन कर ग्लानि से इतना झुक चूका है कि वह कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता, बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है।

बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है आज का ब्राह्मण। नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण। बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं आज। बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके हैं । अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ने वाला कोई नही, इसलिए उन्हें जोड़ने के लिए उन्हें एक करने के लिए ब्राह्मण कम्युनिटी भारत प्रयासरत है 

Wednesday, 3 December 2025

जीवित होते हुए भी मृतक समान माने जाने वाले 14 दुर्गुण


क्या आप जानते हैं कि रामायण के अनुसार, साँस लेना ही जीवन नहीं है?
जब राम और रावण का भीषण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण को ललकारते हुए कहा था, "तुझे मारकर क्या फ़ायदा? तू तो पहले ही मरा हुआ है!"
इस पर रावण हैरान हुआ। तब अंगद ने वे 14 दुर्गुण बताए, जिनके कारण कोई भी व्यक्ति जीवित होते हुए भी 'मृत' के समान माना जाता है। ये 14 बातें त्रेतायुग की थीं, लेकिन आज के दौर में भी शत-प्रतिशत लागू होती हैं।
विचार करें, क्या इनमें से कोई दुर्गुण आपको भी मृतक समान तो नहीं बना रहा?
जीवित होते हुए भी मृतक समान माने जाने वाले 14 दुर्गुण

१. कामवश (अत्यधिक भोगी):
जो व्यक्ति कामवासना और संसार के क्षणिक भोगों में पूरी तरह लिप्त रहता है, जिसकी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं, और जो प्राणी सिर्फ अपनी वासनाओं के अधीन होकर जीता है।

२. वाम मार्गी (नकारात्मक विद्रोही):
जो व्यक्ति समाज और दुनिया से विपरीत चलता है। जो हर बात में नकारात्मकता खोजता है और नियमों, परंपराओं तथा लोक-व्यवहार के विरुद्ध आचरण करता है।

३. अति कंजूस (कृपण):
वह व्यक्ति जो धर्म के कार्य, दान, या किसी भी कल्याणकारी कार्य में आर्थिक रूप से हिस्सा लेने से बचता है। धन होने पर भी उसे खर्च न करना, उसे मृत समान बना देता है।

४. अति दरिद्र (आत्मविश्वास से हीन):
सिर्फ धन से नहीं, बल्कि जो व्यक्ति आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो। गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है, और ऐसा व्यक्ति जीवित होते हुए भी पराजित माना जाता है।

५. विमूढ़ (मूर्ख/विवेकहीन):
अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति, जिसके पास अपना विवेक और बुद्धि न हो। जो खुद कोई निर्णय न ले सके और हर कार्य के लिए दूसरों पर आश्रित हो।

६. अजसि (बदनाम व्यक्ति):
जिस व्यक्ति को समाज, परिवार या राष्ट्र में बदनामी मिली हुई हो। जो किसी भी इकाई में सम्मान नहीं पाता, वह मृत समान ही होता है।

७. सदा रोगवश (निरंतर रोगी):
जो व्यक्ति लगातार रोगी रहता है, जिसका शरीर अस्वस्थता के कारण विचलित रहता है। ऐसा व्यक्ति जीवन के वास्तविक आनंद से वंचित रह जाता है।

८. अति बूढ़ा (अत्यंत आश्रित वृद्ध):
अत्यधिक वृद्ध व्यक्ति, जो पूरी तरह से दूसरों पर आश्रित हो जाता है, जिसका शरीर और बुद्धि दोनों असक्षम हो जाते हैं। (अंगद के अनुसार यह अवस्था भी मृतक समान है, जहाँ व्यक्ति कष्टों से मुक्ति की कामना करने लगता है)।

९. सतत क्रोधी (हमेशा क्रोध में रहने वाला):
वह व्यक्ति जो हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण उसका मन और बुद्धि उसके नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं, और नियंत्रणहीन जीवन मृत के समान ही है।

१०. अघ खानी (पाप की कमाई खाने वाला):
जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का भरण-पोषण करता है। पाप की कमाई से जीवन चलाने वाला व्यक्ति स्वयं तो मृत समान होता ही है, उसके परिजन भी उसी के भागी होते हैं।

११. तनु पोषक (परम स्वार्थी):
ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से सिर्फ अपनी आत्म-संतुष्टि और अपने स्वार्थों के लिए जीता है। जिसके मन में संसार के अन्य प्राणियों के लिए कोई संवेदना न हो और जो समाज के लिए अनुपयोगी हो।

१२. निंदक (अकारण आलोचना करने वाला):
जो व्यक्ति दूसरों में सिर्फ कमियाँ देखता है और किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता। जो सदैव दूसरों की बुराई करता है, वह मृत समान है।

१३. परमात्म विमुख (आस्थाहीन):
जो व्यक्ति परम सत्ता (परमात्मा) का विरोधी है, यह सोचता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं और संसार हम ही चला रहे हैं। ऐसा व्यक्ति परमशक्ति में आस्था न रखने के कारण मृत माना जाता है।

१४. श्रुति, संत विरोधी (ज्ञान का विरोधी):
जो व्यक्ति वेद, ग्रंथ, पुराणों और संतों के उपदेश का विरोधी होता है। संत और शास्त्र समाज में ब्रेक का काम करते हैं; जो इन्हें नकारता है, वह अपने और समाज के पतन का मार्ग प्रशस्त करता है।

चौपाई में प्रमाण (लंका काण्ड):
कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमूख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जिवत सव सम चौदह प्रानी।।

भाषा की दरिद्रता: नाम


भाषा की दरिद्रता:
#नाम
समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को न जाने हो क्या गया है? समाज पथभ्रष्ट एवं दिग्भ्रमित हो गया है. 

एक सज्जन ने अपने बच्चों से परिचय कराया, बताया पोती का नाम अवीरा है, बड़ा ही यूनिक_नाम रखा है। 

पूछने पर कि इसका अर्थ क्या है, 

बोले कि बहादुर, ब्रेव कॉन्फिडेंशियल। 

सुनते ही दिमाग चकरा गया। फिर बोले कृपा करके बताएं आपको कैसा लगा?  

मैंने कहा बन्धु अवीरा तो बहुत ही अशोभनीय नाम है नहीं रखना चाहिए.

उनको बताया कि

1. जिस स्त्री के पुत्र और पति न हों. पुत्र और पतिरहित (स्त्री) 

2. स्वतंत्र (स्त्री) उसका नाम होता है अवीरा.

नास्ति वीरः पुत्त्रादिर्यस्याः सा अवीरा 

उन्होंने बच्ची के नाम का अर्थ सुना तो बेचारे मायूस हो गए, बोले महोदय क्या करें अब तो स्कूल में भी यही नाम हैं बर्थ सर्टिफिकेट में भी यही नाम है। क्या करें?

आजकल लोग नया करने की ट्रेंड में कुछ भी अनर्गल करने लग गए हैं जैसे कि 
लड़की हो तो मियारा, शियारा, कियारा, नयारा, मायरा तो अल्मायरा ... 

लड़का हो तो वियान, कियान, गियान, केयांश ...

और तो और इन शब्दों के अर्थ पूछो तो  
दे गूगल ... दे याहू ...

और उत्तर आएगा "इट मीन्स रे ऑफ लाइट" "इट मीन्स गॉड्स फेवरेट" "इट मीन्स ब्ला ब्ला"

नाम को यूनीक रखने के फैशन के दौर में एक सज्जन ने अपनी गुड़िया का नाम रखा "श्लेष्मा".

स्वभाविक था कि नाम सुनकर मैं सदमें जैसी अवस्था में थी. 

सदमे से बाहर आने के लिए मन में विचार किया कि हो सकता है इन्होंने कुछ और बोला हो या इनको इस शब्द का अर्थ पता नहीं होगा तो मैं पूछ बैठी "अच्छा? श्लेष्मा! इसका *अर्थ क्या होता है? 

तो महानुभाव नें बड़े ही कॉन्फिडेंस के साथ उत्तर दिया "श्लेष्मा" का अर्थ होता है "जिस पर मां की कृपा हो" मैं सर पकड़ कर 10 मिनट मौन बैठी रही ! 

मेरे भाव देख कर उनको यह लग चुका था कि कुछ तो गड़बड़ कह दिया है तो पूछ बैठे. 

क्या हुआ मैंने कुछ ग़लत तो नहीं कह दिया? 

मैंने कहा बन्धु तुंरत प्रभाव से बच्ची का नाम बदलो क्योंकि श्लेष्मा का अर्थ होता है "नाक का कचरा" उसके बाद जो होना था सो हुआ.

यही हालात है समाज के एक बहुत बड़े वर्ग का। 

फैशन के दौर में फैंसी कपड़े पहनते पहनते अर्थहीन, अनर्थकारी, बेढंगे शब्द समुच्चयों का प्रयोग समाज अपने कुलदीपकों के नामकरण हेतु करने लगा है

अशास्त्रीय नाम न केवल सुनने में विचित्र लगता है, बालकों के व्यक्तित्व पर भी अपना विचित्र प्रभाव डालकर व्यक्तित्व को लुंज पुंज करता है - जो इसके तात्कालिक कुप्रभाव हैं.

भाषा की संकरता 
इसका दूरस्थ कुप्रभाव है.

नाम रखने का अधिकार दादा-दादी, बुआ, तथा गुरुओं का होता है. यह कर्म उनके लिए ही छोड़ देना हितकर है.

आप जब दादा दादी बनेंगे तब यह कर्तव्य ठीक प्रकार से निभा पाएँ उसके लिए आप अपनी मातृभाषा पर कितनी पकड़ रखते हैं अथवा उसपर पकड़ बनाने के लिए क्या कर रहे हैं, विचार करें.

अन्यथा आने वाली पीढ़ियों में आपके परिवार में भी कोई "श्लेष्मा" हो सकती है, कोई भी अवीरा हो सकती है।

शास्त्रों में लिखा है व्यक्ति का जैसा नाम है समाज में उसी प्रकार उसका सम्मान और उसका यश कीर्ति बढ़ती है.

नामाखिलस्य व्यवहारहेतु: शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतु:।
नाम्नैव कीर्तिं लभते मनुष्य-स्तत: प्रशस्तं खलु नामकर्म।
{वीरमित्रोदय-संस्कार प्रकाश}

स्मृति संग्रह में बताया गया है कि व्यवहार की सिद्धि आयु एवं ओज की वृद्धि के लिए श्रेष्ठ नाम होना चाहिए.

आयुर्वर्चो sभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहृतेस्तथा ।
नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभि:।।

नाम कैसा हो
नाम की संरचना कैसी हो इस विषय में ग्रह्यसूत्रों एवं स्मृतियों में विस्तार से प्रकाश डाला गया है पारस्करगृह्यसूत्र 1/7/23 में बताया गया है-

द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा घोषवदाद्यंतरस्थं। 
दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान्न तद्धितम्।। 
अयुजाक्षरमाकारान्तम् स्त्रियै तद्धितम् ।।

इसका तात्पर्य यह है कि

बालक का नाम दो या चारअक्षरयुक्त, पहला अक्षर घोष वर्ण युक्त, 

वर्ग का तीसरा चौथा पांचवा वर्ण, 

मध्य में अंतस्थ वर्ण, य र ल व आदिऔर नाम का अंतिम वर्ण दीर्घ एवं कृदन्त हो तद्धितान्त न हो।

कन्या का नाम विषमवर्णी तीन या पांच अक्षर युक्त, दीर्घ आकारांत एवं तद्धितान्त होना चाहिए

धर्मसिंधु में चार प्रकार के नाम बताए गए हैं

१ देवनाम
२ मासनाम 
३ नक्षत्रनाम 
४ व्यावहारिक नाम 

नोट - कुंडली के नाम को व्यवहार में नहीं रखना चाहिए क्योंकि जो नक्षत्र नाम होता है उसको गुप्त रखना चाहिए. 

यदि कोई हमारे ऊपर अभिचार कर्म मारण, मोहन, वशीकरण इत्यादि कार्य करना चाहता है तो उसके लिए नक्षत्र नाम की आवश्यकता होती है, 

व्यवहार नाम पर तंत्र का असर नहीं होता इसीलिए कुंडली का नाम गुप्त होना चाहिए।

1/2 
हमारे शास्त्रों में वर्ण अनुसार नाम की व्यवस्था की गई है ब्राह्मण का नाम मंगल सूचक, आनंद सूचक, तथा शर्मा युक्त होना चाहिए. 

क्षत्रिय का नाम बल रक्षा और शासन क्षमता का सूचक, तथा वर्मा युक्त होना चाहिए, 

वैश्य का नाम धन ऐश्वर्य सूचक, पुष्टि युक्त तथा गुप्त युक्त होना चाहिए, अन्य का नाम सेवा आदि गुणों से युक्त, एवं दासान्त होना चाहिए।

पारस्कर गृहसूत्र में लिखा है -

शर्म ब्राह्मणस्य वर्म क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य

शास्त्रीय नाम की हमारे धर्म में बहुत उपयोगिता है मनुष्य का जैसा नाम होता है वैसे ही गुण उसमें विद्यमान होते हैं. 

बालकों का नाम लेकर पुकारने से उनके मन पर उस नाम का बहुत असर पड़ता है और प्रायः उसी के अनुरूप चलने का प्रयास भी होने लगता है 

इसीलिए नाम में यदि उदात्त भावना होती है तो बालकों में यश एवं भाग्य का अवश्य ही उदय संभव है।

हमारे धर्म में अधिकांश लोग अपने पुत्र पुत्रियों का नाम भगवान के नाम पर रखना शुभ समझते हैं ताकि इसी बहाने प्रभु नाम का उच्चारण भगवान के नाम का उच्चारण हो जाए।

भायं कुभायं अनख आलसहूं। 
नाम जपत मंगल दिसि दसहूं॥

विडंबना यह है की आज पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में नाम रखने का संस्कार मूल रूप से प्रायः समाप्त होता जा रहा है. 

इससे बचें शास्त्रोक्त नाम रखें इसी में भलाई है, इसी में कल्याण है।

Tuesday, 2 December 2025

भारत नाम विमर्श

भारतविमर्श 
**मूल नामों से #प्राचीन_इतिहास और परम्परा का पता चलता है** 

जैसे काशी क्षेत्र की पूर्वी सीमा (सोन-गंगा संगम) पर के स्थान नाम उसी क्रम में हैं जैसे जगन्नाथ पुरी के निकट के क्षेत्र। विश्वनाथ और जगन्नाथ धाम में अधिक अन्तर नहीं है। 

उत्तर भारत में अधिक नाम बदलने से यह लुप्त हो गया है। अलीगढ़ का नाम १७१० ई. तक बारन था। भारत में ३ या अधिक बहिरंग हैं जो बड़े किले में रसद पानी भेजने के लिये सहायक किले थे। 

राजस्थान के कोटा तथा ओड़िशा के कटक (कोट, कटक = किला) दोनों से २० किमी. दूर बारंग (बहिरंग) है। 
ओड़िशा के कई किलों के पास ऐसे छोटे किले थे-बगालोगढ़-बगालो बहाराणा। 

दिल्ली के निकट दो बहिरंग थे-बारन (वर्तमान अलीगढ़), अग्रा (आगरा)। अग्रा गणित ज्योतिष का शब्द है जो छाया द्वारा भौगोलिक उत्तर-दक्षिण दिशा जानने के विषय में है-स्तम्भ केन्द्र से छाया शीर्ष की दूरी। रांगेय राघव ने इसे अहिगृह का अपभ्रंश माना है (महागाथा यात्रा)। 

दिल्ली मूल रूप से नागों का खाण्डव प्रस्थ नगर या वन था जिसकी सीमा के अर्थ में यह अग्रा था। बादमें युधिष्ठिर ने महाभारत पूर्व इसे इन्द्रप्रस्थ नाम से बसाया जो मूलतः इन्द्र काल की छावनी थी। इन्द्रप्रस्थ नगर में मय निर्मित भवन तथा १ योजन लम्बा राजसूय भवन था जिसमें विद्युत् प्रकाश की व्यवस्था थी। 

मिर्जापुर का पुराना नाम गिरिजा पुर था जिसे श्री जितेन्द्र कुमार सिंह ने सिद्ध किया है। दुर्गासप्तशती अध्याय ११ में इसे विन्ध्यवासिनी कहा गया है। सम्भवतः सम्पूर्ण नगर या जनपद (जिला) विन्ध्याचल थ और मन्दिर भाग गिरिजापुर।

विदेशों से सम्बन्ध भी पुराने नामों से पता चलता है। भारत की जलवायु में ऊंचे स्थान स्वर्ग हैं-जैसे हिमालय भाग त्रिविष्टप् (तिब्बत) का अर्थ स्वर्ग होता है। इसके ३ जल स्रोत क्षेत्र ३ विटप हैं-पश्चिम में विष्णु विटप से सिन्धु नदी, मध्य के शिव विटप (शिव जटा) से गंगा नदी तथा पूर्व के ब्रह्म विटप से ब्रह्मपुत्र का उद्गम है। 

सभ्यता केन्द्र रूप में भारत अजनाभ वर्ष था। अज = विष्णु, उसका नाभि-कमल मणिपुर और उससे ब्रह्म देश या ब्रह्मा की उत्पत्ति। गंगा अवतरण की कथा है कि गंगा नदी ब्रह्मा के कमण्डल में समा गयी थी। साधारण कमण्डल में नदी नहीं समा सकती है, वह समुद्र में ही मिल सकती है। ब्रह्मा का स्थान ब्रह्मदेश (म्याम्मार = महा अमर) जिसके निकट का समुद्र को अंग्रेजों ने बंगाल की खाड़ी नाम दिया। क= जल या ब्रह्मा (कर्त्ता रूप क ब्रह्म), मण्डल = क्षेत्र। इसी कमण्डल में गंगा समा गयी थी। इसका पश्चिमी तट कर-मण्डल या कारोमण्डल हुआ। गंगा गिरने के बाद यह गंगा सागर तथा पश्चिमी समुद्र में सिन्धु नदी मिलने से यह सिन्धु समुद्र था। गंगा सागर पर नियन्त्रण करने वाले ओड़िशा के राजाओं को भी गंग वंश का कहते थे।

उत्तर यूरोप की ठण्ढी जलवायु में निम्न स्थान स्वर्ग (स्वीडेन का स्थानीय नाम) तथा पर्वतीय भाग नर्क (नार्वे का स्थानीय नाम) है। नार्वे की राजधानी ओसलो की तरह उत्तराखण्ड में भी हर की दून में ओसला है।
भारत का पश्चिम पत्तन मुम्बई था। उसी समुद्र के पश्चिम छोर पर पूर्व अफ्रीका का पत्तन भी मोम्बासा है। 
पश्चिम भारत का सीमान्त आप्रीत (अफरीदी) कहते थे। भारत के पश्चिम का महाद्वीप कुश को भी अप्रीक (अफ्रीका) कहते थे। 

भारत की कन्या कुमारी का अनुवाद वर्जिन मेरी, सलेम का नया रूप जेरुसलेम तथा अयप्पन का बाइबिल में इयापेन हो गया। भारत के मलय क्षेत्र की राजधानी का समुद्रतट कोवलम है। मलयेसिया की राजधानी भी कोवलमपुर है। आन्ध्रतट पर अनाम की तरह वियतनाम का नाम अनाम था (अ, या वियत = शून्य)। 
भागलपुर तथा कम्बोडिया दोनों का नाम चम्पा था।भारतवर्ष के कई नाम थे-भारतवर्ष हिमालय दिशा में पूर्व से पश्चिम दिशा तक था जिसके ९ खण्ड थे। मुख्य भाग भारत या कुमारिका खण्ड कहते थे जो अविभाजित भारत था।

कानपुर नाम कर्ण पुर भी हो सकता है। यह स्वाभाविक उच्चारण परिवर्तन है। इसका क्षेत्र कान्यकुब्ज था।
हैदराबाद के विभिन्न भागों के अलग अलग नाम थे। एक भाग्य नगर था।

इलाहाबाद संगम क्षेत्र प्रयाग था जो प्रायः १०५०० वर्षों से पुरुरवा के समय से चल रहा है। निकट के स्थानों के नाम नहीं बदले हैं-झूंसी आदि।

भोपाल मूल नाम है-भूपाल का अपभ्रंश। इसके ताल को भी भूपाल ताल कहते हैं। इस बड़े ताल से भूमि का पालन होता था, अतः भूपाल हुआ। ज्योतिष में भूप या भूपाल का अर्थ १६ होता है, जिसका कारण स्पष्ट नहीं है। चन्द्रमा को भी राजा कहते थे जिसकी १६ कला होती थी, अमावास्या में शून्य तथा १ से १५ तिथि की कला। राज कार्य के १६ विभाग हो सकते हैं या भूपाल ताल १६ योजन लम्बा होगा।

लखनऊ =लक्ष्मणावती-लखनऊ। इससे लक्ष्मण का काम और इतिहास याद रहता है।

अहमदाबाद का नाम सोलंकी राजा कर्णदेव के समय से कर्णावती है। इसके पूर्व यह भद्रावती था-भद्रकाली मन्दिर का स्थान। इसी २१ अक्षांश पर ओड़िशा के भद्रक में भी भद्रकाली है। आकाश में २१ अहर्गण के भीतर सूर्य का रथ है (पृथ्वी व्यास का २ घात १८ गुणा)। पुरुष सूक्त में यह सहस्राक्ष क्षेत्र है-सूर्य से १००० सूर्य-व्यास दूरी तक के ग्रहों शनि तक का ही दृश्य प्रभाव पड़ता है। अतः पृथ्वी पर २१ उत्तर अक्षांश भद्र हुआ।

फैजाबाद का पुराना नाम अयोध्या था जिसके कई भाग थे-साकेत, नन्दिग्राम (सचिवालय), अयोध्या-राजमहल और सरकारी क्षेत्र। प्राचीन काल में अधिकारियों के १० स्तर थे-आजकल ५० के करीब हैं। सबसे ऊपर राजा १० स्तर पर था। उसके नीचे मन्त्री या सचिव को नन्द कहते थे जो नवम स्तर का था। अतः ज्योतिष में नन्द का अर्थ ९ है। जहां मन्त्री-सचिवों का कार्यालय था वह नन्दिग्राम हुआ। शासन चलाने के लिये भरत को वहां रहना पड़ता था। दूसरा कारण था कि अपने को नन्द स्तर का ही माना, राजा नहीं। किसी भी पुराण में सूर्यवंशी राजाओं की सूची में दशरथ के बाद राम का ही नाम है, १४ वर्ष तक भरत को राजा नहीं कहा गया। यह आदर्श और व्यवस्था प्राचीन नामों से ही प्रकट होगी। बाबरी मस्जिद से यही पता चलेगा कि जो भी लूटमार करे उसकी सम्पत्ति हो जायेगी।

रोहतक का पुराना नाम रोहितक था। यह शून्य देशान्तर रेखा के निकट था जो विषुव रेखा पर प्राचीन लंका तथा उज्जैन से गुजरती थी।

लङ्काकुमारी तु ततस्तु काञ्ची, मानाटमश्वेतपुरी त्वथोदक्।
श्वेतोऽचलोऽस्मादपि वात्स्यगुल्मं, पूः स्यादवन्ती त्वनुगर्गराटम्॥१॥

आश्रमपत्तनमालवनगरे पट्टशिवमेव रोहितकम्।
स्थाण्वीश्वरमस्तु हिमवान् मेरुर्लेखाध्वकर्म नास्त्येषाम्॥२॥
(वटेश्वर सिद्धान्त, १/८/१-२)

मध्य विषुव रेखा के निकट के स्थान-लंका (विषुव पर) से उत्तर कुमारी, काज्ची, मानाट, अश्वेतपुरी, श्वेत पर्वत, वात्स्यगुल्म (वत्स राज्य की छावनी), अवन्ती, गर्गराट्, आश्रमपत्तन (सरस्वती तट पर पत्तन), मालवनगर, पट्टशिव, रोहितक, स्थाण्वीश्वर (थानेश्वर), हिमालय (कैलास निकट), मेरु (उत्तरी ध्रुव)। इस रेखा पर सबसे उत्तर का नगर शिविर (साइबेरिया) का उत्तर कुरु था किसे ओम्स्क कहते हैं (वहां से देशान्तर की माप होती है अतः ॐ नाम)।

पुरबन्दर मूल नाम है। इसी प्रकार का बोरीबन्दर मुम्बई में है। बन्दर = पत्तन। इसके अधिकारियों के वानर कहते थे जो वननिधि (समुद्र) में चलते थे। बान्ध्यो वननिधि नीरनिधि उदधि सिन्धु वारीश। सत्य तोयनिधि कम्पति जलधि पयोधि नदीश॥ (रावण द्वारा रामसेतु बनने पर आश्चर्य व्यक्त कर समुद्र के १० नाम कहना)।
आजमगढ़ = अर्यमागढ़।

उज्जैन के ३ भाग थे-अवन्तिका, उज्जयिनी, विशाला (पुराण संकलन का स्थान भविष्य पुराण-मेघदूत में)
विशाखापत्तनम् मूल नाम है। यहां दो नदियां वंशधारा और नागावली स्रोत से समुद्र तक दो धाराओं (शाखा) में एक साथ चलती हैं।

पटना के कई भाग थे-प्रकाश स्तम्भ क्षेत्र प्रकाशपत्तन (मञ्जुल का लघुमानस), सरकारी कार्यालय और आवास के सेक्टर (पटल)-पाटलिपुत्र, मुख्य बाजार-बृहद् हट्टी-बिहटा, विश्वविद्यालय भाग-कुसुमपुर (फुलवारीशरीफ), खगोल वेधशाला-खगोल।

एक आश्चर्य है कि भारत राष्ट्र है तो उसका छोटा अंश महाराष्ट्र कैसे हुआ? भागवत माहात्म्य में है कि भक्ति से ज्ञान-वैराग्य का जन्म द्रविड़ में हुआ, वृद्धि कर्णाटक में हुयी तथा विस्तार महाराष्ट्र तक हुआ। गुर्जर जाते जाते प्रभाव समाप्त हो गया। 

अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ।
ज्ञान वैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४५॥

उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता। 
क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥

तत्र घोर कलेर्योगात् पाखण्डैः खण्डिताङ्गका। 
दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मन्दताम्॥४९॥

वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी। 
जाताहं युवती सम्यक् श्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥५०॥

(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)

सृष्टि का आरम्भ अप् से हुआ, अतः उसके शब्द रूप वेद के उद्गम को द्रविड़ कहा (द्रव = अप् = जल)। वेद श्रुति आदि माध्यम से प्राप्त ज्ञान है अतः श्रुति हुआ। इसका ग्रहण कर्ण से होता है अतः इसकी वृद्धि का क्षेत्र कर्णाटक हुआ। वृद्धि का अर्थ है शब्द के अर्थों का विस्तार। शब्दों का मूल अर्थ आधिभौतिक था, उनके आध्यात्मिक तथा आधिदैविक अर्थ बनाना वृद्धि हुआ। आज भी वेद का सबसे अधिक शोध वहीं होता है। इस अर्थ में भी वेद प्रसार की अन्तिम सीमा कर्णावती हो सकती है। इसका उलटा अर्थ अहमदाबाद से आयेगा। अहमद शाह ने इसे बर्बाद किया था, उसके द्वारा आबाद कहना सत्य का उलटा है। प्रभाव या विस्तार क्षेत्र महर् (महल) है। अतः वेद का जहां तक विस्तार हुआ, वह महाराष्ट्र है। 

बाद में उत्तर भारत में प्रसार होने पर श्रुति क्षेत्र कर्णपुर, कान्यकुब्ज, बहराइच (बहवृच =ऋग्वेद) उत्तर बिहार का रीगा आदि हुए।

इस ज्ञान के अभाव में कहते हैं कि उत्तर भारत के आर्यों ने दक्षिण भारत पर वेद थोप दिया। स्पष्टतः इन लोगों ने वेद कभी देखा नहीं है। ऋग्वेद के पहले ही सूक्त में ही दो शब्दों का प्रयोग केवल दक्षिण भारत में होता है। दोषा-वस्ता = रातदिन। दोषा काल का मुख्य भोजन दोसा है। सौर मण्डल के धाम वस्त (बस्ती) हैं जिनकी गिनती अहः में होती है। इनका नियन्त्रक सूर्य या दिन का समय वस्ता है। जैसे हिन्दी फिल्मों का एक पुराना तेलुगू गीत था-रमैया वस्ता वैया।

विष्णु ने नगरों का निर्माण किया था अतः उनको उरुक्रम कहते हैं। केवल दक्षिण भारत में ही नगरों को उर या उरु कहते हैं जैसे बंगलूरु, मंगलूर, नेल्लूर, तञ्जाउर आदि। बंगलोर को टीपूसुल्तानाबाद कहने से यह पता नहीं चलेगा।

उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८) शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग् वेद १/९०/१)
बाद में वरुण ने भी वैसे ही उर बनाये। अतः इराक का सबसे पुराना नगर ऊर था।

दत्तात्रेय

भगवान श्री दत्तात्रेय जयंति के पावन अवसर पर शुभकामनाएं! 
______________

कुछ तथ्य : - 
        आदि गुरू दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और अनुसूइया के पुत्र 
इसीलिए दत्त +आत्रेय कहे गए! 
        महर्षि अत्रि की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के नेत्रों से, अनुसूइया महर्षि कर्दम और देवहुति की पुत्री और सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपील की बहन थी! 
        गुजरात में दत्त उपासना के बीज सरदार सरोवर बांध के निकट स्थित गरूड़ेश्वर तीर्थ में प. पू. स्वामी श्री वासुदेवानंद सरस्वती टेम्बे महाराज ने रखे! 
       पूज्य टेम्बे स्वामी ने मराठी और संस्कृत में दत्त उपासना साहित्य की खूब रचना की! 
        उनके शिष्य नारेश्वर के संस्थापक प. पू. रंगअवधूत महाराज ने गुजराती, हिंदी और संस्कृत भाषा में दत्तात्रेय उपासना को प्रचुरता प्रदान की! 
         भगवान दत्तात्रेय का जन्म सह्याद्री पर्वत माला के माहूरगढ़ नामक स्थान पर एवम् गुजरात के गिरनार पर्वत पर उनका निवास माना जाता है! जैसे राम और कृष्ण अवतार में राक्षस वध के बाद वे निज धाम गमन कर गए किंतु दत्तात्रेय चिरंजीवी माने जाते हैं! 
        भगवान कृष्ण योग के ईश्वर है इसलिए योगेश्वर कहे गए। दत्तात्रेय योगियों के ईश्वर है इसलिए योगीेश्वर कहे जाते हैं! 
       प. पू. रंगअवधूत जी के अनुसार दत्त शब्द दन्त्यवर्णों से निर्मित है (यानी जो त, थ, द, ध, न,) यह अद्वैत का सूचक है! 
      "दया, दान अरू दमन ये है दत्ता के भेद! 
       तत्ता विषयाध्यास है ताको तू कर भेद!!"
       भगवान दत्त का मुख्य गुण "सर्वस्व का दान" करना है! दत्त अवतार को लेकर भी प. पू. रंगअवधूत जी का कथन यही था कि जिसमें दत्त की तरह सर्वस्व अर्पण के गुण हो वही दत्तावतारी! उन्होने अपने जीवन में जो सूत्र दिया वह है "परस्पर देवो भवः!" उन्होंने 'लंघन करना (भूखों रहना) पर मांगना नहीं' का सूत्र भी अपने अनुयायियों को दिया!

https://youtu.be/A8BNfgyqVLM