Tuesday, 30 December 2025

कैलास देशान्तर रेखा के शैव पीठ

कैलास देशान्तर रेखा के शैव पीठ
१. प्राचीन भूगोल-(१) आकाश के लोक-आकाश के ७ लोक हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (यूरेनस तक का वायु क्षेत्र, २२ अहर्गण तक, या १०० कोटि योजन व्यास की चक्राकार पृथ्वी जो नेपचून तक की ग्रह कक्षा है), स्वः (सौर मण्डल, ३० धाम या ३३ अहर्गण तक-ऋक्, १०/१८९/३, जहां तक सूर्य का प्रकाश अधिक है), महः लोक (४३ अहर्गण तक, सर्पाकार भुजा शेषनाग में सूर्य केन्द्रित भुजाकी मोटाई का गोल जिसके १००० तारा शेष के १००० सिर हैं), जनः लोक (ब्रह्माण्ड जिसका केन्द्रीय चक्र आकाशगंगा है, ४९ अहर्गण क्षेत्र की गति ४९ मरुत्), तपः लोक (जहां तक का ताप या प्रकाश पृथ्वी तक आ सकता है, पृथ्वी का २ घात ६४ गुणा, या ८६४ करोड़ प्रकाश वर्ष की त्रिज्या), सत्य लोक ( अनन्त आकाश)।
(२) परिलेख या माप-पृथ्वी पर २ प्रकार का परिलेख या माप (map) बनता था। इसके लिए नक्षत्र देख कर अक्षांश देशान्तर निकालते थे, अतः इसे नक्षा (नक्शा) कहते थे। पृथ्वी के ७ द्वीप चक्राकार नहीं हैं। पृथ्वी से देखने पर यूरेनस तक के ग्रहों का पथ गोलाकार या वलयाकार दीखता है, जिनके नाम पृथ्वी के द्वीपों के नाम पर ही दिये गये हैं। (विष्णु पुराण, २/७/३-४)। अन्यथा १००० योजन व्यास की पृथ्वी पर १६ कोटि योजन मोटाई का वलयाकार पुष्कर द्वीप नहीं हो सकता है। पृथ्वी के ७ द्वीप किसी भी ज्यामितिक आकार में नहीं हैं। ये ७ द्वीप हैं-जम्बू द्वीप (एशिया), प्लक्ष द्वीप (यूरोप), कुश द्वीप (विषुव रेखा के उत्तर का अफ्रीका), शाल्मलि द्वीप (विषुव वृत्त के दक्षिण का अफ्रीका), शक द्वीप (अग्नि कोण में होने से अग्नि द्वीप, वायु पुराण अध्याय ३६, ३०० प्रकार के शक या स्तम्भ वृक्ष युकलिप्टस), क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका, यह द्वीप तथा मुख्य क्रौञ्च पर्वत-दोनों उड़ते पक्षी के आकार के हैं), पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका, उज्जैन से १२ अंश पश्चिम के पुष्कर बुखारा के विपरीत-विष्णु पुराण में पुष्कर २/८/४२)
अन्य पद्धति थी पृथ्वी के उत्तर गोल का ४ पाद में नक्शा बनाना जिनको भूपद्म का ४ दल कहा गया है-(१) भारत दल उज्जैन देशान्तर के पूर्व और पश्चिम ४५-४५ अंश तक, विषुव रेखा से उत्तर ध्रुव तक) (२) पूर्व में भद्राश्व, (३) पश्चिम में केतुमाल, (४) विपरीत दिशा में कुरु वर्ष (यह कुरुक्षेत्र के विपरीत है)। 
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः॥२४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥४०॥
(विष्णु पुराण, २/२)
दक्षिण में भी इसी प्रकार ४ पाद थे। भारत दल में इन्द्र के ३ लोक थे। इनकी माप के लिए विष्णु वामन का पूर्व दिशा में प्रथम पद यवद्वीप सहित सप्तद्वीप के पूर्व में पड़ा था। यहां पद का अर्थ है वृत्त पाद, ९० अंश। द्वीतीय पद मेरु (उत्तर ध्रुव) पर पड़ा। तृतीय पद वापस बलि के स्थान भारत के पाचिमी छोर पर पड़ा।
तत्र पूर्वपदं कृत्वापुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे। द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः॥
वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, ४०/५८)
यहां त्रिविक्रम = तिकड़म। राजा की ४ नीति हैं-साम, दाम, दण्ड, भेद। दण्ड तभी दिया जा सकता है, जब बल हो। नहीं तो छल करना पड़ेगा जिसकी ३ पद्धति साम, दाम, भेद को त्रिविक्रम कहा गया है। वामन ने तीनों का प्रयोग किया था।
(३) पृथ्वी के लोक- भारत पाद में इन्द्र के ३ लोकों को ही ७ लोकों में विभाजित किया गया था। 
लोकाख्यानि तु यानि स्युर्येषां तिष्ठन्ति मानवाः॥८॥ भूरादयस्तु सत्यान्ताः सप्त लोकाः कृतास्त्विह॥९॥
पृथिवी चान्तरिक्षं च दिव्यं यच्च महत् स्मृतम्। स्थानान्येतानि चत्वारि स्मृतान्यावर्णकानि च॥११॥
जनस्तपश्च सत्यं च स्थान्यान्येतानि त्रीणि तु। एकान्तिकानि तानि स्युस्तिष्ठंतीहा प्रसंयमात्॥१३॥
भूर्लोकः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु भुवः स्मृतः।१४॥ 
स्वस्तृतीयस्तु विज्ञेयश्चतुर्थो वै महः स्मृतः। जनस्तु पञ्चमो लोकस्तपः षष्ठो विभाव्यते॥१५॥ 
सत्यस्तु सप्तमो लोको निरालोकस्ततः परम्।१६। महेति व्याहृतेनैव महर्लोकस्ततो ऽभवत्॥२१॥
यामादयो गणाः सर्वे महर्लोक निवासिनः।५१॥ (ब्रह्माण्ड पुराण,३/४/२/८-५१)
ध्रुव तक देखने पर चीन मध्य में आता है, अतः वहां के लोग अपने को पृथ्वी स्वर्ग के बीच का मध्य राज्य कहते थे। केवल भारत वर्ष में हिमालय-विन्ध्य के बीच का भाग मध्य भारत है जिसे आजकल उत्तर भारत समझा जाता है। इसे मध्यम लोक भी कहा गया है-(रघुवंश, २/१६)। इसी अर्थ में नेपाल में दक्षिण की समतल भूमि को मधेश (मध्यदेश) कहते हैं। हिमालय मार्ग को प्राचीन काल से उत्तरापथ कहा गया है। 
भारत दल के ७ लोक हैं-भू (विन्ध्य से पश्चिम), भुवः (मध्यम लोक, विन्ध्य हिमालय के पश्चिम), स्वः (हिमालय, तिब्बत या त्रिविष्टप = स्वर्ग), महः (चीन, ब्रह्मा ने यहां के लोगों को महान कहा था (ब्रह्माण्ड पुराण,३/४/२/२१, वायु पुराण, १०१/२३), जनः लोक (मंगोलिया, अरबी में मुकुल = प्रेत), तपस् (स्टेपीज, साइबेरिया), सत्य लोक (ध्रुव वृत्त)।
भारत दल के अतिरिक्त अन्य ७ पादों को ७ तल या पाताल कहते थे। ये पृथ्वी सतह पर ही हैं, आकाश में नहीं। भारत के दक्षिण तल या महारल, पश्चिम में अतल, उसके दक्षिण तलातल, अतल के पश्चिम पाताल, उसके दक्षिण रसातल, भारतके पूर्व सुतल, उसके दक्षिण वितल है। 
२. भू-माप के सन्दर्भ विन्दु-
शून्य देशान्तर का चयन-आधुनिक काल में ब्रिटेन की प्रभुता होने पर अपनी राजधानी के निकट ग्रीनविच की देशान्तर रेखा को शून्य घोषित कर दिया। यह विषुव के निकट होने के कारण माप में कठिनाई होती है। इसके पूर्व नेपोलियन ने पेरिस से गुजरती देशान्तर रेखा पर विषुव से उत्तर ध्रुव तक की दूरी के १ कोटि भाग को मीटर घोषित किया तथा उस लम्बाई के बराबर मिश्र धातु की छड़ पर २ चिह्न दिये गये जिनके बीच की दूरी शून्य डिग्री केल्विन (सेण्टीग्रेड) पर १ मीटर थी। पुरुष सूक्त के अनुसार भी यही माप होगी। 
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्त्वा अत्यत्तिष्ठत् दशाङ्गुलम्॥ (वाज. यजु, ३१/१)
यहां भूमि का अर्थ पृथ्वी ग्रह लें तो ठोस पिण्ड = भू (भ = २४वां अक्षर), वायुमण्डल आवरण जोड़ कर २५वां अक्षर मिलाने पर यह भूमि है। इसकी परिधि = २४/२५ x१/९६ x१००० शीर्ष x१००० अक्ष (२) x१००० पाद (२) = ४ x१० घात ७ दण्ड (१ दण्ड = ९६ अङ्गुल) = ४ कोटि दण्ड। पृथ्वी की परिधि = ४ कोटि मीटर (४०,००० किमी)। अर्थात् यहां १ दण्ड = १ मीटर। विषुव रेखा पर स्थित लंका को शुन्य देशान्तर रेखा मानने का मूल कारण था कि यह दोनों ध्रुवों (उत्तर में मेरु या सुमेरु, दक्षिण में कुमेरु) तथा समुद्र के बीच है। (इस मन्त्र के अन्य कई अर्थ हैं)
स्थलजलमध्याल्लङ्का भूकक्ष्याया भवेच्चतुर्भागे। 
उज्जयिनी लङ्कायाः तच्चतुरंशे समोत्तरतः॥ (आर्यभटीय, ४/१४)
विषुव रेखा का हर विन्दु दोनों ध्रुवों के बीच है। इस रेखा पर भारत के दक्षिण महासागर में पश्चिम में अफ्रीका तट से पूर्व में सुमेरु तट के मध्य विन्दु पर लंका था। लंका के समुद्र में लीन होने के बाद उज्जयिनी को सन्दर्भ माना गया जो भूपरिधि के चतुर्थ भाग (९० अंश) का भी चतुर्थ भाग (२२.५ अंश) उत्तर है।
हर महाद्वीप में सन्दर्भ के लिए १-१ मेरु थे। पूर्व का मेरु प्राङ्मेरु (पामीर) मध्य मेरु अफ्रीका में विषुव रेखा पर है जिसका नाम अंग्रेजों ने किलिमंजारो कर दिया, पर उस जिले का नाम अभी भी मेरु है। पश्चिम में अपर मेरु या अमेरु दक्षिण अमेरिका में है जिसके नाम पर उसे अमेरिका कहा गया।
इसके अतिरिक्त स्थानीय सन्दर्भ के लिए अनेक मेरु थे, जिनमें प्रायः २५ मेरु आज भी मूल नाम से वर्तमान हैं।
लंका का समय पृथ्वी का समय कहते थे, अतः यहां के शासक का नाम कुबेर था (कु = पृथ्वी, बेर = समय)। बाद में रावण ने इस पर अधिकार किया था। इसी अर्थ में उज्जैन के शिवलिङ्ग को भी महाकाल कहते हैं। प्राचीन काल में वहां से १-१ दण्ड (२४ मिनट = ६ अंश) की दूरी पर समय क्षेत्र थे। इन रेखाओं पर भी कई स्थानों का नाम लंका था, जैसे 
लंकावी (मलयेसिया के पश्चिम तट पर द्वीप) ६अं२१’उ, ९९अं४८’ पू
फू लंका-थाईलैण्ड, १९अं२७’५" उ, १००अं२५’३’
वट लंका-कम्बोडिया की राजधानी नोम्पेन्ह में मन्दिर ११अं३३’५७" उ, १०४अं५५’३६" पूर्व
लंकात (सुमात्रा, इण्डोनेसिया) ३अं४५’२"उ, ९८अं२८’१४" पू
लंकांफेन (आस्ट्रिया) ४७अं३३’७" उ, १२अं६’१४" पू
ब्रिटेन का लंकाशायर (स्टोनहेंज की प्राचीन वेधशाला) उज्जैन से ठीक १३ समय क्षेत्र पश्चिम है।
वाराणसी में भी प्राचीन वेधशाला का स्थान लंका है। उसके निकट सिगरा भी है, जो लंका में रावण के राजभवन का स्थान था।
३. शिव क्षेत्र-हिमालय की मेरु चोटी ३०अं ५२’५" उत्तर तथा ७९अं१’५६" पूर्व है। 
इसी देशान्तर रेखा पर ८ प्रसिद्ध शिव पीठ हैं-
(१) केदारनाथ-केदारनाथ मन्दिर-(३०.७३५२ उ, ७९.०६६९ पू.)
(२) कालेश्वरम्-कालेश्वर मुक्तीश्वर स्वामी मन्दिर (१८.८११०उ, ७९.९०६७ पू.)
(३) श्रीकालहस्ती-श्रीकालहस्ती मन्दिर (१३.७४९८०२ उ, ७९.६९८४१० पू.)
(४) काञ्चीपुरम्-एकाम्बरेश्वर मन्दिर (१२.८४७६०४ उ, ७९.६९९७९८ पू.)
(५) तिरुवनै कवल-जम्बूकेश्वर मन्दिर (१०.८५३३८३ उ. ७८.७०५४५५ पू.)
(६) तिरुवन्नामलै-अन्ना मलैयार मन्दिर (१२.२३१९४२ उ, ७९.०६७६९४)
(७) चिदम्बरम् -नटराज मन्दिर-(११.३९९५९६ उ, ७९.३१७४ पू.)
(८) रामेश्वरम्- रामनाथ स्वामी मन्दिर (९.२८८१, ७९.३१७४ पू.) 
अन्य भी कई शिव क्षेत्र हैं। इन ८ मुख्य शिव क्षेत्रों के एक देशान्तर रेखा पर स्थित होने का कोई कारण नहीं लिखा हुआ है। अनुमानित कारण-
(१) कैलास-शिव को ज्ञान स्वरूप तथा आदि गुरु कहा गया है। गायत्री मन्त्र का तृतीय पाद इसका द्योतक है-धियो यो नः प्रचोदयात्। मस्तिष्क में आज्ञा चक्र के ऊपर इड़ा-पिङ्गला- सुषुम्ना का मिलन स्थान त्रिकूट या कैलास है। इस पर शिव का निवास है। शिव पार्वती के परस्पर वार्त्तालाप से१८ प्रकार की विद्या उत्पन्न हुई। मालिनी विजयोत्तर तन्त्र में इसकी व्याख्या है। मस्तिष्क से वाम और दक्षिण भाग हैं। उनके ऊपर और नीचे२-२ भागहैं। ये ४ भाग शिव के ४ मुखों के स्थूल रूप हैं। मध्य का मुख अघोर है, जिसमें इनका लय होता है। अन्य ४ मुख हैं-ईशान, तत्पुरुष, वामदेव और सद्योजात। आधुनिक शरीर विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क के दोनों भागों में जितना अधिक सम्बन्ध रहता है, उतनी अधिक बुद्धि क्षमता होती है। इसका वर्णन शङ्कराचार्य ने किया है-
समुन्मीलत् संवित्-कमल मकरन्दैक रसिकं, भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, तदादत्ते दोषाद् गुणमखिल-मद्भ्यः पय इव॥ 
(शंकराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)
इन २ हंसों को वेद में २ सुपर्ण कहा है, जिनमें एक कर्म फल का भोग करता है, अन्य निर्लिप्त है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक्, १/१६४/२०, अथर्व, ९/९/२०)
भौतिक शरीर में इनको आत्मा तथा जीव कहा है, जो बाइबिल में आदम-ईव हो गया है।
भौगोलिक रूप में भारत का मस्तिष्क स्थान हिमालय का त्रिविष्टप् (तिब्बत) है। इसके ३ विष्टप् (या विटप = वृक्ष) हैं। वृक्ष का मूल भूमि से जल ग्रहण कर तना और शाखा होते हुए पत्तों तक पहुंचाता है। इसी प्रकार हिमालय क्षेत्र में जो जल बरसता है, वह कई धाराओं से बह कर ३ नदियों से सागर तक जाता है। पश्चिम भाग का जल सिन्धु नदसे होकर सिन्धु समुद्र (वर्तमान नाम अरब सागर) में मिल जाता है। सिन्धु तनया लक्ष्मी विष्णु पत्नी हैं, अतः यह विष्णु विटप हुआ। मध्य भाग का जल गङ्गा से मिल कर गङ्गासागर (वर्तमान नाम बंगाल की खाड़ी) तक जाता है। इस जल ग्रहण क्षेत्र को शिव की जटा कहा गया है। यह शिव विटप हुआ। पूर्व भाग ब्रह्म विटप है, जिसका जल ब्रह्मपुत्र होते हुए गङ्गा सागर में मिलता है। इस रूप में गङ्गा सागर ब्रह्मा का क-मण्डल ( क = जल) है। ब्रह्मपुत्र के पार की भूमि ब्रह्म देश है। तीनों विटप मिल कर त्रिविष्टप हुआ। इसका केन्द्र कैलास भारत रूपी मस्तिष्क का केन्द्र है, अतः यह शिवका स्थान है। अतः शिव के ८ क्षेत्र इसकी देशान्तर रेखा पर हैं। 
अग्नि रूप में शिव के ८ वसु हैं, वायु रूप में ११ रुद्र तथा तेज रूप में १२ आदित्य हैं। अतः कैलास देशान्तर रेखा पर ८ मुख्य शिव पीठ हैं।
(२) उज्जैन केन्द्र से पूर्व दिशा में ६ अंश पर यह प्रथम सीमा क्षेत्र है। २ पीठों के नाम भी ’काल’ हैं-कालेश्वरम्, कालहस्ती। ज्योतिष में काल के २ रूप हैं-नित्य और जन्य काल। 
लोकानामन्तकृत् कालः, कालोऽन्यः कलनात्मकः। 
स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्त्तश्चान्मूर्त्त उच्यते॥ (सूर्यसिद्धान्त १/१०) 
इस अर्थ में शिव को २ काल का स्वरूप कहा है-
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री, 
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः, 
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टभिरीशः॥१॥ 
(अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मंगलाचरण) 
इनका विस्तृत वर्णन अथर्व वेद के २ काल सूक्तों में है (अथर्व सूक्त, १९/५३-५४)।
कालहस्ती स्थूलरूप है जिसकी माप की जाती है। कालेश्वरम् नित्य काल है।
(३) मस्तिष्क से आरम्भ कर मेरुदण्ड में ८ चक्र हैं-सहस्रार, विन्दु, आज्ञा, विशुद्धि, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार। अतः मस्तिष्क कैलास से नीचे (दक्षिण) ८ शिव पीठ हैं। अन्य प्रकार से इसकी व्याख्य़ा है कि ये ५ महाभूत-आकाश, वायु, अग्नि, अप्, भूमि तत्त्व के प्रतीक हैं। अन्य ३ हैं-मन, बुद्धि, अहंकार। या अष्टधा प्रकृति रूप हैं।

Monday, 29 December 2025

एकलव्य का अंगूठा और शूद्र

पुरानी पोस्ट है : #एकलव्य_महाभारत को संदर्भित करके ऊंची नीची जाति तथा शोषण का प्रोपगंडा फैलाने वालों से अपेक्षा है कि वे मात्र कुछ सौ वर्ष पहले हमारे शिल्पकारों के अंगूठे काटे जाने के सत्य इतिहास से परिचित होंगे। 

1772 के #एकलव्यों का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ? 

आज एक उद्भट विद्वान की वाल पर गया, जो उच्च शिक्षा आयोग में निरन्तर कई वर्ष तक सदस्य रहे हैं। 
#शम्बूक_कथा पर अपने पद के अनुरूप ही अति गर्वीली पोस्ट लिखी थी। 

मैंने मात्र दो कमेंट लिखा और वे धराशायी हो गए। 
सत्य एक ही होता है। असत्य के अनेकों स्वरूप और कलेवर होते हैं। एक बार आप जोर से दहाड़िये तो। 
पेंट गीली होना निश्चित है। 

#मिथक के एक #एकलव्य के #अंगूठा काटने को लेकर भारत मे 3000 या 5000 वर्षो के अत्याचार का #रंडी_रोना मचाए वामियों और दलित चिंतको , मात्र 250 साल पहले सिल्क के कपड़े बनाने वाले भारतीयों ने #अपने_अंगूठे_खुद काट लिए। वे कहां गए क्या हुवा उनका? 10,000 साल की कथा तुम्हे पता है और 200 साल की कथा तुम्हे नही याद है।
तुम निम्न किस्म के केंचुए हो। स्वार्थ घृणा और कुंठा से भरे हुए जोंक हो तुम। 
क्योंकि तुमको देश का खून चूसने और झूंठ का ढिंढोरा पीटने में आनंद आने लगा है। 

ब्रिटिश दस्युवो ने तुमको नष्ट किया बर्बाद किया और तुमको एकलव्य और शम्बूक का झुनझुना थमा दिया:

 “18वी शताब्दी मे विश्व के अन्य देशों की तरह ही, भारत मे भी सड़क या नदी से होने वाले व्यापार पर ड्यूटी लगा करती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक सरकारी फरमान प्राप्त कर लिया था जिसके माध्यम से आयातित या निर्यात होने वाली वस्तुओं को टैक्स फ्री कर दिया था। अतः कंपनी द्वारा निर्यातित या आयातित किसी भी वस्तु पर टैक्स नहीं लगता था”।

(रिफ्रेन्स – रोमेश दुत्त इकनॉमिक हिसटरि ऑफ ब्रिटिश इंडिया, पेज -18)

"1757 मे मीर जफर को बंगाल का नवाब बनाया गया लेकिन मात्र 3 साल बाद 1760 मे उसके ऊपर असमर्थ बताकर मीर कासिम को नवाब बनाया , जिसने कंपनी को बर्धमान मिदनापुर और चित्तगोंग नामक तीन जिलों का रवेनुए तथा मीरजाफ़र पर द्वारा दक्षिण भारत मे हुये युद्ध मे कंपनी द्वारा खर्च किए गए, देय उधार धन 5 लाख रुपये कंपनी के खाते मे जमा करवाया"।
 ( रोमेश दुत्त – पेज -19 )

लेकिन उसके बाद सभ्य अंग्रेजों ने जो आम जनता के द्वारा निर्मित वस्तुओं की लूट मचाई, वो किसी भी सभ्य समाज द्वारा एक अकल्पनीय घटना है। उस दृश्य को आप बंगाल के नवाब द्वारा मई 1762 को ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे पत्र से समझा जा सकता है:
 “ हर जिले, हर परगना , और हर फ़ैक्ट्री मे वे ( कंपनी के गुमाश्ते ) नमक, सुपाड़ी, घी , चावल, धान का पुवाल ( सूखा डंठल, जरा सोचिए क्या क्या खरीद कर ये दरिद्र समुद्री डकैत खरीद कर यूरोप ले जाते थे ) बांस ,मछली ,gunnies अदरक चीनी तंबाकू अफीम और अन्य ढेर सारी वस्तुयेँ,जिनको लिख पान संभव नहीं है , को खरीदते बेंचेते रहते हैं । वे रैयत और व्यापारियों की वस्तुए ज़ोर जबर्दस्ती हिंसा और दमन करके ,उनके मूल्य के एक चौथाई मूल्य पर ले लेते हैं , पाँच रुपये की वस्तु एक रुपए मे लेकर भी वे रैयत पर अहसान करते हैं। 

 प्रत्येक जिले के ओफिसर अपने कर्तव्यो का पालन नहीं करते और उनके दमानात्मक रवैये और मेरा टैक्स न चुकाने के कारण मुझे प्रत्येक वर्ष 25 लाख रुपयों का नुकसान हो रहा है। मैं उनके द्वारा किए गए किसी समझौते का न उल्लंघन करता हूँ न भविष्य मे करूंगा , तो फिर क्यूँ अंग्रेज़ो के उच्च अधिकारी मेरा अपमान कर रहे हैं, और मेरा निरंतर नुकसान कर रहे हैं ”।
( रोमेश दुत्त पेज – 23 ) 

सभ्य बनाने आए इयसाइयों के नैतिक ऊंचाई को आप इस एक उद्धरण से ही माप सकते हैं।

यही बात ढाका का कलेक्टर महोम्मद अली ने कलकत्ता के अंग्रेज़ गवर्नर 26 मई 1762 मे लिखा “पहली बात तो ये है कि व्यापारी फ़ैक्टरी मे रुचि दिखा रहे हैं और अपने नावों पर अंग्रेजों का झण्डा लगाकर अपने को अंग्रेजो का समान होने का दिखावा करते हैं , जिससे कि उनको duty न देना पड़े। दूसरी बात ढाका और लकीपुर की फ़क्टरियाँ व्यापारियों को तंबाकू सूती कपड़े , लोहा और अनेक विविध वस्तुओं को बाज़ार से ज्यादा दामों मे खरीदने का प्रलोभन देते हैं, लेकिन बाद मे जबर्दस्ती वो पैसा उनसे छीन लेते हैं; जो व्यापारियों को पैसा एडवांस मे दिया था ।

लेकिन फिर उनके ऊपर एग्रीमंट तोड़ने का बहाना बनाकर उनके ऊपर फ़ाइन लगाते हैं । तीसरी बात लकीपुर फैक्ट्री के गुमाश्ते तहसीलदार से ताल्लूकदारों से उनके ताल्लूक ( कृषि योग्य जमीन ) को निजी प्रयोग के लिए जबरन कब्जा कर लेते हैं , और उसका भाड़ा भी नहीं देते। कुछ लोगों के कहने पर ,कोई शिकायत होने पर वे यूरोपेयन लोगों को एक सरकारी आदेश का परवाना लेकर गावों मे जाकर उपद्रव करते हैं। वे टोल स्टेशन बनाते हैं और जो भी किसी गरीब के घर समान मिलता है उसको बैंचकर पैसा बनाते हैं। इन उपद्रवों के कारण पूरा देश नष्ट हो गया है और रैयत न अपने घरों मे रह सकते हैं और न ही मालगुजारी चुका सकते हैं। मिस्टर चवालीर ने कई स्तर पर झूँटे बाजार और झूंठे फक्ट्रिया बनाया हैं, और अपनी तरफ से झूंठे सिपाही बनाए हैं जो जिसको चाहे उसको पकड़कर उनसे जबरन अर्थदण्ड वसूलते हैं । उनके इस जबर्दस्ती के अत्याचारों के कारण कई हाट बाजार और परगना नष्ट हो गए हैं। ” 
( रोमेश दुत्त पेज 24- 25 )

“इस तरह बंगाल के प्रत्येक महत्वपूर्ण जिले के व्यापार को कंपनी के नौकरों और अजेंटों ने नष्ट किया और इन वस्तुओं के निरमातों को निर्दयता के साथ अपना गुलाम बनाया । उसका वर्णन एक अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने आंखो देखी हाल खुद लिखा है :
“ अब इस बात को सत्यता के साथ बताया जा सकता है कि वर्तमान मे यह व्यापार जिस तरह इस देश मे हो रहा है , और जिस तरह कंपनी अपना इनवेस्टमेंट यूरोप मे कर रही है,वो एक दमनकारी प्रक्रिया है; जिसका अभिशाप इस देश का हर बुनकर और निर्माता भुगतने को मजबूर है, प्रत्येक उत्पाद को एकाधिकार मे बदला जा रहा है ; जिसमे अंग्रेज़ अपने बनियों और काले गुमाश्तों के मदद से, मनमाने तारीके से यह तय करते हैं कि कौन निर्माता किस वस्तु का कितनी मात्रा मे, और किस दर पर निर्मित करेगा ...गुमाश्ते औरंग या निर्माताओं के कस्बे मे पहुँचने के बाद वो एक दरबार लगाता है जिसको वह अपनी कचहरी कहता है। 

जिसमे वो अपने चपरासी और हरकारों की मदद से वो दलाल और पयकार और बुनकरों को बुलाता है, और अपने मालिक द्वारा दिये गए धन मे से कुछ पैसा उनको एडवांस मे देता है और उनसे एक एग्रीमंट पर दस्तखत करवाता है जिसके तहत एक विशेष प्रॉडक्ट , एक विशेष मात्रा मे, एक विशेष समय के अंदर डेलीवर करना है। उस मजबूर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती है। और ये गुमाश्ते, जो कंपनी के वेतनभोगी थे , प्रायः इस तरह के एग्रीमंट उनसे अपने मन मुताबिक करवाते रहते थे; और यदि बुनकरों ने ये एडवांस रकम स्वीकार करने से इंकार किया तो उनको बांधकर शारीरिक यातना दी जाती है.... कंपनी के गुमाश्तों के रजिस्टर मे बहुत से बुनकरों के नाम दर्ज रहते थे, जो किसी दूसरे के लिए काम नहीं कर सकते थे, और वे प्रायः एक गुलाम की तरह एक गुमाश्ते से दूसरे गुमाश्ते के हाथों तब्दील किए जाते रहते हैं, जिनके ऊपर दुष्टता और अत्याचार हर नए गुमाश्ते के हाँथो बढ़ता ही जाता है ... इस विभाग मे जो अत्याचार होता है वो अकल्पनीय है ; लेकिन इसका अंत इन बेचारे बुनकरों को धोखा देने मे ही होता है; क्योंकि गुमाश्तों और जांचकारो ( कपड़े की क्वालिटी जाँचने वाला ) द्वारा जो दाम उनके प्रोडक्टस का तय किया जाता था वो कम से कम बाजार के दाम से 15 से 40 % कम होता है ...।

बंगाल के बुनकरों के साथ, कंपनी के अजेंटों द्वारा जबर्दस्ती किए गए इन अग्रीमेंट्स को पूरा न करने की स्थिति मे, उनके खिलाफ मुचलका जारी किया जाता था , उसके तहत उनके सारे सामान (कच्चा और पक्का माल ) उस एग्रीमंट की भरपाई के लिए कब्जा कर लिया जाता है और उसी स्थान पर उनको बेंच दिया जाता है ; कच्चे सिल्क को कपड़ों मे बुनने वाले लोगों के, जिनको Nagoads कहते हैं, उनके साथ भी इसी तरह का अन्याय होता है, और ऐसी घटनाए आम बात हैं जिसमे उन्होने जबर्दस्ती #सिल्क के #कपड़े #बनाने की #मजबूरी से बचने के लिए स्वयं ही अपने #अंगूठे #काट लिए ।

( and the winders of raw silk , called Nagoads, have been known of their cutting off their thumbs to prevent their being forced to wind silk ) 
(Ref: Consideration on India affairs (London 1772), p 191 to 194 : from Romesh Dutt ; Economic History of British India , page 25-27 )

इस सच्चाई तक तुम्हारी पहुंच नही है धूर्त और मक्कारों?
इसीलिये पुस्तक का नाम लिखा है। गूगल आर्काइव से डाउनलोड करो और पढो।

बाबा साहेब जैसे पढ़े लिखे लोग ही नहीं, तिलक और दिनकर जैसे लोग भी उस अफवाहबाजी का शिकार हुए जिसको इंडोलॉजी नामक #फेक_साइंस के नाम से उनको विश्वविद्यालय में पढ़ाया गया। 

कोई लुटेरा तुमको निम्न प्रमाणित करके ही तो अपने को श्रेष्ठ प्रमाणित कर सकेगा? 
उन्होंने तुम्हें उल्लू बनाया शिक्षा के माध्यम से।
और तुम उल्लू बनने को तैयार बैठे थे।
बने।

Saturday, 27 December 2025

जम्बू द्वीप भारतवर्ष

हिन्दू धर्म : जम्बू द्वीप में कहां था सुमेरू पर्वत?

जम्बू द्वीप के आसपास 6 द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। जम्बू द्वीप धरती के मध्य में स्थित है और इसके मध्य में इलावृत नामक देश है। आज के कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया और चीन के मध्य के स्थान को इलावृत कहते हैं। इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत।

इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस), उत्तर में रम्यकवर्ष (रूस), हिरण्यमयवर्ष (रूस) और उत्तकुरुवर्ष (रूस) नामक देश हैं।

मिस्र, सऊदी अरब, ईरान, इराक, इसराइल, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन, बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का संपूर्ण क्षेत्र जम्बू द्वीप था।

अगले पन्ने पर सुमेरू पर्वत का रोचक वर्णन...

इलावृत देश के मध्य में स्थित सुमेरू पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ, दक्षिण की ओर गंधमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नंदन कानन नामक वन हैं, जहां अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस (मानसरोवर)- ये चार सरोवर हैं। माना जाता है कि नंदन कानन का क्षेत्र ही इंद्र का लोक था जिसे देवलोक भी कहा जाता है। महाभारत में इंद्र के नंदन कानन में रहने का उल्लेख मिलता है।

सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देश में स्थित हैं।

इस सुमेरू पर्वत को प्रमुख रूप से बहुत दूर तक फैले 4 पर्वतों ने घेर रखा है। 1. पूर्व में मंदराचल, 2. दक्षिण में गंधमादन, 3. पश्चिम में विपुल और 4. उत्तर में सुपार्श्व। इन पर्वतों की सीमा इलावृत के बाहर तक है।

सुमेरू के पूर्व में शीताम्भ, कुमुद, कुररी, माल्यवान, वैवंक नाम से आदि पर्वत हैं। सुमेरू के दक्षिण में त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि पर्वत हैं। सुमेरू के उत्तर में शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग और कालंज आदि पर्वत हैं।
अगले पन्ने पर, अन्य पर्वत और गंगा नदी के स्वर्ग से उतरना...

अन्य पर्वत : माल्यवान तथा गंधमादन पर्वत उत्तर तथा दक्षिण की ओर नीलांचल तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। उन दोनों के बीच कर्णिकाकार मेरू पर्वत स्थित है। मर्यादा पर्वतों के बाहरी भाग में भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष नामक देश सुमेरू के पत्तों के समान हैं। जठर और देवकूट दोनों मर्यादा पर्वत हैं, जो उत्तर और दक्षिण की ओर नील तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। पूर्व तथा पश्चिम की ओर गंधमादन तथा कैलाश पर्वत फैला है। इसी समान सुमेरू के पश्चिम में भी निषध और पारियात्र- दो मर्यादा पर्वत स्थित हैं। उत्तर की ओर निश्रृंग और जारुधि नामक वर्ष पर्वत हैं। ये दोनों पश्चिम तथा पूर्व की ओर समुद्र के गर्भ में स्थित हैं।

गंगा की नदियां : माना जाता है कि सुमेरू के ऊपर अंतरिक्ष में ब्रह्माजी का लोक है जिसके आस-पास इंद्रादि लोकपालों की 8 नगरियां बसी हैं। गंगा नदी चंद्रमंडल को चारों ओर से आप्लावित करती हुई ब्रह्मलोक (शायद हिमवान पर्वत) में गिरती है और सीता, अलकनंदा, चक्षु और भद्रा नाम से 4 भागों में विभाजित हो जाती है।

सीता पूर्व की ओर आकाश मार्ग से एक पर्वत से दूसरे पर्वत होती हुई अंत में पूर्व स्थित भद्राश्ववर्ष (चीन की ओर) को पार करके समुद्र में मिल जाती है। अलकनंदा दक्षिण दिशा से भारतवर्ष में आती है और 7 भागों में विभक्त होकर समुद्र में मिल जाती है। चक्षु पश्चिम दिशा के समस्त पर्वतों को पार करती हुई केतुमाल नामक वर्ष में बहते हुए सागर में मिल जाती है। भद्रा उत्तर के पर्वतों को पार करते हुए उतरकुरुवर्ष (रूस) होते हुए उत्तरी सागर में जा मिलती है।

पृथ्वी के मध्य में जम्बू द्वीप है। इसका विस्तार एक लाख योजन का बतलाया गया है। जम्बू द्वीप की आकृति सूर्यमंडल के सामान है। वह उतने ही बड़े खारे पानी के समुद्र से घिरा है। जम्बू द्वीप और क्षार समुद्र के बाद शाक द्वीप है, जिसका विस्तार जम्बू द्वीप से दोगुना है। वह अपने ही बराबर प्रमाण वाले क्षीर समुद्र से, उसके बाद उससे दोगुना बड़ा पुष्कर द्वीप है, जो दैत्यों को मदोन्मत्त कर देने वाले उतने ही बड़े सुरा समान समुद्र से घिरा हुआ है। उससे परे कुश द्वीप की स्थिति मानी गई है, जो अपने से पहले द्वीप की अपेक्षा दोगुना विस्तार वाला है। कुश द्वीप को उतने ही बड़े विस्तार वाले दही समान के समुद्र ने घेर रखा है। उसके बाद क्रोंच नामक द्वीप है; जिसका विस्तार कुश द्वीप से दोगुना है, यह अपने ही सामान विस्तार वाले घी समान समुद्र से घिरा है। इसके बाद दोगुना विस्तार वाला शाल्मलि द्वीप है; जो इतने ही बड़े ईख रस समान समुद्र से घिरा हुआ है। उसके बाद उससे दोगुने विस्तार वाले गोमेद (प्लक्ष) नामक द्वीप है; जिसे उतने ही बड़े रमणीय स्वादिष्ट जल के समुद्र ने घेर रखा है।

जम्बू द्वीप के मध्यभाग में मेरु पर्वत है, यह ऊपर से नीचे तक एक लाख योजन ऊंचा है। सोलह हजार योजन तो यह पृथ्वी के नीचे तक गया हुआ है और चौरासी हजार योजन पृथ्वी से ऊपर उसकी ऊंचाई है। मेरु के शिखर का विस्तार बत्तीस हजार योजन है। उसकी आकृति प्याले के सामान है। वह पर्वत तीन शिखरों से युक्त है, उसके मध्य शिखर पर ब्रह्माजी का निवास है, ईशान कोण में जो शिखर है, उस पर शंकरजी का स्थान है तथा नैऋत्य कोण के शिखर पर भगवान विष्णु की स्तिथि है।

मेरु पर्वत के चारों ओर चार विष्कम्भ पर्वत माने गए हैं। पूर्व में मंदराचल, दक्षिण में गंधमादन, पश्चिम में सुपार्श्व तथा उत्तर में कुमुद नामक पर्वत है। इनके चार वन हैं जो पर्वतों के शिखर पर ही स्थित हैं। पूर्व में नंदन वन, दक्षिण में चैत्र रथ वन, पश्चिम में वैभ्राज वन और उत्तर में सर्वतोभद्र वन है। इन्हीं चरों में चार सरोवर भी हैं। पूर्व में अरुणोद सरोवर, दक्षिण में मान सरोवर, पश्चिम में शीतोद सरोवर तथा उत्तर में महाह्रद सरोवर है। ये विष्कम्भ पर्वत पच्चीस पच्चीस हजार योजन ऊचे हैं। इनकी चोड़ाई भी हजार हजार योजन मानी गई है। मेरुगिरी के दक्षिण में निषध, हेमकूट और हिमवान- ये तीन मर्यादा पर्वत हैं। इनकी लम्बाई एक लाख योजन और चौड़ाई दो हजार योजन मानी गई है। मेरु के उत्तर में भी तीन मर्यादा पर्वत हैं- नील, श्वेत और श्रंग्वान। मेरु से पूर्व माल्यवान पर्वत है और मेरु के पश्चिम में गंधमादन पर्वत है। ये सभी पर्वत जम्बू द्वीप पर चारों ओर फैले हुए हैं। गंधमादन पर्वत पर जो जम्बू का वृक्ष है, उसके फल बड़े बड़े हाथियों के समान होते हैं। उस जम्बू के ही नाम पर इस द्वीप को जम्बू द्वीप कहते हैं।

पूर्व काल में स्वायम्भुव नाम से प्रसिद्ध एक मनु हुए हैं; वे ही आदि मनु और प्रजापति कहे गए हैं। उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद। राजा उत्तानपाद के पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुव हुए, जिन्होंने भक्ति भाव से भगवान् विष्णु की आराधना करके अविनाशी पद को प्राप्त किया। राजर्षि प्रियव्रत के दस पुत्र हुए, जिनमें से तीन तो संन्यास ग्रहण करके घर से निकल गए और परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो गए। शेष सात द्वीपों में उन्होंने अपने सात पुत्रों को प्रतिष्ठित किया। राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीघ्र जम्बू द्वीप के अधिपति हुए। उनके नौ पुत्र जम्बू द्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं, जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, केतुमालवर्ष, कुरुवर्ष, हिरण्यमयवर्ष, रम्यकवर्ष, हरीवर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भू-भाग को नाभि खंड (भारतवर्ष) कहते हैं।

नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए हैं। नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से ‘भरत’ का जन्म हुआ; जिनके आधार पर इस देश को भारतवर्ष भी कहते हैं।

संदर्भ : हिन्दू ग्रंथ विष्णु पुराण, जैन ग्रंथ 'जंबूद्वीप्प्रज्ञप्ति

बाइबल ईसाई

ईसाईयत की नींव ही कामवासना (s€x) पर है।👇

1-यहोवा परमेश्वर औरतों को नंगा करता था । ( Yashashah3/16-17 )

2-हजरत लूत ने शराब पीकर अपनी दो बेटियों को ही गर्भवति बनाया । ( Genesis 19/33-28 )

3- यहूदा ने अपने बेटे की बहू से व्यभिचार किया । ( 38/12-20 )

4-हजरत अविराहम ने अपनी बहन से व्याभिचार किया और झूठ- मूठ की शादी की । ( Genesis 12/11-13)

5याकूब ने अपनी दासियों के साथ व्यभिचार किया और उसकी बहन दीन ने हमूर के बेटे सिकम के साथ व्यभिचार किया । ( Genesis 34/24-30 )

6-बाप अपनी बेटी के साथ व्यभिचार और शादी कर सकता है । ( Carenthio 36-37-38 )

7-दाऊद के बेटे आमनून ने अपनी सगी बहन तामार के साथ जबरदस्ति मूँह काला किया । ( Semuel 2/13/1-20 )

8- इसराइल में रुबेन ने अपने पिता की बीवी के साथ व्यभिचार किया । और मूसा ने फौज को क्वांरी अछूती कन्याओं से खुले व्यभिचार की आज्ञा दी । ( Ginti Book 31/14-18 )

9-इन्सान को मनुष्य के मल पर रोटी पका कर खाने की आज्ञा है । ( जेहकेल पर्व 4 )

अभी कोई कहेगा बाइबिल एक धार्मिक पुस्तक है?
भाई साहब इन सभी कार्यो को घर व समाज में ना दोहराऐं , हानिकारक हो सकता है लात घुसे ईंटे पत्थर डंडे आदि पड़ेंगे और जेल होगी----
ऐसे नीच चरित्रहीन लोग चंगाई सभाओं के द्वारा भोले भाले लोगों को सभ्यता का पाठ पढ़ाते हैं । और ईसाईयत की श्रेष्ठता का दावा करते हैं और हमारे भी कुछ मूर्ख हिन्दू चर्च जाकर ऐसी सभ्यता का पाठ पढ़ने जाते हैं क्या?

Thursday, 25 December 2025

शूद्र मंदिर और अंबेडकर

यह उस #दस्तावेज के कुछ पन्ने है - #रेगुलशन_1804 या 1806, जिसका उद्धरण प्रस्तुत करके अंबडेकर जी ने 1930 में अपने मालिकान नग्रेजो को बताया कि पूरी के मंदिर में 17 जातियों को नही घुसने दिया जाता था। 
लेकिन यह नही बताया कि कौन नही घुसने दे रहा था।
और क्यों नही घुसने दे रहा था।
लोथियन समिति की रिपोर्ट पढिये।
इस रेगुलशन को बनाया गया था हिन्दुओ से पूरी मन्दिर में दर्शन करने के लिए टैक्स वसूलने के लिए।
जो जितना टैक्स देने की आर्थिक क्षमता रखता था उसको उस श्रेणी की सुविधा लेने की अनुमति देते थे वे।
2 रुपये से लेकर 10 रुपये टैक्स वसूली होती थी। 
जो टैक्स नही दे सकता था, उसे घुसने नही देते थे वे। पुजारी नही, अंग्रेज दस्यु, जिनको दलित छींटक अपना बाप समझते हैं। 

यह रेगुलशन #Temple_Endowment_act नामक उस कानून की पृष्ठभूमि बनाती है जिसे नग्रेजो ने बनाया।
 और स्वत्नत्रता के बाद नेहरू ने उसे जारी रखा, और आज भी वह जारी है - मंदिर की सम्पत्तिओं और उस पर चढ़ावे पर सरकारी कब्जा।

 लेकिन मस्जिद और चर्च के लिए ऐसा कोई कानून न उन्होंने बनाया, न इन्होंने। 

आज भी मंदिरों पर सरकार का कब्जा है।
क्यों है?
क्योंकि आपने कभी सवाल नही उठाया।
सवाल उठाइये।
क्योंकि सरकार का चरित्र एक ही जैसा होता है।
सरकार चलाते हैं बाबू।
नेता जब तक उनको बम्बू न करे वह कोई कानून बदलने नहीं देंगे।

इस पोस्ट से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाना चाहता हूँ।

"कोई बता सकता है कि 10 रुपये का जो मूल्य 1804 में था, उसका आज कितना मूल्य होगा?
1807 में francis hamilton buchnan लिखता है कि एक रुपये का मूल्य दो पौण्ड था।
1901 में दादा भाई नौरोजी लिखते है कि एक रुपये का मूल्य सोने के एक सिक्के के बराबर था। 

उस समय दर्शनार्थियों से 2 रुपये से 10 रुपए के बीच टैक्स वसूला जाता था।

1804 जनवरी से अप्रैल के बीच 46,000 दर्शनार्थी गए थे जिनमें से लगभग 20,000 लोगों से टैक्स वसूला गया था।

यह दर्शनार्थी कोई राजा महाराजा नहीं थे, हर कुम्भ में आने वाले दर्शनार्थियों जैसे ही थे।
लेकिन 1800 तक भारत विश्व की 20%, जीडीपी का निर्माता था।
1900 आते आते मात्र 2% जीडीपी का निर्माता बचा।
लाखो अछूत 1900 के आस पास पैदा हुए।"

इस पोस्ट के अनेक विंदु हैं।
आप जिन पर भी प्रकाश डाल सकते हैं, डालिये। 
यह papers related to east india affairs से उद्धरित है

Wednesday, 24 December 2025

बंदा बैरागी बंदा बहादुर और सिख

कितने लोग "गमानी कावा" शब्द जानते है

" गोविदराय जी , बिन #पेशवाई आप पंजाब में मुगलों के खिलाफ 1 वर्ष भी नही टिक पाएंगे "...

गुरु गोविद सिंह का मराठा देश में स्वागत करते हुए पिंगले सरदार ने कहा... " गुरुजी , हम मराठों ने भगवान परशुराम को अपना आराध्य माना है , तो उन्ही के बताए नियमों से लड़ते भी हैं "...

सिखों के गुरु गोविंद सिंह अचंभित थे !! 

वे तो विष्णु के सबसे विध्वंसक अवतार भगवान परशुराम को लगभग भूल ही गए थे... उनको ध्यान ही नही रहा,लेकिन जब मराठो की मुगलों के खिलाफ विजय देखते है , तब उनसे रहा नही गया.....

उन्होंने पूंछ ही लिया "यह #पेशवे_पद्धति है क्या ? "

सरदार मोरोपंत पिंगले ने कहा " गुरुजी यह प्राचीन ब्राहमण - क्षत्रिय पद्धति पर आधारित परशुराम विधित्व सर्वसम्मत सह्याद्रि खण्ड में वर्णित हिन्दुओ की सबसे तेज युद्ध नीति है जिसे हम लोग... गमानी कावा #GAMANI_KAWA कहते है "....
              " इसका मतलब है , दुश्मन से वहां लडो , जहां आप हो ही नही... हमारा राजा यहां सतारा में बैठता है । उसकी जगह युद्ध उसका पेशवा लड़ता है । नीति निर्धारण कही और पेशवा की मार कही और होती है...."
          " ब्राहमण होने के नाते उसका हर सूबे में यजमानी और रिश्तेदारी है... उनकी सफलता तेज है और जरूरत पड़ने में रिज़र्व रूप में व्यूह-रचना बढ़ता है । वो सब पेशवा के अधीनस्थ लड़ते है लेकिन राजा जिंदा रहता है और ताकतवर होता जाता है... "

यही 4th generation warfare है । 

गुरुवर को बात समझ मे आ जाती है । वह बंदा मोहियाली को अपना पेशवा नियुक्त करते है और उत्तर की ओर भेजते है ! लेकिन सिख इस पद्धति को चला ही नही पाते और अपने गुरु के नियुक्त अंतिम योद्धा श्रीमन्त बंदाबहादुर (हिंदू -ब्राह्मण) के खिलाफ ही विद्रोह कर देते है... 

सिख दो खेमे में बंट जाते है - बेबेसिख (खालसे) और बंदाई सिख (श्रीमंत बंदा बहादुर के लोग)... बाद में यही खालसे श्रीमंत बंदा बहादुर को पकड़वा देते है और मुगल... बन्दाबहादुर की बहुत क्रूरतम हत्या कर देते हैं..

बंदा बहादुर के लोगो को पहचानने 5 नियामक थे ,जिसका खालसे (बेबे-सिख) विरोध करते थे...

(१) चरणामृत पीना 
(२) जनेऊ पहनना 
(३) सफेद कपड़े पहनना ( काले एवम हरे से परहेज )
(४) धोती का गुटनो के नीचे तक जाना 
(५) जयघोष - जय दर्शन की... जय गुरु की...

यह बंदाबहादुर का हस्तलिखित निर्देश है जिसे " बन्दा फरमान " कहते है । 

Monday, 22 December 2025

rahim रहीम

आज 17 दिसंबर ब्रज के कवि, अकबर के नवरत्नों में से एक, बैरम खाँ के लाड़ले, हम मेवातियों के नंवासे और एक कुशल सेनापति, प्रशासक तथा अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध अब्दुर्रहीम ख़ानख़ानाँ का जन्मदिन है l उसी रहीम का जिसका जीवन शायद मुग़लकाल का सबसे जटिल, चुनौती भरा और उतार-चढ़ाव वाला रहा है l रहीम ने कई भाषाओं जैसे फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, ब्रज में निपुणता हासिल की हुई थी l जहाँगीर के शासनकाल में उन्हें आर्थिक संकटों और कैद का सामना करना पड़ा l 1627 में दिल्ली में उनका निधन हो गया और उन्हें पत्नी माहबानू के मकबरे के पास दफनाया गया, जिसका निर्माण उन्होंने स्वयं करवाया था l 
         रहीम के जन्मदिन के अवसर पर तुलसी और उनकी मित्रता को लेकर प्रस्तुत है उपन्यास 'ख़ानज़ादा' का एक अंश - 

OO
उम्र सिर्फ़ बीस बरस और ओहदा पहले गुजरात का सूबेदार और फिर मिर अर्ज़ l इतना ही नहीं बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक रत्न का ख़िताब भी हासिल हो गया l अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ का ज़्यादातर वक़्त अब दरबार की सियासत में बीतने लगा l घर आने के बाद शाम से लेकर इशा की नमाज़ तक का समय रहीम का माहबानू के आलिंगन में बीतता l बीच-बीच में वह हिंदी का ज्ञान अपनी माँ से, कुछ अपने शौक़ से और बाकी अरबी, फ़ारसी और तुर्की की तालीम अंदीजान के मौलवी मुल्ला मुहम्मद अमीन से हासिल करता रहता l इस सबके बीच जो समय मिलता उसमें वह नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै रच लेता l रहीम जब ये नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै दरबार में सुनाता, तब इन्हें सुन पूरा दरबार उसकी विदग्धता पर भौचक्क रह जाता l रहीम की यह प्रतिभा दरबार में टोडरमल, बीरबल और गंग जैसे कवियों के अलावा अनेक संस्कृत विद्वानों के साथ रह कर और निखरने लगी l इनकी संगत में रह कर हिंदू धर्म-शास्त्रों का ज़्यादा और गहन अध्ययन करने लगा l
  गुजरात में अब्दुर्रहीम जो अमन-चैन स्थापित कर आया था, अचानक एक दिन बादशाह अकबर के पास एक बेचैन करने वाली ख़बर आई l बादशाह ने गुजरात के सूबेदार और मीर अर्ज़ अर्थात अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ को एक बार फिर बुलाया l
 “बादशाह सलामत, आपने याद फरमाया ?” रहीम ने कोर्निश करते हुए पूछा l
 “हाँ मिर्ज़ा खाँ, मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा ने हमसे गुजरात फिर छीन लिया है l मैं चाहता हूँ कि आप फिर से गुजरात जाएँ और इस पाजी को सलीक़े से सबक़ सिखा कर आएँ l” 
 “जैसा आपका हुक्म बादशाह सलामत l”
 “इस काम को जितना ज़ल्दी अंजाम दिया जाए, उतना बेहतर होगा l”
 अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ तुरंत गुजरात के लिए रवाना हो गया और शीघ्र हि मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा की कमर तोड़ कर लौट आया l इससे ख़ुश होकर अगले दिन बादशाह अकबर ने उसे न केवल ख़िलअत देकर सम्मानित किया, बल्कि रहीम के वालिद मरहूम बैरम खाँ की तरह उसे भी ख़ानेख़ानाँ जैसे सबसे बड़े शाही ख़िताब से नवाज़ा गया l 
 रहीम एक बार फिर अपने दोहे, बरवै और सोरठा रचने में रम गया l
 एक बार शायर नज़ीरी निशापूरी ने अब्दुर्रहीम से कहा,”ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 शायर नज़ीरी निशापूरी की बात सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ घर चला आया l घर आने के बाद भी उसे शायर नज़ीरी की यह बात परेशान करती रही l परेशान बेटे को देख शाम को माँ सलीमा बेगम उसके पास आई और सर पर हाथ फेरते हुए पूछा,”लगता है मेरा बेटा आज परेशान है ?”
 “अम्मी जान, ऐसा कुछ नहीं है l” रहीम ने माँ को टालना चाहा l
 “कुछ तो है l नहीं बताएगा तो किसी मुश्किल का ऐसे कैसे हल निकलेगा ?” 
 रहीम ने सोचा कि माँ को बता देना चाहिए वरना उसके चक्कर में वह भी परेशान रहेगी l वैसे भी उसकी ज़्यादातर मुश्किलों का हल यही तो बताती है l
 “अम्मी जान, पता है आज शायर नज़ीरी निशापूरी साहब क्या बोले l”
 “क्या बोले ?” माँ ने बेटे के बालों में अपनी नाज़ुक अँगुलियाँ फेरते हुए पूछा l
 “बोले कि ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l अम्मी जान, जब से नज़ीरी साहब ने यह कहा है, मैं तब से यह सोच-सोच कर बेचैन हूँ कि यहाँ मेरे पास बेशुमार दौलत है, और एक शायर नज़ीरी निशापूरी साहब जैसे लोग हैं, जिन्होंने कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 “बेटा, शायर-कवियों के पास कभी धन-दौलत जुड़ती देखी है ? इनका दौलत से क्या लेना-देना l ये तो फ़क़ीर होते हैं l इस दुनिया में नज़ीरी साहब जैसे न जाने कितने लोग हैं l ऐसे ही लोगों के बारे में हमारे मेवात में कहा गया है कि-
 बिरह बाण और बिरहड़ा, इन्ने मत सीखियो कोए l
 इनका सीखणहार को, झुर-झुर पिंजर होए ll”
 
“आप सही कहती हैं अम्मी जान, शायरी-कवित्त करने वाले पिंजर हो जाते हैं l”
“वैसे रहीम, आपके लिए यह कौन-सी बड़ी बात है l”
 माँ के इतना कहते ही रहीम की सारी बेचैनी और परेशानी जैसे चुटकी बजाते काफ़ूर हो गई l उसने माँ का हाथ यह कहते हुए चूम लिया,”अम्मी जान, आपने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल दूर कर दी l”
 अगले रोज़ सुबह अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने शायर नज़ीरी निशापूरी को बुलवाया, और उसके सामने अशर्फ़ियों का ढेर लगा दिया l 
अपने सामने लगे अशर्फ़ियों के ढेर को देख शायर नज़ीरी निशापूरी बोला,”ख़ुदा का शुक्रिया ख़ानेख़ानाँ साहब, जो उसने इस नाचीज़ को एक लाख अशर्फ़ियों के दीदार करा दिए l”
“सिर्फ़ अशर्फ़ियों के दीदार के लिए ख़ुदा का क्या शुक्र अदा करना नज़ीरी साहब l”
“हम जैसों के लिए तो एक लाख अशर्फ़ियों को देखना ही किसी सपने का पूरा होने जैसी बात है l” अशर्फ़ियों को देखने के बाद शायर नज़ीरी निशापूरी अपनी जगह से उठा, और यह कह कर जाने लगा,” ख़ानेख़ानाँ साहब, आपका बहुत शुक्रिया l आपकी वजह से आज मेरा एक बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया l ख़ुदा हाफ़िज़ l”
शायर नज़ीरी निशापूरी ने जिस नादीदेपन के साथ सपना पूरा होने की बात कही, अब्दुर्रहीम सोचने लगा कि जिस आदमी की ज़िंदगी का सपना सिर्फ़ एक लाख अशर्फ़ियों को देखने का रहा हो, अगर उसे ये मिल जाएँ तब इनसे उसके कितने सपने पूरे होंगे, उसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता l
“अगर ऐसा है नज़ीरी साहब तो एक बार इन्हें छू कर भी देख लो l कहीं ऐसा ना हो कि बाद में आप कहें कि मैंने ज़िंदगी में कभी सोने की अशर्फ़ियों को छू कर नहीं देखा l” 
 शायर नज़ीरी निशापूरी को लगा कि अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ बात तो ठीक कह रहा है l वह वापिस लौटा और अशर्फ़ियों के ढेर में उसने दोनों हाथों की अँगुलियों को ऐसे डाला, जैसे अनाज की ढेरी में किसान हाथ डाल कर उसके दानों को परखता है l जिस वक़्त शायर नज़ीरी निशापूरी की अँगुलियाँ सोने की अशर्फ़ियों की देह का स्पर्श कर रही थीं, अब्दुर्रहीम ने ध्यान दिया शायर नज़ीरी की अँगुलियों में एक ख़ास तरह की जुम्बिश हो रही थी l शायर नज़ीरी निशापूरी ने एक बार फिर अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ का शुक्रिया अदा किया, और वापिस जाने के लिए मुड़ा ही था कि पीछे से अब्दुर्रहीम ने उसे टोका l
 “नज़ीरी साहब, कहाँ चल दिए ?
 शायर नज़ीरी निशापूरी जाते-जाते रुक गया और मुस्कराते हुए बोला,”मिर्ज़ा खाँ, अपनी एक अधूरी ग़ज़ल का शे’र याद आ गया l कई दिनों से उसे पूरी करने की सोच रहा था, मगर पूरी नहीं हो रही थी l आज आपके पास आया तो एक बहुत उम्दा शे’र बन पड़ा है l”
 “वो तो ठीक है मगर इन अशआर को भी तो उठाइए !” अब्दुर्रहीम ने अपने सामने पड़े अशर्फ़ियों के ढेर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा l 
नज़ीरी निशापूरी ने अशरफियों को बोरे में भरा और यह सोच कर उठा लिया कि शायद अब्दुर्रहीम यह जतलाना चाहता है, कि वह सिर्फ़ इन्हें देख और छूए भर नहीं, उठा कर यह भी महसूस करे कि एक लाख अशर्फ़ियों में कितना वज़न होता है l
“नज़ीरी साहब, ख़ुदा का शुक्र अदा करना तब ठीक रहेगा, जब आप इन्हें साथ ले जाएँगे !”   
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, साथ ले जाएँगे ! क्या मतलब है आपका ?” शायर नज़ीरी निशापूरी के जैसे हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगे l
 “आज से बल्कि इसी वक़्त से इन पर अब आपका हक़ है नज़ीरी साहब l अब इनके मालिक आप हैं l” अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने मुस्कराते हुए कहा l
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की इस उदारता की चारों तरफ़ चर्चा होने लगी l कुछ रोज़ पहले उसने मुल्ला शिकेवी को उसके फ़ारसी के एक शे’र पर एक हज़ार अशर्फ़ियाँ भेंट कर दी, तो अरबी कवि रफ़ीउद्दीन हैदर को एक लाख रुपए दे दिए l आए दिन रहीम से अरबी, फ़ारसी शायर ही नहीं अन्य कवि भी ईनाम में भेंट ले जाने लगे l उस दिन इबादतख़ाने में लगने वाली मजलिस में अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने कवि गंग को एक छंद, जो छप्पय था, उससे प्रसन्न होकर जब गंग को ईनाम के रूप में छत्तीस लाख रुपए दिए l  
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की दानप्रियता के इन क़िस्सों ने जैसे किंवदंतियों का रूप ले लिया l घर-घर में रहीम के चर्चे होने लगे l माँ सलीमा जब-जब बेटे के इन क़िस्सों को सुनती, तब-तब उसका सीना गर्व से चौड़ा होता चला जाता l जबकि बीवी माहबानू वह तो मारे ख़ुशी के जैसे बौरा जाती l धन्य हो उठती ऐसे दानवीर पति को पाकर l अपनी सूबेदारी और जागीरों से मिले राजस्व को वह कवि और शायरों में दोनों हाथों से बाँटने लगा l
 और इस घटना ने तो मानो पूरे रहीम का ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान का में मस्तक ऊँचा कर दिया l 
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, एक ग़रीब बेवा आपसे मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है l” एक सिपाही ने आकर रहीम को आकर बताया l
 “हमसे एक बेवा मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है ?” रहीम ने आश्चर्य से पूछा l
 “जी l कह रही है कि उसे गोस्वामीजी ने भेजा है l”
 “क्याsss ! गोस्वामी तुलसीदास जी ने भेजा है ? उन्हें इसी वक़्त बाइज़्ज़त लाया जाए !”
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ के हुक्म के बाद वह निर्धन विधवा हाज़िर हो गई l उसके आने पर रहीम ने पहले उसे ऊपर से नीचे तक देखा l उसके कपड़ों को देख रहीम समझ गया कि विधवा होने के साथ-साथ सचमुच यह काफ़ी ग़रीब भी है l आते ही विधवा ने काग़ज़ का एक छोटा-सा पुर्ज़ा रहीम की तरफ़ यह कहते हुए बढ़ा दिया,”गोस्वामीजी ने कहा है कि मैं इसे आपको ले जाकर दे दूँ l”
 रहीम ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा भेजे गए काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े को खोला और उसे पढ़ने लगा l पास में बैठे दूसरे कवियों और शायरों ने ध्यान दिया कि इस टुकड़े को पढ़ते हुए उसके आँखों के कोर भीग आए हैं l देर तक रहीम की नज़र काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े पर टिकी रही l काफ़ी देर बाद रहीम ने धीरे-से नज़र उठाई l
“विवाह में कितना ख़र्चा आ जाएगा ?” रहीम ने निर्धन विधवा की तरफ़ देखते हुए पूछा l
“अन्नदाता, कैसे बताऊँ l कन्या का विवाह है l जितना आपको उचित लगे दे दीजिए l” विधवा ने हाथ जोड़ते हुए बड़ी विनम्रता से कहा l
रहीम ने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा l काग़ज़ के उसी टुकड़े पर उसने कुछ लिखा और यह कहते हुए उसे वापस निर्धन विधवा को दे दिया,”इसे गोस्वामीजी को जाकर दे देना !” फिर सामने बैठे ख़ज़ानची की तरफ़ उसने नज़र उठा कर देखा और उससे बोला,”इनसे जितनी अशर्फ़ियाँ ले जाई जाएँ, इनकी झोली में भर देना !” 
निर्धन विधवा रहीम को दुआएँ देती हुई चली गई l
उसके जाने के बाद रहीम ने पहले अपने साथ बैठे तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन, शेख़ फ़ैज़ी, शायर नज़ीरी निशापूरी, मुल्ला दो प्याजा, फ़क़ीर अज़ुद्दीन, गंग सहित बैठे दूसरे कवि-शायरों की तरफ़ देखा l फिर सबको सुनाते हुए कवि गंग से बोला,”गंग साहब, आप सब सोच रहे होंगे कि यह बेवा कौन थी...इसने गोस्वामीजी का जो काग़ज़ का छोटा-सा पुर्ज़ा दिया, उस पर क्या लिखा था ?”
“आप सही कह रहे हैं ख़ानेख़ानाँ साहब कि तुलसीदासजी ने ऐसा क्या लिख दिया, जिसे पढ़ने के बाद आपने इस निर्धन बेवा की झोली अशर्फ़ियों से भर दी ?”
“गंग साहब, इस बेवा की पुत्री का विवाह है लेकिन इसके पास इतना धन नहीं है कि वह उसके हाथ पीले कर दे l मदद के लिए यह गोस्वामीजी के पास गई होगी और अपनी परेशानी के बारे में बताया होगा l उस गोस्वामीजी के पास जिसके पास सिवाय रामरतन के कुछ नहीं है l वे ठहरे निरे वैरागी l धन से उनका क्या वास्ता l समझ में नहीं आया कि यह क्या उम्मीद लेकर उनके पास गई l उन्होंने इस पंक्ति के साथ इसे मेरे पास भेज दिया कि – सुरतिय नरतिय नागतिय, अस चाहत सब होय l”
“ख़ानेख़ानाँ साहब, तुलसीदासजी ने कहा तो एकदम सही है कि धन-संपत्ति और आभूषण सभी नारियों को अच्छे लगते हैं l इनकी सभी को ज़रूरत होती है, फिर चाहे वे देवताओं की पत्नियाँ हों या असुरों की... नागवंश की हो और कोई l” कवि गंग मुस्कराते हुए बोला l
“आप सही कह रहे हैं गंग साहब l सब चाहते हैं कि उसकी पुत्री विवाह के बाद, भले ही उसका ससुराल कितना ही साधन-संपन्न हो, सुखी रहे l अब अपने मित्र गोस्वामीजी के मान और उनके कहे को मैं कैसे टाल सकता था l”
“मगर आपने काग़ज़ के उस पुर्ज़े पर क्या लिख कर वापस लौटा दिया ?” तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन ने पूछा l
“मुझे लगा गोस्वामीजी ने आधी बात लिखी है l उसे मैंने यह लिख कर पूरा कर दिया कि- गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
“क्या बात कही है ख़ानेख़ानाँ साहब कि-

सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय l
गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
    
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, इसे दोहे की शक्ल देकर आपने दोस्ती का असली हक़ सही मायने में आज अदा किया है l क्या बात कही है कि गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l” मुल्ला दो प्याजा ने हुमकते हुए कहा l
“मुल्ला साहब, आपने सही फ़रमाया l इससे पहले जो नहीं जानते थे कि गोस्वामी तुलसीदास की माँ का क्या नाम है, ख़ानेख़ानाँ साहब के इस दोहे से पता चल जाएगा कि उनकी माँ का नाम हुलसी है l” मियाँ तानसेन मुस्कराते हुए बोला l
रहीम मन-ही-मन मंद-मंद मुस्कराता रहा l 
कवि गंग से इस बार रहा नहीं गया और मुस्कराते हुए बोला,”ख़ानेख़ानाँ साहब, बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ ?”
“प्रिय गंग, आपको हमसे कब से इजाज़त लेने की ज़रूरत पड़ गई ?” प्रतिप्रश्न किया अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने l
कवि गंग ने इसके बाद एक पल के लिए रहीम की आँखों में देखा और फिर बोला-

सीखी कहाँ नवाब जू, ऐसी दीने दैन l
ज्यों-ज्यों कर ऊँचौ करो, त्यों-त्यों नीचे नैन ll”

 कवि गंग का सवाल सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ पहले चुप रहा l फिर धीरे-से नज़र उठाई और कवि गंग की तरफ़ देख कर मुस्कराया,”गंग जी,
 
 देनदार कोऊ और है, भेजत सो दिन-रैन l 
 लोग भरम हम पै धरें, याते नीचे नैन ll”

 रहीम के इतना कहते ही सभा में जैसे ख़ामोशी छा गई l थोड़ी देर के लिए लगा जैसे पूस की बर्फ़-सी पिघलती रातों की तरह ठंडी-ठंडी फुहारें बरस रही हैं l बेजान दीवारें किसी राग की बंदिश से झंकृत हो उठी हैं l