** यह पृथ्वी भी अद्भुत और अपूर्व है l यहाँ गर्भ में आते ही समस्यायें आरम्भ हो जाती हैं l जन्म लेने से पूर्व से लेकर मृत्यु तक समस्यायें ही समस्यायें हैं इस धरती पर l मनुष्य या जीव भी इन समस्याओं से लड़ता रहता है l या तो विजय प्राप्त करता है या समस्याओं से पराजित होता है l
** समस्याओं का निराकरण तीन स्तर पर होता है- देव द्वारा , राजा द्वारा या स्वयं के पुरुषार्थ द्वारा l देव द्वारा प्राप्त सहयोग दुर्लभ होता है l सभी पात्र नहीं होते कि उन्हें दैवीय सहायता मिल सके l राजा द्वारा या राज्यांग द्वारा सहायता तभी मिलती है जब देव अनुकूल हो l प्रायः विपत्ति काल में दी जाने वाली सहायता को राजा के चक्र (प्रशासनिक जन) खा जाते हैं l स्वयं का पुरुषार्थ ही एक ऐसा माध्यम होता है जो समस्याओं से व्यक्ति का उद्धार करता है l यह अलग बात है कि हर पुरुषार्थ के पीछे सफलता खड़ी नहीं मिलती है l
** समस्याओं से भयभीत हो कर आत्महत्या करना या पलायन करना इस बात को सूचित करता है कि व्यक्ति की जीवंतता कितनी स्वल्प है l
** समस्याओं के पीछे के कारण — हमारे पूर्व के कर्म ही हमारी समस्याओं के जनक होते हैं l इन्हें विंशोतरी महादशा और अंतर दशा द्वारा जाना जाता है l साथ ही समुद्र में फंसे व्यक्ति की तरह
प्रार्थना और पुरुषार्थ दोनों का सहयोग लेना पड़ता है l
** भूमि पर जन्म तभी होता है जब आपको पुराना भोग भोगना हो और नया कर्म करके नयी समस्याओं को अगले जीवन के लिए तैयार करना हो l यदि मोक्ष हो जाए तो कभी समस्याएं उत्पन्न ही न हों पर जन्मलेने का अर्थ हीहै समस्याओं
को साथ ले कर धरती पर आना l
** जीवन समुद्रमें उठने वाली अनन्त लहरें समस्याएं ही तो हैंl
इन समस्याओं को या तो तैरना होता है या लहरें लील लेती हैं l l
** पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें -२ **
** पृथ्वी पर व्यक्ति का जन्म आदान प्रदान के लिए होता है l व्यक्ति का जन्म ऐसे परिवारमें होताहै जहाँ उसके पूर्वके आत्मीय लोग होते हैं l माता पिता, भाई बहन, दादा दादी, चाचा चाची से आपका पहले से राग बंधन होता है l ये सम्बन्ध या तो आपको समस्या मुक्त करते हैं या ऐसी समस्याओं से युक्त करते हैं जिनसे आप कभी मुक्त नहीं हो पाते l
** आप जिनका जितना पूर्व काल में उधार लिए रहते हैं वह उतना आपसे ले लेता है l कोई भी व्यक्ति इतना स्वतंत्र नहीं होता की वह जन्म कालिक सम्बन्धों का चयन कर सके l यदि श्रेष्ठ सम्बन्धों की इच्छा हो तो भगवती प्रकृति की आराधना करनी पड़ती है l हमारा पूर्व का कर्म ही हमें तामसिक,राजसिक या सात्विक वातावरण को प्रदान करता है l इस अपार सृष्टि में आपसे वे लोग ही मिल पायेंगे जिनसे आपका पूर्वगत सम्बन्ध है l किसी से किसी व्यक्ति का सम्बन्ध कितने दिनों तक रह पाएगा यह भी पूर्व निर्धारित रहता है l
** मेरे जीवन में अनेक ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं जिन्होंने पूर्व कर्मों से उत्पन्न मोह जनित त्रास को सामने लाकर खड़ा किया है l मॉरिशस में जाकर मैने एक विशाल कच्छप को वासुदेव मंत्र दिया l जहाँ एक ओर राष्ट्रपति और अनेक मंत्रियों से भेंट हुई वहीं एक शापित आत्मा जो कछुए के शरीर में रही उसे मुक्ति का मंत्र देना पड़ा l २००९ में मुझे स्वप्न हुआ कि पूर्व जीवन का २ लाख कर्ज लेकर बैठे हो उसे लौटा देना l २०१० के अप्रैल में वैसी ही घटना घटित हुई l मैं ने पूछा क्या ब्याज भी देना होगा? उत्तर मिला - नहीं l परलोक के गणित में यथा का तथा होता है l अधिक न्यून नहीं l
** इस जीवन में मैने भगवती की अत्यधिक आराधना की - हे देवि! मैं निर्विघ्न रहूँ l न तो किसी को विघ्न दूं न किसी के द्वारा विघ्न ग्रस्त हो सकूँ l
मनुष्य जीवन की सारी समस्याएं चक्रीय हैं l वे घूमती रहती हैं l इस जीवन में नहीं तो किसी अन्य जीवन में हमें अपने कर्मों को भोगना ही पड़ता है l राजयोग और राज भ्रंश भी उसी कर्म भोग के सुनिश्चित अंश हैं l यह बहुत जटिल और अक्रम भोग होता है जिसे त्रिकाल द्रष्टा ही जान पाता है हम लोगों जैसे सामान्य जन नहीं l
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