Saturday, 22 August 2026

कर्ण karn

महाभारत में कर्ण नाम के एक पात्र हुए, एक नंबर के चूतिया और कुंठित. आज भी घोर चूतिया और बेईमान दोगले आदमी उनकी फर्जी कहानियों को अपना दोगलापन ढांपने के लिए हीरो बनाकर इस्तेमाल करते हैं. कर्ण कुमार को हमारे रूस पोषित वामपंथियों ने सिर्फ इसलिए ऊपर उठाया कि हमारा जो सबसे बड़ा हीरो था अर्जुन उसके जीवन से कोई प्रेरणा लेने को न सोचे. अर्जुन भगवान नहीं है, वो राम कृष्ण और परशुराम नहीं है, वो इंसान है, साधारण इंसान जिसने अपने जीवन में पराक्रम, सदाचरण और त्याग के उच्च आदर्श प्रस्तुत किए, और महाभारत जैसा युद्ध जीतकर धर्म की स्थापना की.

अब सोचिए कर्ण क्या था, दुर्योधन का गुर्गा, जैसे फिल्मों में खलनायक अमरीश पुरी का गुर्गा होता था वैसे. बॉस के लिए लड़की उठाने तक को तैयार रहता था अगला. लेकिन आधुनिक काल में कर्ण का क्या महिमामंडन हुआ है. एकदम टॉप क्लास. समझ से बाहर एकदम. एक फिल्म आई थी कल्कि, उसमें भी वही कहानी. कर्ण बड़े योद्धा थे अर्जुन से.

एक हुए राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी, सर जी ने अपने जीवन में दो ही आदमी को महान माना, एक जवाहर लाल नेहरू और दूसरा कर्ण. दिनकर जी की एक कृति है लोकदेव नेहरू, और एक कृति है रश्मिरथी. उनकी और भी बहुत सारी उत्कृष्ट कृतियां हैं, जैसे उर्वशी जिसमें एक पंक्ति आती है कि मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी अपने समय का सूर्य हूं मैं. ऐसी पंक्ति जिसकी तुलना आपको विश्व साहित्य में बहुत मुश्किल से मिलेगी. जैसे शेन वॉर्न की मैजिक बॉल, जिसपर उन्होंने माइक गेटिंग को आउट किया था. ऐसे में उनके साहित्य वांग्मय में ये दो नाम अलग से चमकते हैं. क्योंकि गले से नीचे नहीं उतरते. नेहरू और कर्ण.

महाभारत में एक उद्धरण है जब भगवान कृष्ण कर्ण के रोने पीटने से ऊबकर उसे बहुत सही से ज्ञान देते हैं, कि तुम क्या हर समय रोते पीटते रहते हो, क्या कष्ट और अपमान तुमने ही सहे हैं, कभी मेरे जीवन के बारे में सोचना.

अर्जुन को कभी राजा नहीं बनना था, युधिष्ठिर के बाद युवराज भी भीमसेन थे. अर्जुन केवल योद्धा था. उसकी कोई महत्वकांक्षा नहीं थी, लेकिन प्रकृति सर्वश्रेष्ठ जीन का चुनाव करती है, इसलिए अर्जुन के वंश का परीक्षित ही राजा बना. महाभारत की पूरी कहानी में वर्णित कोई भी महायोद्धा अर्जुन से नहीं जीत पाता है. एक प्रसंग में अर्जुन किरात वेश धारी महादेव के आगे नतमस्तक होते हैं, और उनको प्रसन्न करके पाशुपतास्त्र प्राप्त करते हैं. एक प्रसंग है जब अर्जुन द्रोणाचार्य जब चक्रव्यूह की रचना करते हैं, तब उनका सारा खेल इसपर आधारित होता है, कि अर्जुन को युद्ध भूमि से दूर कर दो, तभी मैं युधिष्ठिर को बंदी बना पाऊंगा. 

वहीं कर्ण विराट युद्ध में अर्जुन से हारते हैं, महाभारत के चौदहवें दिन भीमसेन से पराजित होते हैं, अभिमन्यु से अकेले पार नहीं पा पाते, और वो उनके सारे बाण और धनुष काट देता है, सात्यकि कई मौकों पर कर्ण पर भारी पड़ते हैं, गंधर्वराज चित्रसेन कर्ण को पराजित करके भगा देते हैं और दुर्योधन को बंदी बना लेते हैं, यहां तक कि भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने भी कर्ण को हरा कर बंदी बना लिया था. आखिर में कर्ण अर्जुन के हाथों मारे जाते हैं, जहां वो हथियार छोड़कर रथ का पहिया निकालने का बहाना कर रहे होते हैं. 
 
भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश देने को अर्जुन को ही चुना, जैसे महादेव ने माता पार्वती को अमरता का उपदेश दिया. इसलिए नहीं कि वो उनकी भार्या थीं, माता को कड़ी तपस्या और सौ जन्मों की साधना से गुजरना पड़ा.

राम पर, कृष्ण पर, अर्जुन पर इसलिए प्रहार होते रहे हैं, ताकि हमारे नौजवानों के दिमाग में नपुंसकता की खेती की जा सके. अर्जुन और कर्ण के युद्ध की केवल एक तस्वीर दिखाई जाती है, जिसमें अर्जुन पहिया निकालते कर्ण पर बाण तान रहे हैं. कर्ण जैसों का महिमामंडन इसलिए किया गया कि युवा पीढ़ी में दास्य भाव उत्पन्न हो, आदमी अवलंबन में ही स्वयं की उन्नति समझे. तर्क दिया जाता है कि मित्र हो तो कर्ण जैसा, अरे वो मित्र नहीं चमचा था, नौकर था, दलाल था दुर्योधन का. कर्ण को गाली देने के लिए द्यूत भवन में द्रौपदी को बोले गए अपशब्द ही पर्याप्त कारण हैं, बाकी जीवन में भी वो सारा समय दुर्योधन का मैला उठाता रहा. महर्षि व्यास ने पूरे महाभारत में कहीं भी नहीं लिखा है कि कर्ण अर्जुन के टक्कर का योद्धा भी था, कर्ण का महिमामंडन केवल वामपंथी प्रोपोगंडा है.

यह नाम कहीं से भी प्रेरणा नहीं देता, उल्टा मन में जुगुप्सा और जगाता है. अर्जुन ही भारत के इतिहास में सबसे बड़े नायक हैं जिनसे नौजवान प्रेरणा ले सकते हैं.

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