Thursday, 8 January 2026

महमूद ग़ज़नवी

1 )महमूद ग़ज़नवी ---वर्ष 997 से 1030 तक 2000000 , बीस लाख सिर्फ बीस लाख लोगों को महमूद ग़ज़नवी ने तो क़त्ल किया था और 750000 सात लाख पचास हज़ार लोगों को गुलाम बना कर भारत से ले गया था 17 बार के आक्रमण के दौरान (997 -1030). ---- जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया , वे शूद्र बना कर इस्लाम में शामिल कर लिए गए। इनमे ब्राह्मण भी थे क्षत्रिय भी वैश्य भी और शूद्र तो थे ही।.
2 ) दिल्ली सल्तनत --1206 से 1210 ---- कुतुबुद्दीन ऐबक --- सिर्फ 20000 गुलाम राजा भीम से लिए थे और 50000 गुलाम कालिंजर के राजा से लिए थे। जो नहीं माना उनकी बस्तियों की बस्तियां उजाड़ दीं। गुलामों की उस समय यह हालत हो गयी कि गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दू गुलाम हुआ करते थे ।
3) इल्ल्तुत्मिश ---1236-- जो भी मिलता उसे गुलाम बना कर, उस पर इस्लाम थोप देता था।
4) बलबन ---1250-60 -- ने एक राजाज्ञा निकल दी थी , 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उत्तर दो। महिलाओं और लड़कियों वो गुलाम बना लिया करता था। उसने भी शहर के शहर खाली कर दिए।
5) अलाउद्दीन ख़िलजी ---- 1296 1316 - अपने सोमनाथ की लूट के दौरान उसने कम उम्र की 20000 हज़ार लड़कियों को दासी बनाया, और अपने शासन में इतने लड़के और लड़कियों को गुलाम बनाया कि गिनती
कलम से लिखी नहीं जा सकती। उसने हज़ारों क़त्ल करे थे और उसके गुलमखाने में 50000 लड़के थे और 70000 गुलाम लगातार उसके लिए इमारतें बनाने का काम करते थे। इस समय का ज़िक्र आमिर खुसरो के लफ़्ज़ों में इस प्रकार है " तुर्क जहाँ चाहे से हिंदुओं को उठा लेते थे और जहाँचाहे बेच देते थे।.
6) मोहम्मद तुगलक ---1325 -1351 ---इसके समय पर तने कैदी हो गए थे की हज़ारों की संख्या मेंरोज़ कौड़ियों के दाम पर बेचे जाते थे।
7) फ़िरोज़ शाह तुगलक -- 1351 1388 - इसकेपास 180000 गुलाम थे जिसमे से 40000 इसके महल की सुरक्षा में लगे हुए थे। इसी समय "इब्न बतूता " लिखते हैं की क़त्ल करने और गुलाम बनाने की वज़ह से गांव के गांव खाली हो गए थे। गुलाम खरीदने और बेचने के लिए खुरासान ,गज़नी,कंधार,काबुल और समरकंद मुख्य मंडियां
हुआ करती थीं। वहां पर इस्तांबुल,इराक और चीन से से भी गुलाम ल कर बेचे जाते थे। 
8) तैमूर लंग -1398/99 -- इसने दिल्ली पर हमले के दौरान 100000 गुलामों को मौत के घाट उतरने के पश्चात ,2 से ढ़ाई लाख कारीगर गुलाम बना कर समरकंद और मध्य एशिया ले गया। 
9) सैय्यद वंश -1400-1451 - हिन्दुओं के लिए कुछ नहीं बदला, इसने कटिहार ,मालवा और अलवर को लूटा और जो पकड़ में आया उसे या तो मार दिया या गुलाम बना लिया। .
10) लोधी वंश-1451--1525 ---- इसके सुल्तान बहलूल ने नीमसार से हिन्दुओं का पूरी तरह से वंशनाश कर दिया और उसके बेटे सिकंदर लोधी ने यही हाल रीवां और ग्वालियर का किया।
11 ) मुग़ल राज्य -1525 -1707 --- बाबर - इतिहास में ,क़ुरान की कंठस्थ आयतों ,कत्लेआम और गुलाम बनाने के लिए ही जाना जाता है। 
12 ) अकबर ---1556 -1605 ---- बहुत महान थे यह अकबर महाशय , चित्तोड़ ने जब इनकी सत्ता मानाने से इंकार कर दिया तो इन्होने 30000 काश्तकारों और 8000 राजपूतों को या तो मार दिया या गुलाम बना लिया और, एक दिन भरी दोपहर में 2000 कैदियों का सर कलम किया था। कहते हैं की इन्होने गुलाम प्रथा रोकने की बहुत कोशिश की फिर भी इसके हरम में 5000 महिलाएं थीं। इनके समय में ज्यादातर लड़कों को खासतौर पर बंगाल की तरफ अपहरण किया जाता था और उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था। इनके मुख्य सेनापति अब्दुल्लाह
खान उज़्बेग, की अगर मानी जाये तो उसने 500000 पुरुष और गुलाम बना कर मुसलमान बनाया था और उसके हिसाब से क़यामत के दिन तक वह लोग एक करोड़ हो जायेंगे।
13 ) जहांगीर 1605 --1627 --- इन साहब के हिसाब से इनके और इनके बाप के शासन काल में 5 से 600000 मूर्तिपूजकों का कत्ल किया गया था औरसिर्फ 1619-20 में ही इसने 200000 हिन्दू गुलामों को ईरान में बेचा
था। 14) शाहजहाँ 1628 --1658 ----इसके राज में इस्लाम बस ही कानून था, या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उत्तर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतरा था। जवान लड़कियां इसके हरम भेज दी जाती थीं। इसके हरम में सिर्फ 8000 औरतें थी।
15) औरंगज़ेब-1658-1707 - इसके बारे में तो बस इतना ही कहा जा सकता है की ,जब तक सवा मन जनेऊ नहीं तुलवा लेता था पानी नहीं पीता था। बाकि काशी मथुरा और अयोध्या इसी की देन हैं। मथुरा के मंदिर
200 सालों में बने थे इसने अपने 50 साल के शासन में मिट्टी में मिला दिए। गोलकुंडा में 1659 सिर्फ 22000 लड़कों को हिजड़ा बनाया था।
16)फर्रुख्सियार -- 1713 -1719 ,यही शख्स है जो नेहरू परिवार को कश्मीर से दिल्ली ले कर आया था, और गुरदासपुर में हजारों सिखों को मार और गुलाम बनाया था। 
17) नादिर शाह --1738 भारत आया सिर्फ 200000 लोगों को मौत के घाट उत्तर कर हज़ारों सुन्दर लड़कियों को और बेशुमार दौलत ले कर चला गया। 
18) अहमद शाह अब्दाली - 1757-1760 -1761 ----पानीपत की लड़ाई में मराठों युद्ध के दौरान हज़ारों लोग मरे ,और एक बार में यह 22000 लोगों को गुलाम बना कर ले गया था।
19) टीपू सुल्तान --1750 - 1799 --- त्रावणकोर के युद्ध में इसने 10000 हिन्दू और ईसाईयों को मारा था एक मुस्लिम किताब के हिसाब से कुर्ग में रहने वाले 70000 हिन्दुओं को इसने मुसलमान बनाया था।

Tuesday, 6 January 2026

दलित शूद्र

1757 मे #प्लासी के युद्ध मे अपने हाथी और घोड़ो की #लिद साफ करने और अपनी तोपे खींचने अंग्रेज अपने साथ युगांडा, माली, केन्या,नाइजर जैसे देशो से अपने साथ कई मजदूर लाए थे, जिन मजदूरों की औलादो ने समय समय पर अंग्रेजो की #सेवा की और भारतवर्ष के रजवाड़ो के खिलाफ लडाईओ मे अंग्रेजो का साथ देकर देश को गुलाम बनाए रखने मे मदद की..
    जिसका उल्लेख बड़े दलित इतिहासकार #VT_Rajshekhar ने अपनी किताब #the_black_Untouchable_of_india मे किया है,
   और यही भीमते अपने आप को यहाँ का #मूलनिवासी बताते है,
   जो आप उनके शारीरिक ढांचे, खानपान, बर्ताव और मानसिक #बुद्धि स्तर से भी समझ सकते है 
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महाशिवरात्रि नव संवत्सर

महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही होती है। अन्य मास की कृष्ण चतुर्दशी मास-शिवरात्रि है। संवत्सर भी महाकाल रूप शिव का एक चक्र है। संवत्सर के अन्त में उसकी रात्रि होगी। फल्गु का अर्थ है खाली, उसके दहन के बाद पुनः नये संवत्सर की सृष्टि होती है। फल्ग्व्या च कलयाकृताः (गजेन्द्र मोक्ष)।
पुराण तथा धर्म शास्त्रों का वर्तमान संस्करण विक्रमादित्य काल का है, अतः विक्रम संवत के अनुसार ही निर्णय होना चाहिए।

Sunday, 4 January 2026

1947 में घोसी मुसलमानों के अवैध कब्जे मे थी कृष्ण जन्मभूमि

*1947 में घोसी मुसलमानों के अवैध कब्जे मे थी कृष्ण जन्मभूमि* 

 *फिर उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने कैसे बनवाया ‌मंदिर ?* 

-1670 में औरंगजेब ने मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़ दिया था... उसके बाद 281 सालों तक कृष्ण जन्मभूमि पर कोई मंदिर नहीं था... सिर्फ एक बहुत छोटा सा अस्थाई मंदिर बनाकर घंटा लगा दिया गया था जहां स्थानीय पंडे और पुजारी दर्शन करवाते थे... वो प्रतीक रूप में ही था... कि यहां पर भगवान कृष्ण का जन्म हुआ है 

-आज जिस मंदिर को हम कृष्ण जन्मभूमि पर देखते हैं वो बहुत पुराना नहीं है... इस मंदिर का निर्माण कार्य 1984 में पूरा हुआ था... इस वर्तमान मंदिर का निर्माण कैसे हुआ ? आपको समझाते हैं... 

-आजादी के पहले करीब साल 1940 में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने मथुरा का दौरा किया था.. तब उन्होंने देखा था कि कृष्णजन्मभूमि की जमीन पर घोसी मुसलमानों ने अवैध कब्जा जमा रखा था 

-इसके अलावा बहुत लंबे समय से यहां पर पुराने तोड़े गए मंदिरों का मलबा भी पड़ा हुआ था... 

- जुगल किशोर बिड़ला ने जब कृष्ण जन्मभूमि का बुरा हाल देखा तो वो काफी दुखी हुए । 1940 में जुगल किशोर बिड़ला ने मदन मोहन मालवीय को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि वो पैसा लगाने को तैयार हैं आप यहां पर एक भव्य केशवदेव मंदिर का निर्माण करवाइए । 

- लेकिन केशव देव का मंदिर बनाने के लिए पहले कृष्ण जन्मभूमि की जमीन को खरीदना जरूरी था । 

-1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई और 1803 में मराठों ने मुगलों को गोवर्धन के युद्ध में हरा दिया और उन्होंने कृष्ण जन्मभूमि को सरकारी जमीन घोषित कर दिया 

-1803 में अंग्रेजों ने मराठा सूबेदार दौलतराव सिंधिया को हराकर मथुरा पर कंट्रोल कर लिया । अंग्रेजों ने भी मराठों की पॉलिसी को जारी रखते हुए कृष्ण जन्मभूमि को सरकारी जमीन ही दर्ज रहने दिया 

- 1815 तक कृष्ण जन्मभूमि सरकारी जमीन के तौर पर दर्ज थी... लेकिन साल 1815 में अंग्रेजों ने कृष्ण जन्मभूमि की नीलामी की 

- बनारस के राजा पटनीमल ने साल 1815 में 13.37 एकड़ का पूरा कृष्ण जन्मभूमि परिसर खरीद लिया । जहां मस्जिद खड़ी थी वो जमीन भी राजा पटनीमल के नाम पर लिख दी गई 

- साल 1832 में शाही ईदगाह के मुअज्जिन ने ब्रिटिश कोर्ट में केस दायर किया लेकिन अंग्रेज जजों ने ईदगाह के मुअज्जिन का केस खारिज कर दिया 

- 1947 के पहले पूरी कृष्ण जन्मभूमि बनारस के राजा पटनीमल के वंशज राय किशन दास के नाम पर थी। 

- 8 फरवरी 1944 को मदन मोहन मालवीय की मदद से जुगल किशोर बिड़ला ने 13.37 एकड़ की ये पूरी जमीन राय किशन दास से 13 हजार रुपए में खरीद ली

- साल 1951 में कृष्ण जन्मभूमि से यथा संभव अवैध कब्जे हटवाए गए । फिर जुगल किशोर बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की... तब मदन मोहन मालवीय की मृत्यु हो चुकी थी लेकिन जुगल किशोर बिड़ला ने मदन मोहन मालवीय के सपने को साकार करने के लिए जन्मभूमि पर निर्माण कार्य शुरू करवाया था।

-उद्योगपति विष्णु हरि डालमिया और रामनाथ गोयकना ने भी कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण के लिए काफी धन खर्च किया... और इस तरह औरंगजेब के द्वारा मंदिर का विध्वंस किए जाने के 281 साल बाद दोबारा कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर बनकर तैयार हुआ

Thursday, 1 January 2026

ऋग्वेद

ऋग्वेद को बार-बार पढ़ने पर मुझे लगा कि इसको समझने में दो सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। 

प्रथम, ऋग्वेद के ऋषियों ने यह ज्ञान का भण्डार एक-दो वर्षों में न देकर सैकड़ों वर्षों में दिया है। हम आज तक ऋग्वेद के चार सौ दो ऋषियों को उनके काल के अनुसार व्यवस्थित नहीं कर पाए हैं जिससे एक विषय पर विचारों का विकास कैसे हुआ है यह समझने में कठिनाई होती है। ऐसा न होने पर जो कभी-कभी ऋषियों के विचारों में विरोधाभास प्रतीत होता है उसकी गुत्थी सुलझाना भी कठिन हो जाता है। 

दूसरे, ऋग्वेद के प्रमाणिक इण्डैक्सों का अभाव हैं। जो इण्डैक्स हैं भी वे अपने में पूर्ण नहीं है। 

उदाहरण के लिये विदेशी विद्वान् ए.ए.मैकडोनेल एवं ए. वी. कीथ का वैदिक इन्डैक्स ले लें। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इन विद्वानों ने बहुत परिश्रम से बहुत बड़ा काम किया है। इस ग्रन्थ में कुछ कमियाँ होना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिये इसमें बहुत सारे शब्द और विषय हैं ही नहीं। फिर इन विद्वानों ने अपने को एक या दो ग्रन्थों तक सीमित न रखकर अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को ले लिया है। इससे विचारों की क्रमबद्धता तथा स्पष्टता में कमी आई है। फिर मुद्रण की भी काफी कृपा हुई है। 

इसी तरह ऋग्वेद संहिता, जो वैदिक संशोधन संस्थान मण्डल पूना के दो विद्वानों द्वारा सम्पादित की गयी हैं, के अन्त में जो ऋषियों, देवताओं तथा मन्त्रों की तालिकाएँ दी गयी हैं वे महत्त्वपूर्ण हैं, पर उन्हें वैदिक इण्डैक्स नहीं कहा जा सकता है। इसमें भी संकट का अपना योगदान तो है ही। 

ऋग्वेद के अध्ययन की अनेक विधियाँ हो सकती हैं। एक विधि तो विदेशी विद्वानों, विशेषकर मैक्समूलर (max muller, 1875), आर.टी.एच ग्रिफिथ (R.T.H. Griffith, 1982) एच, ओल्डेनवर्ग (H. Oldenberg, 1912) आदि की हैं या फिर विशिष्ट अंशों का आलोचनात्मक अध्ययन करने वाले विद्वानों जैसे रूडोल्फ रौथ (Rudolph Rotlh ), कर्ल गेल्डनर (Karl Geldener), ए. कैगी (Adolf Kaegi), रोअर (Roer), एहिलीब्रेण्ड (Ahillibrandt), ए. ए. मैकडोनेल (A.A. Mecdinell), ए.बी.कीथ (A.B. Keith) आदि ने अपनाई है।

इन विदेशी विद्वानों द्वारा रचित ग्रन्थ उत्तम हैं पर उनमें कुछ कमियाँ भी हैं। उदाहरण के लिये ए.ए. मैकडोनेल का मत है कि कोई ‘‘कोई भी विषय ऐसा नहीं है जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से निरूपण किया जा सके’’ (पृष्ठ 8)। ‘‘वैदिक पुराकथा शास्त्र एक ऐसे देश और काल तथा सामाजिक और भौगोलिक स्थिति की कृतियाँ हैं जो हम (बिटिश) लोगों से अत्यन्त दूरस्थ और अत्यधिक भिन्न हैं’’ (पृष्ठ 8)। स्पष्ट है कि पाश्चात्य सभ्यता में पले, बढ़े और रंगे लोगों को भारतीय संस्कृति, जो अपने में अनूठी है, को समझने में गलतियाँ हो जाना स्वाभाविक है। 

भारतीय विद्वानों जैसे सायण, वेंकटमाधव का भाष्य जो डॉ. लक्ष्मण स्वरूप द्वारा सम्पादित है, स्वामी दयानन्द, सातवलेकर आदि ने ऋग्वेद पर लिखा है पर उनमें आपस में ही मतभेद है, वे विज्ञान की सहायता नहीं लेते हैं, वे किसी आधुनिक शोध विधि को भी नहीं अपनाते हैं। तथा संस्कृत शब्दों के विभिन्न अर्थों के आधार पर अपने-अपने अनुसार व्याख्या करते हैं। उन्होंने भी ऋषियों को कालानुसार व्यवस्थित नहीं किया है। 

फलतः ये विद्वान् भी विदेशी विद्वानों की तरह ऋग्वेद के देवताओं को न तो चिह्नित कर पाए हैं। और न उनके पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट कर पाए हैं और भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं। वे इन देवताओं की पूजा-अर्चना की बात करते हैं पर उसके पीछे छिपे अर्थों को स्पष्ट नहीं करते हैं। 

भारतीय धर्मग्रन्थों में पंच तत्त्वों-आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जल की बड़ी महिमा है। कहा तो यहाँ तक गया है कि सभी भौतिक पदार्थ और यहां तक सभी प्राणी उन्हीं की देन हैं। आधुनिक विज्ञान इस बात से सहमत है यद्यपि उसने इन पाँचों तत्वों के ही लगभग 128 उप-तत्त्व मालूम कर लिये हैं तथा उसका मत है कि इन्हीं के संचय (Combination_ तथा क्रमचय (Permution) से सभी भौतिक पदार्थों और जन्म का विकास होता है।

ऋग्वेद के अधिकांश देवता प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जो अजर-अमर और सर्वव्यापी हैं तथा अपने-अपने नियमों से बँधी हुई हैं। यदि, मनुष्य उन्हें पूजे, अर्थात उनके सहयोग में चलते हुए उनके नियमों का पालन करे, तो निश्चित ही वह स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होगा तथा सुखी और सन्तुष्ट रहेगा। पर जब वह प्रकृति को जीतना चाहता है और उनके नियमों का पालन नहीं करता है तो वह स्वयं तो दुखी रहता ही है पर प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़कर अपने तथा समाज के लिए विष के बीज बो देता है। वर्तमान इस बात को चीख-चीखकर स्वीकार कर रहा है।

ऋषियों ने शनैः शनैः आत्मा का भी पता लगा लिया था तथा यह भी मालूम कर लिया था कि आत्मा अजर और अमर है तथा यह बार-बार किसी न किसी शरीर में प्रविष्ट होकर उसे जीवित कर देती है। ये ऋषि परमात्मा, विष्णु शिव या रुद्र आदि के बारे में भी अधिक-अधिक जानने का प्रयास करने लगे थे और ऋषि भौतिक देवताओं से आध्यात्मिक देवताओं की तरफ जा रहे थे। ऋषिगण केवल काल्पनिक बातें नहीं कर रहे थे, वे वास्तव में वैज्ञानिक खोजें कर रहे थे। यह बात दूसरी है कि उनकी खोज करने के तरीके भिन्न थे।

लेकिन आत्मा भी मरती है। इस विषय पर किसी ने नहीं बात की।

अगर आत्मा मारेगी ही नहीं तो फिर मोक्ष किसका और कैसे........?

गंवार : हम सभी गंवार हैं।

#गंवार : हम सभी गंवार हैं।

बहुत दिन से इस शब्द पर विचार कर रहा था।इस शब्द को हीन भाव से देखा जाता है। कुछ लोग इसे गांव से जोड़ते हैं। कुछ लोग अशिक्षा से।

लेकिन ऐसा नहीं है। 
गंवार शब्द का न तो गांव से सम्बन्ध है न अशिक्षा से। 

इसका संबंध है हमारे जीवन जीने के तरीके से। जीवन जिया या उसे ऐसे ही गवां दिया।

एक महात्मा ने कहा - अबहूँ न चेत गंवार। अभी भी नहीं चेते तो यह जीवन भी गवां बैठोगे। 

कबीर कहते हैं :
रात गवायीं सोय के दिवस गवाए खाय।
हीरा जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाय।।

कृष्ण कहते हैं : अनेक जन्म संसिद्धो सः याति पराम गति। अनेको जन्म की साधना करने से परम गति की प्राप्ति होगी। 

यह जिंदगी न मिलेगी दोबारा। जैसी फिल्में बनती हैं जो हमारे मानस में यह भ्रांति भर देती हैं कि जीवन एक बार ही मिलता है। यह ईसा-ई और क_साई दर्शन है। इसीलिए उनके यहां किसी के मरने पर कहते हैं - RIP. अर्थात कब्र में शांति से पड़े रहना डे ऑफ जजमेंट तक।उपद्रव न करना। 
लेकिन जिन्होंने जीवन को जाना है वे कहते हैं जीवन सतत प्रवाह है जन्म और मृत्यु के बीच। 

 हो सकता है कि आप कहें कि पुनर्जन्म नहीं होता। लेकिन यह आप मानते हैं या जानते हैं? मानते हैं। जानते नहीं। 

बात दूसरी तरफ चली गयी। 

तो जिस तरह का हम जीवन जीते हैं हम सब गवांर ही हैं। 
अजहू न चेत गवांर। 

चेतना का क्या अर्थ है - होश जागरण ध्यान Counciosness आदि आदि ।
हम पूरा जीवन बेहोशी में गुजार देते हैं।

आपको अंतिम पंक्ति समझने में शायद कठिनाई हो कि हम और बेहोश? लेकिन सत्य तो यही है कि हम पूरा जीवन बेहोशी में जीते हैं। सत्य से अनभिज्ञ। 

ॐ
©Tribhuwan Singh

परिक्रमा कितनी करनी चाहिए

परिक्रमा कितनी करनी चाहिए

भैरव जी की तीन परिक्रमा की जाती है।

. शनि देव जी की सात परिक्रमा की जाती है।

हनुमान जी की तीन परिक्रमा की जाती है।

श्री गणेश जी की तीन परिक्रमा की जाती है।

पीपल के वृक्ष की सात परिक्रमा की जाती है।

भगवान कृष्ण की चार परिक्रमा की जाती है।

भगवान विष्णु की चार परिक्रमा की जाती है।

भगवान श्री राम की चार परिक्रमा की जाती है

माँ दुर्गा की एक परिक्रमा की जाती है।

. शिव जी की आधी परिक्रमा की जाती है।