Saturday, 27 June 2026

भगवान जगन्नाथ और काष्ठ


जगत को चलाने वाले जगन्नाथ भले ही षडैश्वर्य गुण संपन्न हो, पर उनको  भी अपना ही घर चलाने में मैया याद आ जाती है। वैसे देखा जाए तो यह गृहस्थों के लिए एक सीख भी है कि गृह स्वामी को भीतर-बाहर काठ के कुंद की तरह धैर्य धारण करना पड़ता है। तभी गृहस्थी रूपी रथ आगे बढ़ता है।
भगवान मुरारी को काठ क्यों होना पड़ा, इसका रहस्य  पढ़िए। संस्कृत साहित्य में हास्य बोध उच्च कोटि का है,






भगवान हैं तो मनुष्य की चिंता करेंगे ही। करना भी चाहिए। किंतु उनके भक्त भी इस मामले में कम नहीं हैं। वे भगवान की चिंता करते हैं। खासी चिंता करते हैं।
ऐसे ही एक चिंता प्रवण भक्त जब जगन्नाथ जी के दर्शन को गये तो वह चिंता में पड़ गये है। उन्हें यह बात बड़ी विचित्र लगी कि ‘‘पुरुषsएवेदं सर्व्वं यद्भूतं यच्चं भाव्यम्’’ वाले भगवान आखिर काठ के कैसे हो सकते हैं? हो ना हो, इसके पीछे बहुत बड़ा कोई रहस्य है। 
चिंतन प्रवण भक्त ने चिंता शुरू कर दी । बहुत दिन तक चिंतन चला। अंत में उन्होंने सारा रहस्य ढूंढ मारा। वह रहस्य इस श्लोक में आबद्ध कर दिया:-

‘‘एका भार्या प्रखर मुखरा चंचला सा द्वितीया, एको पुत्र: त्रिभुवन विजयी मन्मथ दुर्निवार:
शेष: शैया, उदधि भवन: वाहन पन्निगार:, स्मारं स्मारं स्वगृहे चरितं दारू भूतो मुरारि।’’

इसका चलताऊ भाषा में मोटा-मोटी यह अनुवाद हो सकता है कि एक पत्नी बहुत बोलने वाली। दूसरी अति चंचला, कहीं टिकती ही नहीं। एक पुत्र है कामदेव है जिसको जीतना बहुत ही कठिन है और वह तीनों लोक को जीत लेता है। शेष नाग की शैया। ऊपर से गहरे सागर का निवास। वाहन है नागों के शत्रु गरूड़। भगवान की जरा सी दृष्टि चूके तो शैया और वाहन आपस में भिड़ जाए। बेचारे भगवान मुरारी अपने घर की चिंता कर करके काठ के हो गये हैं। 
सोचिए लोग अपने घर की जरा जरा सी परेशानियों से परेशान हो उठते हैं।

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