आज वामन जयन्ती है। ओनम। वामन होकर भी आप बड़ी से बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकते हो। तीनों लोक आपसे बाहर नहीं है। अक्सर अपनी शार्ट हाइट को लेकर लोग ग्रंथियों का शिकार रहते हैं। वामन अवतार की धर्मनिरपेक्ष व्याख्या, यदि बहुत आवश्यक हुआ तो, यों ही की जा सकती थी कि महाबली भी वामन जब अपनी पर आ जाये तो उसके सामने नहीं टिक सकते। आज भी अंग्रेजी में achieving great feats में शायद उन्हीं तीन पदों की स्मृति बची हो किसी क्रास-कल्चरल संवाद के कारण। यूरी गगारिन की हाइट कितनी कम थी लेकिन वह अंतरिक्ष का पहला यात्री था। वामन का एक पद तो अंतरिक्ष भी तय कर आया था। बीथोफेन की संगीत लहरियों पर उसके वामन होने का क्या असर पड़ा। आज हम कम हाइट की एक महिला आई ए एस को सफलतापूर्वक काम करते हुए देखते हैं। कीमती और अच्छा माल छोटे पैकेट में ही बंद रहता है। तो वामन अवतार की एक सेकुलर व्याख्या शूमाखर की तरह हो सकती थी कि स्मॉल इज ब्यूटीफुल। कवि की तरह हो सकती थी कि रहिमन देख बड़ेन को लघु न दीजिये डारि। कि एक छोटा सा वायरस, एक छोटा सा बैक्टीरिया, एक छोटा सा एटम क्या कहर बरपा सकता है - हम उन सारे अनुभवों से गुजर चुके हैं। आज के दिन हम विभिन्न ऐसे कार्यक्रम कर, जिनमें अपने अपने अपने क्षेत्र में कम हाइट के बावजूद विराट उपलब्धि हासिल करने वालों का सम्मान होता, मना सकते थे। बचपन में तो हम सभी वामन होते हैं तो यह दिन child prodigies के सम्मान का दिन भी हो सकता था। वामन तो बटुक ही थे। एक इनफीरियोरिटी की, अहसासे कमतरी की ग्रंथि जो इस कारण रहती है कि हम वामन हैं, उससे मुक्त होने का दिन है आज। यह अकारण नहीं है कि वामन स्तुति में स्पष्टत: ‘खर्वग्रन्थिविमुक्तसन्धिविलसद्वक्षःस्फुरत्कौस्तुभं’ की बात की गई है। खर्व ग्रंथि - बौने होने की ग्रंथि से विमुक्त होने का दिन।
हमारी सभ्यता में पिग्मी असभ्य होने की तरह देखे जाते हैं। आज जब हम वालमार्ट जो अकेले 159 देशों की अर्थव्यवस्था से बड़ा है, Big Oil, Big Pharma, Big Tech, Big Tobacco के दौर से गुजर रहे हैं तब वामन अवतार की उत्सवी स्मृति हमें हमारे लघु उद्योगों, हमारे हथकरघा मज़दूरों, हमारे छोटे कर्मचारियों के लिए कितनी प्रेरणास्पद हो सकती थी।
मेरी दृष्टि में यही धर्मनिरपेक्षीकरण है। पर वाम दृष्टि में धर्मनिरपेक्षीकरण एक ऐसी चीज है जिसमें वामन अवतार को एक उत्तरी भारत की तरह और महाबलि को दक्षिण भारत की तरह पेश किया जाए और भारत में क्षेत्रीय अहं को प्रोत्साहित किया जाये। जबकि वामन स्वयं दक्षिण भारतीय ही प्रतीत होते हैं क्योंकि उनका जन्म श्रावण द्वादशी को माना जाता है जो मलयालम कैलेंडर का दिन है। उत्तर भारत का सावन तो कब का गुजर चुका।
आज के केरल में ओनम को सेकुलर बनाने के चक्कर में उसे उसकी पौराणिकता से विच्युत ही नहीं किया जा रहा, विकृत भी किया जा रहा है। एक क्रिश्चयन केरली महोदया हैं जो कह रही हैं :
“Onam is not a Hindu festival. Onam does not glorify a Hindu god. Onam is celebrated in memory of the Asura Dravidian king, the one who was banished by Vamana out of jealousy. Apparently, they couldn’t accept the fact that a Dravidian Asura was a better king than the Aryan Devas!”
महाबली को द्रविड़ राजा बताना भी उसी तर्ज पर है जिस पर रावण को द्रविड़ बताया गया। वही पेरियारवादी स्ट्रेटेजी। यहाँ वामन वैसे ही आर्य देव हैं जैसे राम सबसे झूठी रामायण में बताये गये। सारे असुर इस साज़िश में द्रविड़ हैं। याद कीजिये इसी तर्ज पर महिषासुर को द्रविड़ बताया गया और दुर्गा को आर्य। यानी यहां यह ग़लतफ़हमी भी है कि जो तथाकथित द्रविड़ थे वे हिन्दू नहीं थे। रावण भी कथित रूप से शिवभक्त था, जैसे बलि विष्णु भक्त। आपके रिलीजन या मज़हब में कोई द्रविड़ कभी न था।
उसी केरल के एक दूसरे महोदय हैं जो कह रहे हैं कि :
“Happy Onam! We celebrate Mahabali who did not discriminate by caste or creed, not Vamana who cheated him.”
ये सज्जन भी ईसाई हैं। ये लोग हिन्दुत्व की व्याख्या करेंगे? ओनम् शब्द संस्कृत ‘ श्रोणम्’ या ‘श्रावण’ से बना है, इसकी पुष्टि स्वयं दक्षिण भारतीय स्तोत्र करते हैं।15 वीं शती के तमिलनाडु के कवि उद्दान शास्त्रिन यह बताते हैं। भागवत पुराण वामन अवतार का जन्म श्रावण द्वादशी को बताता है। तमिल और मलयालम परंपरा ओनम को वामन अवतार का जन्म मानती आईं हैं।590-599 के बीच की मदुरैक कांची कविता ओनम को वामन अवतरण से सम्बद्ध करती है। दसवीं शताब्दी के दक्षिणी साहित्य मसलन दिव्य प्रबंधम् में ओनम को भगवान वामन के अवतरण का दिन कहा गया। उसमें बताया गया कि कैसे आज के दिन विष्णु को चावल और फलों का भोग चढ़ाया जाता है। यह भी संदर्भ मिलता है कि आज के दिन महाबली वामन का पद चूमने के लिए सुतल से बाहर निकल कर पृथ्वी पर आते हैं और थ्रिक्कारा मंदिर में वामन का जन्म मनाने पहुंचते हैं। इस मंदिर का नाम ही बताता है कि यह प्रकरण का अर्थ क्या है। इसका मतलब होता है कि पवित्र पग का स्थान। यह कोची में है और यह वामन मंदिर है। अभी भी यहाँ वामन मूर्ति एक जुलूस की शक्ल में ले जाई जाती है।
यह भी मान लें कि ये सब हिन्दू स्रोत हैं तो हम 17 वीं शती के आंग्ल एद्नोग्राफर फ्रांसिस डे की पुस्तक को ही ले लें तो वे बताते हैं कि ओनम का दिन विष्णु के पृथ्वी पर आने के रूप में मलाबार में मनाया जाता है। हम विलियम लोगन की पुस्तक मलाबार मैनुअल की साक्षी ले लेते हैं जो मलाबार में 19 वीं सदी में कलेक्टर थे। वे इस पुस्तक में बताते हैं कि इस दिन वामन अवतार का जन्मदिन मनाया जाता है और विष्णु आज भी अपने भक्त बली को मिलने इस दिन आते हैं।
आज के दिन थ्रिक्क्रारा अप्पन के रूप में विष्णु पूजा की जाती है। श्रीमद्भागवत के अनुसार राजा बलि ने उनके साथ का आशीर्वाद माँगा था। सो विष्णु सुतल में वामन के द्वारपाल बन जाते हैं क्योंकि बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्होंने यह वर दिया था कि वे इस रूप में उसकी सेवा करेंगे। उन्होंने सुतल को बीमारियों, भय और घृणा से मुक्त करने का वर दिया था।
लेकिन घृणा से हमारे वामपंथी कैसे मुक्त हो सकते हैं जबकि उनकी दालरोटी ही द्वन्द्व के सिद्धांत पर चलती है। राजा बलि तो वरदान के पूर्व और पश्चात् वामन के भक्त रहे और किसी प्राचीन साहित्य में चाहे वह उत्तर भारत का हो या दक्षिण का, कहीं भी उन दोनों के बीच द्वन्द्व का नाम नहीं आया। सो इसमें आर्य और द्रविड़ उतर आये। आर्य गोरे वामन काले। जबकि मानकोट की एक सत्रहवीं शती की पेंटिंग वामन को काला और राजा बलि को गोरा बताती है। बलि यहाँ चोटी और यज्ञोपवीत धारण किये हुए ब्राह्मण के रूप में बताये गये हैं क्योंकि वे ऋषि कश्यप के वंशज हैं। गरुड़ पुराण यह बताता है कि भगवान वामन की पूजा
छाता और पादुका अर्पित कर की जानी चाहिए तो वह परंपरा केरल में आज भी यथावत है।
पर वामपंथियों को ओनम का सर पैर नहीं पता तो छत्र-पादुका क्या पता होंगे।
वह समावेशन नहीं है जब आप ओनम की रांगोली में क्रॉस बनाते हुए वास्तव में विभाजनकारी व्याख्याएँ परोसते रहते हो। तब वह inclusivity नहीं, camouflage करना है। तमाम कोशिशें कर लें पर राजा बलि ईसाई नहीं था। तमाम कोशिशें कर लें पर राजा बलि मुस्लिम नहीं था। द फैक्ट रिमेंस कि वह विष्णु भक्त था और आज भी वह यदि पृथ्वी पर आता है तो विष्णु को ही अपनी श्रद्धा अर्पित करने आता है। उसके सुतल को स्वर्ग से भी भव्यतर होने का वामन-आशीष मिला है। आज आपको ओनम के जरिये क्रिश्चियनिटी में स्थानीय आबादी का inculturation करने की बड़ी उत्सुकता है पर 1604 में केरल के चर्च फादर्स ईसाइयों को ओनम गतिविधियों में शामिल होने से मना करते थे।
इन्हें संव्यवहार की वह सौंदर्यशास्त्रीय गतिकी पता ही नहीं जिसमें विष्णु और बलि का नित्य साहचर्य साक्षात्कृत होता है।
तब उत्तर भारत को पृथ्वी और दक्षिण भारत को पाताल से समीकृत करने की औंधी खोपड़ी को ही वाम कहा जा सकता है।
उसे harvest festival मात्र के रूप में बताना धर्मनिरपेक्षता नहीं है, वह सिर्फ उन लोगों के लिए भूमिका बनाना है जिनका लक्ष्य harvesting of souls है। अन्यथा हार्वेस्टिंग किसी consumer state में कैसे होगी? अलबत्ता कैश क्रॉप की हार्वेस्टिंग से आप अवश्य संतोष कर सकते हैं। केरल में 90% कृषि क्षेत्र में तो नकद फसल होती है। हार्वेस्टिंग करेंगे Food deficit state बनकर! खेतों में काम करने को मजदूर उत्तरपूर्वी राज्यों से बुलायेंगे और हार्वेस्ट फेस्टिवल मनायेंगे!!
धरा की रक्षा एवं कल्याण के लिए सदा तत्पर रहते हैं भगवान वामन
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एक अमेरिकी मूर्खाधिराज है नवारो। उसने हाल में ब्राह्मणों को लेकर एक मूर्खतापूर्ण टिप्पणी की है। अब उसके बारे में आखिर क्या ही कहा जाए?
ब्राह्मण परिवार में भगवान के एक अवतार का जन्म हुआ। इन्हें वामन अवतार के नाम से जानते हैं। वामन भगवान का कद छोटा था। यह एक संकेत है कि ब्राह्मण को अपना अहंकार सीमित रखना चाहिए। किंतु जब बात इस धरा को बचाने पर आ जाए तो उसे त्रिविक्रम स्वरूप अपनाना चाहिए। त्रिविक्रम के शास्त्रों में तमाम अर्थ हैं। पर एक सरल सा अर्थ शायद आपको पसंद आये कि संकट आने पर तीन गुना प्रयास, प्रयत्न और पुरूषार्थ करने चाहिए। इस बात को इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि यदि आपके घर में आ लग जाए तो आप जैसे भी हों, अपने परिजनों, अपने सामान तथा स्वयं अपने को बचाने का एकसाथ प्रयास करेंगे, साथ ही आपका यह भी प्रयत्न रहेगा कि आग को कैसे नियंत्रित किया जाए।
शास्त्रों में एक बड़ी मजेदार कथा आती है। बाल कृष्ण जब पूतना का वध करते हैं और वह जब महाध्वनि करते हुए अपने प्राण त्यागती है तो यशोदा मैया और नंद बाबा सहित पूरा नंदगांव उस स्थान पर दौड़ा आता है। यशोदा माता अपने लाल की यह दशा देखकर बहुत भयभीत हो उठती हैं और वे गाय की पूंछ से अपने लाला की नजर उतारती हैं, झाड़ा करती हैं। नंदबाबा (नन्दगोप) अपने बालक की रक्षा के लिए भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। यह स्मरण ठीक किसी कवच की तरह है। इसमें एक बड़े पते की बात आती है:-
वामनो रक्षतु सदा भवन्तं य: क्षणादभूत्।
त्रिविक्रम: क्रमाक्रान्तत्रैलोक्य: स्फुरदायुध:।।
(जिन्होंने क्षण मात्र में सशस्त्र त्रिविक्रमरूप धारण करके अपने तीन पदों से त्रिलोकी को नाप लिया था, वे वामन भगवान तेरी सर्वदा रक्षा करें।–विष्णु पुराण)
अत: वामन भगवान इस त्रिलोक की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और उनका स्मरण करने मात्र से वह अपना त्रिविक्रम स्वरूप धारण कर क्षण मात्र में आ जाते हैं।
इस पृथ्वी के कल्याण और रक्षा के लिए जो कोई भी शांति के साथ अपने प्रयास कर रहा है, वह भगवान वामन का अंश है। वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।
वामन जयंती की राम राम
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