“अगर अंबेडकर के पिता सूबेदार थे, और उन्हें तनख़्वाह मिलती थी, तो फिर अंबेडकर को #गरीब कहना कैसे उचित है? आप दोनों बातें साथ में कैसे कह सकते हैं?”
शौरी ने यह तर्क दिया कि अंबेडकर को #अंग्रेजों ने पढ़ाई और करियर के लिए “स्पेशल ट्रीटमेंट” दिया, जिससे वे “settled professional” बन गए।
उन्होंने यह भी लिखा कि अंबेडकर ने मजदूरों, किसानों या आम दलितों की ज़िंदगी का सीधा #अनुभव नहीं किया।
कुछ #दक्षिणपंथी लेखक उन्हें “elitist” या “British-backed opportunist” कहकर पेश करते हैं। जो सच है बस इतना की वो हमेशा ऐशो आराम का जीवन जिए कभी कष्ट में नहीं रहे कभी, बड़ौदा #राजा के भरोसे
एनजी रांधी ने कहा अम्बेडकर कभी #श्रमिकों की समस्या को नहीं उठाये बस उनके नाम का प्रयोग #अंग्रेजों के सामने अपनी राजनीति चमकाने के लिए करते रहे।
मुझे कहना ये है की अंबेडकर कभी ना अपनी बिरादरी (महार) से ऊपर उठ पाए ना कभी अन्य डिप्रेस क्लास के लिए कुछ किए डिप्रेस्ड के लिए वास्तव में किसी ने कुछ किया तो थे महात्मा गांधी और जगजीवन राम उनसे ज़्यादा काम तो स्वामी अछूतानंद जी ने किया लेकिन आज का तथाकथित अगड़ा #दलित उनका नाम ही भूल गया।
भूल तो अंबेडकर भी गए जिस #ब्राह्मण ने उनकी सामाजिक स्थिति बेहतर करने के लिए अपना #आस्पद (टाइटिल) #अंबेडकर तक दिया आज अंबेडकर की पूरी गोल उस ब्राह्मण के विनाश के सारे उपाय कर रही है, भूल तो गए उस #क्षत्रिय राजा #गायकवाड़ को जिसने पैसा देकर अंबेडकर की #शिक्षा पूरी की।
परन्तु राजनेताओं को राजनीति करने के लिए और हमारे शूद्र भाइयों को भड़काने के लिए
No comments:
Post a Comment