मैं जानता हूं कि अब मुझ पर किसानों, अपशब्दों की भरमार होनी शुरू हो जायेगी मगर सत्यासत्य विवेक के लिए, सही निष्पति निकालने के लिए विभिन्न हिंदू लेखकों के लेखों का संग्रह "हिंदू समाज के पथभ्रष्ट तुलसीदास" पढ़ने से स्पष्टता आयेगी।
Tufail Chaturvedi जी यदि आप तुफैल हैं तो चतुर्वेदी सरनेम लटकाये रहने का कोई औचित्य नहीं है। तुलसीदास को पथभ्रष्टक कहना आपकी मूढ़ता का परिचायक है जो हर ब्रेनवाश्ड से अपेक्षित है। वैसे मुझे ज्ञात नहीं कि आप लोगों के पथभ्रष्टक "रंगीला रसूल"की पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है भी या शार्ली एब्दो की तरह आतंकवादी मजहबियों का शिकार हो गयी?हम आप लोगों की तरह पाखंड झूठ और मजहबी कट्टरपंथ को साहित्य संस्कृति में जहर नहीं घोलने देते। तुलसीदास ने भारतीय साहित्य संस्कृति को समृद्ध किया है और मुगलों के वहशी अन्यायी राज्य में इतिहास के जघन्य क्रूरतम क्षणों में राष्ट्रीय स्वाभिमान को सहेज कर गौरवान्वित किया है।वे हमेशा हमारे पर प्रदर्शक रहेंगे -वर्णसंकर दोगले चाह कर भी चांद को अपनी थूक से मैला नहीं कर सकते!
इस पद में श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने बालपन की दीनता को प्रकट किया है। तुलसीदास जी का जन्म सोरों सूकरक्षेत्र के जिस योगमार्ग मोहल्ले में हुआ था, वहाँ तब भी और आज भी मुसलमानों की आबादी है। तुलसीदास जी दीनावस्था में जिस मस्जिद की शिला पर सोते बैठते थे, वो मस्जिद आज भी है और उस शिला को मुसलमानों ने सुरक्षित भी रखा है। पंडित रामनरेश त्रिपाठी आदि मूर्धन्य विद्वानों ने अपने तुलसी संबंधी साहित्य (‘तुलसी और उनका काव्य’ आदि) में इसका उल्लेख भी किया है।
Rahul Vashishtha गोस्वामी तुलसीदास जी तो राजापुर , चित्रकूट में पैदा हुए थे । सोरों में वह गुरु नरहर्यानंद जी पास विद्याध्ययन के लिए गये थे ।
Natthu Lal नहीं। आप बाँदा गजेटियर का अवलोकन कर सकते हैं। बाबू शिवनन्दन सहाय के साहित्य का अवलोकन कीजिए, जिन्होंने राजापुर के बड़े बूढ़ो से जाकर पूछा तो सभी ने यही कहा कि तुलसीदास जी ने सोरों से आकर राजापुर बसाया। अयोध्या के रूपकला जी ने भक्तमाल की टीका में स्पष्ट लिखा है कि गोस्वामी जी गंगा-वाराह क्षेत्र (सोरों) से आकर राजापुर में रहे यह उनकी जन्मभूमि नहीं है। आज से लगभग 500 वर्ष पहले (आपके अनुसार) गुरु नरहर्यानन्द उस असुविधा वाले समय में इतने अबोध बालक को समीप के अयोध्या, प्रयागराज, काशी, चित्रकूट आदि तीर्थों को छोड़कर सोरों सूकरक्षेत्र में ही लेकर क्यों आये? और वो भी तब, जब गोस्वामी जी की अवस्था बालपन, बालपन में भी अचेत और अचेत में अति अचेत थी। गोस्वामी तुलसीदास जी ने सोरों सूकरक्षेत्र में निज गुरु (स्मार्त वैष्णव नृसिंह चौधरी) से बालपन की अत्यचेतावस्था में रामकथा सुनी। (बालकाण्ड ३०क) अंतर्साक्ष्य और बहिर्साक्ष्य दोनों के ही आधार पर गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रामाणिक जन्मभूमि सोरों सूकरक्षेत्र ही है। दूसरी बात किस गृह्यसूत्र में उल्लेख है कि एक संन्यासी (आपके अनुसार गुरु नरहर्यानन्द) किसी गृहस्थ बटुक को गुरुदीक्षा दे सकते हैं?
तुलसीदास जी के जन्म स्थान पर विद्वान एकमत नहीं हैं। बहुत से विद्वान चित्रकूट के राजापुर को तुलसी का जन्म स्थान मानते हैं। कुछ विद्वान सोरों को मानते हैं। किन्तु सबसे मजबूत दावा गोंडा जिले के राजापुर वालों का है, जहाँ सरयू और घाघरा नदी का संगम होता है। राजापुर (गोंडा) के बगल के गाँव में ही वाराह भगवान का पुराना मन्दिर है। स्वामी नरहर्यानन्द जी इसी वाराह मन्दिर में रहते थे। तुलसीदास जी की रचनाएं जिस अवधी भाषा में हैं वह अवधी अयोध्या, गोंडा और आसपास के जिलों में ही बोली जाती है, न तो बाँदा-चित्रकूट में और न सोरों में।
Rajendra Srivastava वराहपुराण में अध्याय १३७ के श्लोकांक ८ पर उल्लेख है कि ;
“यत्र संस्थाप्य च मे देवि ह्युद्धृतासि रसातलात्।
यत्र भागीरथी गङ्गा मम सौकर वै स्थिता।।”
भगवान वाराह देवि पृथ्वी से कहते हैं कि हे देवि! जहाँ मैंने तुम्हें रसातल से उद्धार कर स्थापित किया है, जहाँ भागीरथी गंगा हैं, वहीं मेरा सूकरक्षेत्र स्थित है।
अब आप बताइये कि गोण्डा में सरयू-घाघरा है; लेकिन भागीरथी गंगा कहाँ हैं? जो मंदिर वाराही देवी का है, उसे आप वाराह भगवान का बता रहे हो। चाहे कोई भी तीर्थ हो मनगढंत नहीं हो सकता, प्रत्येक तीर्थ शास्त्रोक्त है। श्रीवराहपुराण की भाँति ही श्रीगर्गसंहिता एवं श्रीवृहन्नारदीयपुराण में भी सूकरक्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का वर्णन है। या फिर आप बताइये कि कौन से धर्मशास्त्र में सरयू-घाघरा के तट पर सूकरक्षेत्र बताया गया है? आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी; क्योंकि तीर्थों की अवधारणा शास्त्रों से होती है। और रही बात अवधी की, तो अवधी में शब्दों के पीछे वा जोड़ा जाता है, जैसे– कमल का कमलवा, ललन का ललनवा आदि। तो ऐसे शब्द श्रीरामचरितमानस में बताइये।🙏
Rahul Vashishtha जाहिर है, जब लिखा होगा तब अविवाहित होंगे या पत्नी से विलग नही हुए होंगे. बाद मे लिखने का तुक नही बनता
Mithilesh Choubey जी बिल्कुल। बाल्यावस्था की दीनता है, जब वे अनाथ हो चुके थे।
मसीति क्षेत्रीय भाषा का शब्द है जिसका अर्थ निश्चित सोना है
आपकी टिप्पणी स्वयं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत है। वहां वैष्णव मंदिर था यह पुरातत्व विभाग के शोध और खुदाई में मिले अवशेषों से साबित है। आपने शायद ध्वस्त जन्मस्थान मस्जिद को देखा नहीं होगा मैंने उसे 1980 में विस्तार से देखा है। उत्तर प्रदेश पुलिस पत्रिका के सम्पादन के सिलसिले में मैंने अयोध्या जन्मस्थान मस्जिद पर अपना शोध कार्य करते हूये कम से कम एक सौ एक सबूत पद्म स्तंभ सीता रसोई और विष्णु मंदिर के अवशेष मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है ऐसे में यह मूर्खतापूर्ण ढंग से स्थापित करना कि वहां श्रीराम जन्मभूमि का कोई प्रमाण नहीं मिला एक दुर्भावना पूर्ण वक्तव्य है ! क्या प्रमाण चाहते हैं? क्या मुहम्मद या जीसस के जन्म स्थान का प्रमाण है? विष्णु मंदिर स्वयं श्रीराम के मंदिर का परिचायक है ।
किसी भाषा के किसी शब्द का अर्थ दूसरी भाषा में निकालने का प्रयास ही मूर्खता है। संस्कृत में पैर के लिए पाद शब्द है जिसका प्रयोग मैथिली में अपान वायु होता है। उर्दू में दस्त हाथ को कहते हैं। हिंदी में दस्त का अर्थ होता है पाखाना। कौन कौन सा अर्थ किस किस भाषा में निकाल कर बतंगड़ बनाओगे,?किसी भाषा के शब्द का अर्थ उसी भाषा में निकालें, यही उचित है।
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