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मनुस्मृति में श्राद्ध के कुछ नियम बतायें गयें है जिसे हमें समझना चाहिये ! आज इसी लेख में हम इसी विषय पर चिंतन मनन करेंगे ! बहुत ही गंभीर नियम मनुस्मृति मे बतायें गयें है ! किसी की घर में मृत्यु हो गयी तो हम बारहव या तेरहवें दिन भोज करते हैं जिसे शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म भोज कहाँ गया है ! ब्रह्म भोज अर्थात वह वो भोज जो विषेश रुप से ब्राह्मणों के लिये हैं लेकिन उसका अधिकारी भी हर ब्राह्मण नहीं होता ! मुख्य विषय है श्राद्ध में जो दान होता है उसका अधिकारी कौन होता है ! दान भी दो प्रकार के होते हैं ! एक होता है हव्य और एक होता है कव्य ! हव्य वह होता है जो की यज्ञ आदि में, पुजा पाठ, हवन आदि में जो दान किया जाता है , देवताओं का जो दान हैं वह हव्य है और पितरों का जो दान हैं वह कव्य हैं ! तो पितरों के नाम पर या श्राद्ध के नाम पर जो दान किया जाता हैं उसे हर कोई ग्रहण नहीं कर सकता ! पितृ पक्ष या किसी की मृत्यु घर में हो जायें तो श्राद्ध के दान का अधिकारी कौन है ? इस विषय पर महाराज मनु ने मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में चर्चा की हैं ! तो महाराज मनु कहते हैं कि पितृ कर्म श्राद्ध या प्रेत कर्म के रूप में भी इसे जाना जाता हैं ! अमावस्या के दिन पितृ श्राद्ध करने वाला पुरुष नित्य किये जाने वाले लौकिक श्राद्ध के फल को भी प्राप्त कर लेता है ! इसलिये अमावस्या के दिन श्राद्ध जरूर करना चाहिये अपने पितरों का ! 128-129 वे श्लोक में महाराज मनु कहते हैं कि दाताओं को चाहिये केवल श्रोत्रिय अर्थात ज्ञानी ( जो ब्रह्म ज्ञानी , आत्म ज्ञानी , ज्ञाननिष्ठ ) ब्रहामण हो उसी को हव्य कव्य समर्पित करें ! जीतने अधिक योग्य विद्धान को यह दिया जायेगा उतना ही अधिक फल लाभ होगा ! देव यज्ञ या पित्र यज्ञ में एक ही विद्वान ब्रहामण की पुजा करने से जिस बड़े भारी पुण्य का लाभ होता है , अनेक मुर्ख ब्राहमणों की पुजा करने से वह कभी नहीं मिलता है ! वेद विद्या में प्रविण ब्राह्मण की पहले से ही पुछताछ और परिक्षा कर लेनी चाहिए ! संतुष्ट होने पर ही उसे निमंत्रित करना चाहिये ! ज्ञानी ब्राह्मण ही देव बली और पित्र बली ग्रहण करने का सच्चा अधिकारी हैं ! ऐसे ब्राह्मण ही एक प्रकार का अथिति भी हैं ! वेद ज्ञान से रहित लाखों ब्राह्मण के भोजन व दान आदि के संतुष्ट होने पर भी श्राद्ध सफल नहीं माना जाता हैं ! इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा ! जबकि इसके विपरीत एक ही ब्रह्म ज्ञानी, तपस्वी ब्राह्मण को आपने संतुष्ट कर दिया , उस भोजन करा दिया, उसे दान दे दिया , तो आपका श्राद्ध पुर्ण सफल हो जाता हैं ! इसके विपरीत आप लाखों लोगों को भी भोजन खिला दो पर आपको उसका फल मिलने वाला नहीं है ! यहाँ पर उसका फल न तो खाने वालों को और ना ही खिलाने वाले को मिलता है ! यहाँ पर दोनों ही पाप के भागीदार बन जाते हैं ! क्योंकि यह श्राद्ध का विषय है , सामान्य विषय नहीं है ! जिस प्रकार रक्त से सने हाथ रक्त से नहीं धोये जा सकते , उनकी शुद्धि जल से ही होयीं जा सकतीं हैं उसी प्रकार ब्रह्म ज्ञान रहित ब्रहामण को कव्य या हव्य देने से कोई लाभ नहीं होता ! वेद ज्ञान से रहित ब्रह्मामण को श्राद्ध में हव्य कव्य आदि ग्रहण ही नहीं करना चाहिये ! वेद तत्व का ज्ञान याने सिर्फ वेदों का ज्ञान नहीं है , वेदों का पठन नहीं है ! इसलिये तपस्वी ब्रहामण लिखा गया है मतलब जिसने अपने तप से , साधना से वेद के ज्ञान को प्रकट किया है अपने हदय में ! क्योंकि वेदों का ज्ञान हदय में प्रगट होता है ! तो वेद कैसे आये तो वेद अपुरशय है क्योंकि वेदों को किसी परमात्मा ने भी नहीं लिखा है बल्कि ॠषियों के हदय में वेद प्रगट हुये हैं और उन ॠषियों ने ही वेदों की रचना की , तो उन्होंने भी अपने आप को रचियेता नहीं माना ! तो वेद ज्ञान प्रगट होता है ! तो जो वेद तत्व का ज्ञान रखते हैं वहीं ब्रहामण श्राद्ध में हव्य कव्य ग्रहण करने योग्य है और जो वेद तत्व ज्ञान से रहित ब्रहामण हैं उन्हें हव्य कव्य आदि ग्रहण ही नहीं करना चाहिए ! ये विचार उन्हें स्वत: से करना चाहिये ! वस्तुतः ऐसा व्यक्ति श्राद्ध में जितना ग्रास खाता है मरने पर उसे शुल और लोहे के उतनें ही गोले खाने पड़ते हैं ! उसे ऐसा दोष लगता हैं क्योंकि ऐसा भोजन वास्तव में जिस कारण से घर में किसी की मृत्यु हुई है तो उस कर्म को घटाने के लिये यह दान किया जाता हैं !इसलिए श्राद्ध का जो दान हैं उसे पचाना आसान नहीं होता ! इसलिये बहुत विचार करके श्राद्ध का भोज ग्रहण न किया करें यद्यपि वहाँ खुद दान देकर आ जायें ! लेकिन जब आप वहाँ से दान ग्रहण करते हैं और आपको अपनें कर्मो को जलाने की क्षमता नहीं है ! भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन उसे पंडित जानों जो अपने कर्मो को ज्ञान अग्नि में जला सकता हैं ! कर्मो को भस्म कर सकता हैं ! वैसा ही योगी, तपस्वी, ब्रहामण ही श्राद्ध का दान ग्रहण करने योग्य है! इस संसार में कुछ ब्रहामण ऐसे होते हैं जिन्हें तत्व ज्ञान संपन्न कहाँ जा सकता है , कुछ दुसरे तपोनिष्ठ होते हैं , कुछ तप के साथ स्वाध्याय में निरत होने वाले होते हैं और यज्ञ या आदि में निरत कर्म कांड करने वाले होते हैं ! इनमें तत्व ज्ञान से संपन्न ही ब्रहामण श्रैष्ठ हैं ! श्राद्ध में तो केवल तत्व ज्ञान से संपन्न ब्रहामण को ही भोजन कराना चाहिये और उसे ही केवल दान देना चाहिए ! सभी ब्रहामण इसके योग्य नहीं है क्योंकि वैसा दान उनके ही पतन का कारण बनेगा , उनके ही कष्टों का कारण बनेगा , इसलिये दान पर निर्भर जीवन नहीं जीना चाहिये ! यज्ञ, पुजा, हवन लोग करते हैं ! कर्म कांड के अंतर्गत पांच प्रकार के कर्म बतायें गयें है नित्य, निमित्त, काम्य , निषिद्ध और प्राश्चित ! इसमें जो काम्य कर्म और निमित्त कर्म के अंतर्गत जो यज्ञ पुजा होती हैं उसका दान तो ग्रहण किया जा सकता हैं ! इसलिये यहाँ पर लिखा गया है कि यज्ञों में चारों ज्ञाननिष्ठा, तपोनिष्ठ, स्वाध्याय प्रायण कर्मनिष्ठ! ये चारों के दान ग्रहण कर सकते हैं लेकिन श्राद्ध में ऐसा नहीं है ! श्राद्ध में तत्व ज्ञान से संपन्न ब्रहामण को ही दान ग्रहण करना चाहिये और तत्व ज्ञान से संपन्न हैं वह प्रकृति के रहस्य जानता है ! वह खुद ही दान लेने के लिए प्रेरित नहीं होगा जब तक उसे लगेगा कि इसमें इस व्यक्ति का कल्याण हैं और इस श्राद्ध के अन्न को या दान को हजम में ही कर सकता हूँ ! जो तत्व ज्ञान से संपन्न है वो स्थूल जगत में अनासक्त होगा और स्थूल आसक्ति किसी भी रुप में रह जायें तो मुक्ति संभव नहीं है , मोक्ष संभव नहीं है ! तो जो तत्व ज्ञान से संपन्न ब्रहामण है वो वैसे ही दान के ऊपर जीवन जीने से बचता रहेग
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