Saturday, 27 June 2026

श्राद्ध कार्य में स्त्री का रजस्वला हो जाने पर क्या

पितृपक्ष पर विशेष भाग - ( 10 )
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श्राद्ध कार्य में स्त्री का रजस्वला हो जाने पर क्या करना चाहिए। 

कुछ श्राद्ध ऐसे हैं कि यदि कर्ता की पत्नी रजस्वला भी हो जाए और पाक / भोजन बनाने वाला कोई और हो, तो उसी दिन श्राद्ध हो सकते हैं और यदि भोजन बनाने वाला कोई नहीं हो तो आमान्न / कच्चा अन्न / सीधा दान करके आमान्नदानात्म उसी दिन श्राद्ध किया जा सकता हैं।

उन श्राद्धों के नाम हैं
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दर्श श्राद्ध
युगादि श्राद्ध
मन्वादि श्राद्ध
अष्टका_श्राद्ध
अन्वष्टका श्राद्ध
सकृन्महालय श्राद्ध
दौहित्र कर्तृक मातामह श्राद्ध

प्रमाण
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अथभार्यारजोदोषे - तत्रदर्शयुगादिमन्वाद्यष्टकान्वष्टकादिश्राद्धानि,
पाककर्त्रंतरसत्त्वेन्ने तद्दिने कार्याण्यन्यथामादिद्रव्येण,
कालादर्शोदर्शश्राद्धं_पंचमेहनीतिपक्षांतरमाह,
सकृन्महालयस्तु दर्शभार्यारजसि मुख्यकालातिक्रमभिया तत्रैवकार्यः,
एवमाश्विनशुक्लपंचम्यंतकालेप्यूहम्। (धर्मसिन्धौ)

यदि कोई महालय में पिता की मृत्यु तिथि में श्राद्ध न करके अष्टमी आदि शास्त्रों में बताए गए अन्य विकल्पों में श्राद्ध करता है, तब यदि पत्नी ऋतुमती हो जाती है तो उस दिन श्राद्ध नहीं करे। 4 दिन बाद जब भी कोई अमावस्या आदि शास्त्रोचित विकल्प हो उस दिन महालय श्राद्ध करें।

अष्टम्यादौसकृन्महालयो भार्यारजोदोषे न कार्य:,
कालान्तरसत्त्वादित्यादिमहालयप्रकरणोक्त मनुसंधेयम्। (धर्मसिन्धौ)

कुछ श्राद्ध ऐसे हैं, जिनके लिए शास्त्रों में विकल्प हैं...

( 1 ) : - प्रतिसांवत्सरिक श्राद्ध
( 2 ) : - मासिक श्राद्ध

प्रथम पक्ष👉 उपर्युक्त दोनों श्राद्धों को नियत तिथि पर ही करें चाहे पत्नी रजस्वला हो या न हो यह प्रथम पक्ष है। यही मुख्य-पक्ष है।

द्वितीय पक्ष👉 उपर्युक्त दोनों श्राद्धों को पत्नी के रजस्वला होने पर पाँचवें दिन में करें, यह दूसरा पक्ष भी है।

प्रत्याब्दिकं मासिकं च रजोदोषेपि तद्दिनएवकार्यमित्येक: पक्ष:,
पंचमेहनिकार्यमित्यपर: पक्षद्वयेपियंथसंमति: शिष्टाचारसमतिश्च। (धर्मसिन्धौ)

यदि किसी की दो पत्नियाँ हों...तो श्राद्ध नियत काल पर ही होगा, यह सर्व सम्मत मत है।

"भार्यान्तरसत्त्वे तद्दिन एवेति सर्वसंमतम्।"

#रजस्वला के दिन श्राद्ध किये जाने पर..

श्राद्धकाले रजस्वला दर्शनादिकं वर्ज्यं। (धर्मसिन्धौ)

अर्थ 👉 जिस दिन पत्नी रजस्वला हो और उस दिन यदि श्राद्ध करें तो श्राद्ध काल में रजस्वला को नहीं देखना चाहिए तथा रजस्वला के द्वारा भी श्राद्ध संभारादि का दर्शन नहीं होना चाहिए।

श्राद्धकल्पे च दैवे च तैर्थिके पर्वणीषु च ।
रजस्वला च या नारी श्वित्रिकापुत्रिका च या ।।
एताभिश्चक्षुषा दृष्टं हविर्नाश्नन्ति देवता:।
पितरश्च न तुष्यन्ति वर्षाण्यपि त्रयोदश ।। (महाभारत_अनु.127/12-14)

छोटा घर एवं रजस्वला की स्थिति पर 
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योग्यपाककर्त्रसंभवे_च
पंचमेहनीतिपक्षःश्रेयान्। (धर्मसिन्धौ)

अर्थ 👉 यदि किसी का घर इस प्रकार का नहीं हो, इतना बड़ा न हो कि श्राद्धकाल में रजस्वला को न दिखे अथवा श्राद्ध का भोजन बनाने वाला कोई दूसरा न हो, तो सभी प्रकार के श्राद्धों को पांचवे दिन (रजस्वला के शुद्ध होने पर) करना चाहिए अथवा आमान्नदानात्मक (कच्चा अन्न/सीधा) श्राद्ध करना चाहिए।

अपत्नीकः प्रवासी च यस्य भार्या रजस्वला।
आमश्राद्धं दीवारों कार्यं शूद्रेण तु सदैव हि।। (श्राद्धविवेक)

पुत्र विहीन विधवा के रजस्वला के होने पर
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भर्तुराब्दिकादिकं पंचमेहनि_कुर्यान्नत्वन्यद्वातरातद्दिने। (धर्मसिन्धौ)

अर्थ 👉 अपुत्रा विधवा स्त्री को रजस्वलावस्था में अपने पति का श्राद्ध पांचवें दिन में करना चाहिए।

रजस्वला अवस्था में 5 दिन से पहले किसी ब्राह्मण आदि से भी नहीं कराना चाहिए।

श्राद्ध संबंधित नियमपालन पूर्वक विधिवत् श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ,,,

क्रमशः...
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