"मैं स्त्री में वाक (वाणी) हूँ"।
यह कहना बहुत सरल है, लेकिन निभाना बहुत कठिन है।
स्त्रियों को हम-आप बात करते हुए देखते हैं। यह उनका गुण है, सहज स्वभाव है। लेकिन जिस 'वाक' के बारे में श्रीकृष्ण गीता में उल्लेख कर रहे हैं, वह साधारण बातचीत नहीं है।
वह 'वाक' स्त्री में तब प्रकट होती है जब स्त्री अपने अस्तित्व में परम मौन को उपलब्ध हो जाती है। जब वह एकदम मौन हो जाती है तब उसकी वाणी वेद की ऋचा बन जाती है। लेकिन जो स्त्री मौन नहीं हो सकती, वह कभी वाक को उपलब्ध नहीं हो सकती।
इसलिए स्त्री का परम गुण 'मौन होना' भी है।
स्त्री के अन्दर सुन्दरता, मधुरता, कोमलता, सौम्यता आदि सब कुछ सुन्दर लगता है, लेकिन उसकी बातचीत उबाने वाली लगती है।
वह स्त्री के गुण की विकृति है।
सुन्दर-से-सुन्दर स्त्री बराबर बोलती जाती है तो वह घबड़ाने वाली हो जाती है। कोई भी बहुत देर तक उसके पास नहीं बैठ सकता।
स्त्री का मौन किसी चमत्कार से कम नहीं है। मौन स्त्री की गरिमा है।
मिथिला के महान विद्वानों में वाचस्पति का नाम कौन नहीं जानता ...........?
उनका विवाह भामती नामक स्त्री से होता है। वाचस्पति उस समय ब्रह्मसूत्र पर टीका लिख रहे थे। विवाह तो हो गया लेकिन उनका मन रमा था ब्रह्मसूत्र पर टीका करने में। जब वह टीका पूर्ण हुई, तब तक बारह वर्ष का लम्बा समय व्यतीत हो गया। उन्हें अपनी पत्नी का बिल्कुल ध्यान नहीं रहा। जब ब्रह्मसूत्र पर टीका करके उठने लगे तो मध्य रात्रि का समय था। वाचस्पति ने देखा.......
"एक सुन्दर स्त्री के हाथों में सोने की चूड़ियां चमक रहीं थीं। वह धीरे-से पीछे से आकर दीपक की लौ मन्द करने लगी थी। वाचस्पति ने सिर घुमाकर उत्सुकता से देखा। उन्हें घोर आश्चर्य हुआ"। उन्होंने पूछा-
इतने लम्बे समय तक तुम कहाँ थी...... ?
पत्नी ने कहा......
"मैं यहीं थी आपके आस-पास। मैं प्रतिदिन आती थी, जब दीपक की लौ कम होती तो उसे बढ़ा देती। प्रतिदिन सायंकाल दीपक जला जाती। प्रातः चुपचाप हटा देती। आपके कार्य में बाधा न पड़े, इसलिए आपके सामने कभी नहीं आती। कभी यह भी प्रयास नहीं किया कि कहती कि मैं भी हूँ। मैं आपके आस-पास ही रहती। आप अपने काम में लीन रहते"।
इतना सुनकर वाचस्पति की आंखों में आंसू भर गये। उनका गला भर आया। बोले......
"अब तो बहुत देर हो गयी। बारह वर्ष का समय निकल गया। मैंने यह निर्णय लिया था कि भाष्य पूर्ण होने पर मैं सन्यास ले लूंगा।
अब मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ........... ?
"मेरे जाने का समय आ गया। लेकिन जाते-जाते तुम्हें कुछ देकर जाता हूँ जिससे तुम संसार में अमर हो जाओगी। ब्रह्मसूत्र पर जो टीका की है, वह तुम्हारे नाम से जगत में प्रसिद्ध होगी। भामती के नाम से पहले लोग तुम्हें जानेंगे, बाद में भामती नाम की टीका"।
बहुत ही मार्मिक क्षण था उस समय। भामती का मौन अमर हो गया। वाचस्पति अन्त में बोले......
"मेरे जाने के बाद तुम दुःखी होगी। जीवन में बराबर क्लेश रहेगा"।
भामती उनके पास आकर बस इतना ही बोली......
"मैं दुःखी नहीं हूँ। आज मैं अपने को परम सौभाग्यवती मान रही हूँ। इतना कम है क्या कि मेरे लिए आपकी आंखों में आँसू आ गए। गला भर आया आपका। मेरा जीवन कृतार्थ हो गया। अब मैं खुशी-खुशी आपको विदा कर सकूंगी"।
बारह वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद बस इतने शब्द निकले जिन्होंने दोनों को अमर बना दिया। जो अन्तरतल से निकलता है, वही 'वाक' है, वही 'ब्रह्म' है।
इसी तरह सीता जी परम् विरह के उपरांत जब बोलीं तो पूरी अयोध्या रोने लगी, पूरी प्रकृति रोने लगी। जब काली की वाक हुंकार में फूटी तो पूरा ब्रह्माण्ड कांप उठा। सरस्वती की वाणी फूटी तो वेद ही बन गयी। लक्ष्मी की वाणी फूटी तो जगत में ऐश्वर्य की वर्षा होने लगी। दुर्गा की हुंकार से सारे असुर पलायन कर गए। कृष्ण की वाणी गीता बनकर अमर हो गयी। मीरा की वाणी ने पूरे जगत को कृष्णमय बना दिया।
श्रीकृष्ण कहते हैं......
मैं स्त्री में 'स्मृति' रूप में हूँ। विज्ञान माने, न माने लेकिन स्त्री-पुरुष की स्मृति एक तरह की नहीं होती। पुरुष की स्मृति बौद्धिक होती है और स्त्री की स्मृति अस्तित्वगत होती है।
अगर पुरुष किसी स्त्री को प्रेम करता है तो उसकी स्मृति में बस इतना ही रहता है कि उस स्त्री से प्रेम किया था। मगर स्त्री किसी पुरुष से प्रेम करती है तो उसकी स्मृति उसके रोम-रोम में समायी रहती है। उसका सम्पूर्ण अस्तित्व रम जाता है प्रेम की स्मृति में।
पुरुष अनेक स्त्रियों से प्रेम करता प्रायः देखा जा सकता है, लेकिन स्त्री के लिए अनेक पुरुषों से प्रेम करना कठिन है। क्योंकि उसके प्रेम में वह पुरुष रोम-रोम में समा जाता है।
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