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मुरारी बापू गुजरात प्रांत से वामपंथी विचारधारा में राम कथा कहने के लिए विश्व में विख्यात हैं।
अभी कुछ समय पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। उन्होंने तीन दिन के बाद काशी में कथा कहने के लिए गंगा में स्नान किया और बाबा विश्वनाथ का दर्शन भी किया ।
इसके साथ ही विद्वानों ,संतो और शंकराचार्य जी महाराज ने धर्म की मर्यादा का उल्लंघन देखकर उन्हें शास्त्र की मर्यादा का संदेश दिया।
मुरारी ने भी अपनी तीखी प्रक्रिया में क्षमा याचना की और सब पोल खोल देंगे कह कर सभी साधु संतों पर आक्रमण किया। अपने को निम्बार्काचार्य सम्प्रदाय का साधु घोषित करके कहा कि उन्हें सूतक नहीं लगता है।
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समाधान
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वेद, स्मृति और पुराण को मानने वाले सनातनी प्राणी के लिए मरणाशौच में दशगात्र विधान करना जरूरी है ।अन्यथा वह अपवित्र है और उसके हाथ का पानी पीना भी दोषपूर्ण है। अशौच में पड़ा हुआ व्यक्ति न तो किसी से पैर छुआ सकता है न किसी का पैर छू सकता है न किसी को प्रणाम कर सकता है।
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उनके सूतक का पालन न करने के लिए सभी आचार्यों ने तीखी प्रतिक्रिया की।
यहां राम कथा के माध्यम से मरणाशौच को समझिए।
महाराज दशरथ की मृत्यु के बाद भरत जी ने अपने पिता की वेद,पुराण,स्मृतियों के अनुसार विधियों का पालन किया।
सोधि सुमृति सब वेद पुराना।
कीन्ह भरत दसगात विधाना।।
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भये विशुद्ध दिए सब दाना।
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पितु हित भरत कीन्हि जस करनी।
इससे भरत जी की सूतक से निवृत्ति हो गई। अब भरत जी के निर्णय से सब राम जी को मनाने चित्रकूट पहुंच गये।
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जब राम जी ने सुना कि पिता जी सुरपुर चलेगये। बहुत दुखी होकर प्रथम दिन की तरह सूतक माना । जबकि भरत जी तो सब विधान पहले ही पूरे कर चुके थे।
व्रत निरम्बु तेहि दिन प्रभु कीन्हां।
मुनिहु कहें जलु काहु न लीन्हां।।
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करि पितु क्रिया वेद जस वरनी।
भे पुनीत पातक तम तरनी।।
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चित्रकूट में रहते हुए और भरत जी द्वारा सब क्रिया विधान पूरा करने पर भी...
शुद्ध भये दुई वासर बीते।
दो दिन बीत जाने के बाद तीसरे दिन अपने को शुद्ध माना।
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मुरारी जी राम कथा करते हैं।राम कथा सापेक्ष उनका चिंतन स्थिर रहता तो सूतक मान्य करते।उनकी कथा में वामपन्थ स्पष्ट रहता है। इसलिए उनका सूतक समाप्त नहीं हो सकता है। उन्होंने वेद विहित मार्ग का त्याग किया है।
तजि श्रुति पन्थ वाम पथ चलिहीं।
वंचक विरचि वेष जगु छलहीं।
मुरारी बापू और उनके समर्थक श्रोता दोनों सनातन धर्म में वामपन्थ की प्रविष्टि के लिए सूतक के पात्र हैं।
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