उपनिषद्, रामायण, महाभारत से लेकर अनेकों दार्शनिकों ने एक दर्शन दिया वो यूरोप पहुंचकर Socrates द्वारा कुछ इस तरह कहा गया।
"Great minds discuss ideas; average minds discuss events; small minds discuss people."
अर्थात्
"निम्न कोटि का व्यक्ति व्यक्ति पर चर्चा करता है।"
"मध्यम कोटि का व्यक्ति घटनाओं/विचारों पर चर्चा करता है।" और "उत्तम कोटि का व्यक्ति विषय/विचारों पर चर्चा करता है।"
पर इसमें एक और तथ्य जोड़ने की आवश्यकता है और वो है कि विक्षिप्त व्यक्ति कुतर्क करता है, असंबद्ध बातें करता है, ऐसी बातें करता है जो किसी के द्वारा न कहीं गई और न सुनी गई। वो अपने मन में कुछ कहानियां बनाता और बस बकता है। वस्तुतः ये मानसिक रोग का एक गंभीर चरण है।
आज का समाज और लगभग हर परिवार ऐसे विक्षिप्त लोगों से भरा हुआ है, जिन्हें ये होश नहीं होता कि क्या बक रहे हैं, क्या सोच रहे हैं, क्या कर रहे हैं, क्या पढ़ रहे हैं उन्हें बस बकना होता है। बुद्धिमान लोग इनसे दूर हो जाते हैं क्योंकि इन्हें समझाया नहीं जा सकता, उनकी क्लेश को कुछ भी करके शांत नहीं किया जा सकता। इसका एक बड़ा लक्षण यह है कि ऐसे लोग अपने आसपास या परिजनों में से किसी न किसी को अपने विनाश, अपने पतन का जिम्मेदार जीवनभर मानते हैं और इस तरह वे जीवन में जो उन्नति कर सकते थे उसकी संभावनाओं को भी खत्म कर देते हैं।
15 वर्ष पहले मैंने विविध भारती के किसी कार्यक्रम में एक मनोचिकित्सक से सुना था कि अमेरिका के किसी मनोवैज्ञानिक ने कहा है कि अगले 30 वर्षों में हर घर में एक "पागल" होगा लेकिन मैं समझता हूं कि बदले हुए युग में उनका अनुमान समय से पहले सही सिद्ध हुआ है और आज सामान्यतः हर घर में एक से ज्यादा पागल हैं अर्थात गंभीर रूप से मानसिक रोगी हैं या मानसिक रोगी होने की ओर तीव्रता से बढ़ रहे हैं। इसका कारण हैं इंटरनेट का युग, अस्तव्यस्त दिनचर्या, धर्महीन चिंतन, ईर्ष्या द्वेष से भरा मन, दोहरा चरित्र और अध्यात्महीन लक्ष्य हैं।
कई बार अनुभव करता हूं कि समाज विक्षिप्त और मानसिक रोगियों से तीव्रता से भरता जा रहा है। स्वस्थ मानसिकता का व्यक्ति यदि आपके परिवार और मित्र मंडली में है तो इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिए।
मैं लोगों को विशेषकर युवाओं को यही सुझाव दूंगा कि अपने मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा रखते हुए अपने परिवेश अपने वातावरण को अच्छा बनाने का प्रयास करें अन्यथा आप भी उन्हीं की तरह मानसिक रोगी, विक्षिप्त होते जायेगे और आपका आने वाला परिवार भी एक नरकीय जीवन जीने के लिए विवश होगा। इसलिए कलुषित और विक्षिप्त लोगों से भरे हुए परिवार को छोड़ना भी पड़े तो छोड़ने में हिचकिचाना नहीं चाहिए क्योंकि जिन लोगों की हर दिन, हर घंटे, सुबह शाम, दिन रात क्लेश करने की मानसिकता बन चुकी हो वह आपको भी मानसिक बीमार कर देंगे, आपको भी अपना जैसा पागल कर देंगे। आप कितना भी उनका शुभ चाहना, शुभ की कामना करना पर आपका हर बार का प्रयास असफल ही होगा क्योंकि विक्षिप्त लोगों की सुनने और सोचने की क्षमता खत्म हो चुकी होती है। वे अपने निर्णय हर घंटे बदलते हैं, सुबह किए अपने किए वादे पर शाम तक नहीं टिकते, वे अपने शब्दों पर नहीं टिकते। इनका चित्त उसी तरह स्थित होता है जैसे कि समुद्र का पानी लहरों के कारण अस्थिर रहता है। इनके व्यवहार में तनिक स्थिरता नहीं होती। वे केवल वही बकते हैं, जो उनके मन मस्तिष्क में उन्होंने कोई कहानी बना रखी होती है। इन लोगों का चित्त पत्थर की तरह हो चुका होता है, जिस पर आप कितना भी प्रयास करें कोई बीज अंकुरित नहीं हो सकता।
हजारों वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने भी अपने योगदर्शन में इसी तरह चित्त की पांच अवस्थाओं का वर्णन किया है पर निश्चित ही महर्षि के काल में इतने विक्षिप्त लोग नहीं रहे होंगे अर्थात विक्षिप्तता की परिभाषा इतनी ज्यादा कलुषित नहीं रही होगी।
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