सनातन शास्त्रों में,स्पष्ट कहा गया है,“यो यच्छ्रद्धः स एव सः”,व्यक्ति जिस प्रकार की श्रद्धा,आस्था,प्रवृत्ति, वृत्ति और प्रवृत्त कर्म करता है,उसका भविष्य,उसी दिशा में संचालित होता है।
कल रात्रि को,एक छोटी सी पोस्ट करी थी,उसमें तीन प्रकार के प्रश्न थे,पहला था,कभी विचार किया है क्या कि,कुत्तों की भोग योनि में,किस प्रकार के मनुष्य जाते हैं.?संसार में कुत्तों की जनसंख्या जो बढ़ रही है,उसका वैज्ञानिक रीज़न भले ही अलग हो,पर ऐसे कौनसे कर्म करता है व्यक्ति,ऐसी कौनसी प्रवृति होती है,व्यक्ति की,जो वो,अपने अगले जन्म में,
कुत्ते की भोग योनि में जन्म लेता है?
कई मित्रों ने,सही दिशा में उत्तर दिया,कईयों ने उत्तर देने में, असमर्थता जताई,कईयों ने इस प्रश्न को ही,अनदेखा किया,फिर कई ऐसे भी थे,जो अपने कुतर्क को,इतने कॉन्फिडेंस से कह रहे थे,जिसे अगर कोई ऐसा व्यक्ति पढ़ता,जिसका अध्ययन ज्ञान शून्य से नीचे हो,विवेकहीन हो,विचारशीलता से अनभिज्ञ हो,तो वो उसे ही सत्य मान,संतुष्ट हो जाता।पर मुझे अध्ययन करना पसंद है,त्वरित प्रतिक्रियाएं देना नहीं,इस लेख के माध्यम से,आप भी मेरे साथ एक अध्ययन कीजिए,सत्य को साथ में खोजते हैं...
मित्रों,कुत्तों की योनि,जिसे "भोग योनि" कहा गया है,उसमें उन आत्माओं का प्रवेश होता है,जो जीवन भर वासना,कपट, अति–लोभ,अंधभक्ति,पर–निंदा और कायरता में लिप्त रहती हैं,और जिनके भीतर मानवता,कर्तव्य और विवेक का,
लोप हो चुका होता है।
कुत्ता,भले ही सामाजिक दृष्टि से निष्ठा का प्रतीक बना दिया गया हो,परंतु आत्मिक दृष्टि से,ये योनि अत्यंत ही निम्न और तुच्छ प्रवृत्तियों की द्योतक मानी गई है।शास्त्रों के अनुसार,जो मनुष्य,"अत्यधिक वासना" में लिप्त हो,जो रातभर वेश्याओं के संग और दिनभर,व्यर्थ की कुतर्की चर्चाओं में रत रहता हो,जो "झूठ", "चाटुकारिता","चोरी","परस्त्री–गमन",और "परधन–अपहरण" में रत हो,जो बिना कारण,"भौंकने वाला आलोचक" हो,जो सत्य को जानकर भी,उस पर,अपने लघु "कुतर्कों" से,प्रहार करे,ऐसे जीव,देह त्याग के उपरांत,
"कुत्ते की योनि"/"श्वान योनि" में,प्रवेश करते हैं।
गरुड़ पुराण में वर्णित है कि,यदि कोई मनुष्य,अपना सारा जीवन,मात्र "खाने","सोने","काम" व "क्रोध" में ही खर्च कर देता है,तो वो पशु–योनि का अधिकारी होता है।और यदि वो दूसरों के ऊपर "निर्भर" रहकर जिए,"छीना–झपटी" करे,तो भी,उसे "श्वान-योनि" ही प्राप्त होती है।कुत्तों की बढ़ती संख्या का,आध्यात्मिक संकेत ये भी है कि,हमारी पृथ्वी,अब उन आत्माओं से भर रही है,जो भोग में,कंठ तक,डूब चुकी थीं और जिनकी आत्मिक तरंगें,अब मानव–देह की पात्रता नहीं रखतीं।
मित्रों,कुछ लोगों ने,ये कहा कि,"मनुष्य योनि में,जन्म लेने के पश्चात,पशु योनि में,आत्मा का जन्म लेना,संभव नहीं।"कुछ ने ये भी कहा कि,"मनुष्य योनि में,जन्म लेने के पश्चात,आत्मा को मात्र,सात(7) जन्म ही प्राप्त होते हैं,जिसमें वो मोक्ष प्राप्त कर सकता है,इसके अतिरिक्त,उसे मानव योनि में,
और जन्म लेने नहीं पड़ते।"
ये बात सत्य है कि,मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ कहा गया,क्योंकि ये ही वो द्वार है जहां,आत्मा,अपनी "गति"को चुन सकती है,वो "मोक्ष" को भी,चुन सकती है या "बंधन" को भी।परंतु ये भ्रम कि,"एक बार मनुष्य बनने के पश्चात,आत्मा पुनः पशु योनि में नहीं जाती"ये शास्त्रों की दृष्टि से,पूर्णतः मिथ्या है।
ये कथन,न वेद सम्मत है,न उपनिषदसम्मत,न ही किसी महान ऋषि या विद्वान द्वारा स्वीकार्य।
विनम्रता से कहूंगा,ऐसा सोचने वाला व्यक्ति,और उसके प्रशंसक एवं फॉलोवर्स,धर्म–चक्र के गूढ़ रहस्यों से,पूर्णतः अनभिज्ञ हैं,उन्हें अभी बहुत अध्ययन की आवश्यकता है,बिना अध्ययन के,त्वरित प्रतिक्रियाएं देना,आत्मा को, अज्ञान की ओर धकेलता है,और अपनी अज्ञानता को ही परम ज्ञान मानना,आत्मा को अहंकार के बंधन में,बांध देता है!
आइए इसके बारे में भी,साथ में,अध्ययन करते हैं,
मैं भी सीखता हूं,मेरे संग आप भी सीखिए.....
मित्रों,बृहदारण्यकोपनिषद् (4.4.5) में स्पष्ट उल्लेख है,
"यथाकर्म यथाश्रुतं च,यथा विद्वानं लोकानां प्राप्नोति"
अर्थात्,"जैसा जीव (आत्मा) कर्म करता है,और जितना वो वेद,उपनिषद,ब्रह्मविद्या का श्रवण या आत्मज्ञान प्राप्त करता है,उसके अनुसार,वो मृत्यु के पश्चात,किन लोकों को प्राप्त करेगा,ये निर्धारित होता है।"(अर्थात् जन्म–जन्मांतर, स्वर्ग–नरक,या मोक्ष की दिशा में गति)और ये योनियां,पशु, नरक,देव,प्रेत और मनुष्य सभी हो सकती हैं।मनुष्य को कितने जन्म मिलते हैं,ये उसकी "यथाकर्म–यथाश्रुतं–यथा विद्वानं" की "त्रयी" पर निर्भर है।
न कोई सात(7) जन्मों में बंधा है,
न ही सात(7) लाख जन्मों में।
आत्मा की गति,गुण,कर्म और ज्ञान की स्थिति के अनुसार होती है।मनुष्य योनि से,पशु योनि में गिरना,संभव है,यदि यथा–कर्म पतनकारी हों और श्रवण न हुआ हो,अर्थात् ज्ञानशून्यता हो,तो वो आत्मा,नीच योनियों की ओर गति करती है।आत्मा का ये अनंत चक्र,तब तक चलता है,जब तक वो,विद्वान न हो जाए,अर्थात् "आत्मज्ञानी",न बन जाए,जैसे ही आत्मा ब्रह्म को जान ले,तैसे ही वो,जन्म–मृत्यु के चक्र से,विमुक्त हो जाती है।
भगवद्गीता (14.15) में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि,
"राजसि प्रेण लभते कर्मणा मनुष्यलोकम्।
तमेव लोके पुनरागतिं प्राप्नोति जीवः।"
यदि कोई रजोगुण में,कर्म करता है,तो वो मनुष्य योनि पाता है,परंतु यदि वो तामसिक कर्म करता है,तो अधोगति को प्राप्त होता है,उदाहरण,पशु,प्रेत,पेड़,कंटीले पेड़,कीट–पतंगों की योनि तक।
"गरुड़–पुराण" में तो,और भी स्पष्ट चित्रण है...
"जो व्यक्ति,जीवन–पर्यंत,
अधर्म,वासना,मद्यपान,परस्त्री–गमन,पशुहत्या और निंदा में लिप्त रहता है,वो मृत्यु के उपरांत,पशु योनि में जन्म लेता है,कभी कुत्ता,कभी सूअर,कभी गधा बनता है।"
अब,ये भी विचार करें आप,कि,"यदि आत्मा एक बार,मानव बनकर,पशु न बन सकती होती,तो शास्त्रों में,"पशु–योनि" के बारे में इतने विस्तृत वर्णन का,प्रयोजन ही क्या था?"
सोचिए इस बारे में भी..विचार कीजिए..
विष्णु धर्मसूत्र और मनुस्मृति दोनों में,वर्णन है कि,
"यस्य कर्म तथैव गति:",कर्म जैसा होगा,गति वैसी ही होगी।
अब रही बात "सात जन्मों की सीमा" की,तो विनम्रता से कहूंगा कि,ये भी एक,अध–कचरी आधुनिक कल्पना मात्र है,जिसका शास्त्रों में,कोई आधार नहीं।
ये विचार,"नव–बौद्ध मत" या कुछ "नव–गूगल वेदांति" "छिछले–मनोवैज्ञानिकों" के कुतर्कों से,उपजा हो सकता है,परंतु वेदान्त और सनातन धर्म,ऐसा कोई बंधन स्वीकार नहीं करता।
ब्रह्मसूत्र में,शांकर–भाष्य के अंतर्गत,पुनर्जन्म के अनेक संदर्भ आते हैं,पर कहीं भी,"सात जन्मों" का कोई निश्चितांक नहीं बताया गया,बल्कि चांडोग्य उपनिषद (5.10.7) में कहा गया है कि,"ते पुनः अविद्यया समभिसंयान्ति",जो आत्माएं अभी भी,"अज्ञान" में हैं,वो पुनः पुनः संसार में लौटती हैं,ये चक्र अज्ञान के रहते,अनंतकाल तक चलता है।
महाभारत (अनुशासन पर्व) में भी,युधिष्ठिर के प्रश्न पर,भीष्म पितामह कहते हैं कि,"कर्मनियमस्य न अंतो नादिः।"कर्म के नियमों का,न कोई आरंभ है,न अंत।तो जब तक आत्मा मुक्त न हो जाए,वो कर्म–बंधन में बंधी रहती है,और उसका पुनरागमन होता रहता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण (5.26) में,नरक का ऐसा विस्तृत चित्रण है कि,ये स्पष्ट हो जाता है,आत्मा केवल 7 बार नहीं,अपितु हज़ारों बार जन्म–मरण के चक्र में पड़ती है।"दशानाम् नरकाणाम् अपगच्छनाय, शतानि जन्मानि आपद्यते।"केवल एक नरक से उबरने के लिए ही आत्मा को सैकड़ों जन्म लेने पड़ते हैं।
फिर प्रश्न ये उठता है कि,लोग क्यों कहते हैं कि,केवल सात(7) जन्म होते हैं? कारण ये है कि,मानव मस्तिष्क "सीमित" है,वो "अनंत" को नापने का साहस नहीं कर पाता,इसलिए उसे सात या नौ जैसी सीमाएं बना लेता है।परंतु आत्मा की गति,"अनंत" है,जब तक,वो"मोक्ष"प्राप्त नहीं करती,तब तक,वो मात्र,एक जड़ संचालित स्मृति–प्रवृत्ति है,जो कर्मफल के नियमों से चलती है,
"न कर्मणा लिप्यते पापं,न कर्मणा लभ्यते मुक्तिः"।
आत्मा,यदि अपने कर्मों में,पतन करे,तो पशु योनियों संग(यहां मेरा फोकस,"श्वान योनि" पर है,जिसकी बढ़ती जनसंख्या,भारत के लोगों को,आजकल बहुत चिंतित कर रही है),अन्य भोग योनियों में,पुनर्जन्म लेती है और ये चक्र,सात जन्मों में नहीं,अपितु तब तक चलता है,जब तक,आत्मा, "स्व" को पहचान न ले,
जब तक वो "सोऽहम्" को न जान ले....
कुछ मित्रों के प्रश्न थे कि,कुत्तों की जनसंख्या तो अत्यधिक रूप से बढ़ रही है,(वैज्ञानिक और सामाजिक कारणों से इतर हम यहां,"कार्मिक–कारणों" पर बात करेंगे)पर विश्व में,अन्य जीवों की संख्या घटने का,उनके पूर्ण रूप से,
समाप्त हो जाने का कारण क्या है?
ये सच में,आज की विडंबना है कि,पशु घट रहे हैं,पर पशुओं में,श्वान योनि की संख्या बढ़ रही है और उधर मनुष्य भी बढ़ रहे हैं,पर क्या वो मानव हैं,या केवल दो पैरों वाले,मांस के संवेदनहीन पुतले?
इस बढ़ती,मानव–जनसंख्या के पीछे,मात्र भौतिक कारण नहीं हैं,अपितु,आध्यात्मिक तंतु जुड़ते हैं।श्रीमद्भगवद्गीता कहती है,"स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः", किंतु आज मानव,अपना धर्म भूल गया है।आत्मा जब सतत अधर्म,छल, हिंसा और रागद्वेष में फंसी रहती है,तब पशु योनि में जाती है। किंतु,यदि वो ही आत्मा,जन्म–जन्मांतर के अधर्म से,ऊबी हुई होती है,तो वो ऊर्ध्वगति करती है,भले ही क्षणिक पुण्य से ही सही।इसीलिए,अनेक आत्माएं,अन्य पशु–योनि त्याग कर, कुत्तों की योनि में,जो मनुष्यों से,निकटतम भावनात्मक संपर्क में हैं,आ रही हैं,और वहां दोहराव कर,या कुछ मामलों में सीधे,पशु योनि त्यागकर,पुनः मानव योनि में प्रवेश कर रही हैं।
यानि ये "सर्कल ऑफ कर्मफल"
या कहें कर्मफल का चक्र,यूं ही चले जा रहा है..
आत्मा,वस्त्र रूपी योनियों को,बदलती जा रही है..
और कभी बस,एक यूनिफॉर्म(मानव योनि)बार–बार,
पहने जा रही है।
इसी पर आधारित,एक प्रश्न था कि,संसार में मानव की जनसंख्या इतनी क्यों बढ़ रही है?कितने मानवों का पुनर्जन्म हो रहा है?"मोक्ष" कितनों को मिल रहा है?कर्म–बंधन,मोह–बंधन में,कितने लोग फंस रहे हैं और पुनः यहीं आ रहे हैं,आते ही जा रहे हैं,कितने हैं उनमें से,जो अपने उद्देश्य को पहचान रहे हैं,कितने स्वयं को पहचान रहे हैं?
तो मित्रों,इस भौतिक संसार में,मनुष्य की बढ़ती जनसंख्या,वास्तव में "मोक्ष" की अनुपलब्धि का द्योतक भी, माना जा सकता है।अन्य योनियों से,ऊर्ध्वगति प्राप्त कर,आत्माएं,मनुष्य योनि में,जन्म तो ले रही हैं,फ़िर मृत्यु पश्चात,पुनः इस योनि में जन्म लेती जा रही हैं,क्योंकि,वो न तो,स्वयं को जान पाईं हैं,न ही अपने उद्देश्य को पहचान पाई हैं।उनकी दृष्टि मात्र,नश्वर देह के "सुख" तक सीमित रहती है।
सरल शब्दों में कहें,तो वो यहां कुछ समय के लिए,
अटक गई हैं..
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”,जो आत्मबल–हीन है,जो स्वयं पर,संयम नहीं साध सकता,जो विचार और ध्यान से दूर है,वो जीव,कभी भी आत्मा के सत्य को नहीं जान सकता।ये ही कारण है कि,हर क्षण,हजारों जन्म होते हैं,पर दूसरी ओर,एक भी आत्मा,"मुक्ति" नहीं पाती।
करोड़ों में,कोई एक पुरुषार्थी होता है,जो जन्म और मृत्यु के बंधन से,पार जाकर,"ब्रह्म" को प्राप्त करता है।
एक तथ्य और है इससे जुड़ा है,जो श्रीमद्भागवतम में बताया गया है कि,कलियुग के कई चरणों में,अनेक आत्माएं,मानव देह प्राप्त करती हैं,ताकि उन्हें एक बार का अंतिम मोक्ष अवसर मिले।ये "संघातिक मोक्ष काल" कहलाता है,जहां आत्माएं तीव्रता से जन्म लेती हैं,और ये संख्या–वृद्धि का भी कारण है।
शास्त्रों में एक और भविष्यवाणी है,जो बढ़ती मानवीय जनसंख्या की ओर संकेत देती है,"कलौ नृणां च पातकीनां प्रबलो भविष्यति वंशः",कलियुग में पापकर्मियों की संतान ही प्रबल होंगी।ये ही आज हो रहा है।जो आत्माएं महायुद्धों,बलात्कारों,और बर्बरता के लिए,उत्तरदायी थीं,वो पुनः लौट रही हैं,इस बार,
मनुष्य का मुखौटा पहने।
अंत में,ये भी स्मरण रहे कि,ये बढ़ती संवेदनहीन मानव जनसंख्या,एक "असंतुलित आत्मिक भार" है,पृथ्वी पर।
जब ये सीमा लांघेगी,तो प्रकृति,"संतुलन" स्वयं साधेगी,या तो महायुद्ध से,या महामारी से,या प्राकृतिक आपदाओं से,अभी देखिए,पिछले कुछ वर्षों से,इस तरह की घटनाएं घट रही हैं,जिसमें मानवीय हानि बहुत अधिक हो रही है,अभी आने वाले 7 वर्षों में,और उसमें भी,2025 के अंत से 2027 तक,बहुत प्रकार की घटनाएं घटित होंगी,जिसमें जनहानि होगी।ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि,धर्म और संतुलन ही सृष्टि के मूल तत्व हैं,यदि मानव उनका उल्लंघन करेगा,तो उसका पतन निश्चित है,और वो पतन,पुनः पशु–योनि या पाषाण में समा जाना है।
इसलिए आज जो "मानवता" दिख रही है,वो संख्या में है,परन्तु गुण में नहीं।आत्माएं लौट रही हैं,लेकिन चेतना से विरक्त,और ये ही है,इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी।
फिर मन में एक और प्रश्न आया था कि,संसार में,मानव योनि में जन्म लेने के पश्चात भी,जेहादी कौम में,जन्म कौनसी आत्माएं ले रही हैं?उनके पूर्वजन्म के कौनसे कर्म थे,जो उन्हें एक,ऐसे समाज का हिस्सा बनना पड़ा,जो "राक्षसी प्रवृति" का है,और जिसका अंतिम उद्देश्य,सर्वनाश है,क्या कर्म थे उनके,जो वो,इस कौम में जन्मे?
मित्रों,जेहादी प्रवृत्ति,वास्तव में "राक्षसी प्रवृति" की अभिव्यक्ति ही है,जितना सनातन इतिहास को,ध्यान से पढ़ोगे,जितना उसके गूढ़ रहस्यों को,आज के परिपेक्ष्य में भी,समझने का प्रयास करोगे,उतने उत्तर पाओगे,एक बार पुनः उन ग्रंथों–कथाओं में राक्षसी प्रवृति का वर्णन पढ़ो,तुम्हें जेहादियों से,उनकी अनेकों समानताएं दिखाई देने लग जाएंगी।
भगवद्गीता के १६वें अध्याय में,भगवान श्रीकृष्ण ने दो प्रवृत्तियों का वर्णन किया,दैवी और आसुरी।जो आत्माएं, अहंकार,क्रोध,हिंसा,मांसभक्षण,छल,और अधर्म में रत रही हैं,जो पिछले जन्मों में भी,धर्मद्वेषी,स्त्री–द्वेषी,सनातनविरोधी और सत्यद्रोही रही हैं,वो ही,ऐसी कौमों में जन्म पाती हैं,जहां बचपन से ही,उन्हें,"अन्य को मिटाने" का पाठ पढ़ाया जाता है।ये उनका कर्मफल ही है,जो उन्हें ऐसे कुल में जन्म देता है,जहां उनकी आत्मा का पाशविक पक्ष और अधिक पुष्ट होता है।ये वो आत्माएं होती हैं,जो सतत् धर्म से विमुख रही हैं।
मनुस्मृति कहती है कि,"धर्म एवे हतो हन्ति,धर्मो रक्षति रक्षितः"जो धर्म का नाश करता है,उसका नाश,धर्म करता है,और जो धर्म की रक्षा करता है,उसकी रक्षा धर्म करता है।जो आत्मा,धर्म के नाश में,भागीदार रही है,विचार से,कर्म से या संग से,वो कभी,किसी महान कुल या श्रेष्ठ धर्म में जन्म नहीं पाती।ये राक्षसी आत्माएं,पुनः उस कौम में,जन्म लेती हैं जहां,पाशविकता यानी पशुता को ही, "ईश्वरीय आदेश"(अल्लाह का हुक्म/ तक़दीर) कहा जाता है,जहां निर्दोषों की हत्या को,"पुण्य"(सवाब) समझा जाता है।
ये मनुष्य योनि,भोजन,भोग और दिशाहीन भ्रमण की प्रयोगशाला नहीं है।ये ब्रह्मांड का सर्वोच्च अवसर है,आत्मा की उन्नति,चित्त की शुद्धि और परमात्मा की प्राप्ति का साधन,लेकिन वामपंथी विचारधाराओं,पश्चिमी भोगवाद,और आधुनिक मनोरंजन–प्रधान संस्कृति ने,हमारे भीतर यह विष भर दिया है,“एक ही तो ज़िंदगी है... एंजॉय करो,पार्टी करो, जो मन करे वो करो... जिंदगी फिर नहीं मिलेगी दोबारा!”ये ही है वो सांस्कृतिक मृगत्रिष्णा,जो तुम्हें आत्मा से काटकर इंद्रियों का दास बना देती है।“दिन में सोओ,रात में जागो,हर बंधन तोड़ो,हर मर्यादा मिटाओ,जो चाहो खाओ–पीयो,जो चाहे करो,न सोचो,न समझो,मदहोश हो जाओ और मदहोशी में जियो।"ये मंत्र नहीं है मोक्ष का बंधु,ये मार्ग है मूढ़ता का।मनुष्य–जन्म को,"वन टाइम एंजॉयमेंट पास"समझ लेना,मानवता का नहीं,पशुता का परिचायक है।
सत्य ये है कि,जन्म एक नहीं है,जन्म अनेक हैं,पर मुक्ति एक से भी हो सकती है,यदि तुमने इसे सार्थक किया और यदि इसे व्यर्थ कर दिया,काम,क्रोध,मद,मोह में डूबकर,तो ये एक जन्म,तुम्हारे अगले सौ जन्मों पर,भारी पड़ेगा।आनंद भोग से नहीं,योग से आता है,स्वतंत्रता उच्छृंखलता में नहीं,संयम में फलती है और मोक्ष,नशे और मस्ती से नहीं,जागृति और आत्मचिंतन से मिलता है।इसलिए बंधु,“वन लाइफ वन चांस” को तत्त्व से समझो,ये एक ही जन्म तुम्हें मुक्ति दिला सकता है,बशर्ते तुमने इस समय को,इंद्रिय–भोग में नहीं,आत्मा की खोज में लगाया हो।
सत्य ये ही है बंधु कि,ये मनुष्य योनि,आत्म–उद्धार का अवसर है।लेकिन जो आत्माएं इसे भी,भोग का साधन बनाती हैं,और फिर क्रूरता,हिंसा,मूर्खता और अहंकार को अपना स्वभाव बना लेती हैं,वो या तो पशु–योनि में जाती हैं या राक्षसी प्रवृति वाले कुलों में जन्म लेती हैं।
मनुष्य के जन्म का निर्णय,उसके पिछले जन्मों के कर्म, विचार,संगति और मृत्यु के समय की चेतना तय करती है। अतः ये जीवन एक "भव–संधि" है,जहां से आत्मा,की अधोगति की ओर भी जा सकती है और ऊर्ध्वगति भी,वो प्रेत योनि और अन्य योनियों में भी जा सकती है,और मोक्ष भी प्राप्त कर सकती है,या प्रभु काज हेतु,यहां पुनः पुनः संसार में संतुलन बनाने के लिए आ सकती है।
जो आत्मा अभी भी यह सोच रही है कि,“बिना परिश्रम के धन मिल जाए","पराई स्त्री या पुरुष से भोग का अवसर मिल जाए","छल से यश और धन मिले","नशे में संसार भूल जाऊं"और,"मेरी वाणी से सभी डरें,भयभीत हों”वो आत्मा मोह–माया के गहरे कुहासे में,डूबी हुई है।
न तो वो आत्मा,स्वयं को जानती है,न ब्रह्म को।
ऐसी आत्मा पुनः इसी चक्र में लौटती है,कभी कुत्ता बनकर,कभी आतंकी बनकर,कभी ग़ुलाम बनकर,और तब तक लौटती है जब तक वो भगवद्गीता के अध्याय 3,श्लोक 35,को नहीं समझ लेती....
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अपने जन्मजात धर्म (स्वभावजन्य कर्तव्य) में यदि मृत्यु भी हो जाए तो वो श्रेष्ठ है,बजाय इसके कि,कोई दूसरे के धर्म (जो उसके लिए स्वाभाविक नहीं है) का पालन करे,चाहे वो दिखने में कितना ही उत्तम क्यों न हो,क्योंकि दूसरे का धर्म भय को जन्म देता है।
ये श्लोक,सनातन धर्म की उस अत्यंत गूढ़ सत्य को उद्घाटित करता है,जहां आत्मा को उसके स्वभाव,संस्कार,गुण,वर्ण, और पूर्वकर्मों के अनुसार,एक विशेष "कर्म–पथ" प्राप्त होता है,जिसे ही,"स्वधर्म" कहा गया है।स्वधर्म का अर्थ,मात्र जाति या पेशे से नहीं है,ये उस आत्मा के स्वभाव और पूर्वकर्मों से विकसित हुए कर्तव्यों का सम्मिलन है।जो आत्मा अपने स्वभाव के विपरीत,प्रलोभनों,भय,या दूसरों के अनुकरण में पड़कर कर्म करती है,वो अंततः भटक जाती है,और कर्म–बंधन में फंसकर,पुनर्जन्म का कारण बनती है।
अर्जुन यदि युद्ध छोड़कर,सन्यास ग्रहण कर लेता,तो वो स्वधर्म त्याग कर पर–धर्म में प्रवेश करता,तो अनिष्ट होता,इसलिए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उसे,युद्ध करने का,
आदेश दिया।
जो व्यक्ति "दूसरों जैसा" बनने की होड़ में,अपना स्वभाविक पथ त्याग देता है,वो न तो आत्मशांति पाता है,न परमगति।
आज की पीढ़ी,यदि अपने "स्वधर्म" (जो आत्मा के गुण, अभिरुचि,और प्रारब्ध से बनता है)को छोड़कर,केवल पैसे, दिखावे,या प्रसिद्धि के कारण,ऐसा कार्य करता है,जो उसके स्वभाव से मेल नहीं खाता,तो वो मोह और भय के जाल में, फंसकर,"आत्महंता" बनता है।
ये संसार मृत्यु का खेल है,परन्तु आत्मा अमर है।जो ये पहचान गया,वो ही मुक्त हो गया।बाक़ी सब फिर से,जन्म के अंधे कुएं में गिरेंगे और ये चक्र,सात जन्मों में नहीं,अपितु तब तक चलता है,जब तक आत्मा "स्व" को पहचान न ले,
जब तक,वो "सोऽहम्" को न जान ले।
ये ही कारण है कि,संसार आत्माओं से भरता जा रहा है,कुत्तों की अत्यधिक संख्या,जेहादी कौम में आत्माओं का जन्म,मानवता से शून्य मनुष्यों की भीड़,ये सभी,उसी अविचारित,अविवेकी,अदूरदर्शी जीवन के परिणाम हैं,जो पुनः उन्हें अधम योनि में धकेल रहा है।
यदि मनुष्य को इस चक्र से बाहर आना है,तो उसे कर्म की शुद्धि,आस्था की स्थिरता और आत्मा की खोज करनी होगी। अन्यथा,वो मात्र,योनि से योनि की ओर प्रवास करता रहेगा,कभी पशु बनकर,कभी राक्षस बनकर,और कभी वो मनुष्य बनकर भी,पशुता का जीवन जीता रहेगा।ये ही सनातन का परम तात्विक सत्य,और मैं हूं आपका तत्वज्ञ जो आपके साथ,इस तात्विक सत्य को समझने के लिए,तैयार हूं,ये यात्रा लंबी है,इस लेख की भांति,पर इस यात्रा में हम सब एक दूसरे से कुछ सीखें–सिखाएं,कुछ अनुभव साझा करें,तो इस लेख की भांति,ये यात्रा भी,कब समाप्त हो जाएगी,पता नहीं चलेगा,हम में से कुछ यहीं लौटेंगे,शायद कुछ को मोक्ष प्राप्त हो जाए,कुछ का मोक्ष यहीं लौटकर,प्रभु काज करने में ही है।आप सबकुछ जानकर,कौनसा निर्णय लेना चाहते हैं,ये आप पर निर्भर करता है,प्रभु बस साक्षी हैं,और सारथी भी,पर उन्हें अपना साथी और सारथी बनाने हेतु,
आपको अर्जुन बनना पड़ेगा,
बनेंगे आप कृष्ण के अर्जुन?🙂
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