Sunday, 19 July 2026

"उपनयन" जनेऊ

"उपनयन" शब्द एक संस्कारविशेष का नाम है। इसी विषय में भरद्वाज का कथन है-
"उपानयाख्यं यत्कर्म विद्यार्थं तदुदीरितम्॥"

विद्यार्थी के लिए जो संस्कार किया जाता है, वही उपनयन नाम से प्रसिद्ध है।

यह नाम व्युत्पत्तिमूलक है। इसका आधार उद्भिद्-न्याय है। भारुचि के अनुसार किसी शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार की मानी जाती है- भावव्युत्पत्ति और करणव्युत्पत्ति। इसे इस प्रकार समझना चाहिए- उप का अभिप्राय समीप है। आचार्य आदि के निकट बटु को ले जाना अथवा पहुँचाना उपनयन कहलाता है। अथवा जिस साधन के द्वारा बटु को आचार्य आदि के समीप पहुँचाया जाता है, उसे भी उपनयन कहा जा सकता है।
इसी विषय को विद्वानों ने इस प्रकार कहा है-
 "गुरोर्व्रतानां वेदस्य यमस्य नियमस्य च। देवतानां समीपं वा येनासौ नीयते द्विजः॥"
जिस संस्कार के द्वारा द्विज बालक गुरु, व्रत, वेद, यम, नियम अथवा देवताओं के समीप पहुँचाया जाता है, उसी का नाम उपनयन है। इन दोनों प्रकार की व्युत्पत्तियों में भावव्युत्पत्ति ही अधिक उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि वही श्रौतविधि के अभिप्राय के अनुरूप है। करणव्युत्पत्ति को स्वीकार करना उचित नहीं है, क्योंकि उससे अन्य वस्तुओं पर भी 'उपनयन' शब्द का प्रयोग होने लगेगा। फिर यह भी है कि करण का निर्धारण वक्ता की इच्छा पर निर्भर रहता है; इसलिए अनेक प्रकार की कल्पनाएँ सम्भव हो जाती हैं और शास्त्र का निश्चित अभिप्राय अस्थिर हो जाता है।
उदाहरण के रूप में, यदि "जिसके द्वारा समीप ले जाया जाता है" ऐसी करणव्युत्पत्ति स्वीकार कर ली जाए, तो कभी चलना, कभी कोई व्यक्ति और कभी स्वयं आचार्य भी 'उपनयन' कहलाने लगेंगे। ऐसी स्थिति में 'उपनयन' शब्द का निश्चित आशय समाप्त हो जाएगा और अनेक शास्त्रीय विषयों में अर्थ-भ्रम उत्पन्न हो जाएगा। संस्कार किसी अन्य वस्तु का नाम नहीं हो सकता, क्योंकि उसका स्वरूप संस्कार (शुद्धि एवं योग्यता प्रदान करने की क्रिया) है। अतः पूर्व में कही गई भावव्युत्पत्ति ही अधिक संगत और ग्राह्य है। यहाँ उपनयन का अभिप्राय यह है कि आचार्य द्वारा बटु का गायत्री-मन्त्र के माध्यम से संस्कार किया जाए। इसी कारण कात्यायन ने कहा है—

"गायत्र्या ब्राह्मणमुपनयीते।"

अर्थात् कि आचार्य ब्राह्मण बालक का गायत्री-मन्त्र द्वारा उपनयन करे। इस वचन में 'ब्राह्मण' (जिसका संस्कार किया जाना है) और 'गायत्री' (जिसके द्वारा संस्कार सम्पन्न होता है) के पृथक्-पृथक् निर्देश से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'उपनयन' शब्द का आशय केवल संस्कारविशेष ही है, किसी साधन अथवा अन्य वस्तु का नहीं।

इसी अभिप्राय को आपस्तम्ब ने भी व्यक्त किया है-
"उपनयनं विद्यार्थस्य श्रुतितः संस्कारः।।"

श्रुति के अनुसार विद्यार्थी का उपनयन एक संस्कार है। इसी उपनयन को मनु ने 'ब्रह्मजन्म' के रूप में निरूपित किया है। वे कहते हैं-

"तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्। 
तत्रास्य माता सावित्री 
पिता त्वाचार्य उच्यते॥"

जिस समय मौञ्जी (मुंजघास की मेखला) धारण कराकर उसका उपनयन किया जाता है, वही उसका ब्रह्मजन्म कहलाता है। उस आध्यात्मिक जन्म में सावित्री (गायत्री) उसकी माता और आचार्य उसके पिता माने जाते हैं।
इस प्रकार उपनयन केवल एक बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऐसा संस्कार है जिसके द्वारा बालक वेदाध्ययन, ब्रह्मचर्य और धार्मिक जीवन के लिए योग्य बनता है। इसी कारण धर्मशास्त्रों में इसे मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का दूसरा जन्म माना गया है।

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